सफाईकर्मी और कलाकार कैलाश ने लिखी स्वच्छता कहानी

Sunday, April 19, 2015 - 21:22

अजिता मेनन

कैलाश बासफोर (35) एक सफाई कर्मी है। वह एक कलाकार भी है। कैलाश का सम्बन्ध हरिजन पाड़ा लोककला नाट्य समूह से है जो कि कोलकाता से 65 किलोमीटर उत्तर स्थित कल्याणी में बसी 52 झुग्गियों में स्वच्छता के फायदे के बारे में समय-समय पर नाटकों का मंचन करता है।

कैलाश और उसकी बिरादरी के लोगों को हरिजन पाड़ा की झुग्गियों में सफाई कार्यक्रम के लिए प्रेरित करना कोई आसान काम नहीं था लेकिन यह एक स्थानीय म्यूनिसिपल अधिकारी डॉ. कस्तूरी बक्शी (53) की पहल से सम्भव हो पाया है। लम्बे चौड़े और हट्ठे-कट्ठे कैलाश के सामने डॉ. कस्तूरी बक्शी दुबली पतली और नाजुक सी दिखती हैं। लेकिन कैलाश और उसके दोस्तों के लिए, `` डॉ. बक्शी एक भगवान की तरह हैं। उन्होंने हमें यह सिखाया है कि किस तरह गरिमा के साथ रहा जाए।’’ कैलाश इस पहल के एक स्वाभाविक नेता के तौर पर उभरे और उसने सबसे पहले अपनी झुग्गियों में सौ फीसदी सफाई अभियान चलाया और बाद में कल्याणी की दूसरी झुग्गियों में। 110 सफाई परिवारों वाली इस झुग्गी बस्ती में जब डॉ. कस्तूरी पहली बार गईं तो वहाँ उठने वाली मल की दुर्गन्ध असहनीय थी।

वे बताती हैं, `` खुले में शौच के कारण नाक पर हाथ रखे बिना झुग्गियों से गुजरना कठिन था। मैंने इस झुग्गी को समुदाय नीत सम्पूर्ण सफाई परियोजना (सीएलटीएस) लागू करने के लिए चुनौती के तौर पर लिया।’’  पहली चुनौती इस समुदाय को इस बात के लिए प्रेरित करने की थी कि वे अपने परिवेश को साफ रखें क्योंकि यहाँ मूल रूप से उस समुदाय के लोग रहते हैं जो दूसरों का शौचालय साफ करके अपनी आजीविका चलाते हैं। कैलाश बताता हैं कि,``यह परम विडम्बना थी। हम लोग दूसरों का घर साफ करने के लिए श्रम करते हैं लेकिन स्वयं सफाई के विषय से अनभिज्ञ गन्दगी में रहते हैं। जब डॉ. कस्तूरी ने खुले में शौच के बुरे प्रभावों, विशेष तौर पर वह किस तरह हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, के बारे में बताया तो मैं सहमत हो गया। हम लोगों को हर वक्त डायरिया हो जाया करता था और बच्चों को हर समय पेट की बीमारी रहती थी और उन्हें कृमि की शिकायत रहती थी।’’

डॉ. बक्शी के मुताबिक बहुत कम लोगों को मालूम था कि बेहतर सफाई से देश से बीमारी का बोझ 50 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। वे कहती हैं, `` खराब सफाई न सिर्फ वातावरण को प्रदूषित करती है बल्कि यह मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है और मानव गरिमा का उल्लंघन भी है। यह सुरक्षा और विशेष तौर पर महिलाओं की निजता का अतिक्रमण है। इससे आर्थिक मुनाफा कम होता है, गरीबी बढ़ती है और सामाजिक विकास की आधारशिला कमजोर होती है।’’

कोलकाता अरबन सर्विसेज फॉर पूअर (केयूएसपी) के समर्थऩ से 2006 में शुरू की गई सीएलटीएस परियोजना के तहत कैलाश जैसे झुग्गी वालों को बताया गया था कि शौचालय के निर्माण के लिए किसी प्रकार की सब्सिडी नहीं दी जाएगी। इस योजना का लक्ष्य न सिर्फ शौचालयों की संख्या बढ़ाना था बल्कि खुले में शौच से मुक्त माहौल बनाना था। डॉ. बक्शी कहती हैं, `` हमने उन्हें बताया कि लक्ष्य को पाने के लिए आदत बदलनी होगी। शौचालय के मॉडल से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है लोगों के व्यवहार में बदलाव।’’

स्थानीय निवासियों के समक्ष सैनिटरी टॉयलट का विचार प्रस्तुत किया गया। इसमें महज एक सामान्य पैन होता है, एक गड्ढा होता है और मल को दिखने, बदबू फैलने और जानवर व कीट प्रदूषण से रोकने के लिए एक वाटर सील होता है। इन शौचालयों का निर्माण महज 250-300 रुपए की लागत पर किया जा सकता है। कैलाश बताते हैं ,``हमारे लिए शौचालयों की कम लागत के अलावा जो असली प्रेरक कारण था वो यह कि अगर हर कोई इसका इस्तेमाल करता है तो उसका मेडिकल खर्च कम हो जाएगा।’’

कैलाश ने पहला शौचालय अपने घर में बनाया और फिर दूसरों को, विशेषकर समुदाय के युवाओं को राजी किया। ``इस दौरान बसफोर और उसके अन्य मित्र स्वाभाविक नेता के तौर पर उभरे। उन्होंने समुदाय के अन्य लोगों को समझाया और उन्हें इस काम के लिए प्रेरित किया। बूढ़े लोग इस काम के सबसे ज्यादा खिलाफ थे, लेकिन आखिरकार महज एक महीने में हर घर तैयार हो गया।’’

हरिजन पाड़ा में कामयाबी मिलने के बाद कैलाश और उसके साथियों ने तय किया कि वे 48,167 लोगों की आबादी वाली दूसरी 52 झुग्गियों को खुले में शौच से मुक्त कराने में डॉ. बक्शी का समर्थन करेंगे। परियोजना की लागत महज 2.50 लाख थी। दीपक बसफोर और उसके दूसरे साथी मुस्कुरा कर कहते हैं `` बदलाव चमत्कृत करने वाला था। हमारे पड़ोसियों ने जैसे ही महसूस किया कि इसके इस्तेमाल से बीमारियों की दर गिरती है, उन्होंने अपने शौचालय और उसके प्रयोग से गर्व का अहसास होता है, तो उन्होंने बेहतर पैन, कंकरीट की दीवार और अच्छे दरवाजों के लिए ज्यादा खर्च करना शुरू कर दिया।’’

दीपक बसफोर बयान करते हैं कि किस प्रकार शम्भु बसफोर नाम के एक बूढ़े व्यक्ति ने आखिर तक शौचालय बनाने का विरोध किया। उनके रवैए से हार कर झुग्गी के बच्चों ने उन्हें खुले में शौच करते देखकर सीटी बजाना शुरू कर दिया। ``उन्होंने इससे अपमानित महसूस किया और शर्मा के मारे  शौचालय का उपयोग करना शुरु किया।’’ जब हरिजन पाड़ा को झुग्गियों की सफाई प्रतियोगिता का पुरस्कार मिला तो दूसरे झुग्गी वालों ने भी इस दिशा में रुचि विकसित कर ली।

``सन 2008 में कल्याणी को खुले में शौच से मुक्त शहर घोषित कर दिया गया। लेकिन इतना  पर्याप्त नहीं था। सौ प्रतिशत सफाई को कायम रखने के लिए जनजागरण अभियान जरूरी था।’’ डॉ. बक्शी बताती हैं। जैसे-जैसे शौचालयों की संख्या बढ़ी वैसे ही उनके इस्तेमाल करने और उन्हें साफ रखने की आदत बनाना एक प्राथमिकता का सवाल बन गया। उसी समय इस कार्यक्रम का प्रचार करने के लिए एक लोक नाट्य समूह तैयार करने का विचार आया। डॉ. बक्शी ने समुदाय के कुछ उत्साही युवाओं जिनमें चार महिलाएँ भी थीं को गोलबन्द किया हरिजन पाड़ा स्लम लोक नाट्य समूह का गठन किया। यह समूह सफाई, खुले में शौच से मुक्ति और बीमारियों की कमी के असर के बारे में चेतना फैलाने के लिए नाटक करता है।

यह समूह स्वयं पटकथा लिखता है और फिर अभिनय भी करता है। शनिवार की शाम वे अभ्यास करते हैं। दीपक कहते हैं, `` यह योजना इतनी सफल रही कि हमने शराब की लत, घरेलू हिंसा जैसी सामाजिक बुराइयों और अभिभावकों को बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार करने में प्रेरित करने की खातिर पटकथा के दूसरे विषय भी चुने।’’

हालांकि इस प्रगति को बनाए रखने के लिए झुग्गी वालों को कुछ अतिरिक्त प्रलोभन भी दिए गए। कहा गया कि अगर आप खुले में शौच से मुक्त क्षेत्र बनाएंगे तो आपके इलाके में सड़क, पानी के पम्प, नाली और सड़क पर सोलर लैम्प जैसे दूसरे विकास के काम किए जाएंगे। कैलाश जैसे लोगों को मुम्बई की कुछ अच्छी झुग्गी बस्तियों का दौरा भी कराया गया। यहाँ तक कि कल्याणी विश्वविद्यालय जिसकी जमीन पर हरिजन पाड़ा अवैध तरीके से बस गया था उसने भी सफाई के मोर्चे पर समुदाय वालों का काम देखकर जमीन झुग्गी वालों को दान कर दी।

इन प्रयासों के नतीजे बहुत अहमियत वाले थे। तात्कालिक असर बीमारी की दरों में तीव्र कमी के तौर पर था। 2005-06 में बीमार पड़ने वालों की संख्या 347 थी जो कि 2007-08 में 124 पर आ गई। अगले दो सालों में उसमें और गिरावट आई। डॉ. बक्शी बताती हैं,``किशोरों में एनीमिया की खासी कमी आई, जो कि स्कूल निगरानी कार्यक्रम के दौरान पाया गया। इसका श्रेय शहरों में स्वच्छता में आए सुधार को दिया जा सकता है।’’ अब सीएलटीएस की टीम जिसमें हर झुग्गी से आठ महिला स्वास्थ्य कर्मी होते हैं, सूचनाओं के आदान प्रदान और समाधान निकालने के लिए डॉ. बक्शी की अध्यक्षता में हर इतवार को बैठक करती है। एक स्वास्थ्य कर्मी और सिमांत इलाके से टीम की सदस्य संध्या सरकार (45) कहती हैं,``हम सफाई की नई-नई समस्याओं का समाधान निकालने के लिए एक समूह के रूप में काम करते हैं। हमारे सुझाव पर इलाके में कई नए सार्वजनिक शौचालय भी बनाए गए हैं। कल्याणी में अभी एक नया वार्ड भी शामिल किया गया है। अब हम वहाँ की सफाई की स्थितियों की समीक्षा कर रहे हैं।’’

तलतला उप-केन्द्र के बाबा मण्डल (43) बताते हैं,`` जब भी किसी झोपड़पट्टी इलाके में कोई नया मकान बनता है तो हमारा ध्यान इस बात पर होता है कि क्या वहाँ शौचालय बिठाया जा रहा है या नहीं। लगातार जागरूकता अभियान ही एक तरीका है जिसके आधार पर सफाई के स्तर को कायम रखा जा सकता है।’’

निश्चित तौर पर कैलाश, विभा और संध्या जैसे निवासियों के लिए वह गर्व का क्षण था जब स्पेन की एक महिला शोधार्थी ने हरिजान पाड़ा का दौरा करने के बाद कहा कि उनका शौचालय कोलकाता के भारतीय संग्रहालय से ज्यादा साफ है। आज भारत के 1.1 अरब लोगों को सैनिटरी टॉयलट उपलब्ध नहीं हैं। सरकार ने रियायती दरों पर जो शौचालय बनवाए थे वे सफाई के लिहाज से स्थायी माडल के रूप में नहीं उभर सके हैं। हमारे सामने कल्याणी का उदाहरण यह बताया है कि महज सामुदायिक भागीदारी और समुदाय नीत पहल से ही भारतीय गांवों में पूर्ण स्वच्छता लाई जा सकती है।

साभार :  बेटर इण्डिया वेबसाइट

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