ताकि कचरा न हो जाये जिन्दगी

Friday, June 5, 2015 - 16:45

अरुण तिवारी

 

हवा में कचरे को घटाने के लिए भारतीय वाहन निर्माताओं ने कई इंतज़ाम किए। उद्योगों के धुएँ पर लगाम को लेकर कई कानून बने, फिर भी राजधानी, दिल्ली की हवा ने हमारी साँस को चुनौती देने के कई रिकाॅर्ड तोड़े। नदी और भू-जल में कचरा रोकने के नाम पर हमने कई योजनायें बनाईं, कई हजार करोड़ खपाये, किन्तु हमारी एक भी महानगरीय नदी नहीं, जिसका पानी पीने योग्य हो। भारत, भूजल में आर्सेनिक, नाइट्रेट, फ्लोराइड तथा भारी धातु वाली अशुद्धियों की तेजी से बढ़ोत्तरी वाला देश बन गया है। हमने कचरा प्रबंधन के नाम पर कई नारे गढ़े, किन्तु हम कचरा कम करने की बजाय, बढ़ाने वाले साबित हो रहे हैं। भारत में हर रोज करीब 1.60 लाख मीट्रिक टन कचरा होता है। हर भारतीय, एक साल में पाॅलिथिन झिल्ली के रूप में औसतन आधा किलोग्राम कचरा बढ़ाता है।

 

सेहत की दृष्टि से इलेक्ट्रानिक कचरे का आँकड़ा सबसे बड़ा खतरा है। एक सामान्य कम्प्यूटर का वजन सामान्यतया 3.15 किलो होता है। इसमें 1.90 किलो लेड, 0.693 ग्राम पारा और 0.04936 ग्राम आर्सेनिक होता है, शेष प्लास्टिक होता है। बिना शोधन किए, ई-कचरे और रासायनिक कचरे का निष्पादन नहीं करना चाहिए। ऐसा न करने पर, ऐसी जगहों पर अगले 15 साल तक गैसों के अलावा घुलनशील नाईट्रेट आदि प्रदूषण कारक तत्वों का उत्सर्जन होता रहता है। कायदा यह है कि जिस क्षेत्र में बिना शोधन ई-कचरा डंप किया गया हो, वहाँ अगले 15 साल तक कोई आबादी नहीं बसाई जानी चाहिए। अपने फायदे के लिए हम इस कायदे की परवाह भी नहीं कर रहे। इसकी वजह से हमारे कम्प्यूटर, कल-पुर्जे खराब हो रहे हैं। कैंसर, एलर्जी, गर्भपात और तंत्रिका तंत्र की बीमारियों के मरीज बढ़ रहे हैं। कचरा बढ़ता जा रहा है। कचरे के पुनर्चक्रीकरण यानी रिसाइक्लिंग की हमारी रफ्तार अत्यंत धीमी है। अभी हम कुल कचरे की मात्र एक प्रतिशत मात्रा को ही रिसाइकल कर पा रहे हैं। यह परिदृश्य चिंतित करता है।

 

कचरा, कैंसर की तरह है। नीति कहती है कि यदि इसका उपचार करना है, तो इसे पैदा करने वाले स्रोत पर ही करना होगा। निर्मलता का सर्वश्रेष्ठ सिद्धांत यही है। जलस्रोतों को पहले मलीन करना और फिर साफ कराने का अनुभव अब तक मलीनता बढ़ाने वाला ही साबित हुआ है।

 

फिलहाल, कचरा निष्पादन के तीन तरीके प्रचलित हैं: शोधन पश्चात् निर्धारित लैंडफिल एरिया में डालना, इंस्टीनरेटर में जलाकर नष्ट करना और कंपोस्ट बनाना। आकलन है कि यदि भारत में प्रतिदिन पैदा हो रहे 1.60 लाख मीट्रिक टन कचरे का ठीक से निष्पादन किया जाये, तो इतने कचरे से प्रतिदिन 27 हजार करोड़ रुपये की खाद बनाई जा सकती है। 45 लाख एकड़ बंजर भूमि उपजाऊ बनाई जा सकती है। 50 लाख टन अतिरिक्त अनाज पैदा किया जा सकता है और दो लाख सिलेंडरों हेतु अतिरिक्त गैस हासिल की जा सकती है। लेकिन यह हो नहीं रहा। नतीजा? पानी, बिजली, भीड़, कचरा और पार्किंग को नगर नियोजन के समक्ष पेश आ रही प्रमुख पाँच चुनौतियों के रूप में चिन्हित किया गया है।

 

हकीकत है कि वर्तमान नगरों का कचरा और सीवेज हमसे सम्भाले नहीं सम्भल रहा। जितना विकसित नगर, उतनी गन्दी नदी! विकास और शुचिता का यह कैसा सम्बन्ध है? हम गाँव-गाँव शौचालय बनाकर भी यही करने जा रहे हैं, जितना विकसित गाँव, उतना गन्दा उसका तालाब.. उसकी नदी। हम भूल रहे हैं कि कचरे के अनियोजित निष्पादन ने धरती के नीचे का प्रवाह रोका तो धरती ने पानी सोखने से इंकार कर दिया। इसी कारण, तीन दिन की बारिश ने मुम्बई को उसकी औकात बता दी। हरियाली की कमी और हवा में बढ़ते कचरे ने साँस, सेहत और वैश्विक तापमान के संकट को कई गुना बढ़ा दिया है। क्या कचरा होते नगरों को लेकर, हमारे नगर नियोजकों को अभी और किसी चेतावनी का इंतजार है?

 

आज भारत में 5161 नगर, 35 महानगर, 393 प्रथम श्रेणी और 401 द्वितीय श्रेणी दर्जा प्राप्त नगर हैं। 20,000 से 50,000 तक की आबादी वाले कई छोटे नगर हैं। इनमें से 3,894 नगर न नियोजित हैं और न ही वहाँ नियोजन करने वाले निगम या नगरपालिकायें हैं। क्या जरूरी नहीं कि 100 नई स्मार्ट सिटी बनाने और बसाने से पहले सरकार, मौजूदा नगरीय बसावट का सेहतमंद नियोजन सुनिश्चित करें? क्या जरूरी नहीं कि हम कुल भूमि में ‘वाटर रिजर्व’, ‘ग्रीन रिजर्व’ और ‘वेस्ट रिजर्व’ जोन का निर्धारण करें। कचरा डंप करने की जगह के चुनाव में सावधानी बरतें। क्या हमारे नगर नियोजक यह कर रहे हैं? यदि हम चाहते हैं कि हमारे नगरों के जलस्रोत व भूमि साफ-स्वच्छ रहें तो कचरा न्यूनतम उत्पन्न हो, इसके लिए ’यूज एण्ड थ्रो’ प्रवृति को हतोत्साहित करने वाले टिकाऊ उत्पाद नियोजित करें।

 

हम गाँव-गाँव शौचालय बनाकर भी यही करने जा रहे हैं, जितना विकसित गाँव, उतना गन्दा उसका तालाब.. उसकी नदी। हम भूल रहे हैं कि कचरे के अनियोजित निष्पादन ने धरती के नीचे का प्रवाह रोका तो धरती ने पानी सोखने से इंकार कर दिया। इसी कारण, तीन दिन की बारिश ने मुम्बई को उसकी औकात बता दी। हरियाली की कमी और हवा में बढ़ते कचरे ने साँस, सेहत और वैश्विक तापमान के संकट को कई गुना बढ़ा दिया है।

 

दरअसल, स्वच्छता, आज एक खास नीति और नीयत की माँग करती हैै। यह सिर्फ एक नारे से नहीं होने वाला। कचरा, कैंसर की तरह है। नीति कहती है कि यदि इसका उपचार करना है, तो इसे पैदा करने वाले स्रोत पर ही करना होगा। निर्मलता का सर्वश्रेष्ठ सिद्धांत यही है। जलस्रोतों को पहले मलीन करना और फिर साफ कराने का अनुभव अब तक मलीनता बढ़ाने वाला ही साबित हुआ है। आज ताजा पानी नहरों में और सीवेज के मल और उ़द्योगों के शोधित अवजल नदियों में बहाया जा रहा है। नगरीय नालों का नियोजन ऐसा हो कि इसके विपरीत ताजा जल नदी में बहे और शोधित मल-अवजल नहरों में बहाया जाये।

 

अपव्यय और कंजूसी में फर्क होता है। जूठन न छोड़ना कंजूसी नहीं, अपव्यय रोकना है। गाँवों में तो यह जूठन मवेशियों के काम आ जाता है अथवा खाद गड्ढे में चला जाता है। शहरों में ऐसा भोजन कचरा बढ़ाता है। हमें चाहिए कि हम जिस चीज का ज्यादा इस्तेमाल करते हों, उसके अनुशासित उपयोग का संकल्प लें। यदि हम बाजार से घर आकर कचरे के डिब्बे में जाने वाली पाॅलिथिन झिल्लियों को घर में आने से रोक दें, तो गणित लगाइये कि एक अकेला परिवार ही अपनी जिन्दगी में कई सौ किलो कचरा कम कर देगा। इस तरह एक बात तो तय है कि हम जो कुछ भी बचाएंगे, अंततः उससे कचरा कम ही होगा। इससे धरती बचेगी और हम भी। भूले नहीं कि हर बड़े बदलाव की शुरुआत छोटी ही होती है। परिणाम की चिन्ता करे बगैर आइये, करें।

 

लेखक मोबाइल: 9868793799

लेखक ईमेल: amethiarun@gmail.com

TAGS