स्वच्छ भारत मिशन में गायब व अधूरे शौचालय बड़ी बाधाएँ

Monday, October 5, 2015 - 15:33

राजु कुमार

 

पानी एवं स्वच्छता के मुद्दे पर मध्यप्रदेश में कार्यरत जलाधिकार अभियान ने स्वच्छ भारत मिशन के एक साल पूरे होने पर आज पत्रकार वार्ता में मिशन से जुड़ी कई चुनौतियों को साझा करते हुए कहा कि समस्याओं का समाधान जल्द ही नहीं किया गया तो तय समय में स्वच्छता के लक्ष्य को हासिल करना सम्भव नहीं होगा। और न ही लोगों की पहुँच में स्वच्छता सुविधाओं को उपलब्ध कराया जा सकता है। अभियान से जुड़े वरिष्ठ साथियों ने कहा कि गायब व अधूरे शौचालय स्वच्छता अभियान की बड़ी बाधाएँ हैं। संस्थागत स्वच्छता पर अभी कम ध्यान दिया जा रहा है। पानी के अभाव में शौचालय का उपयोग ग्रामीणों के लिए समस्या है। कमजोर आर्थिक स्थितियों वाले हितग्राही अपने पैसे से शौचालय बनाने में अक्षम हैं। स्थानीय स्वशासन एवं स्वैच्छिक संस्थाओं की भूमिका को कम किया गया है और बेहतर मॉनिटरिंग का अभाव है।

 

अभियान से जुड़े एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष रनसिंह परमार ने कहा कि स्वच्छता और पानी एक दूसरे के पर्याय हैं। इसलिए शौचालय के उपयोग के लिए पानी उपलब्ध होना बहुत ही जरूरी है। जहाँ कहीं भी शौचालय का निर्माण किया जा रहा है वहाँ पर पानी की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जाना बहुत ही जरूरी है। वर्तमान में कई इलाके सूखे की चपेट में हैं। पूर्व में बनाए गए शौचालय जो वर्तमान में ध्वस्त हो गए हैं या जिन्हें सिर्फ कागजों में बना हुआ दिखाकर पैसे निकाल लिए गए हैं और ग्रामीणों का नाम हितग्राहियों के रूप में जोड़ दिया गया है, उनके शौचालय निर्माण को लेकर स्वच्छ भारत मिशन के दिशा-निर्देश में कोई स्पष्टीकरण नहीं है। इसलिए गुम हो गए शौचालयों के हितग्राहियों और अत्यधिक गरीब परिवारों में किसी अन्य योजना से मिले शौचालय, जो ध्वस्त हो गए हैं, के स्थान पर नए शौचालय निर्माण का कार्य भी मिशन में जोड़ा जाना चाहिए।

 

एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष रनसिंह परमार ने कहा कि स्वच्छता और पानी एक दूसरे के पर्याय हैं। इसलिए शौचालय के उपयोग के लिए पानी उपलब्ध होना बहुत ही जरूरी है। जहाँ कहीं भी शौचालय का निर्माण किया जा रहा है वहाँ पर पानी की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जाना बहुत ही जरूरी है। वर्तमान में कई इलाके सूखे की चपेट में हैं।

 

व्यक्तिगत के साथ-साथ संस्थागत शौचालयों को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। प्रदेश में संस्थागत स्वच्छता की स्थिति बहुत ही खराब है। कई पंचायत भवनों में शौचालय नहीं है और कई जगहों पर इसका उपयोग नहीं किया जा रहा है। सरकारी दावे में प्रदेश की सभी शालाओं में शौचालय एवं बालिकाओं के लिए अलग शौचालय की उपलब्धता का दावा तो किया जा रहा है पर वास्तविकता इससे अलग है। श्योपुर के कराहल विकासखण्ड की 264 शालाओं का सर्वे किया गया है, जिसमें महज 31 फीसदी शालाओं में ही बालिकाओं के लिए अलग से शौचालय थे। 12 फीसदी शालाओं में शौचालय ही नहीं है। 142 शालाओं में शौचालय अनुपयोगी है।

 

समर्थन संस्था के निदेशक डॉ. योगेश कुमार ने कहा कि खुले में शौच करने की प्रथा से मुक्ति के लिए सबसे पहली प्राथमिकता व्यवहार परिवर्तन को देनी होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के व्यवहार परितर्वन के लिए व्यापक पैमाने पर काम करने की जरूरत है। इसमें स्वैच्छिक संस्थाओं की बड़ी भूमिका है। मिशन की प्रगति एवं क्रियान्वयन में ग्राम, पंचायत, ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर स्वैच्छिक संस्थाओं एवं बुद्धिजीवियों की भूमिका को प्रभावी बनाने की जरूरत है। मिशन में पर्याप्त मानव संसाधन की कमी है। इस कमी को दूर किए बिना स्वच्छता अभियान को मिशन के रूप में चलाना मुश्किल है।

 

 

सरकार ने 2015-16 के लिए प्रदेश में शौचालय निर्माण के लिए जो लक्ष्य रखा है, उसमें से महज 12 फीसदी ही अभी पूरा किया जा सका है। इतनी धीमी गति के पीछे मानव संसाधन की कमी और क्रियान्वयन में आ रही समस्याएँ बड़ी बाधाएँ हैं। इसलिए इसमें स्वैच्छिक संस्थाओं की मदद ली जा सकती है। गायब एवं खराब शौचालयों पर अंकुश लगाने के लिए सामाजिक अंकेक्षण को ज्यादा प्रभावी बनाने की जरूरत है। स्वच्छता में पंचायतों की भूमिका को सीमित करने के बजाय उन्हें प्रभावी बनाया जाना चाहिए और ठेकेदारों की भूमिका को पंचायतों के अधीन करने की जरूरत है। ग्राम स्वच्छता समितियों को भी सक्रिय किया जाना चाहिए। मिशन के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए संचार, शिक्षा एवं संवाद की सामग्रियों में स्थानीय आवश्यकता के अनुरूप सन्देश एवं भाषा का चयन हो।

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