स्वच्छता की चुनौती

Monday, November 16, 2015 - 16:52

शैलेन्द्र चौहान

 

केन्द्र सरकार ने देश भर में स्वच्छता अभियान के लिये संसाधन जुटाने के लिये सेवा कर के दायरे में आने वाली सभी सेवाओं पर अधिभार यानी सेस लगाने का निर्णय किया है। यह सेस 0.5 प्रतिशत होगा और इसकी वसूली पन्द्रह नवम्बर से होगी। नीति आयोग में मुख्यमंत्रियों के समूह ने स्वच्छता अभियान के लिये पेट्रोल, डीजल पर दो फीसद सेस लगाने की सिफारिश की। वहीं कोल, एल्युमीनियम, आयरन ओर उत्पादन पर भी सेस की सिफारिश की गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख लोगों की मानव मल जनित बीमारियों से मृत्यु हो जाती है और इनमें पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की संख्या अधिक होती है।

 

विकासशील देशों में यह स्थिति अधिक दयनीय है। अतिसार से होने वाली कुल मृत्यु का एक चौथाई भाग अकेले भारत में है। यह तथ्य भी चौंकाने वाला है कि विश्व में लगभग दो सौ करोड़ जनसंख्या शौच सुविधाओं के बिना जीवनयापन करती है और उसकी एक बड़ी तादाद यानी 63 करोड़ लोग भारत के हैं। बिना शौच सुविधाओं के रहना अर्थात अपने आसपास के वातावरण को दूषित करना या ऐसे वातावरण में रहना जहाँ हवा में लगातार कीटाणु हों और गन्दगी में उन कीटाणुओं को पनपने के अवसर देना, लोगों का उनके सम्पर्क में आना और न चाहते हुए भी संक्रामक बीमारियों के घेरे में रहना इसका परिणाम है। खुले हुए गन्दे नाले, नदियों के जल में प्रदूषण, नगरों के बीच ठोस कचरे के पहाड़ और कारखानों से उत्सर्जित अपशिष्ट की मात्रा इसमें शामिल कर ली जाये तो एक बेहद अस्वच्छ देश की तस्वीर बनती है।

 

शोध बताते हैं कि बहुत हद तक कुपोषण भी अस्वच्छता का परिणाम है। ऐसा इसलिये कि संक्रमित जल और अस्वच्छता से उत्पन्न आँत के कीड़ों के विषाणु भोजन के पोषक तत्वों को शरीर में अवशोषित नहीं होने देते, जिससे रोग अवरोधकता कम हो जाती है। परिणामस्वरूप बच्चों का भौतिक विकास नहीं हो पाता। भारत में विश्व की उन्नीस प्रतिशत बाल जनसंख्या है और कुपोषण से पीड़ित कुल बच्चों का एक चौथाई भाग भी भारत में ही है। देश में गन्दगी के कारण अनेक बीमारियाँ फैलती हैं। जनस्वास्थ्य के बजट पर 6,700 करोड़ रुपए सालाना यानी 60 रुपए प्रतिव्यक्ति खर्च आता है।

 

महात्मा गाँधी ने अपने आसपास के लोगों को स्वच्छता बनाए रखने सम्बन्धी शिक्षा प्रदान कर राष्ट्र को एक उत्कृष्ट सन्देश दिया था। उन्होंने स्वच्छ भारत का सपना देखा था जिसके लिये वह चाहते थे कि भारत के सभी नागरिक एक साथ मिलकर देश को स्वच्छ बनाने के लिये कार्य करें। महात्मा गाँधी के स्वच्छ भारत के स्वप्न को पूरा करने के लिये, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया। इस अभियान का उद्देश्य अगले पाँच वर्ष में स्वच्छ भारत का लक्ष्य प्राप्त करना है ताकि गाँधीजी की 150वीं जयंती को इस लक्ष्य की प्राप्ति के रूप में मनाया जा सके। स्वच्छ भारत अभियान सफाई करने की दिशा में प्रतिवर्ष सौ घंटे के श्रमदान के लिये लोगों को उत्प्रेरित करता है। प्रधानमंत्री द्वारा मृदुला सिन्हा, सचिन तेंदुलकर, बाबा रामदेव, शशि थरूर, अनिल अम्बानी, कमल हासन, सलमान खान, प्रियंका चोपड़ा और तारक मेहता का उल्टा चश्मा की टीम जैसी नौ नामचीन हस्तियों को आमंत्रित किया गया कि वह भी स्वच्छ भारत अभियान में अपना सहयोग प्रदान करें। इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करें और अन्य नौ लोगों को भी अपने साथ जोड़ें, ताकि यह शृंखला बन जाये।

 

केन्द्र सरकार ने देश भर में स्वच्छता अभियान के लिये संसाधन जुटाने के लिये सेवा कर के दायरे में आने वाली सभी सेवाओं पर अधिभार यानी सेस लगाने का निर्णय किया है। यह सेस 0.5 प्रतिशत होगा और इसकी वसूली पन्द्रह नवम्बर से होगी। नीति आयोग में मुख्यमंत्रियों के समूह ने स्वच्छता अभियान के लिये पेट्रोल, डीजल पर दो फीसद सेस लगाने की सिफारिश की। वहीं कोल, एल्युमीनियम, आयरन ओर उत्पादन पर भी सेस की सिफारिश की गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख लोगों की मानव मल जनित बीमारियों से मृत्यु हो जाती है और इनमें पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की संख्या अधिक होती है।

 

महात्मा गाँधी ने एक बार कहा था, स्वच्छता आजादी से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, इस बात से इसके सापेक्षिक महत्त्व को समझा जा सकता है। अस्वच्छ परिवेश कई रोगों के फैलाव के लिये आधार बनाता है जो स्वच्छता के रूप में लोगों के कल्याण के साथ गहरा सम्बन्ध रखता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा है कि प्रदूषित पानी 80 प्रतिशत रोगों का मूल कारण है, जो अपर्याप्त स्वच्छता और सीवेज निपटान विधियों का परिणाम है। पानी की आपूर्ति और स्वच्छता भारत के संविधान के तहत 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों, के तहत राज्य का दायित्व है। राज्यों द्वारा यह दायित्व और अधिकार पंचायती राज संस्थानों (पीआरआई) और शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) को दिये गए हैं। आज भी बड़ी संख्या में लोग खुले स्थान पर मल त्याग करते हुए जलाशयों और पानी के अन्य खुले प्राकृतिक संसाधनों को सन्दूषित करते हैं। इससे प्रदर्शित होता है कि लोगों को स्वच्छता के महत्त्व पर जानकारी देने और शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में स्वच्छता पूर्ण विधियों के उपयोग की शिक्षा देने की आवश्यकता है। अपर्याप्त स्वच्छता सुविधाओं और जागरुकता की कमी के कारण अनेक स्वास्थ्य समस्याएँ होती हैं, मानवीय गोल कृमि और मानवीय हुक वॉर्म जैसे पेट के कीड़े पेट से सम्बन्धित बीमारियाँ फैलाते हैं। इस रोग की दर आमतौर पर अर्द्धशहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में कम आय वर्ग में बहुत अधिक होती है। स्वच्छता मानव विकास की मूलभूत पहचान है। यह उसकी सामर्थ्य का प्रतीक है और उसकी प्रगति का पैमाना भी है।

 

स्वच्छता एक मूलभूत मौलिक अधिकार और दायित्व दोनों है। 21वीं शताब्दी में जहाँ तकनीकी विकास और खुशहाली के नए आयाम खोजे जा रहे हैं, वहीं विश्व के किसी भाग में या समाज के किसी हिस्से में अस्वच्छ जल और अस्वच्छता जनित कारणों से बड़े पैमाने पर मृत्यु होना एक विडम्बना ही है। ‘स्वच्छता’ क्या है, यह एक वृहत शब्द है जिसमें व्यक्तिगत सफाई, मनुष्य और पशुओं के मल का समुचित निपटान, कूड़ा-करकट का उचित प्रबन्धन, जल निकासी का उचित प्रबन्ध और आरोग्ययुक्त जीवन में सहायक साफ-सुथरा निर्मल वातावरण आदि सम्मिलित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वच्छता का अभिप्राय मनुष्य के स्वस्थ निर्वहन को प्रभावित करने वाले भौतिक पर्यावरण के उचित प्रबन्धन से है। स्वच्छता मानव व्यवहार और वातावरण को साफ-सुथरा बनाए रखने के लिये भौतिक सुविधाएँ जैसे शौचालयों की व्यवस्था, बहते पानी की समुचित निकासी आदि शामिल हैं। सरकार के सेस लगाने से हर वह सेवा जो सर्विस टैक्स के दायरे में आती है महंगी हो जाएगी।

 

सरकार ने बजट के दौरान कहा था कि स्वच्छता सेस केवल उन्हीं पर लगेगा जिनकी आय अधिक है, लेकिन इस तरह के एलान ने सबको चकित कर दिया है। लेकिन यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सेस लगाकर जनता की जेब खाली करने मात्र से स्वच्छता अभियान सफल हो सकेगा। भारत में स्वच्छता एक बेहद पेचीदा और कठिन कार्य है। और जब तक इसके लिये सरकार मजबूत संकल्प के साथ स्वच्छता के लिये व्यावहारिक सांगठनिक और तकनीकी ढाँचा तैयार नहीं करती, यह प्रयास महज एक सद्विचार ही बना रहेगा। इसके लिये आधारभूत ढाँचा सरकार को ही तैयार करना होगा। इसमें कारपोरेट की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण होगी। कूड़ा उठाने की प्रक्रिया, उसकी डम्पिंग और रीसाइक्लिंग और हर दो सौ कदम पर कूड़ेदान लगाने और उन्हें नियमित साफ करने का काम नगर निगम ही कर सकेंगे, जनता नहीं। जबकि हम देख रहे हैं कि देश में नगरपालिकाओं और नगरनिगमों की कार्यप्रणाली पूरी तरह अव्यावहारिक और अवैज्ञानिक है। क्या उन्हें सुधारे बिना जनता पर अधिभार लगाने भर से यह अभियान अपेक्षित गति पकड़ सकेगा।

 

साभार : जनसत्ता 15 नवम्बर 2015

 

लेखक ईमेल: shailendrachauhan@hotmail.com

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