कूड़े के ढेर पर चाइना बाजार

Sunday, May 24, 2015 - 12:05

पद्माकर त्रिपाठी

 

दुनिया भर में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए मची होड़ में अब ई-कचरा फैलाने का काम भी शामिल हो गया है। अंतरिक्ष से लेकर महासागरों, नदियों, पहाड़, मैदान तक फैली उस होड़ में से ई-कचरा एक नई समस्या के रूप में उभर कर सामने आया है। यह समस्या अचानक नहीं आई है बल्कि यह मानव की ओर से लम्बे समय से किए जा रहे प्रयासों का ही सहज परिणाम है। उस कचरे में सभ्य-असभ्य, विकसित और विकासशील सभी तरह के देशों के लोगों ने कचरे फैलाए हैं। लेकिन इस ओर किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा है कि उस कचरे से निजात कैसे मिलेगी?

 

अंतरिक्ष से लेकर महासागरों, नदियों, पहाड़, मैदान तक फैली उस होड़ में से ई-कचरा एक नई समस्या के रूप में उभर कर सामने आया है। सभ्य-असभ्य, विकसित और विकासशील सभी तरह के देशों के लोगों ने कचरे फैलाए हैं।

 

अफसोस यह कि सारी दुनिया उसे गिरते और फैलते हुए लाचार हो कर देखने को मजबूर है। ध्यान देने की बात यह भी है कि उस दिशा में वैश्विक स्तर पर अभी तक कोई कारगर कार्ययोजना बनाने की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। अखिर दिनोदिन उस फैलते कचरे से बचाव कैसे हो? देखें तो ई-कचरा का औद्योगिक और तकनीकी विकास से सीधा सम्बन्ध है। परम्परागत और प्राकृतिक व्यवस्था के आधार पर अधिकतम जीवन जीने वाले देशों में यह समस्या अपेक्षाकृत कम है। यूएन, एसोचैम, इंटरनेशनल जर्नी ऑफ एनवायरॉनमेंटल टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेंट जैसे चोटी के संस्थानों की रिपोर्ट बताती है कि ई-कचरा जेनरेट करने के लिहाज से भारत दुनिया का पाँचवा देश बन गया है। इस सूची में मानव संसाधन विकास के नजरिये से महाशक्ति कहलाने वाले देश शामिल हैं।

 

कारगर नहीं कानून

 

ई-कचरे को नष्ट करने के लिए कोई भी ईमानदारी से प्रयास करता नहीं दिखाई देता है। देखें तो उस गन्दगी की सफाई की अपेक्षा उसे फैलने से रोकने का काम ज्यादा आसान है। लेकिन इसके लिए अभी तक कोई भी कानून व्यावहारिक स्तर पर काम नहीं कर पा रहा है। इधर कुछ शहरों में गन्दगी फैलाने और गलत जगह पर कूड़ा फेंकते पकड़े जाने पर नगर महापालिकाओं की ओर से आर्थिक जुर्माने की सजा का प्रावधान किया जा रहा है। लेकिन वह इस समस्या का सही समाधान नहीं है।

 

लोगों की भी मजबूरी

 

यह एक सामाजिक समस्या है जिसमें रहन-सहन के तौर-तरीकों पर बहुत कुछ निर्भर करता है। दूसरे सही विकल्प आसानी से नहीं मिल पाने के नाते ऐसा करना लोगों की मजबूरी भी है। महानगरों में विधिवत तरीके से बसाये गये इलाकों में थोड़ी गनीमत है। लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में तो हालात और भी खराब हैं।

 

कुछ राज्य सरकारों ने लोगों में उस ओर जागरुकता लाने के लिए अपने शैक्षिक पाठ्यक्रमों में इससे सम्बन्धित बातों को शामिल करने का भी प्रयास किया है। लेकिन वह कोशिश भी अपेक्षित रूप से सफल होती नहीं दिख रही है। असल में उस नजरिये से किसी कानून को भी लागू करना और उसके तहत कार्रवाई करना दोनों ही काम बहुत कठिन हैं।

 

साथ ही उस तरह की घटनाओं में सम्बन्धित कानूनों का पालन कराना पुलिस, प्रशासन और दूसरे मुकदमों के बोझ से दबी अदालतों के लिए मामला चलाना बहुत बड़ी चुनौती है। उस कचरे से निकलने वाले विषैले तत्वों से होने वाले प्रदूषण को रोक पाने में हम बुरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं।

 

ई-कचरे को नष्ट करने के लिए कोई भी ईमानदारी से प्रयास करता नहीं दिखाई देता है। देखें तो उस गन्दगी की सफाई की अपेक्षा उसे फैलने से रोकने का काम ज्यादा आसान है। लेकिन इसके लिए अभी तक कोई भी कानून व्यावहारिक स्तर पर काम नहीं कर पा रहा है। इधर कुछ शहरों में गन्दगी फैलाने और गलत जगह पर कूड़ा फेंकते पकड़े जाने पर नगर महापालिकाओं की ओर से आर्थिक जुर्माने की सजा का प्रावधान किया जा रहा है। लेकिन वह इस समस्या का सही समाधान नहीं है।

 

निस्तारण महज दस फीसदी

 

देश में ई-कचरे से मुक्ति दिलाने वाली कुल 16 कम्पनियों के जरिये अधिकतम 10 फीसद कचरे का खात्मा हो पाता है। हाल यह है कि हम अपनी जरुरतों को पूरा करने के लिए मानव संसाधन और तकनीक तो विकसित करते जा रहे हैं। लेकिन उसके कबाड़ हो जाने के बाद उसे हानिरहित तरीके से समाप्त करने अथवा किसी दूसरे रूप में रूपांतरित करने की तकनीक विकसित करने में असफल होते जा रहे हैं। उनमें सबसे बुरा हाल इलेक्ट्रॉनिक सामानों का है।

 

सस्ते माल का रोना

 

विदेश से बड़े पैमाने पर उपयोगी सामान के रूप में यहाँ आकर बहुत जल्द कचरे में बदल जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक सामानों का सबसे बड़ा स्रोत चाइना बाजार के रूप में दिखाई देता है। उन सामानों में चीन में बने कम टिकाऊ और सस्ते माल का सबसे बड़ा जखीरा है। उनके साथ ही देशी कम्पनियों के सामान भी ई कूड़े का बड़ा भण्डार कायम कर रहे हैं। उपभोक्ताओं के लिए घरेलू उपयोग के सामान बनाने वाली कम्पनियों का हाल यह है कि वे पॉलिथीन बैग, मोबाइल और उनकी बैटरियाँ, टैबलेट, कम्प्यूटर, सीएफएल, टीवी, डीवीडी-वीसीआर, मिक्सर जैसी घरेलू वस्तुओं के कुछ महीनों के अंतराल पर अपने नये मॉडल पेश कर रही हैं। ऐसे में उपभोक्ताओं के उनके पुराने सामान की सही कीमत नहीं मिल पाती है। वे गैर मुनासिब दाम पर अपने सामान बेचने की अपेक्षा उसे घर रख देने और कुछ समय बाद कबाड़ हो जाने पर कूड़ेदान में फेंक देते हैं।

 

आसान नहीं समाधान

 

अहम सवाल यह है कि तेजी से फैल रहे कचरे पर रोक कैसे लगाई जाए? जीवन की रोजाना बढ़ती हुई जरुरतों को रोक पाने में भी हम असफल होते जा रहे हैं। दूसरी ओर उसी का लाभ उठा कर कम्पनियाँ अपने उत्पाद भी पेश कर रही हैं। इसके लिए वैश्विक अथवा राष्ट्रीय स्तर पर कोई भी कानून व्यावहारिक रूप में काम नहीं कर रहा है। इस समस्या को कानून के जरिये खत्म भी नहीं किया जा सकता है। इस काम में पढ़े-लिखे से लेकर अशिक्षित, बेरोजगार, अतिविशिष्ट व्यक्ति कमोबेश सभी शामिल हैं। ऐसे में, दो सगे पड़ोसियों के बीच मामूली बात पर तनाव हो जाता है। जबकि ई-कचरे को खत्म करने के लिए निजी अथवा संस्थागत किसी भी रूप में कहीं भी कारगर सहमति बनती नहीं दिखाई देती है।

 

साभार : नेशनल दुनिया 24 मई 2015

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