कचरे की खादः लापरवाही में बर्बाद

Sunday, August 2, 2015 - 14:01

सोमा बासु

 

जैविक कम्पोस्टिंग एक गन्दा व्यवसाय है। सुविधाओं, मानदण्डों के उल्लघंन की वजह से खराब गुणवत्ता वाली खाद बनती है।

 

उत्तरी दिल्ली के बाहरी इलाके में बने भलस्वा लैंडफिल के गेट के बाहर पड़ी नगरपालिका खाद बोरियों को देखकर ही एक समृद्ध खास संयंत्र की तस्वीर उभर आती है। एक्सेल इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि वे नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट को रोजाना खाद में बदलते हैं।

 

लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। यहाँ पर बोरे इसलिए नहीं पड़े हैं कि खेतों या बगीचों में उन्हें भेजने की दिक्कत है बल्कि इसलिए पड़े हैं क्योंकि इनका कोई खरीदार नहीं है। दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) में माली के रूप में कार्यरत गोविन्द सिंह का कहना है कि "यह बहुत खराब श्रेणी की खाद है। मुझे यह खाद दिल्ली नगर निगम के पार्कों के लिए दी गई थी, लेकिन यह अच्छी नहीं है।"

 

दिल्ली आधारित गैर-सरकारी संगठन ग्रीनटेक एन्वायरमेंट सिस्टम के असित नेमा कहते हैं कि  यह भारी धातुओं, जहर और काँच से भरी हुई खाद होती है क्योंकि इससे ठोस अपशिष्टों को अलग नहीं किया जाता है। दिल्ली नगर निगम एक ही ट्रक से सभी कचरे को खाद बनाने वाले प्लांट में डाल देती है। "इसलिए अगर कचरा स्रोत पर अलग  किया जाता होगा तब भी ट्रक में मिल जाता है।"

 

और क्या, बोरे खुले में छोड़ दिए जाते हैं। मौसम की मार इन बोरियों को फाड़ देती है और बारिश से खाद में मौजूद पोषक तत्व निकल जाते हैं।

 

यह कैसे बनती है

 

देश में जैविक खाद बनाने का आम तरीका है विंड्रो-डिकम्पोजिंग। संयंत्र के प्रभारी सुभाष कुमार का कहना है "हमारे पास एक काफी बड़ी मशीन है जिसमें पाँच धातु पंक्तियाँ है।" एमएसडब्ल्यू (नगरपालिका ठोस अपशिष्ट) को सबसे आखिरी पंक्ति में रखा गया है। इसे एक सप्ताह के लिए 70-80 डिग्री सेल्सियस तापमान में तरल सूक्ष्म जैविक का छिड़काव करके छोड़ दिया जाता है। इस परिवर्तित कचरे को फिर भारी मशीनों द्वारा इनर सर्कल में स्थानांतरित कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया को पाँच बार दोहराया जाता है, और हर बार कचरा निकाला जाता है।

 

उन्होंने कहा कि पाँच हफ्तों के अवायवीय अपघटन के बाद, अपशिष्ट को एक फिल्टर के माध्यम से पहुँचा दिया जाता है। एक 40 मिमी स्क्रीन से प्लास्टिक, लोहा और काँच को अलग करके लैंडफिल में भेजा जाता है। परिष्कृत कचरे को 20 मिलीमीटर स्क्रीन के द्वारा 40-45 डिग्री सेल्सियस पर 4 मिमी स्क्रीन के माध्यम से फाइनल खाद बनाई जाती है। वितरक को सौंपने से पहले इसे 15-20 डिग्री सेल्सियस पर बोरी में रखा जाता है।

 

जब बड़ी मात्रा में कचरे से खाद बनानी होती है तब विंड्रो अच्छी तरह से काम करता है। देश में सुप्रीम कोर्ट की ठोस अपशिष्ट प्रबंधन समिति ने खाद बनाने की इस विधि का समर्थन किया है।

 

सवाल यह है कि आखिर इस खाद के इतने कम उपभोक्ता क्यों हैं? इस समस्या की जड़ खाद तैयार करने के तापमान और इसकी प्रक्रिया में छुपी है। इस प्रक्रिया के द्वारा छिद्रिल और ऑक्सीजन सामग्री होने से नमी निकल जाती है और इसे ठण्डे या गर्म हिस्सों में बाँट देता है। "अधिकांश पौधों में एक बेड़ा होता है, लेकिन यह इस बात की गारंटी नहीं है कि पाँच बार घुमाने के बाद कचरा बन ही जाएगा। कचरे के सभी भाग एक तापमान में परिवर्तित हो जाएंगे। नेमा ने कहा कि इस प्रकार, रोगजनक और खरपतवार बीजों का विनाश वांछित स्तर पर हासिल नहीं किया जा सकता है।’’

 

मशीनों को काफी ईंधन की आवश्यकता पड़ती है। इसके अलावा जब भी मशीनें संचालित की जाती हैं टूट-फूट की आशंका बनी रहती है। नतीजतन, उन्हें मरम्मत की जरूरत होती है, जिसकी वजह से ज्यादा परिचालन लागत लगती है। कम्पनियाँ इस पूरी प्रक्रिया में खर्च हुई लागत में कटौती कर देती हैं। सुप्रीम कोर्ट की अंतर मन्त्रालयी टास्क फोर्स ने शहरी कचरे के पोषक प्रबंधन पर कहा है कि अच्छी गुणवत्ता वाली खाद केवल 60-70 डिग्री सेल्सियस पर ही तैयार की जानी चाहिए। नमी की मात्रा 40-60 फीसदी के बीच रहनी चाहिए। रोगाणुओं को जीवित रखने के लिए कम-से-कम 20 प्रतिशत नमी का रहना आवश्यक है।

 

आंध्र प्रदेश के पटानचेरु अर्द्ध शुष्क उष्णकटिबंधीय, अंतरराष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान के ओम रुपेला ने कहा कि अगर इन कारकों में बदलाव किया जाता है, जैसा कि भलस्वा संयंत्र में हुआ तो खाद की गुणवत्ता प्रभावित हो जाएगी। उन्होंने कहा "जैविक खाद इस्तेमाल करने वाला किसान कभी भी इस खाद का प्रयोग नहीं करता क्योंकि वह जानता है कि इस शहरी खाद में भारी धातुओं की भरमार है।"

 

कमजोर प्रदर्शन

 

21.06 हेक्टेयर में फैला हुआ भलस्वा संयंत्र 1989 में बनाया गया था। 1993 से इसने दिल्ली के पुराने लैंडफिल के तौर पर कार्य करना शुरू कर दिया था। प्रतिदिन इसमें 2,200 टन एमएसडब्ल्यू सिविल लाइंस, करोल बाग, रोहिणी और नजफगढ़ से फेंका जाता है। सीपीसीबी के वैज्ञानिक संजीव अग्रवाल कहते हैं कि संयंत्र में रोजाना 500 टन खाद उत्पादन करने की क्षमता है। लेकिन यह 350 टन से अधिक का उत्पादन नहीं करता। प्राप्त अपशिष्ट के केवल 24 फीसदी से ही खाद बनाई जाती है।

 

अग्रवाल ने कहा कि सभी सुविधाओं के बावजूद  उत्पादन कम है क्योंकि फर्में एमएसडब्ल्यू को अलग नहीं करती हैं। मिश्रित अपशिष्ट को डिकम्पोज करने के लिए अनियमित या अनियंत्रित तरीके से इस्तेमाल किया जाता है। केवल दूसरे चरण में छंटनी की जाती है।

 

आईएलएफएस इको स्मार्ट नगर निगम के ओखला संयंत्र में 2008 से काम कर रही है। अपनी प्रतिदिन 200 टन स्थापित क्षमता से अलग यह 150 टन खाद का ही उत्पादन कर पाती है।

 

यही हाल नरेला-भलस्वा साइट पर लगे संयंत्र का भी है। यह भी अपनी स्थापित क्षमता 1,500 टन के विपरीत 1,276 टन खाद का ही निर्माण करता है। 2012 के सितम्बर से दिसम्बर के बीच कम्पनी ने 1,55,712 टन कचरा प्राप्त किया।

 

नियमों का उल्लंघन

 

अधिकांश संयंत्र पौधा उर्वरक (नियंत्रण) आदेश, 1985 (एफसीओ) का पालन नहीं करते। 2011 में भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल ने 29 शहरों में भौतिक-रासायनिक गुण, उर्वरक क्षमता और सम्भावित भारी धातु प्रदूषण जाँच विषय पर अध्ययन किया था। उन्होंने पाया कि जैविक पदार्थ, नाइट्रोजन और फास्फोरस पदार्थ खाद में कम जबकि भारी धातु ज्यादा मिली। कोई भी नमूना एफसीओ सीमा के अन्दर का नहीं था। केवल दो शहरों- सूर्यापेट और विजयवाड़ा की खाद यूरोपीय देशों की वैधानिक दिशा निर्देशों के अनुकूल की थी। आंध्र प्रदेश के इन दो शहरों में एमएसडब्ल्यू को स्रोत पर ही अलग कर दिया जाता है। 2009 में एक टास्क फोर्स की रिपोर्ट के अनुसार, स्रोत पर ही कचरे को अलग करने के कारण कानपुर की खाद गुणवत्ता काफी अच्छी पाई गई थी।

 

लेकिन बेकार पौधों को खाद बनाने हेतु मथने के लिए प्राप्त किया जाता है। ओखला खाद संयंत्र को संयुक्त राष्ट्र की तरफ से 25 लाख रुपए की राशि जलवायु परिवर्तन पर काम करने व 2 लाख टन एमएसडब्ल्यू को एरोबिक कम्पोस्टिंग के माध्यम से कम करने के लिए मिला।

 

एमएसडब्ल्यू को शून्य अपशिष्ट में बदलने के लिए कम्पनियाँ पर्यावरण एजेंसियों से पैसे लेती हैं। इसके अलावा वे खाद संयंत्रों को चलाने के लिए नगर निगम से और सरकार से भी प्रोत्साहन राशि लेती है। भलस्वा संयंत्र का जूनियर कर्मचारी पूछता है कि "यहाँ गुणवत्ता नियंत्रण और खाद बेचने की जरूरत क्या है?"

 

दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के संदीप मिश्रा, जो होटलों को खाद बनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, ने कहा कि खाद की गुणवत्ता की चिन्ता डीपीसीसी का विषय नहीं है। हमारा केवल कचरे के प्रबंधन के साथ सम्बन्ध है।

 

एफसीओ के अनुसार, सरकार की ओर से नियुक्त निरीक्षक बाजार से खाद का नमूना लेकर उसकी गुणवत्ता की जाँच फरीदाबाद, मुम्बई, चेन्नई या कोलकाता में स्थित केन्द्रीय उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण और प्रशिक्षण संस्थान में या सरकार द्वारा अधिसूचित किसी भी प्रयोगशाला में करेगा। लेकिन आमतौर पर कम्पनियाँ अपने उत्पादों का परीक्षण निजी प्रयोगशालाओं में करती है।

 

दिल्ली नगर निगम के अधिकारी, तौफीक अहमद ने बताया कि भलस्वा में कार्यरत कम्पनी श्रीराम इंस्टीट्यूट औद्योगिक अनुसंधान को हर छह महीने के बाद खाद के नमूने भेजती है। हालाँकि, कम्पनी के अधिकारी परिणामों का खुलासा करने के लिए तैयार नहीं हैं। आईएलएफएस इको स्मार्ट के सीईओ एल कृष्णन ने कहा कि कम्पनी अपने नमूनों की जाँच अपनी प्रयोगशाला में करती है।

 

खाद प्रोत्साहन

 

रुपेला ने कहा "रासायनिक उर्वरक खरीदने पर भारी सब्सिडी दी जाती है। किसानों को एमएसडब्ल्यू खाद की खरीद पर प्रोत्साहन राशि दी जानी चाहिए।’’

 

उत्तरी दिल्ली में एक उर्वरक वितरण कम्पनी के मोहन सिंह का कहना है "एक बैग एमएसडब्ल्यू खाद के साथ यूरिया के दो-तीन बैग बेचना नियम है। लेकिन हम क्या करें जब किसानों को यह चाहिए ही नहीं?" एक किसान उर्वरक को एक और बैग खरीदने के लिए 2 रुपए और खर्च कर सकता है बजाए कि 3 रुपए की खाद पर खर्च करने के।

 

कृष्णन पूछते हैं जब तक सरकार खाद के उपयोग को बढ़ावा नहीं देती, तो हम किसानों में इसे उपयोग उम्मीद कैसे कर सकते हैं? कृष्णन कहते हैं "खाद के कम खरीददार इसकी खराब गुणवत्ता की वजह से नहीं बल्कि सब्सिडी के अभाव की वजह से हैं।"

 

अपर आयुक्त, कृषि विभाग के कृष्ण चन्द्र का कहना है "एमएसडब्ल्यू खाद को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन या सब्सिडी देने के लिए कदम उठाए गए हैं।" वे कहते हैं लेकिन यह सब अभी योजना के चरण में हैं। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर बनी सुप्रीम कोर्ट की समिति के सदस्य अल्मित्रा एच पटेल ने कहा यदि स्रोत पर ही कचरे को अलग-अलग कर लिया जाए तो इसकी कीमत कम हो सकती है।

 

उन्होंने कहा "यदि इसकी लागत को 2,500 से 1,500 प्रति टन पर लाया जा सके तो यह यह किसानों के लिए सस्ता हो जाएगा और उनका काम बिना नुकसान के चल जाएगा और उन्हें भी थोड़ा लाभ मिल सकेगा।"

 

साभार : डाउन टू अर्थ 14 अगस्त 2013

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