स्वच्छता : हमारे भीतर और आसपास

Sunday, July 26, 2015 - 13:06

तुषार ए. गाँधी

 

बापू सफाई पर बहुत जोर देते थे, उनका विश्वास था कि स्वच्छता हर व्यक्ति की स्वयं की और सामूहिक जिम्मेदारी है। उनके आश्रमों में प्रत्येक व्यक्ति का ये कर्तव्य होता था कि वह न केवल अपने आपको साफ-सुथरा रखे बल्कि शरीर, आत्मा, मस्तिष्क और हृदय के साथ-साथ अपने आवास और आश्रम परिसरों को स्वच्छ रखने के लिये प्रयास करे। परन्तु स्वयं और आश्रम परिसरों की साफ-सफाई करते हुए उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होता था कि आश्रम के बाहर गन्दगी और कूड़ा न छोड़े। बापू ने स्वच्छता को भक्ति के समतुल्य माना। मै यहाँ “बापू के आशीर्वाद” पुस्तक दिनाँक 8 जनवरी,1946 से एक उद्धरण प्रस्तुत करता हूँ। “जब अंदरूनी और बाहरी स्वच्छता होती है तो यह धर्मनिष्ठता से भी आगे हो जाती है।”

 

दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए शुरुआत से ही बापू ने स्वयं उस बस्ती की सफाई का बीड़ा उठाया जिसमें वे रहते थे और गन्दगी से कभी आँख नहीं चुराई। वे गन्दगी और गन्दा रहना पसन्द नहीं करते थे इसलिये उन्होंने अपनी व्यक्तिगत साफ-सफाई और अपने आसपास के स्थानों तथा शहरों की साफ-सफाई का बीड़ा उठाया। उन्होंने अपने नागरिक कर्तव्यों का नियमित व्यवहार के तौर पर निर्वहन किया परन्तु जब कोई आपात स्थिति होती थी तो वे क्षेत्र की गन्दगी को लेकर विशेष ध्यान रखते थे और स्वेच्छा से साफ-सफाई के लिये तत्पर रहते थे।

 

बापू का विश्वास था कि स्वच्छता समग्र होनी चाहिये और इसमें सब शामिल हों। उनका विश्वास था कि एक स्वच्छ और निर्मल आत्मा अपवित्र शरीर में नहीं रह सकती, उनका मानना था कि गन्दे और दूषित दिमाग में स्वच्छ विचार उत्पन्न नहीं हो सकते और एक निर्मल, स्वच्छ, ईमानदार व्यक्ति अपने आस-पास गन्दगी में नहीं रह सकता। उनका विश्वास था कि अच्छे कर्म करने अथवा घटनाओं के लिये सम्पूर्ण स्वच्छता जरूरी है तथा उनका कहना था कि यह हर व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है। स्वच्छता के पक्षधर लोगों को अपने आसपास से कूड़ा-करकट और गन्दगी के प्रति असंवेदनशील हो जाते हैं, चाहे वे कभी कूड़ा-करकट अथवा गन्दगी का प्रतिवाद नहीं करेंगे और इसकी परवाह किये बगैर इसके बीच ही पड़े रहेंगे। सृष्टि के रचनाकारों ने हमें भी कुछ इस प्रकार बनाया है कि हमारी संवेदनशीलता बहुत जल्द हमारे आसपास के वातावरण के अनुरूप ढल जाती है। एक प्रयोग करके देखें-एक बदबूदार पदार्थ लें, शुरू में कोई भी इससे परेशान हो उठेगा और दूर भाग खड़ा होगा। कई बार शुरू में किसी को उबकाई आने लगेगी लेकिन बहुत जल्द हम उस गन्द के अनुरूप ढल जायेंगे और इसे नोटिस करना भी छोड़ देंगे। हमारे सूंघने की शक्ति उस गन्दगी से अवचेतन रूप में व्यवहार करती है और तब हम इसे नोटिस ही नहीं करते हैं तथा इस पर प्रतिक्रिया देना ही बन्द कर देते हैं। चूँकि हम इस पर अधिक प्रतिक्रिया नहीं देते हैं इसलिये हम इससे छुटकारा पाने के लिये भी कुछ करने का प्रयास नहीं करते। यही वजह है कि कोई व्यक्ति अपने आपको आसपास की गन्दगी के अनुकूल ढाल लेता है। हम इस पर प्रतिक्रिया करना रोक देते हैं और हम इसके भीतर रहना सीख जाते हैं और इसकी परवाह नहीं करते हैं और इस तरह इसके सम्बन्ध में कुछ भी नहीं करते हैं।

 

हम इस बात पर गर्व करते हैं कि व्यक्तिगत तौर पर हम कितने साफ-सुथरे हैं। बहुत बार हम दूसरों का उपहास करते हैं, जो मैले-कुचैले होते हैं और हमारे स्वच्छता के स्तर से मेल नहीं खाते हैं। परन्तु देखिये हम साम्प्रदायिक स्वच्छता में कितना पीछे हैं। अपने शहरों और कस्बों की सड़कों पर यात्रा करते हुए हमें नजर आता है कि किस तरह सुविधा स्थल पर कूड़ा-कचड़ा डाल दिया है। हम बेपरवाह होकर कहीं भी शौच करने लगते हैं, हम किस तरह सार्वजनिक स्थानों पर थूक देते हैं। नाक साफ है परन्तु हमें यह भी अवश्य महसूस करना चाहिये कि जब तक हम अपने शहरों और कस्बों के सामान्य क्षेत्रों को अपनी चिन्ता में शामिल नहीं करते हैं और उन्हें गन्दा करते हैं, हम कभी स्वच्छता हासिल नहीं कर सकते। बिहार में अपनी यात्राओं के दौरान एक शाम प्रार्थना सभा में बोलते हुए बापू ने लोगों की बेफिक्री से थूकने की आदत के बारे में टिप्पणी की थी, “यदि सभी भारतीय एक साथ मिलकर थूक दें तो भारत डूब जायेगा।”

 

सृष्टि के रचनाकारों ने हमें भी कुछ इस प्रकार बनाया है कि हमारी संवेदनशीलता बहुत जल्द हमारे आसपास के वातावरण के अनुरूप ढल जाती है। एक प्रयोग करके देखें-एक बदबूदार पदार्थ लें, शुरू में कोई भी इससे परेशान हो उठेगा और दूर भाग खड़ा होगा। कई बार शुरू में किसी को उबकाई आने लगेगी लेकिन बहुत जल्द हम उस गन्द के अनुरूप ढल जायेंगे और इसे नोटिस करना भी छोड़ देंगे। हमारे सूंघने की शक्ति उस गन्दगी से अवचेतन रूप में व्यवहार करती है और तब हम इसे नोटिस ही नहीं करते हैं तथा इस पर प्रतिक्रिया देना ही बन्द कर देते हैं। चूँकि हम इस पर अधिक प्रतिक्रिया नहीं देते हैं इसलिये हम इससे छुटकारा पाने के लिये भी कुछ करने का प्रयास नहीं करते।

 

बापू इस बात में विश्वास रखते थे कि जिस प्रकार हमें अपनी व्यक्तिगत साफ-सफाई की चिन्ता होती है हमें अपने पास-पड़ोस, बस्ती और कस्बे अथवा शहर की साफ-सफाई के प्रति भी जिम्मेदार होना पड़ेगा। दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए शुरुआत से ही बापू ने स्वयं उस बस्ती की सफाई का बीड़ा उठाया जिसमें वे रहते थे और गन्दगी से कभी आँख नहीं चुराई। वे गन्दगी और गन्दा रहना पसन्द नहीं करते थे इसलिये उन्होंने अपनी व्यक्तिगत साफ-सफाई और अपने आसपास के स्थानों तथा शहरों की साफ-सफाई का बीड़ा उठाया। उन्होंने अपने नागरिक कर्तव्यों का नियमित व्यवहार के तौर पर निर्वहन किया परन्तु जब कोई आपात स्थिति होती थी तो वे क्षेत्र की गन्दगी को लेकर विशेष ध्यान रखते थे और स्वेच्छा से साफ-सफाई के लिये तत्पर रहते थे। जब डरबन में भारतीय बस्ती में प्लेग फैला, आरम्भ में बापू पीड़ित लोगों की सहायता के लिये दौड़े लेकिन प्लेग का प्रसार रोकने के लिये उन्होंने बस्ती की भी साफ-सफाई की। उन्होंने इस रोग की चपेट में आने के जोखिम की परवाह नहीं करते हुए बस्ती और घरों की सफाई की तथा बीमार लोगों का इलाज किया। बाद में राजकोट के दौरे में जब समान तरह की महामारी वहाँ फैली बापू ने शहर में सड़ रहे कूड़े के गड्ढों और गटरों को साफ किया ताकि वहाँ पर कीटाणु पैदा न हों और महामारी पर अंकुश लगाया जा सके। दक्षिण अफ्रीका से अपने एक दौरे के दौरान वे कोलकाता आए जहाँ कांग्रेस का सत्र चल रहा था। बापू वहाँ गए और उस स्थान पर गन्दगी और अस्वच्छता की स्थिति को लेकर व्याकुल हो गए। बापू ने दक्षिण अफ्रीका से दौरे पर आए साफ-सफाई सुनिश्चित की। उन्होंने संगठित स्वयंसेवकों द्वारा इस्तेमाल की गई नालियों की गन्दगी को साफ किया और शौचालयों की खुद सफाई की तथा उन्हें ढका। उन्होंने प्रतिनिधियों को स्वच्छता और साफ-सफाई के बारे में भाषण नहीं दिया और उन्होंने उदाहरण के साथ पाठ पढ़ाया जो उन्होंने उस स्थान पर स्वच्छता बनाये रखने के लिये स्वयं की जिम्मेदारी के तहत संचालित किया था। यह बात गौर करने लायक है कि कांग्रेस सम्मेलन का स्थान उनकी निजी सम्पत्ति नहीं थी, न ही किसी मित्र का घर था। ये स्थान सरकारी मैदान था और बापू उस स्थान की सफाई सुनिश्चित करने के वास्ते नगर परिषद को भलीभाँति लिख सकते थे। परन्तु उन्होंने सार्वजनिक स्थान की स्वच्छता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी खुद उठाई और यह सुनिश्चित किया कि सम्मेलन के आसपास साफ-सफाई और स्वच्छ वातावरण हो। बापू विश्वास करते थे कि यदि मन और पड़ोस स्वच्छ नहीं होगा तो अच्छे, सच्चे और ईमानदार विचार आना असम्भव है। कृषि विश्वविद्यालय की आधारशिला रखे जाने के समारोह में बोलते हुए बापू ने पवित्र शहर की अस्वच्छता को लेकर आलोचना की और इस बात पर खेद प्रकट किया कि जिन पवित्र स्थानों पर हम पूजा करते हैं, वे इतने गन्दे हैं। यही टिप्पणी उनकी तब थी जब उन्होंने कुम्भ मेले का दौरा किया। बापू इस बात को लेकर चिन्तित थे कि हम नदी में गन्दगी कैसे बहाते हैं और कहा कि नदियाँ हमारे देश की नाड़ियों की तरह है और हमारी सभ्यता हमारी नदियों की स्थिति पर निर्भर है। परन्तु हम उन्हें गन्दा करना जारी रखेंगे जिस तरह से हम कर रहे हैं वह दिन दूर नहीं जब हमारी नदियाँ जहरीली हो जायेंगी। हम पर्यावरणीय आपदा के मुँहाने पर खड़े हैं क्योंकि हमने अपनी सबसे पवित्र नदी गंगा को गन्दगी से प्रदूषित कर डाला है।

 

पचहत्तर साल बाद हमारे नये प्रधानमन्त्री ने वाराणसी और देश के लोगों को धन्यवाद भाषण में वाराणसी में गन्दगी और गंगा के प्रदूषण के बारे में चिन्ता प्रकट की। बापू का कहना था कि हरेक व्यक्ति को चिन्ता करनी होगी और जिम्मेदारी लेनी होगी। स्वच्छता चेतावनियों, कानूनों अथवा अध्यादेश जारी करके इसे हासिल नहीं किया जा सकता और इसे आदत में शामिल करके ही हासिल किया जा सकता है। 19 नवम्बर, 1925 के अंक में यंग इण्डिया में लिखते हुए बापू ने कहा था, “स्वच्छता भक्ति से आगे है।” हम मैले शरीर और मैले मस्तिष्क से परमात्मा का आशीर्वाद प्राप्त नहीं कर सकते। एक निर्मल शरीर गन्दे शहर में नहीं रह सकता।

 

एक अज्ञात प्रापक को 26 अप्रैल, 1945 को उन्होंने जो कुछ लिखा, बाद में बापू के आशीर्वाद में पुनः प्रस्तुत किया गया। बापू ने गन्दगी छिपाने की हमारी आदत पर चिन्ता प्रकट की, क्या केवल वही गन्दगी होती है जो हमारी आँखों के सामने दिखाई देती है? यदि सफेद वस्तु पर एक भी कण गन्दगी का होता है तो हम परेशान हो उठते हैं, लेकिन काले पर कितनी भी गन्दगी हो सकती है और हमें कोई परवाह नहीं होती। एक साफ-सुथरे क्षेत्र में थोड़ी-सी भी गन्दगी बहुत चिन्ताजनक और पीड़ाजनक हो सकती है लेकिन कई बार हम गन्दगी को नजरअंदाज कर देते हैं जो अंधेरे स्थानों तथा नुक्कड़ों में पड़ी होती है। बापू कहते थे कि ऐसे अलग-थलग स्थानों पर साफ-सफाई करना और स्थानों की गन्दगी साफ करना महत्वपूर्ण नहीं है जहाँ गन्दगी अथवा कूड़ा-कचड़ा दिखाई देता है बल्कि जो लोग स्वच्छता के प्रति जागरूक है उन्हें सम्पूर्ण स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिये।

 

पचहत्तर साल बाद हमारे नये प्रधानमन्त्री ने वाराणसी और देश के लोगों को धन्यवाद भाषण में वाराणसी में गन्दगी और गंगा के प्रदूषण के बारे में चिन्ता प्रकट की। बापू का कहना था कि हरेक व्यक्ति को चिन्ता करनी होगी और जिम्मेदारी लेनी होगी। स्वच्छता चेतावनियों, कानूनों अथवा अध्यादेश जारी करके इसे हासिल नहीं किया जा सकता और इसे आदत में शामिल करके ही हासिल किया जा सकता है।

 

यंग इण्डिया में दिनाँक 25 अप्रैल, 1929 के अंक में बापू ने अपने घरों अथवा स्वयं की साफ-सफाई तथा अपने आसपास बेपरवाह गन्दगी के ढेर लगाने की हमारी आदत पर टिप्पणी करते हुए लिखा था, “हम अपने घरों से गन्दगी हटाने में विश्वास करते हैं, परन्तु हम समाज की परवाह किये बगैर इसे गली में फेंकने में भी विश्वास करते हैं।” हम व्यक्तिगत रूप से साफ-सुथरे रहते हैं, परन्तु राष्ट्र के समाज के सदस्य के तौर पर नहीं, जिसमें कोई व्यक्ति एक छोटा-सा अंश होता है। यही कारण है कि हम अपने घर के द्वार के बाहर इतनी अधिक गन्दगी और कूड़ा-कचड़ा पड़ा हुआ पाते हैं। हमारे आसपास कोई अजनबी अथवा बाहरी लोग गन्दगी फैलाने नहीं आते हैं। ये हम ही हैं जो अपने आसपास रहते हैं जो इस गन्दगी को फैलाकर बदहाली की स्थिति पैदा कर देते हैं। जब हम कूड़े से भरा थैला अपने दरवाजे अथवा खिड़की से फेंकते हैं, हम खुश हो सकते हैं कि हमारा घर साफ है परन्तु हमारा आसपड़ोस भी हमारी बस्ती का ही हिस्सा है और यदि कोई जानबूझकर इसे गन्दा करने का काम करता है तो पूरा परिसर गन्दगी का ढेर हो जायेगा क्योंकि किसी बस्ती में रहने वाला हर व्यक्ति एक ही तरह से व्यवहार करता है और उसे इस बात की कोई चिन्ता नहीं होती कि वे अपने पड़ोस, समुदाय और शहर को किस तरह गन्दा कर रहे हैं। कार्पोरेट जगत की भी स्वच्छता बनाये रखने की जिम्मेदारी होती है। हरिजन में 16 जून, 1946 को लिखते हुए बापू ने कहा, “स्वच्छता की सावधानीपूर्ण सोच, केवल व्यक्तिगत नहीं है बल्कि अपने आसपास की भी है।” लाभ कमाने की इच्छा से कम्पनियाँ अपने खर्चों में कटौती करती हैं और ये सामान्यतः उनकी उत्पादन प्रक्रिया से कचड़े के निपटान की प्रक्रिया के मामले में होता है। बापू का ये मानना था कि ये प्रत्येक संगठन में ऊपर से लेकर नीचे तक प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी है कि वे अपने प्रचालन स्थल के पर्यावरण को गन्दा अथवा प्रदूषित न करें। सरकारें और नगर परिषदें कुछ सीमा तक प्रयास कर सकती हैं उनकी अपनी सीमाएँ होती हैं लेकिन यदि हर व्यक्ति इसे अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य समझें तो न केवल भारत को एक स्वच्छ राष्ट्र बनाने का लक्ष्य हासिल करना अधिक सम्भव होगा बल्कि आध्यात्मिक रूप से भारतीय स्वच्छ बन पायेंगे और तब वे एक स्वच्छ राष्ट्र, एक स्वच्छ सभ्यता और एक स्वच्छ व्यक्ति होने का उदाहरण बनकर गर्व महसूस कर सकेंगे।

 

बापू ने 22 जनवरी, 1945 को एक पत्र में लिखा, जो कि बाद में बापू के आशीर्वाद में पुनः प्रकाशित हुआ, “वह जो सचमुच में भीतर से स्वच्छ है, वह अस्वच्छ बनकर नहीं रह सकता।” यह बापू की व्यक्तिगत और नागरिक स्वच्छता का मूल मन्त्र था। बापू का मानना था कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में स्वच्छता की आदत उसके भीतर और बाहर काफी पहले समायोजित हो जानी चाहिये और यह किसी व्यक्ति के स्वभाव का हिस्सा बन जानी चाहिये और उन्हें विश्वास था कि यदि किसी को भी एक स्वच्छ दिमाग, निर्मल आत्मा और ईमानदार प्रकृति के बारे में बताया जाता है तो इससे उसके शरीर की स्वच्छता के साथ-साथ आसपास की स्वच्छता भी स्वतः ही सुनिश्चित हो जायेगी। यंग इण्डिया में इसके 10 दिसम्बर, 1925 के अंक में बापू ने कहा था, ‘आंतरिक स्वच्छता पहली वस्तु है जिसे पढ़ाया जाना चाहिये, अन्य बातें प्रथम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण पाठ सम्पन्न होने के बाद लागू की जानी चाहिये।’ यदि हम स्वच्छता की आदत को अपनाना चाहते हैं तो हमें अपने बच्चों को गन्दगी से नफरत करना और न केवल गन्दगी को साफ करने की जिम्मेदारी लेना बल्कि गन्दगी हटाने में योगदान करने के बारे में शिक्षित करना चाहिये। ये वे महत्वपूर्ण बातें थीं जिनमें बापू को विश्वास था कि मनुष्यों के लिये आंतरिक और बाहरी स्वच्छता उनके आगे बढ़ने और प्रगति के लिये तथा स्वयं के वास्तविकीकरण तथा मानवीय विकास के लिये कितनी जरूरी है। वे स्वयं की स्वच्छता और आसपास की स्वच्छता के बीच अंतर नहीं करते थे, उनको विश्वास था कि एक पवित्र आत्मा के लिये एक स्वच्छ शरीर में रहना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि किसी स्थान, शहर, राज्य और देश के लिये स्वच्छ रहना जरूरी होता है ताकि इसमें रहने वाले लोग स्वच्छ और ईमानदार हों। उनका विश्वास था कि वे दोनों ही महत्वपूर्ण और जीवन के आधार हैं।

 

हम स्वच्छ भारत का लक्ष्य केवल अपनी आत्मा की शुद्धता और इसके बाद अपने आसपास की साफ-सफाई करके ही हासिल कर सकते हैं और यही बापू के जीवन का सन्देश था। प्रधानमन्त्री प्रेरणा दे सकते हैं, लेकिन जिम्मेदारी हरेक भारतीय की है।

 

साभार : रोजगार समाचार 18-24 अक्टूबर 2014

 

लेखक महात्मा गाँधी फाउण्डेशन के संस्थापक अध्यक्ष हैं।

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