अब कहाँ फेंके कचरा

Tuesday, June 23, 2015 - 10:31

अरुण कुमार त्रिपाठी

वास्तविक अर्थों में देश के अकेले महानगर मुम्बई को अभी हाल में बारिश और बाढ़ से राहत मिली है और कहा जा रहा है कि तीन दिनों की अफरा-तफरी के बाद शहर सामान्य होने लगा है। इस दौरान तमाम फिल्मों के सेट खराब हुए तमाम धारावाहिकों की शूटिंग रद्द हुई और कई अभिनेत्रियों को अपनी कार छोड़ कर पैदल जाना पड़ा। लेकिन शहर की जो सामान्य स्थिति बताई जा रही है उसमें जगह-जगह कचरा बिखरा पड़ा है। रेलवे लाइनों पर पानी के साथ कूड़ा घरों से बहकर आए कचरे के ढेर बिखरे हैं। सड़कों की भी स्थिति बेहतर नहीं है। यह सब कब और कैसे साफ होगा कोई दावे के साथ कह नहीं सकता। कहते हैं कि मुम्बई औसतन 15,050 टन ठोस कचरा प्रतिदिन निकालती है जिसमें 4,110 टन कचरा निर्माण और ध्वंस का होता है। हालाँकि मुम्बई नगर निगम के अनुसार यह आँकड़ा तकरीबन नौ हजार टन का है। जिसमें साढ़े छह हजार टन ठोस कचरा और बाकी भवन निर्माण का है।

कचरे के बारे में सरकारी और गैर-सरकारी एजेंसियो के इसी फर्क के आधार पर कहा जा सकता है कि मुम्बई को सही अनुमान ही नहीं है कि वह कितना कचरा रोज पैदा करती है। जब ठीक अनुमान ही नहीं है तो उसे निपटाने का इंतजाम कैसे होगा? मुम्बई इस समस्या पर अपने ढंग से जूझती और विचार करती रहती है और उत्तर से दक्षिण तक लम्बाई में फैले इस शहर के सामने समस्या यह है कि जजीरा होने के नाते वह अपना कचरा कहाँ फेंके। वेटलैण्ड में फेंका नहीं जा सकता और शहर के किनारे इतनी जगह नहीं है कि बार-बार वहाँ लैंडफिल बनाया जा सके।

दिल्ली की स्थिति देखकर इटली के शहर नेपल्स में 2007 में हुई सफाई कर्मचारियों की हड़ताल की याद ताजा हो जाती है। उन्होंने भी कचरा उठाने से मना कर दिया था और तब नगर निकाय को कचरे के निस्तारण के बारे में नए सिरे से सोचना पड़ा था।

दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली जो कि तीन तरफ से हरियाणा और एक तरफ से उत्तर प्रदेश से घिरी है उसके पास पर्याप्त मैदान और जगह होने के बावजूद अब कचरे को लेकर त्राहि-त्राहि कर रही है। उसके पास कचरा फेंकने के लिए जगहें नहीं बच रही हैं। अभी पूर्वी और उत्तरी दिल्ली में 30,000 सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के बाद शहर की सड़कों पर जिस तरह हफ्तों कचरा बिखरा रहा उससे बीमारी और अराजकता की स्थिति पैदा होती दिखाई पड़ रही थी। फिलहाल मजदूरों के काम पर लौट आने से थोड़ी राहत जरूर मिली है लेकिन यह राहत स्थायी नहीं है। क्योंकि मजदूरों ने फिर 26 जून से हड़ताल पर जाने की धमकी दी है। इन दिनों सफाई कर्मचारियों को लेकर आप पार्टी, कांग्रेस पार्टी और भाजपा के भीतर जो राजनीतिक खींचतान चल रही है उससे लगता है कि कोई न कोई पेंच फिर फँसेगा। दिल्ली की स्थिति देखकर इटली के शहर नेपल्स में 2007 में हुई सफाई कर्मचारियों की हड़ताल की याद ताजा हो जाती है। उन्होंने भी कचरा उठाने से मना कर दिया था और तब नगर निकाय को कचरे के निस्तारण के बारे में नए सिरे से सोचना पड़ा था।

सवाल यह है कि नई राजनीति का दावा करने वाले और अच्छे दिनों व स्वच्छ भारत का सपना दिखाने वाले लोग क्या महानगरों के कचरे के निस्तारण के बारे में कोई ठोस रणनीति बनाने की तैयारी में हैं क्योंकि यूरोप ने अपने कचरे के बारे में नीतियाँ बनाई हैं और उसे लागू करने के साथ वे बेहतर परिणाम पा रहे हैं लेकिन हम अभी भी तमाम तरह की दुविधा के शिकार हैं। यह सही है कि भारतीय शहर मुम्बई और दिल्ली नेपल्स से काफी अलग हैं। नेपल्स की आबादी कुल जमा दस लाख से भी कम है। जबकि दिल्ली का एक इलाका इतने लोगों से आबाद है। यूरोप में कचरा बीनने वाले नहीं होते जबकि भारतीय शहर ऐसे लोगों से पटे पड़े हैं। अकेले दिल्ली में तीन से चार लाख कचरा बीनने वाले हैं। जिनमें अच्छे बुरे हर तरह के लोग हैं। कचरा बीनने वालों के एक हिस्से में तो बाकायदा माफिया भी काम करते हैं। मुम्बई जैसे शहर में जो भी नया व्यक्ति जाता है वह कोई काम न मिलने पर कचरा बीनने में लग जाता है। इस काम से उसे दो हजार महीने तक की आमदनी भी हो जाती है। कचरा बीनने वाले भारत में ही नहीं दुनिया भर में हैं। विश्व बैंक के अनुसार उनकी आबादी दुनिया की कुल आबादी की 1-2 प्रतिशत है।

मुम्बई जैसे शहर में जो भी नया व्यक्ति जाता है वह कोई काम न मिलने पर कचरा बीनने में लग जाता है। इस काम से उसे दो हजार महीने तक की आमदनी भी हो जाती है। कचरा बीनने वाले भारत में ही नहीं दुनिया भर में हैं। विश्व बैंक के अनुसार उनकी आबादी दुनिया की कुल आबादी की 1-2 प्रतिशत है।

भारत और दुनिया के विकसित देशों के कचरे की किस्म में भी फर्क है। भारत के घरों से अभी भी प्लास्टिक का कचरा कम और ऑर्गेनिक व रसोई का कचरा ज्यादा निकलता है। हालाँकि अब दावा किया जा रहा है कि भारत में भी प्लास्टिक कचरा बढ़ रहा है। फिर भी यूरोप के मुकाबले उसका अनुपात कम है। लेकिन यूरोप ने कचरे से लैंडफिल का काम लगभग बन्द कर दिया है। उनके लैंडफिल में अगर जाता है तो फ्लाई ऐश जाता है। बाकी सारे कचरे का किसी न किसी रूप में फिर से इस्तेमाल हो जाता है। उससे या तो गैस बन जाती है और बस, ट्रक चलते हैं या फिर घरों को ठण्ड में गरम करने और गरमी में ठण्डा करने का काम लिया जाता है। यही नहीं यूरोप के कचरा निस्तारण संयंत्र 2500 किलो प्लास्टिक प्रति घण्टा हासिल करते हैं। इस प्लास्टिक का प्रयोग वे फर्निशिंग के फाइबर बनाने , क्लॉथिंग और ऑटोमोबाइल उद्योग के प्रयोग में आने वाली चीजें बनाने में करते हैं।

लेकिन यूरोप में जहाँ कचरा बीनने वालों की तादाद न के बराबर है या यह काम मशीनें करती हैं वहाँ इस काम को घरेलू स्तर पर काफी आसानी से पहले ही कर दिया जाता है। यह वहाँ का सार्वजनिक संस्कार है जो उन्हें एक नागरिक के तौर पर सचेत रखता है। स्वीडन के घरों में चार से आठ कूड़ेदान होते हैं। वे एक डिब्बे में बिजली के बल्ब और बैटरी वगैरह डालते हैं जो कि सुपर मार्केट चला जाता है। दूसरे कूड़ेदान में किचन का कचरा डालते हैं जो कि बायोगैस के रूप में बदल दिया जाता है और जिससे बसें चलती हैं और शहर का ईंधन बचता है। उससे बचने वाला कचरा बायोफर्टिलाइजर के तौर पर प्रयोग होता है। दरअसल वहाँ सारा जोर कचरे को अलग करने से ज्यादा उससे ईंधन उत्पादन करने पर है। कचरे को तो वहाँ का जागरूक नागरिक पहले ही अलग कर देता है। हालाँकि कचरे से ईंधन बनाने वाली मशीनें काफी महँगी हैं और उनकी लागत दस करोड़ से बीस करोड़ यूरो तक है।

इसके बावजूद सवाल यह है कि भारत जैसे देश में जहाँ कचरा बीनने वालों की लम्बी फौज है और जिससे उन्हें रोजगार भी मिलता है, उन्हें दरकिनार करके क्या हम महँगे मशीनीकरण की ओर जाएँगे? उससे भी जरूरी सवाल यह है कि क्या हम कम कचरा निकालने और उसे अलग करके रखने की संस्कृति को अपनाएँगे? यह सारे सवाल संसाधन, सभ्यता और संस्कृति से जुड़े हैं। इसके साथ शहरी नियोजन की दूरगामी वैज्ञानिक दृष्टि भी चाहिए। क्या भारत उसके लिए तैयार है? या हम महज नारेबाजों और तमाशबीनों का देश बनकर रह गए हैं?

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