करोड़ों गये कूड़े में

Saturday, September 19, 2015 - 16:41

अनिल सिंदूर

 

उत्तर प्रदेश में स्थापित 19 सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट संयंत्र ने काम करना बन्द कर दिया है। संयंत्र बन्द हो जाने के कारण जहाँ 19 शहरों में कूड़े का प्रबंधन बन्द हो गया है, वहीं केन्द्र तथा राज्य सरकार के करोड़ों रुपए कूड़े में चले गये हैं। बनारस नगर निगम ने जैसे ही निजी संस्थान का करार रद्द करने का नोटिस दिया, कम्पनी उच्च न्यायालय चली गई। प्रदेश सरकार ने विवाद बढ़ता देख कानपुर नगर आयुक्त को निर्देश दिए कि निजी संस्थान के खिलाफ जो भी कार्यवाही की गई है उसकी विस्तृत रिपोर्ट भेजें ताकि आर-पार की लड़ाई लड़ी जा सके।

 

बढ़ती आबादी ने जहाँ एक ओर खाद्य पदार्थों का संकट खड़ा किया है वहीं खेती लायक जमीन के क्षेत्र को भी कम किया है। एक सर्वे के अनुसार यदि इसी तरह आबादी बढ़ती रही तो वर्ष 2050 तक खेती लायक जमीन कुल भूमिक्षेत्र का एक चौथाई ही रह जाएगा। बाकी बची जमीन कूड़े के डम्पिंग ग्राउंड बन जाएंगे। क्योंकि हर व्यक्ति 24 घंटों में 400 ग्राम कूड़ा उत्पन्न करता है।

 

सर्वे से निकलने वाली भयावहता को देखते हुए उच्चतम न्यायालय ने केन्द्र सरकार को निर्देश दिए कि कूड़े का हर सम्भव प्रबंधन किया जाये। उच्चतम न्यायालय से मिले निर्देश को मद्देनजर रख केन्द्र सरकार ने वर्ष 2000 में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट एक्ट-2000 बनाया। जिससे कूड़ा प्रबंधन पर कारगर दबाव बनाया जा सके। तमाम जद्दोजहद के 10 वर्ष बाद उत्तर प्रदेश के सबसे गन्दे शहर कानपुर में जेएनएनआरएम योजना के तहत पहला पीपीपी मॉडल सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट संयंत्र कानपुर नगर निगम, जल निगम की कार्यदायी संस्था सीएंडडीएस तथा ए2जेड इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने स्थापित किया। इसने सितम्बर 2010 से शहर में काम करना शुरू किया। संयंत्र को स्थापित करने तथा कूड़ा संयंत्र तक ले जाने में लगने वाले संसाधन का 70 प्रतिशत खर्च केन्द्र तथा राज्य सरकार ने जुटाया जबकि 30 प्रतिशत निजी कम्पनी को जुटाना था। केन्द्र तथा राज्य सरकार ने 56 करोड़ रुपए दिए। काम की गति को देखते हुए पहले ही वर्ष में कानपुर शहर को ‘इम्प्रूवमेंट इन सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट 2011’ के पुरस्कार से पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने नवाजा। जैसे ही केन्द्र सरकार से पुरस्कार मिला निजी संस्थान ए2जेड इन्फ्रास्ट्रक्चर लि. को उत्तर प्रदेश कि बसपा सरकार ने जल्दीबाजी में 19 शहरों का काम दे दिया। इसी एक वर्ष में ए2जेड के कानपुर संयंत्र ने जैविक खाद का निर्माण दिखा, शेयर बेचकर करोड़ों रुपए कम्पनी के खाते में डाल दिए।

 

जनता पशोपेश में थी कि वर्षों से जो कार्य नगर निगम करता आ रहा है उसके यूजर चार्ज का जनता भुगतान वह क्यों करे। जनता को लगा कि यह अतिरिक्त बोझ है और निजी संस्था अपनी तिजोरी भरेगी। जबकि इसी यूजर चार्ज से निजी संस्था को भुगतान किया जाना था। यदि सभी घरों तथा व्यापारिक प्रतिष्ठानों से कूड़ा उठाने का कार्य ए2जेड ने किया होता और सभी ने यूजर चार्ज दिया होता तो यूजर चार्ज लगभग दो करोड़ रुपए तक एकत्रित होता।

 

मालूम हो कि कानपुर का कूड़ा संयंत्र उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा 1500 टन क्षमता का संयंत्र था। कानपुर को कम्पनी ने अपना मुख्य केन्द्र बनाया। गड़बड़ी शुरू हुई दूसरे वर्ष से। जब नगर निगम कानपुर ने ए2जेड को टिपिंग फीस देना कम कर दिया क्योंकि अनुबंध के हिसाब से नगर निगम को जनता से वसूले जाने वाले यूजर चार्ज से ही टिपिंग फीस (नगर के कूड़ा घरों तथा घरों से निकलने वाले कूड़े को संयंत्र तक ले जाने का चार्ज) देना था लेकिन जनता से यूजर चार्ज ए2जेड नहीं वसूल पाया।

 

 

 

ए2जेड ने यूजर चार्ज न वसूल पाने का ठीकरा नगर निगम के सिर फोड़ दिया और आरोप लगाया कि नगर निगम ने उसे अपेक्षित सहयोग नहीं दिया। जबकि वास्तविक स्थिति इससे इतर है। न तो नगर निगम ने ही और न ए2जेड ने ही जनता को जागरूक करने की ज़हमत उठाई। इधर जनता पशोपेश में थी कि वर्षों से जो कार्य नगर निगम करता आ रहा है उसके यूजर चार्ज का जनता भुगतान वह क्यों करे। जनता को लगा कि यह अतिरिक्त बोझ है और निजी संस्था अपनी तिजोरी भरेगी। जबकि इसी यूजर चार्ज से निजी संस्था को भुगतान किया जाना था। यदि सभी घरों तथा व्यापारिक प्रतिष्ठानों से कूड़ा उठाने का कार्य ए2जेड ने किया होता और सभी ने यूजर चार्ज दिया होता तो यूजर चार्ज लगभग दो करोड़ रुपए तक एकत्रित होता। ए2जेड के लिए तो बेहतर सौदा होता ही साथ ही नगर निगम के लिए भी यह फायदे का सौदा होता।

 

सार्थक कदम न तो ए2जेड ने उठाये और न ही नगर निगम ने। दोनों ही एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे। यूजर चार्ज न देने वालों पर लगाम लगाने को सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट एक्ट-2000 में प्रावधान था कि नगर निगम 20 गुना तक समन शुल्क वसूल सकती थी लेकिन एक्ट के नियमों को भी लागू करने की जहमत नगर निगम ने नहीं उठाई।

 

ए2जेड ने कानपुर संयंत्र को मॉडल मानते हुए तमाम ऐसे प्रयोग किये जो अन्त में असफल होने ही थे। नगर निगम की आँखों के सामने असफलता के प्रयोग होते रहे। लेकिन उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया। निजी संस्था ने नगर निगम को भरोसे में लेकर तमाम ऐसे काम किये जो अनधिकृत थे। फिर भी ऐसे कार्य किये जाते रहे जैसे कि यूजर चार्ज को निजी कार्यो में उपयोग करना, वाहनों को दूसरे शहरों में प्रयोग होने देना, वाहनों का मेंटेनेंस न होना। जिन नगर निगम ने वाहनों को अपने नाम नहीं करवाया उस जगह ए2जेड ने वाहनों पर बैंकों से फाइनेंस भी करवा लिया।

 

ए2जेड को नगर से कूड़ा ले जाकर उसका प्रबंधन करना था। लेकिन प्रबंधन लाभ का सौदा न होते देख उसने उसे बन्द कर दिया। जब नगर निगम ने काम खत्म करने का नोटिस दिया तो ए2जेड इस आदेश को लेकर उच्च न्यायालय चला गया। उत्तर प्रदेश सरकार अभी तक केवल तमाशा देख रही थी। जब उसने देखा कि ए2जेड काम तो कहीं कर नहीं रहा है और जब नोटिस दिया तो आँखे दिखा रहा है। यह देख उसने आर-पार कि लड़ाई लड़ने का मन बनाते हुए कानपुर नगर निगम से जानकारी माँगी कि कि उन्होंने ए2जेड पर क्या कार्यवाही की है।

 

ज्ञात हो कि उत्तर प्रदेश में ए2जेड कानपुर, बनारस, गाजियाबाद, मेरठ, अलीगढ़, बस्ती, मुजफ्फरनगर, बलिया, बदायूँ, जौनपुर, मिर्जापुर, मुरादाबाद तथा फतेहपुर में काम कर रहा था।

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