महिला शक्ति ने बदला लुधियाना

Monday, April 20, 2015 - 16:34

नलिन राय

ये महिलाएं लुधियाना को एक साफ और सुरक्षित शहर बनाने के अभियान पर निकली हैं। शहर के अस्पतालों को सुधारने से लेकर पोस्टर से पटी दीवारों की पुताई जैसे कार्य आपको एक जिम्मेदार नागरिक बनाने को प्रेरित करेंगे।

जैसा कि हम जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड इलाके की ग्रामीण पृष्ठभूमि या छोटी जाति से जुड़ी महिलाओं ने गुलाबी गैंग नाम से एक समूह बनाया है, जिन्होंने दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ झण्डा उठाया, न्याय के लिए लड़ीं और अब इलाके में इंसाफ के लिए लड़ने वाली ताकत के रूप में उनकी पहचान हो चुकी है।

अब यह दूसरे गुलाबी गैंग की कथा है, जिन्होंने खुद को शहर की बेहतरी के लिए खड़ा किया है, हालांकि उन्होंने अपने आप को उस रूप में चिह्नित नहीं किया है। वे अतिक्रमण या छोड़ दी गई जगहों पर जाकर शहर को साफ करने का प्रयास कर रही हैं। वे सफाई के बारे में चेतना फैला रही हैं और नागरिकों को सामाजिक कार्यों में योगदान देने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

इन महिलाओं ने अपने समूह का नाम लुधियाना केयर्स रखा है। वे समाज के उच्च व मध्यवर्ग से सम्बन्धित हैं लेकिन वे भारत के सबसे ज्यादा प्रदूषित समझे जाने वाले शहर –लुधियाना की भौतिक संरचना को चौतरफा विकृत करने में अपना योगदान देना नहीं चाहतीं। उन्होंने शहर में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने के लिए एक अनोखा तरीका अपनाया है।

इस समूह को इस बात का भी श्रेय जाता है कि उन्होंने अस्पताल से ठीक होकर निकलने वाले मरीजों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे वहाँ पर आभार के तौर पर एक पेड़ लगा कर जाएं ताकि फलदार बागा को बनाने में उनका योगदान मिल सके।

जैसा कि हम अक्सर बेहतर भारत के लिए नारीत्व का गौरवगान करते हैं और प्रेरक कहानियां कहते सुनते हैं ताकि महिलाएं आगे आएं और दुनिया में अपनी जगह बनाएं, लुधियाना केयर्स भी उसी तरह की कहने सुनने लायक कहानी है। क्योंकि इस कहानी में वह ताकत है जिसके सहारे देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं को एक मंच पर आने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, ताकि वे किसी व्यवस्था सहयोग के बिना भी अपने परिवेश को बेहतर बनाने में योगदान दे सकें।

दीवार की सफाई और पुताई

यह काम उस दीवार की सफाई और पुताई के साथ शुरू हुआ, जो हर तरह के नारे और सन्देश देने वाले पोस्टरों से पटी पड़ी थी। इस प्रक्रिया को जबरदस्त रूप से सफल बनाने के लिए समूह के सदस्यों ने कालेज और स्कूल के छात्रों के साथ शहर में प्रभाव पैदा करने में लगे अन्य एनजीओ को भी साथ लिया। लुधियाना केयर्स ने अपने काम के लिए पहले करीब पाँच सौ मीटर में फैली एक सरकारी स्कूल की चाहरदीवारी को चुना। उनके काम के बाद वह ऐसी जगह बन गई जिससे शहर के लोगों का ध्यान उस तरफ गया। उस दीवार की सफाई की हिफाजत के लिए भी एक ढाँचा तैयार किया गया ताकि किया गया काम बिगड़े न।

2014 की बैसाखी पर सफाई अभियान

आरम्भिक सफलता मिलने के बाद लुधियाना केयर्स ने आँखों को खटकने वाली स्थानीय चीजों पर ध्यान केन्द्रित किया। अनाज मण्डी में झुग्गियाँ बसी हुई थीं और वह जगह राजनीतिक रैलियों के लिए इस्तेमाल होती थी। समूह को लुधियाना की मेयर का संरक्षण प्राप्त हुआ जिसके कारण सफाई अभियान काफी दूर तक गया।

उस इलाके में कूड़ा कचरा और गन्दगी इस कदर थी कि उसे हाथ से साफ करना असम्भव था। नागरिकों को इस काम के लिए बड़ी-बड़ी मशीनें मुफ्त में दीं गई जिससे अभियान को जबरदस्त कामयाबी हासिल हुई।

सिविल अस्पताल प्रोजेक्ट

जब कुछ अच्छा होने लगता है तो उससे सकारात्मक कंपन पैदा होने लगता है और व्यवस्था की उदासीनता से खीझ चुके नागरिक इसमें एक उम्मीद देखते हैं। लुधियाना केयर्स ने तीसरी पहल सिविल अस्पताल के सुधार की दिशा में की। उन्होंने इस काम को तब चुना जब इलाके में रहने वाले लोगों ने अखबारों के माध्यम से एक सन्देश दिया और महिलाओं से अनुरोध किया कि वे इसकी सफाई करें।

जब सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया तो लुधियाना केयर्स समूह के सदस्यों का ध्यान  उन कार वालों पर गया जो अपने खाने पीने की चीजों के कवर, रैपर और छिलके सड़क पर फेंकने से पहले एक बार भी नहीं सोचते। इस बारे में लुधियाना ज्यादा ही बदनाम है क्योंकि यहाँ शाम को कार-ओ-बार बन जाता है और लोग शाम को अपनी कार में खाने और पीने का खेल शुरू कर देते हैं। इसलिए महिलाओं ने अपने संसाधन जमा करके सड़क को गन्दा करने में लगे कार वालों को कूड़ेदान बाँटना शुरू किया।

यह क्षेत्र एक कूड़ा फेंकने का अड्डा बन चुका था और उस भूभाग पर हर तरफ कचरा ही बिखरा पड़ा था। महिलाओं ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया, उन्होंने पूरे इलाके को साफ करके पेड़ लगाये। अब यह मरीजों के तीमारदारों के बैठने की जगह बन गई है। अब वह इलाका बिल्कुल बदल गया है और अस्पताल में सबसे सुन्दर जगह बन गयी है। इस समूह को इस बात का भी श्रेय जाता है कि उन्होंने अस्पताल से ठीक होकर निकलने वाले मरीजों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे वहाँ पर आभार के तौर पर एक पेड़ लगा कर जाएं ताकि फलदार बागा को बनाने में उनका योगदान मिल सके।

सिविल अस्पताल को साफ करने के दौरान इस समूह से बच्चों के वार्ड (पेडियाट्रिक्स) के मरीजों ने सम्पर्क करके उनके लिए कुछ करने को कहा, क्योंकि वह बहुत खराब स्थिति में था और नवजात बच्चों के लिए आपूर्ति की बहुत कमी थी। चूंकि उस वार्ड में अक्सर गरीब लोग आते थे जो कि सारा खर्च खुद नहीं उठा पाते थे। अस्पताल के परिसर को साफ करने के बाद महिलाओं ने बाल विभाग को सुधारने का बीड़ा उठाया और वह काम कुछ इस तरह किया कि उसकी चर्चा पूरे शहर में हुई।

कार वालों को बाँटे कूड़ेदान ताकि सड़क पर न फैलाये गन्दगी

जब सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया तो लुधियाना केयर्स समूह के सदस्यों का ध्यान  उन कार वालों पर गया जो अपने खाने पीने की चीजों के कवर, रैपर और छिलके सड़क पर फेंकने से पहले एक बार भी नहीं सोचते। इस बारे में लुधियाना ज्यादा ही बदनाम है क्योंकि यहाँ शाम को कार-ओ-बार बन जाता है और लोग शाम को अपनी कार में खाने और पीने का खेल शुरू कर देते हैं। इसलिए महिलाओं ने अपने संसाधन जमा करके सड़क को गन्दा करने में लगे कार वालों को कूड़ेदान बाँटना शुरू किया। प्रभाव दिखाई पड़ने लगा लेकिन अभी इसका व्यापक असर होना बाकी है। अच्छी बात यह है कि शहर के लोगों में यह सन्देश चला गया है कि उन्हें सड़क को कूड़ेदान के रूप में नहीं इस्तेमाल करना चाहिए।

भानुमती के कुनबे के रूप में शुरू हुआ यह मंच अब एक प्रकट मंच बन चुका है और इसकी उपस्थिति से यह लगता है कि कुछ लोग लुधियाना जैसे शहर को बदलने में लगे हैं। महिलाओं ने यह काम पारस्परिक सहयोग से किया है, इसलिए वे ज्यादा प्रशंसनीय हैं और उनमें देश के विभिन्न हिस्से की महिलाओं को प्रेरित करने की शक्ति है कि उठो और उस जगह को साफ करो जिसमें तुम अपने परिवार के साथ रहते हो।

साभार : बेटर इण्डिया वेबसाइट

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