भारतीय जीवन में स्वच्छता

Tuesday, August 18, 2015 - 12:18

स्वच्छता का अर्थ केवल कमोड व टॉयलेट ही नहीं है। स्वच्छता का अर्थ जीवन के सर्वांगीण पक्षों से जुड़ा है और नीचे दिए गए तथ्यों से हम जानेंगे कि हमारी मनीषा इसी स्वच्छता पर अत्यधिक जोर देती है :

 

शौच के समय शरीर की स्थिति कैसी हो?

 

हमारे शास्त्र कहते हैं कि सिर, नाक, कान को वस्त्र से ढंक कर मल-मूत्र का त्याग करना चाहिए।

न चानावृत्तमस्तक:। शाण्डिल्यस्मृति:

शिरस्तु प्रावृत्य मूत्रपुरीषे कुर्यात्।-आपस्तम्बधर्मसूत्र, 1/11/30/15

 

यह वैज्ञानिक पद्धति है। दुर्गंध का प्रवेश नाक, कान आदि से शरीर में न हो इसके लिए ऐसा करना चाहिए। अर्थात सिर, नाक, कान ढंक लेना चाहिए।

पानी व अंतरिक्ष में मल-मूत्र विसर्जन वर्जित

 

स्कंदपुराण व ब्रह्मपुराण में लिखा है कि पानी में मल-मूत्र न करें। मौन होकर मल-मूत्र का विसर्जन करें।

विण्मूत्रे विसृजेन् मौनी।

 

आज की ‘कमोड’ पद्धति इसलिए हितकारी नहीं है। इसमें दुर्गंध की उत्पत्ति तेजी से होती है। फलतः गन्दगी को बहाने के लिए अत्यधिक जल की आवश्यकता पड़ती है। धीरे-धीरे देश में पानी की भी भारी समस्या उत्पन्न होने लगी है। शौच करते समय बोलना, अखबार पढ़ना, ब्रश करना जीवन और स्वास्थ्य के लिए घातक होता है। खड़े होकर या चलते-चलते मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए।

न गच्छन् न च तिष्ठन् वै विण्मूत्रोत्सर्गमात्मवान्।।

अंतरिक्ष में मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए।

नान्तरिक्षके- कूर्मपूराण, पद्मपुराण।

 

अंतरिक्ष में मल-मूत्र का विसर्जन ब्रह्माण्ड को प्रदूषित करता है। इससे भारी क्षोभ उत्पन्न होता है। जूता, चप्पल, खडाऊं पहन या छाता लगाकर मल-मूत्र त्याग न करें :

न सोपानत् पादुको वा छत्री वा- कूर्मपुराण।

 

जूता-चप्पल-खड़ाऊं पहन कर मल-मूत्र का त्याग करने से ये चीजें भी अशुद्धि को ढोने का काम करेंगी। यदि आप अपने घर के भीतर बाहरी लोगों को जूता-चप्पल पहन कर नहीं आने देते हैं तो आप अनेक रोगों को घर से बाहर ही रोक देते हैं। छाता ओढ़ कर मल-मूत्र त्यागने से दुर्गंध का घेरा बनता है जो हानि करता है। मल त्याग के समय जोर से श्वास न लें। मुँह न खोलें :

मौनी भूत्वा च नि:श्वासं यथा गंधो न संचरेत्।

 

मल त्याग के समय जोर से साँस लेने पर दुर्गंध का शरीर के भीतर प्रवेश होता है। छींकने और खाँसने से भी हानि की सम्भावना बनती रहती है।

कहाँ करें मल त्याग

 

भूमि के ऊपर लकड़ी, सूखी मिट्टी, पत्ता, घास की परत बनाकर मल त्याग करना चाहिए- इस तथ्य का उल्लेख मनुस्मृति, 4/49, वसिष्ठस्मृति 12/10, कूर्मपुराण 13/35, पद्मपुराण स्वर्ग 52/36-37, नारदपुराण, पूर्व 27/4, स्कंदपुराण, ब्रह्म, 5/38 एवं महाभारत अनुशासन पर्व 96 में मिलता है। मल-त्याग की इस विधि से खाद का निर्माण, वातावरण और भूमि की शुद्धि की प्रक्रिया का निर्माण चलता रहता था। आज सुरक्षित गड्ढा (Safety tank) एवं जल प्रवाहिका (Sewer) के द्वारा काम चलाया जा रहा है। इससे भू-गर्भ की शुद्धता दुष्प्रभावित हो रही है। जलाशय से बारह-सोलह हाथ दूर मूत्र विसर्जन करें और चार गुणा ज्यादा दूरी पर मल त्याग करना चाहिए।

हंस्तान् द्वदश संत्यज्य मूत्रं जलाशयात्।

अवकाशे षोड्श व पुरीषे तु चतुर्गुणम्।।- धर्मसिंधु

 

यह निर्देश जल संस्थान की शुद्धता को बचाए रखने के लिए दिया गया है। जलाशय का सम्बन्ध आसपास की मिट्टी और खेत से बना रहता है। अत: इसका पालन करना चाहिए। वृक्ष की छाया, स्तम्भ, मन्दिर की छाया में मल-मूत्र न करें, अपनी छाया में करें :

छायायां मूत्रपुरीषयो: कर्म वर्जयेत्

स्वां तु छायामवमेहेत्।

 

स्थिर निर्माण या वृक्ष की छाया में तथा भूमि के भीतर विविध प्रकार के कीटाणुओं का निवास होता है। सूक्ष्म प्रभाव एवं गूढ़ प्रभाव भी इन स्थानों पर बहुत होता है। फलत: व्यक्ति उसकी चपेट में आ सकता है।

 

स्वयं को मल-मूत्र का भी ध्यानपूर्वक दर्शन नहीं करना चाहिए। वस्तुत: घृणित वस्तु या पदार्थ का दर्शन आयु और स्वास्थ्य को दुष्प्रभावित करता है। मल-मूत्र त्याग करते समय सूर्य, चन्द्र, अग्नि, ग्रह, नक्षत्र दिशाओं एवं तेजस्वी पदार्थों का दर्शन नहीं करना चाहिए-

‘न पश्येदात्मन: शकृत्’ - शान्तिपर्व महा, 193/24

अपनी विष्ठा को न देखें।

न ज्योतिंषि निरीक्षन् वा न संध्याभिमुखोपि वा।

प्रत्यादित्यं प्रत्यनलं प्रतिसोमं तथैव च।।

कूर्म उ. 13/42

 

मल-मूत्र का अनुचित स्थान एवं असमय किया विसर्जन स्वयं तथा मानव समूह के लिए हानिकारक होता है। कल्पना कीजिए गेहूँ, चना का बीज बोया गया है और उसी में कोई मल-मूत्र का त्याग करे तो उस उत्सर्जित अप पदार्थ का रस और संजीवन तत्व उस पौधे और उसके अन्न को कुत्सित करेगा। अत: वहाँ मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए।

न कृष्टे सस्यमध्ये वा गो व्रजे जनसंसदि।

न वर्त्मनि न नद्यादितीर्थेषु पुरुषर्षभ।।

नाप्सुनैवाम्भसस्तरी श्मशाने न समाचरेत्।

उत्सर्ग वै पुरीषस्य मूत्रस्य च विसर्जनम्। विष्णु पुराण 3/11/12-13

 

जुते हुए खेत में, गोशाला में, जनसमूह या उसके कार्यस्थल पर, श्मशान में, जल में, सरोवर के पास, मार्ग में, नदी-तीर्थ के पास मल-मूत्र का विसर्जन न करें।

न फालकृष्टे न जले न चितायं न पर्वते।

जीर्ण-देवालये कुर्यात्र वल्मीके न शाद्वले।।

न ससत्त्वेषु न गर्त्तेषु न गच्छत्र पथि स्थित:।

 

हरी-भरी घास में, टूटे-फूटे देवालय में, गोबर में, जल के भीतर, लोगों के घरों के पास, लोगों की दीवारों पर, खम्भे पर, पुल पर, खेल-कूद के मैदान में, मचान (मंच) के नीचे, राख में, बिल में, अंगारों पर तथा लकड़ी के समूह पर मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए। स्त्री, पूज्यजन और बहती हवा की ओर मुख करके मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए।

न चैवाभिमुखे स्त्रीणां गुरु ब्रह्माणयोर्गवाम्।

न देवदेवालययोरपामपि कदाचन।। पदम्. स्वर्ग 52/42-43

 

शास्त्र कहते हैं- इस तरह का अमर्यादित आचरण करने पर मनुष्य (कर्त्ता) की बुद्धि नष्ट हो जाती है।

प्रत्यग्निं प्रतिसूर्य च प्रतिसोमोदकद्विजान्।

प्रतिगां प्रतिवातं च प्रज्ञान नश्यति मेहत:।

 

इन दुष्कर्मों से जहाँ पूज्यों का किरदार होता है, वहीं अपने स्वास्थ्य का नाश भी होता है। पूज्यों के निरादर से वंशहानि का भारी खतरा उत्पन्न होता है।

वर्षाणि षडशीतिं तु दुर्वुत्ता: कुलापांसना:।

स्त्रिय: सर्वाश्च दुर्वृत्ता: प्रतिमेहन्ति या रविम्।

अनिलद्वेषिण: शक्र: गर्भस्थ च्यवते प्रजा।।

महात्मा.अनु. 125/64-65

 

स्त्री या पुरुष जो सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, वायु, ब्राह्मण, श्रेष्ठजनों की ओर मुख करके मल-मूत्र का त्याग करते हैं तो 86 वर्ष की आयु तक उनका गर्भ नष्ट होता रहता है। प्राय: पान खाकर लोग कहीं भी किसी भी स्थान पर बिना विचार किए थूक देते हैं। उक्त स्थानों पर थूकना, खाँसना, छींकना भी मल-मूत्र त्याग की ही तरह प्रतिबन्धित है।

 

साभार : नवोदय टाइम्स 17 अगस्त 2015

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