जनअभियान के बगैर निदान नहीं

Sunday, September 6, 2015 - 15:52

यथावत संवाददाता

 

कहने और सुनने से स्वच्छता एक साधारण सा शब्द है। लेकिन आचरण में उतारने के लिए संस्कार और समझ भी चाहिए। इसके ही अभाव को दूर करने के लिए एक कार्यशाला लखनऊ में आयोजित की गई। वहाँ पर राय बनी कि स्वच्छता को जनांदोलन बनाने के लिए माहौल बदलना होगा। इसके लिए पहल आश्रम, पाठशाला और घर से करनी होगी। क्योंकि हर कोई शुरुआती शिक्षा यहीं से हासिल करता है।

 

कार्यक्रम का आयोजन जीवा (ग्लोबल इंटरफेथ वाश एलियांस) और संयक फाउण्डेशन के सहयोग से यूनिसेफ ने किया था। यूनिसेफ स्वच्छता को लेकर काफी समय से अभियान चला रहा है। लेकिन यह वह रूप धारण नहीं कर सका जिसकी उसे दरकार थी। इसलिए संगठन ने समाज के प्रभावशाली व्यक्तियों को जोड़ने का काम शुरू किया। इसी क्रम में विभिन्न धर्म के धर्मगुरुओं को एक मंच पर लाने की कवायद शुरू हुई।

 

इसकी खास वजह थी। इन लोगों का समाज पर प्रभाव होता है। इनकी बातों को लोग सुनते है और उस पर अमल करते है। लिहाजा धर्मगुरुओं को चुना गया और नवम्बर 2013 में जीवा की नींव रखी गई। स्वामी चिदानन्द सरस्वती इसके सह-संस्थापक है। जीवा इण्डिया 2014 में गठित हुआ। इसके कार्यक्षेत्र में उन सभी लोगों को शामिल किया गया जो वाश (जल, स्वच्छता, हाइजीन) को आन्दोलन का स्वरूप देने में सहयोग कर सकते हैं। उनमें से ही एक मीडिया है। इसे लेकर पहला कार्यक्रम दिल्ली में हुआ था। उसमें मीडिया क्षेत्र के कई सम्पादकों ने भाग लिया। यहीं पर राय बनी कि स्वच्छता को जनान्दोलन बनाने के लिए क्षेत्रीय मीडिया को भी जोड़ना होगा। इसी के तहत लखनऊ में क्षेत्रीय सम्पादकों की धर्मगुरुओं के साथ गोलमेज वार्ता हुई। इसमें तीन राज्यों और एक केन्द्र शासित प्रदेश (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली) के पत्रकारों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला का विषय ‘मीडिया एण्ड फेथ: क्रीयेटिंग ए सोशल मूवमेंट’ था। कार्यक्रम की औपचारिक शुरूआत यूनिसेफ इण्डिया की कम्यूनिकेशन मुखिया करोलाइन डेन डक के सम्बोधन से हुई। लेकिन स्वच्छता की गम्भीरता को समझाने के लिए पहले वृतचित्र दिखाया गया। उसके बाद धर्मगुरुओं का सम्बोधन आरम्भ हुआ। जीवा के सह-संस्थापक और धर्मगुरु स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा ‘झाड़ू उठाना नहीं बल्कि झाड़ू बन जाना है। इसलिए जरूरत माहौल बदलने की है। इसकी शुरुआत मोहल्ले से करनी होगी। क्योंकि मोहल्ले के बदलने से ही मुल्क बदलेगा।’ उन्होंने आगे कहा कि धर्म पर आस्था रखने वाले करोड़ो लोग है लेकिन उससे भी ज्यादा मीडिया पर भरोसा करने वाले लोग हैं। सुबह उठकर ज्यादातर लोग पूजा करने से पहले देश-दुनिया की खबर से रूबरू होते है। इसलिए मीडिया मेरी आशा है। जहाँ तक धर्माधिकारियों की बात है तो उन्हें भी सोचना होगा कि समय बदल गया है। अब हनुमान चालीसा से सफाई चालीसा की ओर बढ़ना होगा। लोगों को भी सोचना होगा तर्पण में पेड़ा के बजाए पेड़ बाँटे।

 

वह लखनऊ शहर का मशहूर होटल पिकाडिली था, जहाँ मीडिया और धार्मिक क्षेत्र के धुरंधर चर्चा कर रहे थे। उद्देश्य मीडिया और धार्मिक क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों को जोड़कर उस बिन्दु की तलाश करना था, जहाँ से स्वच्छता को जनांदोलन का रूप दिया जा सके

 

चिदानन्द सरस्वती के स्वर में स्वर जैन धर्मगुरु आचार्य लोकेश मुनिजी ने भी मिलाया। उन्होंने कहा, ये सही है कि कई बदलाव कानून से आते है लेकिन कई बदलाव सिर्फ कानून से नहीं आते है। उसके लिए दृष्टिकोण बदलना पड़ता है। इसलिए जरूरत नजरिया बदलने की है। तभी स्वच्छता को हासिल किया जा सकता है। निरोगी काया के लिए यह बहुत जरूरी है। वे आगे कहते हैं कि निरोगी काया का सम्बन्ध सिर्फ धर्म, स्वास्थ्य और समृद्धि से ही नहीं है बल्कि शान्ति से भी है। इस मौके पर मौलाना सईद कलबे सादिक ने भी बड़ी बेबाकी से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि निसन्देह मीडिया और महात्मा दो बड़ी ताकतें है। क्योंकि ये जनता के विचार को आकार देती है। उन्होंने धर्मगुरुओं से अपील की, कि अब कहने का समय नहीं करने का वक्त आ गया है। हमें स्वच्छता के लिए मुहिम छेड़नी होगी। इसके लिए हम धर्मगुरुओं को आगे आना होगा। वजह साफ है। हम जो करते है उसी का अनुसरण किया जाता है। इसलिए स्वच्छता को लेकर पहल हमें ही करनी होगी। उन्होंने तो यहाँ तक कह डाला कि आगे से जब मैं घर से निकलूँगा तो साथ में टोकरी भी रखूँगा ताकि आस-पास की गन्दगी को खुद साफ कर सकूँ। कुछ इसी तरह की राय सुन्नी गुरु ने भी रखी। बौद्ध धर्मगुरु सुमेधा थेरोजी ने कहा 2600 साल पहले महात्मा बुद्ध ने आठ सबसे पुण्य काम का जिक्र किया था। स्वच्छता उसमें से एक है। उस समय भी हिमालय क्षेत्र ने इसके लिए अलख जगाई थी और इस समय भी आवाज वहीं से उठी है। सुमेधा की बात के साथ ही सन्तों की आपसी परिचर्चा समाप्त हो गई। इसके बाद कार्यक्रम का अगला खण्ड शुरू हुआ। इसमें मीडिया और महात्मा के बीच संवाद हुआ। संवाद का मसला था कि कैसे दोनों मिलकर स्वच्छता को जनाभियान बनाए। इस मुद्दे पर मीडिया जगत से आए दिग्गजों ने अपना-अपना मत व्यक्त किया। कुछ पत्रकारों का मानना था कि स्वच्छता पर कोई सार्थक काम तभी हो सकता है जब धर्मगुरु आगे बढ़ेगें। क्योंकि उनकी बातें सुनी जाती है और वे जैसा कहते है वैसा लोग करते हैं।

 

नवोदय टाइम्स के सम्पादक अकू श्रीवास्तव ने कहा कि कोई भी धर्मगुरु अपने प्रवचन में स्वच्छता का पाठ नहीं पढ़ता है। उन्होंने कहा कि कम से कम मेरे ध्यान में तो ऐसा कोई वाकया नहीं है। कमोबेश ऐसी ही राय कई अन्य पत्रकारों ने भी रखी। स्वच्छता पर सरकारी रवैए को लेकर भी वहाँ पर तीखी बहस हुई। बहस इतनी लम्बी खिंच रही थी कि मुद्दा पीछे छूटता जा रहा था। हालाँकि परिचर्चा के संचालक और संयक फाउण्डेशन के कर्ताधर्ता राहुल देव ने उसे दुबारा पटरी पर लाने का प्रयास किया। लेकिन जिस मंच पर राजनीतिक पत्रकार बैठे हो वहाँ पर सरकार के कामकाज पर टीका टिप्पणी कैसे रूक सकती है। हुआ भी यही। पर इतना जरूर है कि मुद्दा परिचर्चा का केन्द्र बना रहा। महात्मा और पत्रकार दोनों इस बात पर सहमत हुए कि एक-दूसरे का सहयोग करना होगा। तभी इस मसले पर अपेक्षा अनुरूप सफलता हासिल की जा सकती है।

 

साभार : यधावत 1-15 सितम्बर 2015

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