चौथिया गाँव में सामुदायिक निगरानी ने बढ़ाया शौचालय उपयोग

Thursday, May 7, 2015 - 16:47

मध्यप्रदेश का आदिवासी बाहुल्य जिला है बैतूल जिसके दक्षिणी छोर पर मुलताई विकासखण्ड का एक गाँव है चौथिया। अन्य गाँवों की ही तरह इस गाँव के 238 परिवारों के ज्यादातर सदस्य खुले में शौच किया करते थे। लोगों ने स्वयं और प्रशासन की मदद से शौचालय बनवा तो लिए थे लेकिन उन्हें इसके उपयोग में दिलचस्पी नहीं थी

 

मध्यप्रदेश सरकार ने वर्ष 2014 में एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया जिससे “स्वच्छता कार्यक्रम” में समुदाय के नेतृत्व विकास एवं सामुदायिक स्वामित्व के भाव का विकास हुआ। इसके लिए मध्यप्रदेश सरकार द्वारा विकासखण्ड स्तर पर समुदाय को प्रेरित करने के लिए कुछ लोगों को प्रशिक्षित किया गया। इन प्रेरक दलों ने समुदाय आधारित स्वच्छता पद्धतियों को अमल में लाने के लिए रणनीति बनाई। पहले चरण में राज्य के 7 जिलों में यह प्रक्रिया प्रारम्भ की गई जिसमें बैतूल एक जिला है।

 

लोगों में माँग बढ़ी तो उन्होंने सरकारी मदद से शौचालय बनवाना शुरू किया। इस बीच जो अभी भी बाहर जा रहे थे उनके शौच पर यही दल मिट्टी डालकर ढकने लगा। करीब डेढ़ महीने के अंदर ही सभी के घर में शौचालय बन गए।

 

शौचालय निर्माण के लिए प्रेरित करने तथा शौचालय के उपयोग में ग्राम समुदाय का नेतृत्व और जबावदेही तय करने के उद्देश्य से प्रत्येक विकासखण्ड के 3-4 इच्छुक व्यक्तियों का जिला स्तर पर चयन करके समुदाय अभिप्रेरण पद्धतियों में पाँच दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया। इसी प्रशिक्षण में प्रशिक्षित श्री कचरू बांरगें ने चौथिया के ग्रामवासियों को खुले में शौच न करने के लिए प्ररित करना शुरू किया।यह कार्य आसान नहीं था। उन्होंने अपनी एक टोली बनाकर मुहल्लों में जा-जाकर पुरूषों, महिलाओं व बच्चों को शौच स्थान पर जाकर समझाया कि कैसे बाहर किया गया शौच हमारे शरीर को विषाक्त करता है और हम अनजाने ही एक दूसरे का मल खा रहे हैं।

 

उन्होंने अपने ब्लॉक की ही एक महिला अनिता नर्रे का उदाहरण दिया कि कैसे उन्होंने बाहर शौच करने से मना किया और अपने पति का घर छोड़ दिया। उन्होंने पति को शौचालय के निर्माण हेतु विवश करके देश में ख्याति प्राप्त की। इस प्रकार के उदाहरणों से श्री कचरू और उनकी टीम ने लोगों को न केवल यह समझाया कि हमें स्वयं के साधनों से और स्वच्छ भारत मिशन की सहायता राशि से शौचालय बनाना चाहिए, बल्कि यह समझाने में भी कामयाब हुए कि खुले में शौच एक सामूहिक समस्या है और सामूहिक प्रयास एवं निगरानी से ही गाँव मल-जनित बीमारी से मुक्त हो सकता है।

 

उनके इस प्रयास से गाँव में महिलाओं और पुरूषों के दो निगरानी दल बन गए। पुरूष दल का नेतृत्व मंचितलात, धनराज, रमेश, सुमरन, संतोष, कमलेश, गुरू कर रहे थे जबकि महिला निगरानी दल में राधा, सयाबाई, रुकमणि, वेदि, बेबी, अंजू, ललिता, गायत्री और रामप्यारी शामिल थी। ये सब शौच के समय बाहर जाने वालों को शौचालय बनाने और जिनके पास शौचालय है उसका उपयोग करने के लिए कहने लगे। गाँव की सरपंच भी इस मुहिम में शामिल हुई। लोगों में माँग बढ़ी तो उन्होंने सरकारी मदद से शौचालय बनवाना शुरू किया। इस बीच जो अभी भी बाहर जा रहे थे उनके शौच पर यही दल मिट्टी डालकर ढकने लगा। करीब डेढ़ महीने के अंदर ही सभी के घर में शौचालय बन गए।

 

ग्राम पंचायत में सरपंच की अध्यक्षता में बैठक हुई जिसमें निर्णय हुआ कि गाँव में लाउड स्पीकर से उनके नामों को उद्घोषित किया जाए। इसके लिए एनाउन्सर को सूचना मोबाइल से दी जाती और एनाउन्सर शुरू हो जाता। इसमें यह समझाया जाता कि शौचालय होने पर भी शौच के लिए बाहर जाना सही नहीं है।

 

इसके बावजूद कई लोग ऐसे थे जो बाहर जाना बन्द नहीं कर रहे थे। ग्राम पंचायत में सरपंच की अध्यक्षता में बैठक हुई जिसमें निर्णय हुआ कि गाँव में लाउड स्पीकर से उनके नामों को उद्घोषित किया जाए। इसके लिए एनाउन्सर को सूचना मोबाइल से दी जाती और एनाउन्सर शुरू हो जाता। इसमें यह समझाया जाता कि शौचालय होने पर भी शौच के लिए बाहर जाना सही नहीं है। नाम एनाउन्स होने की बदनामी ने एेसे लोगों को भी शौचालय उपयोग करने पर मजबूर कर दिया जो शौचालय का प्रयोग करना पंसद नहीं करते थे।

 

प्रेरकों के दल और निगरानी समिति को जिला एवं ब्लाॅक पंचायत के अधिकारियों ने न केवल धन उपलब्ध करवाया बल्कि शौचालय निर्माण की सामग्री के साथ ही राजमिस्त्री उपलब्ध करवाकर शौचालय बनवाने एवं सुबह की निगरानी में शामिल होकर उनके हौसले को बढ़ाने का काम भी किया। इसके साथ ही उनकी गतिविधियों को वैधता प्रदान की।

 

दिसम्बर 2014 में चौथिया में कार्य प्रारम्भ हुआ तथा अल्पावधि में ही यह खुले में शौच मुक्त ग्राम बन गया। कचरू बारंगें और उनके साथियों का दल स्वच्छता दूत के रूप मेें उभरे जो स्वच्छता में समुदाय की भूमिका की न केवल समझ रखते हैं बल्कि उन्होंने इसे जमीन पर क्रियान्वित कर यह आस जगाई है कि सरकारी प्रयासों से कचरू जैसे ग्रामीण स्वयं सेवको को जोड़कर स्वच्छ भारत अभियान को जनांदोलन बनाया जा सकता है।

 

बैतूल जिले के कलेक्टर श्री ज्ञानेश्वर पाटिल ने इस प्रक्रिया में गहरी दिलचस्पी लेते हुए इसे पूरे जिले में लागू करने का फैसला किया है। वे न केवल ग्रामीण प्रेरको से सीधे बात कर उन्हें प्रोत्साहित करते रहते हैं बल्कि सार्वजानिक समारोहों में इन्हे पुरस्कृत भी करते हैं। इसके अतिरिक्त अभियान से मिलने वाली धनराशी पंचायतो को शीघ्रता से उपलब्ध हो, हितग्राहियों के लिए ग्राम पंचायतें गुणवत्तापूर्ण सामग्री खरीदें और प्रशिक्षित राजमिस्त्रियों से बेहतर शौचालय का निर्माण हो इसके लिए ब्लॉक अधिकारियों, स्वच्छता समन्वयकों तथा तकनीकी अधिकारियों के दायित्वों का निर्धारण कर क्रियान्वयन की समीक्षा करते हैं।

 

पूछने पर वे कहते हैं कि पहले जब महिलाएँ, बच्चे ताली बजाते तो गुस्सा आया फिर शर्म आने लगी और हमने शौचालय के उपयोग पर और जिनके पास नहीं थे उन्होंने बनवाने पर ध्यान दिया। अब इन्हें शौचालय प्रयोग करना अच्छा लगता है।

 

इस अभियान में दो संस्थाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। मध्यान्ह भोजन की महिला स्वसहायता समूह और जनअभियान परिषद के ग्रामीण प्रस्फुटन समिति का। इन सदस्यों ने सुबह शाम निगरानी दल के साथ मिलकर बाहर शौच जाने वालों को रोकने में और शौचालय निर्माण हेतु प्रेरित करने में प्रमुख भूमिका का निर्वाह किया।

बैतूल जिले के मुलताई ब्लॉक के 12 ग्राम पंचायतों में इसी विधि से शौचालय निर्माण और शौचालय उपयोग का अभियान चल रहा है। अगले 2-3 महीनों में ये सभी ग्राम पंचायते खुले में शौच मुक्त हो जाएंगी। इस गतिविधि से प्राप्त सीख और दृढ़ निश्चयी स्वच्छता दूतों का प्रेरक दल के रूप में उपयोग कर सम्पूर्ण बैतूल जिले को खुले में शौच मुक्त बनाने का लक्ष्य है। शुरूआत हो गई है तो परिणाम भी हासिल होकर रहेगा।

 

लेंदागोंदी गाँव भी इसी प्रकार की गतिविधियों द्वारा 02 माह से कम समय में खुले में शौच मुक्त बन गया। इस गाँव में न केवल 100 से ज्यादा शौचालय बने बल्कि सभी ने इसका उपयोग किया। वहाँ महिलाओं और बच्चों के समूह ने बाहर शौच करने जाने वालों के सामने ताली बजा-बजा कर उन्हें शर्मसार किया। नतीजतन चाहे 50 वर्ष के भाऊजी हो या 50 वर्ष की कनोती बाई, इनके जैसे सैकड़ों ग्रामीणों ने बाहर शौच करना बन्द किया। पूछने पर वे कहते हैं कि पहले जब महिलाएँ, बच्चे ताली बजाते तो गुस्सा आया फिर शर्म आने लगी और हमने शौचालय के उपयोग पर और जिनके पास नहीं थे उन्होंने बनवाने पर ध्यान दिया। अब इन्हें शौचालय प्रयोग करना अच्छा लगता है। इन्होंने अपना संस्कार बदला तो गाँव में एक गर्व यात्रा निकली और नारा लगा - बन्द कर दी, बन्द कर दी, खुले में टट्टी बन्द कर दी।

 

जिला बैतूल मे इसी प्रकार कुशल प्रेरकों के सहयोग से समुदाय की भागीदारी के साथ एवं प्रशासन के कुशल नेतृत्व में कई ग्राम सम्पूर्ण स्वच्छता की ओर धीरे-धीरे किन्तु ठोस कदम बढ़ा रहें हैं।

 

साभार : पेयजल एवं स्वच्छता मन्त्रालय वेबसाइट

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