सामाजिक व्यवस्था

हेमंत

वह औरत है। आज भी अंधेरे मुंह उठती है। शहर की संकरी गलियों में छिपते-छिपाते उन बीस घरों के पिछवाड़े पहुंचती है। गली में खुलते दरवाजे से पाखाना साफ करती है। चैबीस घंटे में जमा मल को बम्मा या टीन की बाल्टी में भरती है। और उसे सिर पर रख कर चुपचाप निकल जाती है। शुरू में कुछ परेशानी होती थी। मैला से भरा ‘बम्मा’ सिर पर रखकर संकरी गली से गुजरना! उफ! कच्ची, उबड़-खाबड़ गली, गड्ढे...
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