खुले में शौच से मुक्त हुआ जरैला गाँव

Friday, August 21, 2015 - 11:41

रामचरण धाकड़

 

स्वच्छ भारत अभियान के लक्ष्य को पूरा करने के लिए लुपिन फाउण्डेशन संस्था ने भरतपुर जिले के रूपवास पंचायत समिति के जरैला गाँव को स्वच्छ, साफ-सुथरा बनाने एवं खुले में शौच जाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए सभी घरों में 102 शौचालयों का निर्माण कराया है तथा गाँव के प्रमुख मार्गों पर प्रतिदिन साफ-सफाई कराने की व्यवस्था भी ग्रामीणों के सहयोग से शुरू की है। संस्था प्रयास कर रही है कि जरैला गाँव में निर्मित शौचालयों का शत-प्रतिशत उपयोग हो। इसके लिए ग्रामीणों को शौचालयों की उपयोगिता समझाई जा रही है। इन शौचालयों के निर्माण पर लुपिन ने हैबिटेट फॉर ह्यूमैनिटी ऑफ इण्डिया (एचएफएचआई) के सहयोग से करीब 20 लाख रुपये खर्च किए हैं।

 

जरैला गाँव में अन्य गाँवों की तरह लगभग सभी ग्रामीण खुले में शौच के लिए जाते थे। गाँव में मात्र तीन घरों में शौचालय बने हुए थे जिनका उपयोग केवल मेहमानों के लिए किया जाता था। मेहमानों के आने पर इन्हें खोल दिया जाता और उनके जाने के बाद इन पर ताला लगा दिया जाता। यही स्थिति स्कूल में बने शौचालयों की थी जिसका उपयोग विद्यालय के कर्मचारी करते थे। विद्यार्थियों को इसके उपयोग के लिए प्रतिबन्ध लगा रखा था। खुले में शौच जाने से विशेषकर महिलाओं को बहुत परेशानी होती थी। खराब मौसम या बीमारी के समय तो महिलाओं को शौच जाने में काफी तकलीफ उठानी पड़ती थी। यद्यपि गाँव में सरकार द्वारा संचालित सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत शौचालय निर्माण के लिए अनुदान देने की व्यवस्था थी लेकिन किसी ने भी इस अनुदान राशि को इसलिए प्राप्त नहीं किया कि इतनी कम राशि से शौचालय का निर्माण नहीं हो सकता तथा इसे प्राप्त करने के लिए लम्बी कागजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था।

 

लुपिन फाउण्डेशन ने तय किया कि रूपवास पंचायत समिति क्षेत्र के दूरदराज के जरैला गाँव को खुले में शौच जाने से मुक्त गाँव बनाया जाए। इस निर्णय के बाद संस्था ने ग्रामीणों के साथ बैठक आयोजित की और उन्हें खुले में शौच जाने से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की विस्तार से जानकारी दी और बताया कि कुछ बीमारियाँ खुले में शौच जाने से आती हैं। यदि गाँव के लोग खुले में शौच नहीं जाएँ तो वे अधिक स्वस्थ रह सकते हैं। ग्रामीणों को अपने आस-पास प्रमुख रास्तों पर साफ-सफाई रखने का महत्व भी समझाया तथा बताया गया कि संस्था गाँव के सभी 102 घरों में उच्च गुणवत्ता का टू-इन्स-पीट वाले शौचालयों का निर्माण कराएगी। प्रत्येक शौचालय पर करीब 20-20 हजार रुपये खर्च किए जाएँगे। निर्माण के लिए राशि हैबिटेट फॉर ह्यूमिनिटी ऑफ इण्डिया (एच.एफ.एच.आई) द्वारा उपलब्ध कराई जाएगी। इनके रख-रखाव की दृष्टि से प्रत्येक लाभार्थी से 2-2 हजार रुपये की सहयोग राशि दी जाएगी।

 

ग्रामीणों की बैठक में संस्था ने सभी से वचन लिया कि वे इन शौचालयों का शत-प्रतिशत उपयोग करें तथा कोई भी ग्रामीण शौच के लिए बाहर नहीं जाएगा। बैठक में ग्रामीणों ने शौचालय के लिए पानी संग्रहण के लिए टंकी उपलब्ध कराने की माँग रखी तो संस्था ने प्रत्येक शौचालय के निकट सीमेंट की एक हजार लीटर की क्षमता वाली टंकी बनवाने का निर्णय लिया ताकि ग्रामीण शौच के लिए इस टंकी में भरे पानी का उपयोग कर सकें। सभी ग्रामीणों ने तय किया कि वे अपने घरों एवं आस-पास तथा प्रमुख मार्गों की प्रतिदिन प्रातः के समय साफ-सफाई करेंगे।

 

बैठक में लिए गए निर्णय के एक पखवाड़े बाद ही जरैला गाँव में शौचालयों का निर्माण शुरू हो गया और मात्र ढाई माह में गाँव के सभी 102 घरों में शौचालयों व पानी की टंकी का निर्माण करा दिया गया। सभी शौचालयों को आकर्षक रंगों से पुतवाया गया है। प्रत्येक पर क्रम संख्या भी अंकित की गई। शौचालयों का निर्माण होते ही अब गाँव के सभी लोग अपने घरों में नवनिर्मित शौचालयों में शौच जाने लगे हैं। साथ ही ग्रामीणों की बनी समिति सूर्योदय से पहले गाँव के प्रमुख रास्तों की न केवल साफ-सफाई करती है बल्कि गन्दगी फैलाने वालों को हिदायत भी देती है। यह समिति यह भी ध्यान रखती है कि गाँव का कोई व्यक्ति खुले में शौच करने तो नहीं जा रहा। यदि ऐसा किसी ने किया तो समिति उस पर जुर्माना भी कर सकती है।

 

जरैला गाँव के प्रत्येक घर में शौचालयों के निर्माण के बाद गाँव के सभी लोग इतने खुश हैं कि उन्हें दूसरे गाँव के लोगों को यह बताने में गर्व महसूस होता है कि उनके घरों में शौचालय का निर्माण हो चुका है। जरैला गाँव की तरह अन्य गाँवों के लोग भी अपने घरों में शौचालयों का निर्माण कराकर इनका शत-प्रतिशत उपयोग करना शुरू करें तो गन्दगी के कारण फैलने वाली बीमारियों पर रोक लगेगी तथा बीमारियों के इलाज पर कम खर्चा होगा। साथ ही आयवर्द्धक गतिविधियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि बीमारी के कारण अक्सर आयवर्द्धक गतिविधियाँ बन्द हो जाती हैं।

 

इस गाँव में बाहर से आने वाला कोई भी व्यक्ति गाँव की साफ-सफाई को देखकर प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। गाँव के सभी प्रमुख रास्ते साफ-सुथरे दिखाई देंगे और नालियाँ भी कीचड़ मुक्त मिलेंगी। यह सारा कार्य ग्रामीणों की एकजुटता और लुपिन फाउण्डेशन संस्था के मार्गदर्शन व सभी के सहयोग से सम्पन्न हुआ है। साफ-सफाई के कारण ग्रामीणों का स्वास्थ्य स्तर भी पहले के मुकाबले अधिक ऊँचा हो जाएगा और उनमें कम-से-कम बीमारियाँ आएँगी। बीमारियाँ नहीं आने के कारण इलाज पर खर्च होने वाली राशि बन्द अथवा कम हो जाएगी। गाँव में साफ-सफाई से स्वास्थ्य के प्रति आई जागृति से सभी 5 वर्ष तक के बालक-बालिकाओं का शत-प्रतिशत टीकाकरण करा दिया गया है और सभी गर्भवती महिलाओं का संस्थागत प्रसव भी सुनिश्चित किया गया है।

 

ट्राईसाईकिल लेकर नहीं जाना पड़ता अब शौच

 

जरैला गाँव के निःशक्त युवक जगदीश के घर में शौचालय बन जाने के कारण अब उसे ट्राईसाईकिल लेकर शौच के लिए नहीं जाना पड़ता है। शौचालय बनने से पहले जगदीश सूर्य उदय होने से पहले प्रतिदिन ट्राईसाईकिल लेकर शौच के लिए जंगल जाता। जब कभी उसका पेट खराब होता तो उसे अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ता। विपरीत मौसमी परिस्थितियों में तो उसकी समस्या और अधिक बढ़ जाती। जगदीश सहित गाँव के ऐसे ही अन्य निःशक्त लोगों के घरों में भी शौचालय बनने के बाद उन्हें शौच जाने में हो रही परेशानियों से निजात मिली है। जगदीश के घर में शौचालय बनने से उसकी दो बहिन व वृद्ध माँ को भी काफी लाभ मिला है अन्यथा उनको भी जंगल में शौच जाते समय काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता था।

 

महिलाओं को अब नहीं करना पड़ता अंधेरे का इंतजार

 

जरैला गाँव की युवतियों एवं महिलाओं को प्रतिदिन सायँ के समय शौच जाने के लिए अंधेरे का इंतजार करना पड़ता था लेकिन जब से घर में लुपिन फाउण्डेशन के सहयोग से शौचालयों का निर्माण हुआ है तब से उन्हें अंधेरे का इंतजार नहीं करना पड़ता और प्रातः के समय भी जल्दी शौच नहीं जाना पड़ता। महाविद्यालय में पढ़ने वाली जरैला गाँव की छात्रा आरती सहित कई दर्जन छात्राओं को विशेष रूप से शौच जाने में परेशानी होती थी। उन्हें प्रातः के समय जल्दी उठकर शौच जाना पड़ता और यदि मौसम खराब हो तो कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता था। आरती, कल्पना, विजयलक्ष्मी, बॉबी सहित अनेक छात्राओं ने जब महाविद्यालय में प्रवेश लिया तो उन्हे प्रातः जल्दी महाविद्यालय जाना होता और खेतों अथवा जंगल में शौच के लिए जाना पड़ता जिसकी वजह से उन्हें कभी-कभी शर्मिन्दगी भी उठानी पड़ती। लेकिन आज गाँव की सभी युवतियाँ व महिलाएँ उनके घरों में शौचालय बन जाने से बहुत खुश हैं। गाँव की छात्राएँ व पढ़ी-लिखी युवतियाँ इस बात को पूरी तरह जानती हैं कि खुले में शौच जाने से कई प्रकार की बीमारियाँ फैलती हैं जिनके इलाज पर परिवार की आय का एक बड़ा भाग खर्च हो जाता है लेकिन जब से खुले में शौच जाने पर पाबन्दी लगी है तब से गाँव के युवकों के साथ युवतियाँ भी काफी खुश हैं।

 

जरैला गाँव की तरह अन्य गाँवों के सभी परिवारों में शौचालयों का निर्माण होने के साथ साफ-सफाई के प्रति जन-जागृति लाई जाए तो निश्चित ही अन्य गाँव भी जरैला जैसे खुले में शौच जाने से मु्क्त गाँव बन जाएंगे जिसके लिए लुपिन जैसी स्वयंसेवी संस्था के साथ अन्य सामाजिक, धार्मिक अथवा अन्य संस्थाओं को आगे बढ़कर सहयोग करना होगा।

 

लेखक सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में अधिकारी रह चुके हैं।

 

लेखक ईमेल : redhakar@gmail.com

 

साभार : कुरुक्षेत्र अगस्त 2015

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