अदृश्य पर्यावरणविद

Monday, July 13, 2015 - 12:09

कल्पना शर्मा

तेल और पानी कभी आपस में नहीं मिलते। एक ब्रिटिश पेट्रोलियम तेल के जहाज से मेक्सिको की खाड़ी में तेल रिसने के बाद अमेरिकियों को मजबूरन यह तथ्य स्वीकार करना पड़ रहा है। दो महीने से अमेरिकी मीडिया में यह प्रमुख खबर बनी हुई है और यह अमेरिकी प्रशासन की चिन्ता का विषय है कि किस प्रकार तेल के कुओं को बन्द किया जाए और देश के तटवर्ती इलाके के बड़े हिस्से को बचाया जाए।

यह बड़े स्तर का पर्यावरणीय संकट है और पूर्णतया मानव निर्मित है। अब यह देखना है कि क्या लम्बे समय में यह अमेरिकियों को जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता के बारे में सोचने, उसे कम करने और वैकल्पिक स्रोत के बारे में सोचने को प्रोत्साहित करेगा। इस समय तेल के रिसने पर होने वाली चर्चाओं में यह चिन्ता रत्ती भर नहीं है।

दिल्ली में भी छोटे स्तर पर कुछ ऐसी ही घटना हुई थी, हालाँकि वह ज्यादा नाटकीय नहीं थी। कुछ समय पहले जब कचरा उठाने वाले और मजदूर वर्ग के लोग रेडियोधर्मी सामग्री के करीब काम करते हुए रेडिएशन की दुर्घटना के शिकार हुए थे। जब यह घटना हुई, उस समय कचरे के निस्तारण विशेषकर खतरनाक कचरे का मुद्दा अखबारों में सुर्खियाँ बना। उस समय उन लोगों के जीवन पर भी चर्चा हुई जो कचरा उठाते हैं और उसको छाँटने का काम करते हैं। लेकिन बाद में यह मुद्दा गायब हो गया।

भयानक कहानियाँ

हम अक्सर कचरे के निस्तारण के बारे में भयानक कहानियाँ सुनते रहते हैं जैसे कि हैदराबाद के पास कचरे के पहाड़ के नीचे तीन कचरा बीनने वाले दब कर मर गए। इनमें से एक 15 वर्षीय बच्चे का शव बाद में निकाला गया। लेकिन उसी के साथ दफन हुई एक महिला का शव नहीं निकाला जा सका। वो दीर्घकालिक नीतियाँ जो ऐसे आवश्यक काम करने वालों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को सुनिश्चित करती हैं उच्च प्राथमिकता के स्तर पर नहीं हैं। ऐसे लोगों को कुछ लोगों ने खामोश ‘पर्यावरणविदों का समुदाय’ कहा है।

कुछ समय पहले जब कचरा उठाने वाले और मजदूर वर्ग के लोग रेडियोधर्मी सामग्री के करीब काम करते हुए रेडिएशन की दुर्घटना के शिकार हुए थे। जब यह घटना हुई, उस समय कचरे के निस्तारण विशेषकर खतरनाक कचरे का मुद्दा अखबारों में सुर्खियाँ बना।

पूरे भारत में कचरा इकट्ठा करने वाले अक्सर देर रात तक खामोशी से काम करते हैं, वे कचरे के पहाड़ को छाँटते हैं और वैसी कुछ चीजों को निकालते हैं जिन्हें बेचा जा सकता है। अगर आप रात के ग्यारह बजे के बाद केन्द्रीय मुम्बई की सड़कों पर घूमें तो आप को कचरा उठाने वालों की पूरी फौज दिखाई पड़ेगी। पुरुष, स्त्री और बच्चे सभी कड़ी मेहनत करते हैं। वे रात भर काम करते हैं और किसी तरह से उन सड़कों पर बनी दुकानों के सामने थोड़ी नींद पूरी कर लेते हैं। दिन में वे अदृश्य हो जाते हैं। अपने सामान को उन दुकानों पर रखे बक्सों में डाल देते हैं जिनके सामने वे थोड़ी देर सोते हैं। वे रात को ही सक्रिय होते हैं जबकि दिनभर गायब रहते हैं।

जिस बात की तरफ पूरी तरह से ध्यान नहीं दिया जाता वो यह कि कचरा उठाने वालों की बड़ी संख्या महिलाओं की है। मुम्बई में कचरा बीनने वाली महिलाओं को संगठित करने वाले एक समूह स्त्री मुक्ति संगठन के एक अध्ययन के मुताबिक कचरा बीनने वालों में 85 प्रतिशत महिलाएँ, पाँच प्रतिशत बच्चे और दस प्रतिशत पुरुष हैं। इनमें से बहुसंख्यक लोग दलित और भूमिहीन हैं जो गाँवों में सूखा पड़ने पर शहर में आ जाते हैं। इनका आयु वर्ग सात से सत्तर साल के मध्य है और उनमें से ज्यादातर अशिक्षित हैं। बृहन्न मुम्बई नगर निगम के 60,000 कचरा बीनने वालों पर किए गए एक सर्वे के अनुसार भी लोगों का प्रतिशत वही है। इनमें 60 प्रतिशत महिलाएँ, 20 प्रतिशत पुरुष और 20 प्रतिशत बच्चे हैं।

अध्ययनों से पता चला है कि कचरा बीनने वाली महिलाओं में 90 प्रतिशत अपने घर की मुख्य कमाने वाली हैं और वे या तो विधवा हैं या परित्यक्ता हैं। यह दिलचस्प है कि किस तरह से श्रम का लैंगिक विभाजन कचरे के व्यवसाय में अपनी भूमिका निभाता है। जहाँ महिलाएँ और बच्चे कचरा छाँटने और अलग करने का खतरनाक करते हैं वहीं पुरुष सूखे कचरे को सम्भालते हैं। इन्हीं चीजों को थोक विक्रेताओं और फैक्टरियों को भेजते हैं। नतीजतन खतरनाक कचरे का सामना महिलाएँ करती हैं। उनमें से कोई भी सुरक्षात्मक कवच नहीं धारण करतीं और लगातार झुकने और सिर पर कचरा उठाने से उत्पन्न हुई शारीरिक समस्याओं का सामना करती हैं। कचरा बीनने वाले किसी भी समूह को देखिए आप कमर झुकी बूढ़ी महिलाओं को देखेंगे जो दशकों से यह काम कर रही हैं।

जायदाद

मुम्बई के झुग्गी वाले शहर में कचरा बीनने वाले सबसे बुरी तरह बेघर लोग हैं। दूसरे प्रकार का काम करने वाले गरीब लोग वैध या अवैध झुग्गियों में किसी तरह की पनाह पा जाते हैं लेकिन कचरा उठाने वाले उसी कूड़े के ढेर के पास सोते हैं जिसे उन्होंने बीना होता है। क्योंकि बीनने और छाँटने के बाद वही कचरे का ढेर तब तक उनकी सम्पत्ति होता है जब तक वे उसे बेच कर पैसा नहीं ले आते। इसलिए शहरों की अच्छी कॉलोनियों के पास भी आप सुबह कचरा बीनने वालों के परिवार को सोते हुए पाएँगे। उनमें ज्यादातर औरतें और बच्चे ही देखेने को मिलते हैं।

अगर आप रात के ग्यारह बजे के बाद केन्द्रीय मुम्बई की सड़कों पर घूमें तो आप को कचरा उठाने वालों की पूरी फौज दिखाई पड़ेगी। पुरुष, स्त्री और बच्चे सभी कड़ी मेहनत करते हैं। वे रात भर काम करते हैं और किसी तरह से उन सड़कों पर बनी दुकानों के सामने थोड़ी नींद पूरी कर लेते हैं।

नागरिक समाज के समूहों की पैरोकारी और अभियान के बाद कई शहरों ने कचरा बीनने वालों के काम को पहचान के साथ उन्हें एक हद तक वैधता भी प्रदान की है। यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है लेकिन यह कदम अपने में काफी नहीं है। जब शहर और पर्यावरण के लिए उनके योगदान को माना जाता है तो उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दे को भी हल किया जाना चाहिए।

ऐसे समय जब मुख्य पर्यावरण के मुद्दे पर ग्लोबल वार्मिंग के बड़े विषय के रूप में चर्चा की जा रही है और मेक्सिको की खाड़ी में तेल के रिसाव को पर्यावरणीय विनाश मानकर बहस चल रही है, कचरा उठाने वालों पर क्यों चर्चा की जाए? क्योंकि आप पर्यावरण के बारे में तब तक बात नहीं कर सकते जब तक लोगों के जीवन पर पड़ने वाले उसके प्रभाव को न जानें। हमारे इर्द-गिर्द सैकड़ों छोटे-छोटे पर्यावरणीय विनाश हो रहे हैं। लेकिन हम उनकी अनदेखी तब तक करते हैं जब तक वे हमारे जीवन पर असर नहीं डालते।

कचरे की सतत पर्यावरणीय समस्या को सम्भालने में अहम भूमिका निभाने वाले भारत के लाखों कचरा बीनने वाले अपने जीवन और स्वास्थ्य को रोज जोखिम में डालते हैं। यह निरन्तर चलने वाला पर्यावरणीय मुद्दा है जो कि भारत के सामान्य व्यक्ति, मीडिया और नीति निर्माताओं से उतने ही ध्यान की माँग करता है जितना कोई बड़ा मुद्दा।

कल्पना शर्मा मुम्बई में द हिन्दू की ब्यूरो चीफ और डिप्टी एडिटर रही हैं। वे हिन्दू में लगातार लिखती हैं।

साभार : इण्डिया टूगेदर वेबसाइट 27 जून 2010

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