शौचालय की सामाजिक अहमियत

Tuesday, May 12, 2015 - 10:32

जॉयघाट (पश्चिम बंगाल), 11 मई (भाषा)। एक जोड़े की लगभग 15 साल पुरानी शादी को एक शौचालय ने बचा लिया और फिल्मों की तरह उनकी समस्या का भी सुखद अन्त हुआ। रिंकू और जयगोविन्द मण्डल की शादी 2001 में हुई। उनकी शादी को बचाने की नौबत इसलिए आई क्योंकि 30 साल की रिंकू को रोज निवृत्त होने घर से बाहर जाना पड़ता था।

 

दो साल पहले तक सब सामान्य था और निवृत्त होने के नियम से उनके रिश्ते में कोई आँच नहीं थी। लेकिन जब जयगोविन्द ने रिंकू पर शक करना शुरू कर दिया तो उनके रिश्ते में चिड़चिड़ापन, संदेह और अविश्वास बढ़ने लगा। रिंकू ने बताया- उन्होंने मुझसे अजीब से प्रश्न पूछने शुरू कर दिए। मसलन मैं लौटने में इतना वक्त क्यों लगाती हूँ, मैं दिन में दो बार क्यों जाती हूँ वगैरह। इससे धीरे-धीरे पूरे घर का माहौल चिड़चिड़ा रहने लगा। उन्हें लगता था कि मेरा बाहर किसी और के साथ सम्बन्ध है।

 

लाखों शौचालय बनाने के बाद नदिया जिले को खुले में शौच से मुक्त जिला घोषित किया जा चुका है। नदिया के जिलाधिकारी पीबी सलीम का कहना है कि बीमारियों का फैलना रोकने के साथ खुले में शौच को उन्मूलन से महिलाओं को आसानी हुई है।

 

नदिया जिले के मजीदिया गाँव में उनका घर भी उन घरों में से एक है जिनमें शौचालय नहीं है। जयगोविन्द एक दिहाड़ी मजदूर है। उनके इन छोटे-छोटे झगड़ों से उनकी शादी मुश्किल में पड़ने लगी। शराब के नशे में जयगोविन्द अक्सर हिंसक होने लगा। रिंकू ने बताया- जब वो मुझे मारता था तो मैं उसे बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। एक दिन मैं भाग कर अपनी माँ के घर चली गई और वहीं रहने लगी।

 

 

जल्द ही यह मामला कलकत्ता हाई कोर्ट में पहुँचा। अधिवक्ता ककली चटर्जी ने बताया कि रिंकू ने पिछले साल भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के तहत कथित घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया था। हालाँकि अपनी शादी पर आए इस संकट को दूर करने का हल खोजते हुए उन दोनों को पहले ही अहसास हो गया था कि उनकी इस समस्या का हल एक शौचालय है जिसकी दीवारों को अपने घर में खड़ा करके वे अपने रिश्ते के बीच खड़ी दीवार को गिरा सकते हैं। खुले में शौच की पुरानी कुप्रथा उनकी जिन्दगी में एक खलनायक साबित हो चुकी थी।

 

इसी बीच नदिया जिला प्रशासन की शुरू की गई ‘सबार शौचघर’ (सबके लिए शौचालय) योजना का लाभ उन्हें हुआ और अब उन दोनों के घर में मुफ्त में शौचालय बन चुका है। रिंकू अब एक भीनी सी मुस्कुराहट के साथ बताती है कि खुले में शौच करने जाना बन्द करने के बाद से उनकी पारिवारिक समस्याओं का भी अन्त हो गया है। लगभग एक साल हो गया है और अब वे एक सुखी जीवन जी रहे हैं।

 

इस योजना के तहत लाखों शौचालय बनाने के बाद नदिया जिले को खुले में शौच से मुक्त जिला घोषित किया जा चुका है। नदिया के जिलाधिकारी पीबी सलीम का कहना है कि बीमारियों का फैलना रोकने के साथ खुले में शौच को उन्मूलन से महिलाओं को आसानी हुई है। उन्हें अब पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित और निजी स्थान मिलता है निवृत्त होने के लिए। उन्होंने बताया कि नदिया जिले के लगभग 99.8 फीसद लोग शौचालय का प्रयोग करते हैं।

 

साभार : जनसत्ता 12 मई 2015

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