शौचालय का समाजिक सम्बन्ध

Friday, May 15, 2015 - 12:18

आरती केलकर खम्बाटे

 

शोध से पता चला है कि सामाजिक विज्ञान और व्यवहार परिवर्तन में गहरा सम्बन्ध है, खासतौर पर शौचालय उपयोग के मामले में। शौचालय से सम्बन्धित प्रयास समुदाय को ध्यान में रखकर किए जाते हैं न कि एक व्यक्ति को।

 

स्वच्छता से जुड़े मसलों पर बातचीत बेहद कम हुई है, जबकि बहुत बड़े स्तर पर शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है। हाल ही में जारी संयुक्त राष्ट्र की सहस्राब्दी विकास लक्ष्य रिपोर्ट के अनुसार भारत में विश्व के सबसे ज्यादा लोग खुले में शौच करते हैं। ग्रामीण भारत में 66 प्रतिशत लोग खुले में शौच के लिए जाते हैं।

 

1986 से सरकारी सहायता से स्वच्छता प्राप्त करने की हो रही तमाम कोशिशों जैसे पूर्ण स्वच्छता अभियान, निर्मल भारत अभियान के बावजूद कई शौचालय प्रयोग विहीन हैं। एनडीए ने इस समस्या से उबरने के लिए स्वच्छ भारत अभियान का लोकार्पण किया है।

 

क्या शौचालय बना देना ही पर्याप्त है?

 

शौचालय के प्रयोग को क्या प्रभावी बनाता है?

 

शौचालय की संख्या से अधिक, उसका डिजाइन सामाजिक और भूवैज्ञानिक लिहाज से सभी के अनुकूल होना, निर्माण की गुणवत्ता, उन्नत रख-रखाव, सीवेज प्रबन्धन प्रणाली और पानी की उपलब्धता के लिहाज से उपयोगकर्ता के अनुकूल होना चाहिए तभी वह इसका प्रयोग करेगा।

 

स्वच्छता से जुड़े मसलों पर बातचीत बेहद कम हुई है, जबकि बहुत बड़े स्तर पर शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है। हाल ही में जारी संयुक्त राष्ट्र की सहस्राब्दी विकास लक्ष्य रिपोर्ट के अनुसार भारत में विश्व के सबसे ज्यादा लोग खुले में शौच करते हैं। ग्रामीण भारत में 66 प्रतिशत लोग खुले में शौच करने के लिए जाते हैं।

 

उत्तर प्रदेश के रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कम्पैसोनेट इकोनामिक्स (सदय अर्थशास्त्र शोध संस्थान) की ओर से उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के ग्रामीण घरों में किए गये शोध ने कई चौंकाने और शर्मिन्दा करने वाले परिणाम पेश किए हैं। शोध के अनुसार इन प्रदेशों के 40 प्रतिशत घरों में कार्यरत शौचालय हैं फिर भी परिवार का एक सदस्य खुले में शौच जाने को ही प्राथमिकता देता है।

 

आखिर क्यों शौचालय वाले घरों के सदस्य भी खुले में शौच जाने को प्राथमिकता देते हैं यह सवाल नीति निर्माताओं, आयोजकों, शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों के लिए काफी पेचीदा है।

 

व्यवहार परिवर्तन कुंजी हैः- गुणात्मक और मात्रात्मक शोध सम्बन्धी परिणाम

 

भारत में सिक्किम, हरियाणा और झारखण्ड एवं बांग्लादेश और श्रीलंका ने यह बात साबित की है कि व्यवहार परिवर्तन कितना जरूरी है, बजाय कि सप्लाई आधारित, लक्ष्य-निर्धारण सहित सब्सिडी आधारित शौचालय निर्माण के। संक्षेप में उड़ीसा के अनुभवों ने साबित किया है कि शौचालय निर्माण पर पूर्णतयाः ध्यान केन्द्रित करने से शौचालयों की संख्या तो बढ़ सकती है लेकिन इससे लोगों का स्वास्थ्य बेहतर नहीं हो सकता। उसी तरह हस्तक्षेप करने मात्र से लोगों के स्वच्छता व्यवहार और खुले में शौच करने की आदत में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता।

 

सामाजिक गतिविज्ञान और समुदाय कारकः गुणात्मक अध्ययन के परिणाम-

 

सामाजिक मानदण्ड और अपेक्षा को लोगों के लिए शौचालय उपयोग के मामले में महत्वपूर्ण कारक माना गया है। इसमें वो नियम हैं जो कि समाज या समुदाय द्वारा स्वीकृत किए गए हैं। ये नियम औपचारिक या अनौपचारिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी या एक-दूसरे के सम्पर्क में आने से अपनाए गए हैं। गुणात्मक शोध में पाया गया कि :

 

1. शौचालय, एक विलासिता  : खुले में शौच को सामाजिक मान्यता मिली हुई है जबकि शौचालय को विलासिता या महँगी चीज माना जाता है। शौचालय निर्माण के फैसले प्रतिष्ठा से जुड़े हुए हैं जिनका स्वास्थ्य की चिन्ता से कम वास्ता है। इस प्रकार जिन लोगों ने अपने घर में शौचालय का निर्माण कराया वे सामाजिक-आर्थिक रूप से उच्च स्थिति में थे। साथ ही वे शौचालय से सम्बन्धित लाभ के विषय में जागरूक थे। इसी वजह से उन्होंने अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से बहुत महँगे शौचालयों का निर्माण कराया।

 

2. सस्ते और स्थानीयकृत शौचालयों की अनदेखी : पवित्रता और प्रदूषण की अवधारणाओं के कारण उपर्युक्त शौचालय मॉडल को अनदेखा किया गया। घरों में निर्मित शौचालयों को सरकार द्वारा बनाए गए शौचालयों की अपेक्षा ज्यादा तवज्जो दी गई। क्योंकि सरकार वाले शौचालय के गड्ढे छोटे थे इसलिए पवित्रता और प्रदूषण के लिहाज से लोगों को  सही नहीं लगे। इसी वजह से स्थानीयकृत और सस्ते शौचालयों को दरकिनार करते हुए महँगे शौचालयों को प्राथमिकता दी गई।

 

3. आयु और लिंग समम्बन्धी गतिविज्ञान : खुले में शौच व्यवहार उम्र और लिंग के हिसाब से भिन्न पाया जाता है। ग्रामीण खुले में शौच को प्राथमिकता इसलिए देते हैं क्योंकि इससे उन्हें आपस में बातचीत करने का मौका मिलता है और साथ ही समुदाय में यह एक रिवाज है। खुले में शौच का सम्बन्ध लिंग और उम्र से है। एक ओर जहाँ बूढ़े पुरूष एवं महिलाएँ शौचालय का उपयोग करते हैं वहीं युवा, अधेड़ एवं कमाऊ पुरुष खुले में शौच जाना पसन्द करते हैं। पुरुष और महिला में तुलना करने पर पाया गया कि ज्यादातर पुरुषों का रुझान खुले में शौच की तरफ होता है तो महिलाएँ अपनी गोपनीयता को बनाए रखने के लिए शौचालय के उपयोग को प्राथमिकता देती हैं।

 

क्या आप बदलाव चाहते हैं? सामाजिक तन्त्र की महत्ता को जानिए

 

1. व्यक्ति अपने सामाजिक सम्पर्कों से ही शौचालय बनाने के लिए प्रेरित होता है। यदि समान जाति, शिक्षा या अच्छे सामाजिक सम्बन्ध हों तो व्यक्ति भी अपने घर में शौचालय का निर्माण करा लेता है।

 

2. जो व्यक्ति समुदाय में अधिक महत्वपूर्ण या उसके केन्द्र में होते हैं उनके पास शौचालय की सुविधा होती है। वे दुनिया की सारी खबर रखते हैं तो उनसे सामाजिक सम्पर्क रखने वालों पर भी अप्रत्यक्ष तौर पर इसे इस्तेमाल करने का सामाजिक और अपेक्षित दबाव बनता है।

 

3. हालांकि, हाशिए पर रह रहे लोग व समुदाय कई बार किसी भी सामाजिक तन्त्र के हिस्से नहीं होते इसी वजह से उन तक शौचालय की पहुँच भी नहीं होती। इन व्यक्तियों के अलावा, शोध से पता चला है कि सामाजिक सम्पर्कों के माध्यम से शौचालय की माँग बढ़ती है।

 

सरकार द्वारा शौचालय निर्माण के लिए सब्सिडी दिए जाने के बावजूद यह असफल रही, क्योंकि वह इस बारे में जाति आधारित सामाजिक विभाजन को सम्बोधित करने में असमर्थ रही। शोध ने स्वच्छता की चर्चा में एक नया आयाम जोड़ दिया है और निर्णय लेने की पेचीदगियों को उजागर किया है जो समुदाय के स्तर पर शौचालय उपयोग को प्रभावित करता है। अध्ययनों से पता चलता है की :

 

1. समुदायों के स्तर पर हस्तक्षेप के प्रयास करने चाहिए, व्यक्तियों के स्तर पर नहीं।

 

2. जाति और वर्ग मतभेद नए मानदण्डों को अपनाने के लोगों के निर्णयों को प्रभावित करते हैं। कई बार, वंचित और उपेक्षित तबकों को लक्षित करना जरूरी हो जाता है क्योंकि वे जल्द ही शौचालयों को सामाजिक सम्पर्क के कारण अपना लेते हैं।

 

3. शौचालय निर्माण के लिए एक समुदाय के बजाय व्यक्तिगत पसन्द को महत्व देना चाहिए। इसके लिए समुदाय में पहले से प्रचलित मानदण्डों को स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार के माध्यम से दूर करके उनकी जगह नए मानदण्डों को स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए।

 

हालाँकि यह एक क्रमिक प्रक्रिया है। जब नए मानदण्डों को कोई समुदाय अपनाने लगता है और वे उन्हें अपने व्यवहार में लाने लगते हैं तब वो धीरे-धीरे पुराने मानदण्डों की जगह ले लेता है।

 

स्वच्छता से सम्बन्धित हस्तक्षेप करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि शौचालय समाज की स्वीकृति पर आधारित हों न कि लक्ष्य-उन्मुख रणनीतियों पर, जो कि दूर तक न जा सकें। अनुभवों से पता चला है कि समुदाय आधारित प्रयास जिन्होंने समाज के सभी वर्गों को साथ में लेकर कार्य किया उनसे धीरे-धीरे लोगों के स्वास्थ्य व्यवहार में परिवर्तन आया। साथ ही उन्हें प्रेरित करके खुद निर्णय लेने में सक्षम भी बनाया।

 

सन्दर्भ :

 

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