अपशिष्ट पदार्थों द्वारा पर्यावरण अपकर्षण

Friday, July 10, 2015 - 16:57

डॉ. हरि मोहन सक्सेना

 

बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में आज हम अपनी वैज्ञानिक एवं औद्योगिक प्रगति से गौरावान्वित हैं क्योंकि इसी के द्वारा हमें अनेक सुख-सुविधाएँ उपलब्ध हुई है। परन्तु इसके द्वारा जहाँ एक ओर जीवन की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, वहीं पर्यावरण अपकर्षण की समस्या का जन्म हुआ है, जिससे आज सम्पूर्ण विश्व चिन्तित है। पर्यावरण अपकर्षण के अनेक आयामों में से एक है- अपशिष्ट पदार्थों की वृद्धि एवं उनका पर्यावरण तथा मानव-स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव। औद्योगिकरण, नगरीकरण एवं तीव्र जनसंख्या वृद्धि के कारण अपशिष्ट पदार्थों की मात्रा में निरन्तर वृद्धि हो रही है और इनके निस्तारण की उचित व्यवस्था न होने से पर्यावरण के गुणवत्ता स्तर में कमी आ रही है। अतः इस समस्या का समुचित विश्लेषण एवं निदान आवश्यक है। इसी उद्देश्य से प्रस्तुत लेख में अपशिष्ट पदार्थों के निस्तारण की समस्या, उनके पर्यावरणीय प्रभाव एवं उचित प्रबन्धन के प्रारूप का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है।

 

अपशिष्ट पदार्थों की प्रकृति

 

अपशिष्ट पदार्थों से तात्पर्य उन पदार्थों से है जिन्हें उपयोग के पश्चात अनुपयोगी मानकर फेंक दिया जाता है। इनमें एक ओर मानव द्वारा उपयोग में लाए पदार्थ जैसे कागज, कपड़ा, प्लास्टिक, काँच, रबर आदि हैं तो दूसरी ओर उद्योगों से निस्तारित तरल पदार्थ एवं ठोस अपशिष्ट। इसके अतिरिक्त खदानों का मलबा एवं कृषि अपशिष्ट आदि खुले में फेंक देने से पर्यावरण प्रदूषण सहित भू-प्रदूषण भी होता है। यह समस्या ग्रामों की अपेक्षा नगरों में अधिक है क्योंकि जनसंख्या के जमाव तथा उद्योगों के केन्द्रीकरण से अपशिष्ट पदार्थों की मात्रा में निरन्तर वृद्धि होती जाती है। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका जैसे विकसित देश में नगरीय अपशिष्टों की मात्रा प्रतिवर्ष 4.34 करोड़ टन होती है। भारत जैसे देश में जहाँ कूड़ा-करकट निस्तारण की व्यवस्था नहीं है, वहाँ इसकी मात्रा कई गुना अधिक है।

 

अपशिष्ट पदार्थों को उनके स्रोत के आधार पर चार श्रेणियों अर्थात घरेलू अपशिष्ट, औद्योगिक एवं खनन अपशिष्ट, नगरपालिका अपशिष्ट एवं कृषि अपशिष्ट में विभक्त किया जा सकता है।

 

1. घरेलू अपशिष्ट- घरों में प्रतिदिन सफाई के पश्चात गन्दगी निकलती है जिसमें धूल-मिट्टी के अतिरिक्त कागज, गत्ता, कपड़ा, प्लास्टिक, लकड़ी, धातु के टुकड़े, सब्जियों एवं फलों के छिलके, सड़े-गले पदार्थ, सूखे फूल, पत्तियाँ आदि सम्मिलित होते हैं। यदा-कदा होने वाले समारोहों तथा पार्टियों में इनकी मात्रा अधिक हो जाती है। ये सभी पदार्थ घरों से बाहर, सड़को अथवा निर्धारित स्थानों पर डाल दिए जाते हैं जहाँ इनके सड़ने से अनेक विषाणु उत्पन्न होते हैं जो न केवल प्रदूषण बल्कि अनेक रोगों का भी कारण हैं।

 

2. नगरपालिका अपशिष्ट- से तात्पर्य नगर में एकत्र सम्पूर्ण कूड़ा-करकट एवं गन्दगी से है। इसमें घरेलू अपशिष्ट के अतिरिक्त मल-मूत्र, विभिन्न संस्थानों, बाजारों, सड़कों से एकत्र गन्दगी, मृत जानवरों के अवशेष, मकानों के तोड़ने से निकले पदार्थ तथा वर्कशाप आदि से फेंके गए पदार्थ सम्मिलित होते हैं। वास्तव में कस्बे की सम्पूर्ण गन्दगी इसमें सम्मिलित है। इसकी मात्रा नगर की जनसंख्या एवं विस्तार पर निर्भर है। एक अनुमान के अनुसार भारत के 45 बड़े नगरों से कुल मिलाकर प्रतिदिन लगभग 50,000 टन नगरपालिका अपशिष्ट निकलता है।

 

3. औद्योगिक एवं खनन अपशिष्ट- उद्योगों से बड़ी मात्रा में कचरा एवं उपयोग में लाए गए पदार्थों के अपशिष्ट बाहर फेंके जाते हैं। इनमें धातु के टुकड़े, रासायनिक पदार्थ अनेक विषैले ज्वलनशील पदार्थ, तेलीय पदार्थ, अम्लीय तथा क्षारीय पदार्थ, जैव अपघटनशील पदार्थ, राख आदि सम्मिलित होते हैं। ये सभी पदार्थ पर्यावरण को हानि पहुँचाते हैं। कतिपय उद्योगों के अपशिष्ट तालिका-1 में दिखाए गए हैं:-

 

तालिका -1 औद्योगिक अपशिष्ट

 

क्रमांक

उद्योग के प्रकार

अपशिष्ट

लक्षण

1.

औषधि निर्माण उद्योग

सूक्ष्म जीव, कार्बेनिक रसायन

निलम्बित एवं घुलित कार्बनिक पदार्थ

2.

कपड़ा उद्योग

रेशा एवं व्यर्थ कपड़ा

क्षारीय, निलम्बित पदार्थ

3.

रासायनिक उद्योग

कच्चा माल, मध्यक एवं अन्तिम उत्पाद

विषैला, अम्लीय, क्षारीय ज्वलनशील (उद्योग की प्रकृति पर निर्भर)

4.

पेट्रोलियम उद्योग

शोध रसायन

तैलीय एवं अम्लीय

5.

उर्वरक उद्योग

आमंक के रूप में ठोस अपशिष्ट

कैल्शियम एवं कैल्शियम सल्फेट

6.

तापीय ऊर्जी संयंत्र

उड़न राख

सिलिकेट, लौह-आक्साइड, अधजले कार्बन

7.

रबर एवं रबर उत्पाद

रबर

उच्च क्लोराइड, रबर, आचूर्ण

 

इसी प्रकार खनन क्षेत्रों में खानों से निकले अपशिष्ट पदार्थों के विशाल ढेर पर्यावरण प्रदूषण का कारण बनते हैं।

 

4. कृषि अपशिष्ट- कृषि के उपरान्त उसका बचा भूसा, घास-फूस, पत्तियाँ, डंठल आदि एक स्थान पर एकत्र कर दिए जाते हैं या फैला दिए जाते हैं। इनमें गिरने से पानी सड़ने लगता है तथा जैविक क्रिया होने से प्रदूषण का कारण बन जाता है। भारतीय पर्यावरण अभियान्त्रिकी अनुसंधान संस्थान, नागपुर ने भारत के विभिन्न जनसंख्या समूहों के नगरों में अपशिष्ट पदार्थों का स्वरूप निम्न प्रकार से वर्णित किया है:-

तालिका- 2 भारतीय नगरों में अपशिष्ट पदार्थों का स्वरूप (प्रतिशत में)

 

प्रमुख पदार्थ

    नगरों की जनसंख्यानुसार

2 लाख तक

2 से 5 लाख

5 से 20 लाख

20 लाख से अधिक

कागज

3.09

4.74

3.80

7.07

प्लास्टिक

0.57

0.59

0.81

0.86

धातु

0.51

0.39

0.64

1.03

काँच

0.29

0.34

0.44

0.76

राख एवं अग्नि मिट्टी

46.60

39.97

41.81

31.74

मिश्रित पदार्थ

33.41

39.76

40.05

41.74

कार्बन

12.36

12.51

11.95

15.92

नाइट्रोजन

0.60

0.61

0.50

0.51

फास्फोरस फास्फेट

0.70

0.71

0.67

0.59

पोटाशियम

0.70

0.73

0.72

0.67

 

तालिका- 2 से स्पष्ट है कि भारत के नगरों में राख, मिश्रित पदार्थ एवं कार्बन के रूप में लगभग 90 प्रतिशत कूड़ा-करकट होता है। विकसित देशों में इसकी प्रकृति भिन्न होती है जैसे संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में 42 प्रतिशत कागज एवं गत्ते की वस्तुएँ, 24 प्रतिशत धातु पदार्थ और 12 प्रतिशत अपशिष्ट खाद्य पदार्थ होते हैं। स्पष्ट है कि नगरीय अपशिष्ट आज पर्यावरण अपकर्षण का प्रमुख कारण है जिसमें उत्तरोतर वृद्धि होती जा रही है।

 

मानव पर दुष्प्रभाव

अपशिष्ट पदार्थों के एकत्रित होने का प्रभाव पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य पर अत्यधिक हानिकारक होता है। संक्षेप में ये दुष्प्रभाव निम्नांकित हैं:-

1. अपशिष्ट पदार्थ पर्यावरण अपकर्षण में अत्यधिक वृद्धि करते हैं क्योंकि इनसे भू-प्रदूषण के अतिरिक्त जल एवं वायु प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।

2. कूड़ा-करकट के सड़ने-गलने से अनेक प्रकार की गैस एवं दुर्गन्ध निकलने से क्षेत्रीय वातावरण दूषित हो जाता है। यदि इनमें रसायनों की मात्रा होती है तो यह और भी अधिक हानिकारक होती है।

3. अपशिष्ट पदार्थ, जिनमें मल-जल एवं डिटर्जेन्ट मिश्रित होते हैं, जब नालियों से बह कर जल स्रोतों में पहुँच जाते हैं तो जल प्रदूषण के अतिरिक्त अनेक रोगों का भी कारण बनते हैं।

4. रसायन मिश्रित जल एवं अन्य गन्दगी रिसाव द्वारा भूमिगत जल तक पहुँच कर उसे भी प्रदूषित कर देते हैं।

5. अपशिष्ट पदार्थों को समुद्र में डालने से सामुद्रिक पारिस्थितिकी तन्त्र में असंतुलन आ जाता है।

6. मल-जल द्वारा लगातार सिंचाई करने से मृदा के छिद्र अवरुद्ध हो जाते हैं और उसमें उपस्थित सूक्ष्म जीव मर जाते हैं, जो भूमि के लिए आवश्यक है।

7. औद्योगिक अपशिष्ट भूमि की उर्वरा शक्ति पर विपरित प्रभाव डालते हैं। इनके कारण अनेक बीमारियाँ जैसे टी.बी, मलेरिया, हैजा, मोतीझरा, पेचिश, पीलिया, आन्त्रशोथ, आँखों के रोग आदि होते हैं।

8. नगरों में जहाँ अपशिष्ट पदार्थ एकत्र होते हैं, वहाँ सामान्यतः गन्दी बस्तियों का विस्तार हो जाता है। यहाँ रहने वाले लोग नारकीय जीवन व्यतीत करते हैं। ये बस्तियाँ हमारे नगरीय विकास पर एक कलंक हैं। दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता, चेन्नई या राज्यों की राजधानियों में आज अनेक गन्दी बस्तियाँ हैं और उनका विस्तार होता जा रहा है। यही नहीं राजस्थान राज्य के अनेक नगरों जैसे जयपुर, जोधपुर, कोटा, बीकानेर, उदयपुर, भीलवाड़ा, श्रीगंगानगर, अलवर, भरतपुर आदि सभी नगरों में गन्दी बस्तियों का विस्तार होता जा रहा है। साथ ही नगरपालिकाओं के सीमित साधनों एवं उदासीनता के कारण आज सभी नगरों में अपशिष्ट पदार्थों का फैलाव रिहायशी क्षेत्रों में हो रहा है जो अत्यधिक चिन्ता का विषय है।

 

प्रबन्धन

 

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि अपशिष्ट पदार्थों के एकत्रीकरण एवं विस्तार की समस्या एक गम्भीर समस्या है। आज यह बड़े नगरों में है, कल छोटे नगरों में होंगी। यही नहीं अपितु नगरीय विकास के साथ-साथ यह और विकट होती जाएगी। विकास एक नैसर्गिक प्रक्रिया है जिसे रोका नहीं जा सकता। आवश्यकता है उसे एक उचित दिशा देने की जिससे ‘विनाशरहित विकास’ की कल्पना को मूर्तरूप दिया जा सके। यह कार्य उचित प्रबन्धन द्वारा सम्भव है जिसे सरकारी तन्त्र, स्वयंसेवी संस्थाओं और नागरिकों के सहयोग से किया जाता है।

 

भारत सरकार ने 1975 में शिवरामन समिति का गठन इस कार्य हेतु किया था जिसके सुझाव थे- बड़े-बड़े कूड़ेदानों की स्थापना, मानव द्वारा अपशिष्ट मल-मूत्र निष्कासन की उचित व्यवस्था, नगरों में कूड़ा-कचरा उठाने की समुचित व्यवस्था, कूड़े के ढेरों को जला कर भस्म करना आदि। अपशिष्ट पदार्थों की समस्या के नियन्त्रण तथा प्रबन्धन हेतु निम्न कदम उठाने आवश्यक हैं:-

 

1. अपशिष्ट पदार्थों को नष्ट करना- अपशिष्ट पदार्थों को नष्ट कर उनके कुप्रभाव से पर्यावरण एवं मानव को बचाया जा सकता है। इन्हें नष्ट करने की एक सहज विधि भस्मीकरण है जिससे इसकी मात्रा 60 से 80 प्रतिशत कम की जा सकती है। इसके लिए दहन भट्टी या विशाल दहन प्लान्ट का उपयोग किया जाना चाहिए किन्तु इस क्रिया में वायु प्रदूषण न फैले इसका ध्यान रखना चाहिए। रासायनिक क्रिया द्वारा भी अनेक अपशिष्ट पदार्थों को नष्ट किया जा सकता है अथवा उन्हें पुनः उपयोगी बनाया जा सकता है। गहरे महासागरों में अपशिष्टों का निस्तारण किया जा सकता है किन्तु इसमें यह ध्यान देना आवश्यक है कि सागरीय पर्यावरण प्रदूषित न हो।

2. अपशिष्ट पदार्थों से कम्पोस्ट बनाना- नगरीय अपशिष्टो को भूमि में दबा, सड़ा-गलाकर उत्तम उर्वरक बनाया जा सकता है जो विशेषकर सब्जियों के उत्पादन में अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होता है।

3. दारण (रेनडरिंग)- इसके अन्तर्गत हड्डियों, वसा, पंख रक्त आदि पशु अवशेषों को पका कर चर्बी प्राप्त की जा सकती है जिसका प्रयोग साबुन बनाने में किया जाता है तथा इसके प्रोटीन वाला अंश पशु-चारे के रूप में उपयोगी होता है।

4. विद्युत उत्पादन- अपशिष्ट पदार्थों से विद्युत उत्पादन का प्रयोग सफलतापूर्वक किया जा चुका है। इस दिशा में समुचित ध्यान देना आवश्यक है। इसी प्रकार इसमें मिश्रित कार्बनिक पदार्थों को विशेष प्रक्रिया से गर्म कर मिथेन गैस प्राप्त की जा सकती है जिसका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है।

5. कूड़े-करकट को अत्यधिक दबाव से ठोस ईंटों में बदला जा सकता है।

6. नगरों में मल-जल निकासी हेतु उचित सीवरेज प्रणाली का विकास आवश्यक है।

7. नगरीय जल-मल को नगर से दूर गर्त में डाला जाए तथा वहाँ से शुद्धीकरण के पश्चात ही इसका सिंचाई आदि मे उपयोग किया जाना चाहिए।

8. उद्योगों को अपशिष्ट निस्तारण हेतु कानूनी रूप से बाध्य किया जाना आवश्यक है।

9. अपशिष्ट पदार्थों का पुनर्चक्रण कर रद्दी कागज से कागज, लोहे की कतरनों से स्टील, एल्युमिनियम के टुकड़ों से पुनः एल्युमिनियम, व्यर्थ प्लास्टिक से प्लास्टिक बनाने आदि की समुचित व्यवस्था होना आवश्यक है। इस प्रकार के उद्योगों को जो वर्तमान में कार्यरत हैं, और विकसित करने की आवश्यकता है।

10. सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर अपशिष्ट पदार्थों के निस्तारण एवं उनके उपयोगों के सम्बन्ध में निरन्तर शोध की आवश्यकता है। यही नहीं अपितु विकसित देशों को विकासशील देशों को वे सभी तकनीकें प्रदान करनी चाहिए जो अपशिष्टों के निस्तारण एवं पर्यावरण सुरक्षा में सहायक हो।

11. अपशिष्ट पदार्थों की बढ़ती समस्या एवं पर्यावरण सुरक्षा हेतु प्रत्येक क्षेत्र, यहाँ तक कि प्रत्येक नगर हेतु एक दीर्घकालिक ‘मास्टर प्लान’ बनाया जाना आवश्यक है जिससे नियोजित रूप से इसका निराकरण हो सके।

 

उपर्युक्त प्रबन्धन सम्बन्धी उपायों के अतिरिक्त सर्वाधिक आवश्यक है- सामान्य नागरिकों के व्यवहार में सुधार। यदि हम में से प्रत्येक अपने घर के अपशिष्ट पदार्थों को स्वयं या दूसरे के घरों अथवा नालियों में फेंकना बन्द कर उसको उचित स्थान पर एकत्र करे तो यह समस्या स्वतः कम हो जाएगी। इसी प्रकार नगर-पालिकाओं को भी अपनी उदासीनता त्यागनी होगी और सफाई कर्मचारियों के कार्यों में कुशलता एवं कर्तव्य-परायणता लानी होगी। अपशिष्ट पदार्थों से पर्यावरण प्रदूषित न हो और हमारे स्वास्थ्य पर इसका प्रतिकूल प्रभाव न हो, इसके लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है क्योंकि पर्यावरण एक साझी विरासत है, जिसे हमें सुरक्षित रखना है।

 

लेखक राजकीय महाविद्यालय, श्रीगंगानगर, राजस्थान में उप-प्राचार्य हैं।

 

साभार : योजना अप्रैल 1997

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