समाज के लिये मिसाल बनीं मालती

Thursday, November 19, 2015 - 08:45

सावित्री यादव

 

बुलन्द हौसले के साथ शुरू की गई हर लड़ाई का अंजाम अच्छा होता है। कुछ इसी धारणा के साथ फतेहपुर की मालती ने बदलाव की राह पर कदम बढ़ाया और मंजिल हासिल करके दम लिया। मालती ने न सिर्फ सामाजिक परिवेश बदलने का साहस जुटाया बल्कि नामुमकिन को मुमकिन करके दिखाया। उसने समाज की महिलाओं को नई दिशा दिखाई। उन्हें बता दिया कि मन में कुछ करने का जज्बा हो तो हर मंजिल हासिल की जा सकती है। आज स्थिति यह है कि मालती देवी अपने कार्यों के जरिए सिर्फ गाँव की ही नहीं बल्कि पूरे इलाके की चहेती बनी हैं। उसे लोग अपना मार्गदर्शक समझते हैं। मालती ने समाज की उन तमाम महिलाओं को नई राह दिखाई, जो सामाजिक ताने-बाने के बीच अपनी दर्द छुपाए सुबक रही थीं।

 

मालती के प्रयास से उन्हें समाज में जीने का हक मिला। वे पंचायत राज की असली अवधारणा को पूरी करने में अपनी भागीदारी निभा रही हैं। एक तरफ स्वच्छ एवं सुन्दर भारत का सपना साकार हो रहा है तो दूसरी तरफ समाज की मुख्यधारा से कोसों दूर रहने वाली महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर मिला है।

 

पंचायती राज की अवधारणा को पूरा करने के लिये गाँवों की स्वच्छता पर ध्यान देना जरूरी है। जब तक हमारे आसपास की गन्दगी दूर नहीं होगी तब तक स्वच्छता का सन्देश पूरा नहीं हो सकता है। मैला ढोने की प्रथा तो खत्म हो सकती है, लेकिन ग्राम पंचायतों में कूड़ा-करकट हटाने की भी जिम्मेदारी हर व्यक्ति को लेनी होगी। इसी जिम्मेदारी का अहसास कराने के अभियान में जुटी हैं फतेहपुर की मालती। इन्होंने मैला ढोने के काम में लगी महिलाओं को जागरूक कर उन्हें दूसरे कामों के जरिए स्वावलम्बी बनाया। अब वह नए सिरे से गाँवों में स्वच्छता की अलख जगा रही हैं। साथ ही बालिका शिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करने के अभियान में जुटी हुई हैं।

 

फतेहपुर की वाल्मीकि समाज में जन्मी मालती देवी ने बचपन से सिर पर मैला ढोते हुए परिजनों को देखा। इसके खिलाफ अभियान शुरू करने की ललक बचपन से ही रही। जब वह बड़ी हुई तो परिवार के बीच इस कार्य को छोड़ने की चर्चा की, लेकिन उन्हें हर बार समझा दिया जाता। न चाहते हुए भी वह चुप रहने को विवश हो जाती। धीरे-धीरे वक्त बीता तो सोचने और समझने की क्षमता भी बढ़ी। मालती ने गाँव के प्राथमिक स्कूल में जाने का सपना देखा। उसे परिवार के लोगों ने ऐसा करने से मना किया क्योंकि उस जमाने में मालती की बस्ती की कोई भी बच्ची स्कूल नहीं जाती थी। फिर भी जिद करके मालती ने स्कूल जाना शुरू किया। किसी तरह प्राइमरी शिक्षा हासिल कर पाई। इसके बाद परिवार के लोगों ने उसे पढ़ने की इजाज़त नहीं दी। फिर भी उसने घर में पढ़ना-लिखना नहीं छोड़ा। तय किया कि वह स्कूल भले नहीं जाएगी, लेकिन निरक्षर नहीं कहलाएगी। इसके लिये वह घर में कामकाज निबटाने के बाद जब भी वक्त मिलता किताबों के साथ जुट जाती। इसे लेकर कई बार परिवार के लोगों की झिड़की भी मिलती। फिर भी उसका मन पढ़ाई से खिन्न नहीं हुआ। वह हमेशा कुछ-न-कुछ पढ़ने के बारे में सोचती रही।

 

धीरे-धीरे बड़ी हुई तो पढ़ाई के साथ कुछ कर गुजरने का भी जज्बा पैदा होने लगा। ऐसे में मालती ने सामाजिक सरोकार के कार्यों से जुड़ना शुरू किया। सजातीय महिलाओं को इस घृणित कार्य के बजाय किसी दूसरे कार्य से जुड़कर स्वावलम्बी बनने को प्रेरित करना शुरू किया। वर्ष 2003 में विवाह के बन्धन में बंधी। घर-गृहस्थी सम्भालने के साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता भाई धीरज कुमार के सानिध्य में सामाजिक बदलाव की लड़ाई में सक्रिय रही। तय किया कि किसी भी कीमत पर मैला ढोने की प्रथा का विरोध करेंगी। इरादा पक्का था और हौसला बुलन्द। फिर भी सामाजिक बदलाव की इस राह में दिक्कतें भी हजार थीं। कभी परिवार से विरोध मिला तो कभी समाज से। लेकिन वह एक बार आगे बढ़ी तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैला ढोने की कुप्रथा को खत्म करने के लिये समाज की महिलाओं को स्वरोजगारपरक बनाने में तल्लीन हो गईं। मालती बताती हैं कि जब उसने इस दिशा में प्रयास किया तो उसके प्रयास को किसी ने नहीं सराहा। बल्कि लोग उसे परेशान करते। उसे सलाह देते कि आखिर ऐसी राह पर क्यों चल रही है, जो सम्भव ही नहीं है, लेकिन मालती का इरादा पक्का था। वह चाहती थी कि उसके परिवार की ही नहीं बल्कि पूरे समाज की महिलाओं को नई दिशा मिले। इस वजह से पीछे हटने के बजाय और तल्लीनता से सामाजिक जागरुकता में जुट गई। परिणाम यह रहा कि मौजूदा समय में शहर से इस कुप्रथा का एक तरह से सफाया हो चुका है। फतेहपुर जिले की गाजीपुर, असोथर जैसी बड़ी आबादी वाली ग्राम पंचायतों समेत 85 गाँवों में अब वाल्मीकि समाज की महिलाएँ मैला ढोने जैसे घृणित कार्य से खुद को आज़ाद कर चुकी हैं।

 

मालती को मिले तमाम सम्मान

 

मालती बताती हैं कि उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस काम में वह जुटी हैं, उसके एवज में उसे सम्मान मिलेगा। लेकिन इतना जरूर विश्वास था कि वह जिस राह पर चल रही हैं, उसमें कामयाबी जरूर मिलेगी। इसी विश्वास के साथ उसने समाज सेवा में अपनी भागीदारी बढ़ाई। मालती ने समाज के लिये जो योगदान दिया है उसके लिये उन्हें कई अवार्ड मिले। वर्ष 2013 में नेशनल फ़ाउंडेशन ऑफ इण्डिया की ओर से सी. सुब्रामण्यम फ़ेलोशिप अवार्ड हासिल कर उसने लोगों को चौंका दिया। इस पुरस्कार के मिलने के बाद तो उसकी पहचान जिले के साथ ही पूरे प्रदेश में होने लगी। जिस महिला को लेकर कल तक लोग तरह-तरह की बातें करते थे और उसके काम को बेकार का काम बता रहे थे, वे ही उसे बधाई देने पहुँचने लगे। मालती को यह बात बहुत अच्छी लगी। उसे लगा जैसे उसका सपना साकार हो रहा है।

 

इसके बाद तो उसने अपने कदम तेजी से आगे बढ़ाना शुरू किये। इसके बाद वाल्मीकि सुदर्शन समाज से कानपुर में उसे सम्मानित किया गया। इस पुरस्कार के साथ ही समाज के लोगों ने उसे सिर आँखों पर बैठा लिया। मालती बताती हैं कि इस पुरस्कार के बाद उसे पूरे देश से प्यार और सम्मान मिला। तमाम लोगों के पत्र आये। कई लोगों ने मोबाइल पर कॉल करके बधाई दी। उसके कार्यों को सम्बल मिलने लगा था। इसी बीच उसने अमर उजाला रूपायन अचीवर अवार्ड के लिये अपना नामांकन किया। इसमें भी उसे सम्मानित किया गया। अमर उजाला रूपायन अचीवर अवार्ड पूरे देश की उत्कृष्ट कार्य करने वाली महिलाओं को दिया जाता है। इस सम्मान के बाद तो उसकी पहचान पूरे देश में बन गई। इसी तरह वर्ष 2014 में सखी केन्द्र कानपुर व वर्ष 2015 में सोशल डेवलपमेंट फ़ाउंडेशन व राष्ट्रीय महिला आयोग की ओर से भी अवार्ड मिले। राष्ट्रीय स्तर पर अवार्ड मिलने के बाद तो मालती की पहचान पूरे देश में होने लगी। उसके कार्यों के बारे में लोग जानने लगे और उसे विभिन्न समारोहों में बुलावा आने लगा। इसी बीच उत्तर प्रदेश महिला शिक्षा और सुरक्षा अभियान अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। अब स्थिति यह है कि मालती के पास जिले से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के तमाम सम्मान हैं। वह इन अवार्ड के जरिए अपनी यश पताका फहरा रही हैं। मालती कहती हैं कि उनके काम को जिन लोगों ने भी पसन्द किया, उनकी हमेशा शुक्रगुज़ार रहेंगी। क्योंकि लोगों की पसन्द की वजह से उनका हौसला बढ़ा और वह विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ती रही। कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

 

भरे-पूरे परिवार के साथ खुश हैं मालती

 

फतेहपुर शहर के जयरामनगर मोहल्ले की निवासी मालती अपने पति प्रकाश के साथ रह रही हैं। एक बेटी और एक बेटा है। दोनों को वह उच्च शिक्षा दिलाना चाहती हैं। मालती अभी भी समाज की महिलाओं को जागरूक करने के अभियान में लगी हुई हैं। इसमें उसके पति भी पूरा सहयोग करते हैं। ससुर के हिस्से में मिली ज़मीन पर वह खेती करती हैं और उससे जीवीकोपार्जन चल रहा है। मालती कहती हैं कि आज उनका पूरा परिवार खुश है। शुरुआती दिनों में जिन दिक़्क़तों का उन्होंने सामना किया था, वह दूर हो गई हैं। अब परिवार में हर तरफ खुशहाली-ही-खुशहाली दिखती है। राष्ट्रीय-स्तर पर अवार्ड मिलने के बाद विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों की ओर से भी उसे काम मिला है। इस वजह से उसे दोहरा फायदा मिल रहा है। एक तो वह अपने अभियान को गति दे रही हैं तो दूसरी तरफ अपने आस-पास रहने वाली समाज की महिलाओं को स्वावलम्बी बनने के लिये जागरूक कर रही हैं। मालती कहती हैं कि पंचायती राज की अवधारणा तभी पूरी हो सकती है जब हर पंचायत में स्वच्छता की अलख जगे। इसी वजह से वह गाँव-गाँव में जाकर लोगों को स्वच्छता का सन्देश देती हैं। लोगों को बताती हैं कि अपनी स्वच्छता खुद रखें तो पूरा गाँव अपने आप स्वच्छ हो जाएगा। मैला ढोने की प्रथा की तरह ही कूड़ा-करकट हटाने के लिये किसी दूसरे के भरोसे बैठने की प्रवृत्ति भी खत्म करनी होगी। हमें अपनी ग्राम पंचायत में सहभागिता निभानी होगी। सहभागिता के दम पर ही पंचायत की स्वच्छता का सपना पूरा हो सकता है।

 

यह दिया पैगाम

 

मैला ढोने में लगी महिलाओं ने मालती से सवाल किये कि यदि वह इस पेशे को छोड़ देंगी तो करेंगी क्या? इस पर मालती का जवाब था कि पाने को बचा ही क्या है, सिवाय खोने के। सच तो यह है कि इस घृणित कार्य को करने से मान-सम्मान सब कुछ गँवाना पड़ रहा है। कुआँ, मन्दिर तो दूर दुकान में सामान लेने के दौरान अपमान के घूँट पीने पड़ते हैं। ऐसी जिन्दगी किस काम की जिसमें सिर्फ और सिर्फ जलालत हो। मालती कहती हैं कि उन्होंने महिलाओं को जागरूक किया। उन्हें बताया कि मैला ढोने के काम के अलावा भी हमारे आस-पास तमाम ऐसे काम हैं, जिन्हें हम कर सकते हैं। इन कामों के जरिए हमारा वक्त भी बदलेगा और जीवन जीने का नजरिया भी। मैला ढोने का बजाय तमाम महिलाओं ने सिलाई-कढ़ाई के साथ ही अचार, मुरब्बा बनाने आदि का काम सीखा। इन कामों के जरिए कुछ ने तो स्वयंसेवी संगठन बनाकर अपना काम शुरू कर दिया। इस काम से महिलाओं को रोज़गार मिला और वे स्वावलम्बी हो गईं। गाँव के लोगों के साथ ही आस-पास के गाँवों के लोगों को भी सस्ते दर पर उत्पाद मिलने लगे। इससे एक नई क्रान्ति की शुरुआत हुई।

 

मालती की ख़्वाहिश

 

मालती से जब यह पूछा जाता है कि उसकी ख़्वाहिश क्या है तो वह तपाक से सामने वालों से सवाल दागती हैं। कहती हैं कि आखिर वाल्मीकि समुदाय की महिलाएँ घृणित और गुलामी प्रथा से कैसे आज़ाद होंगी। कब इन्हें आज़ादी दिलाने के लिये समाज आगे आएगा। उनका यह सवाल तमाम लोगों को निरुत्तर कर देता है। क्योंकि यह सवाल केवल वाल्मीकि महिलाओं का न होकर देश की आधी आबादी का है। क्योंकि महिला चाहे वाल्मीकि हो या फिर अन्य समाज की, महिला तो महिला ही है। वह कहती हैं कि उसकी ख़्वाहिश है कि समाज की हर महिला पढ़ी-लिखी हो। वह अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाएँ। बेटों की तरह ही बालिकाओं को भी उच्च शिक्षा दिलाई जाये, ताकि यही बालिकाएँ आगे जाकर अपने हक की लड़ाई लड़ सकें, समाज को नई दिशा दे सकें। क्योंकि एक महिला दो परिवार को सँवारती और शिक्षित करती है। ऐसी स्थिति में जब हमारे आस-पास की महिलाएँ शिक्षित नहीं होंगी तो परिवार को साक्षर करने का सपना अधूरा रह जाएगा। मालती कहती हैं कि वह जहाँ भी जाती हैं, जिस भी गाँव में महिलाओं के बीच बैठती हैं, सभी को शपथ दिलाती हैं कि अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाएँ। बेटियाँ पढ़-लिख जाएँगी तो समाज के बीच पनपने वाली खाई अपने आप खत्म हो जाएगी। इसलिये वह शिक्षा को विकास के लिये सबसे जरूरी मानते हुए बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के अभियान में जुटी हुई हैं।

 

जमकर करें काम, कुछ बनकर दिखाएँ

जहाँ तक सवाल सरकारी नीतियों का है तो वह कागजी बनकर रह गई हैं। हाशिए पर खड़े वाल्मीकि समाज को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। मैंने पिछले कई साल काम करते हुए महसूस किया कि वाल्मीकि समुदाय व दलित बस्तियों में समस्याओं का अम्बार है। कोई सुनने वाला ही नहीं है। मेरा मानना है कि जिसका मुद्दा, उसी की लड़ाई और उसी की अगुवाई। ऐसी स्थिति में समाज की महिलाओं को सिर्फ सरकार के भरोसे नहीं बैठना चाहिए। सरकार रोज़गार के साधन उपलब्ध करा सकती है, लेकिन उसके लिये मेहनत तो हमें ही करनी होगी। जब तक हमारे हाथ मेहनती नहीं होंगे तब तक देश व समाज का विकास नहीं हो सकता है। इसलिये हर व्यक्ति को अपने स्तर पर मेहनत करनी चाहिए।

 

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं। विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं में सामाजिक एवं इनोवेशन से जुड़े मुद्दों पर नियमित लेखन कर रही हैं।

 

साभार : कुरुक्षेत्र नवम्बर 2015

TAGS