मैला ढोने की कुप्रथा से मुक्ति की आशा

Thursday, October 29, 2015 - 16:36

डॉ. श्रीनाथ सहाय

 

निर्मल अभियान से ही जुड़ी है सिर पर मैला ढोने जैसी कुप्रथा और इस कार्य में लगे लोगों की दयनीय व्यथा कथा। गाँधी दर्शन में, मैला ढोने वालों को इससे मुक्ति दिलाने, इनके जीवन के उत्थान, उन्नति पर प्रचुर बल दिया गया है।

 

सुबह-सुबह कुछ महिलाएँ अपने घरों से निकल पड़ती हैं, सर पर टोकरी, हाथ में झाड़ू लिए शुष्क शौचालयों की सफाई करने। मलबे को टोकरी में इकट्ठा कर अपने सर पर रख लेती ये महिलाएँ (और पुरुष भी)। आह, कितना दुखद दृश्य है, स्थिति है यह। यह अमानवीय प्रथा ना जाने कब से चली आ रही है, जो आज भी शेष है, विद्यमान है।

 

हमारी सोच सदा से रही है कि मेरे द्वारा की गई गन्दगी कोई अन्य साफ करे। इसी ‘सोच’ से उपजी हमारी ऊँच-नीच की प्रवृत्ति, छुआछूत की रीति। और इसके निमित्त हमने एक ‘सफाई कर्मचारी’ जैसे वर्ग का सूत्रपात किया। समाज ने इसे निम्न श्रेणी का दर्जा दिया और अस्पृश्य मान लिया यह अस्पृश्यता उन्हें दूसरा पेशा प्राप्त करने में बाधक रही है। सर पर टोकरी रखने का दर्द इन्हें सदियों से सता रहा है, अब ये महिलाएँ स्वयं जागृत हुई हैं और अपने दुःख-दर्द, छटपटाहट का प्रकटीकरण नाटकों, गीतों के माध्यम से कर रही हैं, ये महिलाएँ मंचों पर उतरने लगी हैं।

 

इस कार्य में लगे लोगों सम्बन्धी आँकड़ों में काफी भिन्नता है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में लगभग 24 लाख शुष्क शौचालय हैं, लगभग 1,80,657 लोग इस काम में लगे हैं, जिनमें 90 प्रतिशत महिलाएँ हैं। राज्यों की दृष्टि से अभी कई राज्य ऐसे हैं जहाँ यह प्रथा जारी है। देश के आठ से अधिक राज्य अभी भी इस प्रथा से मुक्त नहीं है। हिन्दी-बेल्ट में यह समस्या अधिक है। उत्तर प्रदेश में शुष्क शौचालयों की संख्या सर्वाधिक है। यहाँ 1,51,370 शुष्क शौचालय हैं। इस प्रदेश की राजधानी के नगर निगम ने अपने सर्वे (2013) में कहा कि इस शहर में मैला ढोने वालों की संख्या 37 है तथा यहाँ 450 शुष्क शौचालय हैं किन्तु एक गैर-सरकारी संस्था ‘सफाई कर्मचारी आन्दोलन’ के अनुसार ऐसे व्यक्तियों की संख्या 85 है और यहाँ 1100 शुष्क शौचालय हैं। इस काम में पुरुष, महिलाएँ बच्चे सभी लगे हैं। अविकसित क्षेत्रों में सेप्टिक टैंक अथवा सीवर लाइन नहीं है जिनमें मलबे को निपटाने की व्यवस्था हो। ऐसे शुष्क शौचालयों को फ्लश शौचालयों में परिवर्तित करने हेतु सरकार द्वारा करोड़ों रुपए का अनुदान दिया जा रहा है। मध्य प्रदेश के 506 परिवारों की महिलाएँ इस काम में लगी हैं। झारखण्ड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, नागालैंड, राजस्थान, उत्तराखंड में यह कुप्रथा प्रचलित है। शौचालय साफ करने के अतिरिक्त कुछ ऐसे भी गन्दे कार्य हैं जो पेशे से जुड़े लोगों को करने पड़ते हैं। यदि घरों में आधुनिक शौचालयों की व्यवस्था हो भी जाए तो भी ये शौचालय सीवर लाइन से जुड़े होते हैं जो आगे चलकर गटर में गिरते हैं। जब गटर का मलबा ऊपर से बहने लगता है तो इनकी सफाई हाथ से करनी होती है और इनका मलबा भी टोकरी में भरकर ढोना पड़ता है, कहीं अन्य स्थान पर गिराने हेतु।

 

इस पेशे में कार्यरत कर्मचारियों को साँस, अस्थमा, क्षय रोग, पीलिया, खाज जैसी बीमारियाँ जकड़ लेती हैं। दुर्गन्ध से बचने हेतु ये लोग खुशबूदार तम्बाकू, शराब, ड्रग्स का सेवन प्रारम्भ कर बैठते हैं जो आदत बन जाती है। मैला ढोने जैसा व्यवहार को देख डॉ. वेजवाड़ा विल्सन ने ‘सफाई कर्मचारी आन्दोलन’ नामक संस्था स्थापित की। इसके द्वारा राज्यों, न्यायालयों का विशेष ध्यान इस कुप्रथा के प्रचलन के प्रति आकृष्ट किया गया। इस संस्था ने सन 2013 में सर्वोच्च न्यायालय में राज्यों तथा रेलवे के विरुद्ध पी.एल.ए दाखिल किया कि इस प्रथा को समाप्त किया जाए, छुआछूत दूर हो। सर्वोच्च न्यायालय तथा मानवाधिकार आयोग ने इस समस्या को संज्ञान में लिया। दो बार कानून बनाए गए। इस दिशा में वास्तविक समस्या पुनर्वास की है। इनकी रोजी-रोटी कैसे चले जब तक दूसरा पेशा ना मिल जाए। जाएँ तो जाएँ कहाँ? राज्यों द्वारा स्वेच्छाकार विमुक्त पुनर्वास योजना के अंतर्गत अनुदान दिए जाते हैं, बैंकों द्वारा भी ऋण उपलब्ध कराया जाता है।

 

नई दिशा के सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिन्देश्वर पाठक ने इन महिलाओं के पुनर्वास हेतु अपनी संस्था ‘नई दिशा’ से इन्हें जोड़कर एक नई दिशा दिखाई है। इन्होंने अलवर (राजस्थान) में ऐसी महिलाओं के समूह को वैकल्पिक पेशे के रूप में सिलाई-कढ़ाई, अचार-पापड़ बनाना, मेहंदी लगाना तथा विभिन्न सौंदर्यीकरण आदि में प्रशिक्षित किया। इन महिलाओं को जो पहले मात्र 200-300 रुपये प्राप्त होते थे अब इन्हें 2700 रुपये तक की आय हो जाती है। इस प्रकार राजस्थान के अलवर तथा टोंक में यह प्रथा पूर्णतः समाप्त हो गई है। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग की सिफारिश के आधार पर इन्हें एक से 15 लाख तक का ऋण देने की व्यवस्था है, जिससे ये कृषि, मकान, बच्चों की उच्च शिक्षा का उचित प्रबंध कर सकें।

 

हमारी सोच सदा से रही है कि मेरे द्वारा की गई गन्दगी कोई अन्य साफ करे। इसी ‘सोच’ से उपजी हमारी ऊँच-नीच की प्रवृत्ति, छुआछूत की रीति। और इसके निमित्त हमने एक ‘सफाई कर्मचारी’ जैसे वर्ग का सूत्रपात किया। समाज ने इसे निम्न श्रेणी का दर्जा दिया और अस्पृश्य मान लिया यह अस्पृश्यता उन्हें दूसरा पेशा प्राप्त करने में बाधक रही है। सर पर टोकरी रखने का दर्द इन्हें सदियों से सता रहा है, अब ये महिलाएँ स्वयं जागृत हुई हैं और अपने दुःख-दर्द, छटपटाहट का प्रकटीकरण नाटकों, गीतों के माध्यम से कर रही हैं, ये महिलाएँ मंचों पर उतरने लगी हैं। दिल्ली में विभिन्न राज्यों से आई हुई महिलाओं ने अपने-अपने दर्द का चित्रण-प्रदर्शन किया, जो समान था, एक था, सबकी कहानी एक थी। इनमें अंतर्निहित झलक इन तथ्यों की थी ‘सामंती जातिप्रथा’, पितृसत्ता, मैला ढोने के मूल कारण हैं। यह ‘पेशागत हिंसा’ है। मैला ढोने की प्रथा के मूल में दो अभिप्रेरक कारक हैं, एक वैयक्तिक दूसरा सामाजिक। वैयक्तिक कारक हैं, उनकी गरीबी, आर्थिक विपन्नता जो अनिवार्य रूप से प्रेरित करती है इन्हें इस पेशे में बने रहने को, साथ ही इनके दैनिक जीवन की बुरी आदतें भी जिम्मेदार हैं। और समाज अपने हित में इन गरीब लोगों को यह कार्य करने को मजबूर करता रहा है।

 

इधर, इन दोनों पक्षों की सोच में परिवर्तन आया है। ये लोग भी अपने जीवन-स्तर के सुधार हेतु तत्पर, अग्रसर हैं और समाज का भी इन्हें ऊपर लाने का प्रयास है। हमारे प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी, स्वतन्त्रता दिवस पर, लालकिले से अपने प्रथम सम्बोधन में ‘स्वच्छ भारत’ का आह्वान किया है, बापू को स्मरण करते हुए। अब इस कुप्रथा से विमुक्ति की आशा साफ परिलक्षित होती है।

 

लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं।

 

साभार : कुरुक्षेत्र अक्टूबर 2015

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