स्वच्छता का अभिप्राय

Monday, March 30, 2015 - 15:43

जोहरा फातिमा

 

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है।

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।।

 

महानायक दुनिया में मुद्दतों बाद आते हैं। कभी सदियों में आ जाएँ तो आ जाएँ, फिर लोग उसे उसकी जिन्दगी से पहचानते हैं। पहले वह अपने जीवन से एक आदर्श स्थापित करता है और फिर लोगों से कहता है कि उसकी पैरवी करें। ऐसे ही लोकप्रिय नायकों में गाँधीजी का नाम सर्वोपरि है।

 

महात्मा गाँधी के महान आदर्श, चुम्बकीय व्यक्तित्व, उत्साह, दृढ़ता, साहस, उच्च चेतना, ईमानदारी, वफ़ादारी, बन्धुत्व, गम्भीरता, सदाशयता एवं प्रेमभाव के कारण प्रत्येक साहित्यकार तथा फ़नकार का ध्यान उनकी ओर अवश्य जाता है और उसे चिन्तन-मनन करने पर मजबूर करता है। यही वजह है कि देश-विदेश में महात्मा गाँधी पर इतना कुछ लिखा-पढ़ा गया है कि शायद ही उनके जीवन का कोई क्षेत्र बाक़ी बचा हो। वह वस्तुतः एक सागर हैं, जिसे गागर में भरना असम्भव है।

 

गाँधीजी दुनिया के वह महान इंसान हैं जो कि किसी विशेष देश, किसी विशेष नस्ल, किसी विशेष वर्ग और किसी विशेष समुदाय के हित के लिए नहीं हैं; बल्कि समस्त विश्व के हित के बारे में सोचते हैं। उनका सम्बन्ध किसी विशेष देशकाल से नहीं बल्कि पूरे संसार के इंसानों से है। वह किसी एक काल के लिए नहीं बल्कि प्रत्येक काल के लिए शीर्षस्थ और अनुकरणीय हैं।

 

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने गाँधीजी के बारे में 1944 में लिखा था- “आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था।”

 

गाँधीजी की भूमिका और सेवाओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने यह भी लिखा है- “अपने राष्ट्र का ऐसा लीडर जिसे बाह्य शक्ति का सहारा प्राप्त नहीं था। एक ऐसा राजनेता जिसकी सफलता किसी प्रयोजन या तकनीक पर निर्भर नहीं बल्कि मात्र उसके व्यक्तित्व की प्रभावी शक्ति पर है। एक ऐसा संघर्षकर्ता जिसने शक्ति के प्रयोग से नफ़रत की। एक ऐसा व्यक्ति जिसके दिमाग़ में प्रबुद्धता और स्वभाव में शालीनता थी, जिसने अपनी सम्पूर्ण क्षमता अपने राष्ट्र के कल्याण पर लगा दी, और इस तरह सदैव के लिए उत्कृष्ट हो गया।”

 

सुन तो ज़रा जहाँ में, है तेरा फ़साना क्या।

कहती है तुझको ख़ल्क़े ख़ुदा, ग़ायबाना क्या।।

 

आमतौर पर लोग गाँधीजी को एक बड़े प्रभावशाली और सफल राजनेता के रूप में जानते हैं। कुछ उन्हें चरखे और खादी के ध्वजा वाहक की हैसियत से जानते हैं। कुछ उन्हें सत्याग्रह और अहिंसा की रणनीति का आविष्कारक मानते हैं। कुछ लोग उनकी पत्रिका ‘हरिजन’ के सम्बन्ध से उनसे परिचित हैं। लेकिन यह कहना समुचित होगा कि गाँधीजी बहुआयामी व्यक्तित्व के धारक थे। वह एक नवीन सामाजिक व्यवस्था स्थापित करना चाहते थे जिसमें एक इंसान या एक वर्ग किसी दूसरे का शोषण न कर सके। समाज को बनाने-संवारने में और उसकी ज़रूरतों के साधन उत्पन्न करने में सब बराबर की हैसियत से सम्मिलित रहें। संसाधनों का वितरण जात-पात और जन्म के आधार पर न हो। धन-सम्पत्ति के धारक उसे मात्र अपना अधिकार न समझें। ज्ञान एवं व्यवहार अलग-अलग नहीं बल्कि एक दूसरे के सहायक हों।

 

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने गाँधीजी के बारे में 1944 में लिखा था- “आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था।”

 

गाँधीजी का स्वच्छता-दृष्टिकोण

यदि हम गाँधीजी के सपनों के स्वच्छ भारत की बात करते हैं तो हमारे मन में क्या विचार आते हैं? क्या गाँधीजी के निकट स्वच्छता सिर्फ़ घर और घर के बाहर मौजूद गन्दगी को इधर-उधर फेंकने और फैलाने की बजाए उसे निर्धारित स्थलों तक पहुँचाना था?

 

प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने इस अभियान को शुरू किया है जो प्रशंसनीय है। जगह-जगह हमें स्वच्छ भारत के पोस्टर गाँधीजी के चित्र के साथ दिखाई देते हैं। क्या गाँधीजी का विचार यहीं तक सीमित था? एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है- और उत्तम स्वास्थ्य सफ़ाई के बग़ैर सम्भव नहीं। मेरे विचार में गाँधीजी का स्वच्छता का विचार “स्वच्छ भारत” के वर्तमान विचार से उच्चतर है। इस पर चिन्तन करने की ज़रूरत है।

 

यदि हम गाँधीजी की स्वच्छता की विचारधारा पर चिन्तन करें तो यह परिणाम सामने आता है कि गाँधीजी की स्वच्छता की विचारधारा हार्दिक स्वच्छता की विचारधारा थी। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि हमारा हृदय, हमारी सोच धोखाधड़ी, कपट, नफ़रत से पाक रहे। इससे दूसरों पर इसका प्रभाव पड़ेगा। इस तरह पूरा समाज स्वच्छ हो जाएगा। इस तरह सामूहिक रूप से आन्तरिक स्वच्छता का परिवेश बनेगा जो पूरी सृष्टि पर छा जाएगा। इस तरह पूरे विश्व से युद्ध, हिंसा, नफ़रत, छुआछूत शोषण, असमानता जैसी कुरीतियाँ समाप्त हो जाएँगी। जीवन के सभी क्षेत्र पवित्र हो जाएँगे चाहे वह पर्यावरण हो, अर्थव्यवस्था हो, राजनीति हो या समाज। अर्थात जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हमारा अन्तःकरण, हमारी सोच, हमारा दृष्टिकोण हर तरह की गन्दगी से शुद्ध रहें। इस प्रसंग में गाँधीजी के निम्न कथन उल्लेखनीय हैं :

1.जो व्यक्ति नफ़रत की भावना से मुक्त है, उसे तलवार की ज़रूरत नहीं।

2. कुव्यवस्था बर्बादी का कारण बनती है।

3. दूसरों के दुर्गुण न देखो। स्वयं अपने कर्मों का अवलोकन करों। इस तरह तुम वास्तविक अर्थों में प्रसन्न रहोगे।

4. सच्चा प्रेम समुद्र की तरह असीम है। यह सभी सीमाओं को पार करके अपने भीतर सम्पूर्ण सृष्टि को समाहित कर लेता है।

 

खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तक़दीर से पहले।

खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।।

 

गाँधीजी का वास्तविक सपना दिलों को बदलना था, शक्ति से हालात को बदलकर वक़्ती फ़ायदा उठाना नहीं था। वह मानवीय समुदाय में नैतिक रूप से सन्तुलन पैदा करना चाहते थे। वह एक ऐसा हार बनाना चाहते थे जिसका हर दाना एक दूसरे से जुड़ा हुआ हो। उनका उद्देश्य था कि एक इंसान दूसरे इंसान के काम आये। वे एक दूसरे के पूरक बन जाएँ। जिसके पास जो कुछ है वह उसमें से दूसरों को भी दे ताकि सभी साधन-सम्पन्न हो जाएँ।

 

साए की ख़ातिर रहता है पेड़ का पत्ता-पत्ता एक

दरिया की तशकील हो कैसे, अगर न हो क़तरा एक

यकजहती का आईना भी वह आईना है जिस पर कि

सबकी नज़र पड़े तो सबको दिखाई दे हर चेहरा एक

यकजहती का माला, और तस्बीह का दाना-दाना एक

यकजहती की शमा के हल्क़े को है हर परवाना है

खड़ा है जैसे कोहे हिमाला बनाके एक मज़बूत क़तार

इसी तरह हम भी हो जाएँ मिलाके शाना बशाना एक

 

गाँधीजी का मानना था कि अगर हम खुदा को सिर्फ अपने ज़ेहन से नहीं बल्कि दिल और जान से मानते हैं तो हम सम्पूर्ण मानवजाति से बगैर किसी धार्मिक, जातीय एवं वर्गीय भेदभाव के प्रेम करेंगे। मैंने कभी अपने परिचितों, अपरिचितों, देशवासियों, परदेसियों, गोरों और कालों, किसी भी धर्म के मानने वालों चाहे वे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, यहूदी हों, किसी के साथ भी भेदभाव नहीं किया है। मैं यह कह सकता हूँ कि मेरे भीतर इस भेदभाव को क़ायम रखने की क्षमता नहीं है।

 

गाँधीजी का आन्तरिक जीवन गहन धार्मिक जीवन था जिससे उनके समस्त बाह्य व्यवहार में सार्थकता एवं शक्ति पैदा होती थी। लेकिन वह धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं चाहते थे। वह जीवन भर संघर्षशील रहे। उनका यही प्रयास रहा कि जितना सम्भव हो सके वह दिन में अधिक से अधिक लोगों के साथ घुलमिल सकें। अपने आप को अहंकार के बन्धनों से मुक्त रखना उनके जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा है, और उनकी समस्त राजनीतिक, सामाजिक गतिविधियों में यह भावना क्रियाशील रही है। आप सभी धर्मों का समान रूप से आदर करते थे और उनकी उत्तम शिक्षाओं की सराहना करते थे।

आपकी यह आस्था थी कि प्रत्येक धर्म में ईश्वर की मान्यता विद्यमान है। सत्य एक है, जिसे विभिन्न रूपों में व्यक्त किया गया है। वे चाहते थे सभी धर्मावलम्बी चाहे वह हिन्दू धर्म, इस्लाम, ईसाइयत, ज़रतुश्त किसी भी धर्म के मानने वाले हों धर्म की मूल-भावना को अपनाएँ। और इस तरह विभिन्न धर्मों के बीच सदभाव पैदा हो सके।

गाँधीजी की सोच में व्यापक स्तर पर धार्मिक उदारता थी। मगर इस उदारता का आशय धार्मिक उन्मुक्तता नहीं था। बल्कि विवेक पर आधारित सभी धर्मों के ज़ाहिरी विभेद के बावजूद एक ही वास्तविकता की स्वीकृति है।

गाँधीजी की मान्यता थी कि धर्म इसलिए नहीं है कि इंसानों को एक दूसरे से अलग करें। बल्कि इसलिए है कि मनुष्यों को एकजुट करें। यह दुर्भाग्य है कि आजकल धर्मों को इस तरह से विकृत कर दिया गया है कि वही इंसानों के रक्तपात का कारण बन गए हैं। इस सम्बन्ध में गाँधीजी के विचार ये हैं:

1. कोई भी धर्म दमन और अत्याचार की अनुमति नहीं देता।

2. सत्य और सदाचार से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।

3. विभिन्न धर्मों में समरसता तभी सम्भव है जब किसी एक धर्म के मानने वाले अन्य धर्मों के मानने वालों का सम्मान करें।

4. यदि ईश्वर पर सच्ची आस्था रखते हो तो उसके छोटे से छोटे जीव का हित तुम्हारे मन में होना चाहिए।

5. ईश्वर का सच्चा भक्त तलवार चलाने की शक्ति और साहस रखता है। लेकिन वह तलवार नहीं चलाता। क्योंकि वह जानता है कि प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर का बिम्ब है।

गाँधीजी के इन कथनों के प्रकाश में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि धर्म के नाम पर हमारे दिलों में जो कपट और कटुता भरी है, इस गन्दगी को भी दिल से शुद्ध करना चाहिए।

मुझे मन्दिरों ने सदाएँ दीं कि तेरे काम से अमां मिली

तुझे मस्जिदों ने दुआएँ दीं कि तबाहियों से बचा लिया

गाँधीजी का भारत विविधता में एकता की विशेषता रखता है। यह वह धरती है जहाँ विभिन्न धर्मों, सभ्यताओं, भाषाओं, जातियों के लोग सदियों से मिलजुल कर रहते आए हैं।

जिधर निगाह उठे उस तरफ़ नया है समां

न एक रंग तबीअत, न एक रंगे ज़बां

गाँधीजी के जीवन का एक बड़ा मिशन यह भी था कि देशवासी भाईचारे के रिश्ते में बन्ध जाएँ। वह देश की आज़ादी के साथ-साथ परस्पर प्रेम और भाईचारा क़ायम करने के भी इच्छुक थे। लेकिन जातिवाद, छुआछूत जैसी कुरीतियों ने समाज में जो अशान्ति पैदा की उसे गाँधीजी ने कभी स्वीकार नहीं किया। उनका कहना था कि ये कुरीतियाँ राष्ट्र के शरीर में नासूर की तरह हैं और प्रगति के मार्ग में रुकावट हैं। वह कहते थे कि मैं इंसानों के बीच असमानता का समर्थक नहीं हूँ, हम सब समान हैं। लेकिन यह समानता आध्यात्मिक है, शारीरिक नहीं है।

हमें इस विषय पर मनन करना चाहिए कि वर्तमान संसार में जो असमानता पायी जाती है, उसका कारण क्या है? हमें किस प्रकार समानता प्राप्त करनी चाहिए। यह ध्यान रहे कि किसी व्यक्ति का अन्य व्यक्ति पर श्रेष्ठता जताना पाप है। अतः जातिवाद जहाँ इस अर्थ में हो कि लोगों की सामाजिक सियत में अन्तर आ जाए तो यह बहुत बुरी बात है।

छुआछूत हमारे समाज में अभिशाप की तरह फैला हुआ है। यह ऐसी गन्दगी है कि इसे जड़ से उखाड़ फेंकना समय की सबसे बड़ी अनिवार्यता है। कौन ”छूत” है कौन ”अछूत”, यह विभेद मिटाकर दोनों पक्ष भाई-भाई की तरह गले लग जाएँ, यह गाँधीजी का एक अरमान, एक सुनहरा स्वप्न रहा है।

गाँधीजी हिन्दू धर्म के सच्चे अनुयायी थे। मगर अन्य धर्मों एवं आस्थाओं से वह दुराव नहीं रखते थे। उनका कहना था कि यह असम्भव है कि कोई व्यक्ति मेरे पिछले 50 वर्षों के कामों में से कोई भी एक ऐसा काम बताये जिसके बारे में यह साबित हो सके कि वह काम मैंने किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय विशेष की दुश्मनी में किया हो। मैंने किसी को अपना शत्रु नहीं समझा, न किसी जीवधारी का बुरा चाहा। मेरी आस्था मुझे इसकी अनुमति नहीं देती। मैं सिर्फ हिन्दुओं में छूत-अछूत की एकता नहीं बल्कि हिन्दू, मुसलमानों, ईसाइयों, यहूदियों और पारसी सभी धर्मावलम्बियों के बीच एकता चाहता हूँ।

हम सबको जल्द ही यह एहसास हो जाएगा कि हम एक दूसरे से अलग नहीं बल्कि हम सब एक हैं। छुआछूत को पूरी तरह से ख़त्म करने का संकल्प करते हुए गाँधीजी ने कहा था : मुझे नहीं मालूम कि इस कुरीति को ख़त्म करने का मेरा सपना मेरे जीवन में साकार हो सकेगा या नहीं। हमारा समाज इस अभिशाप से मुक्त होगा या नहीं। यह भेदभाव समाप्त होगा या नहीं।

 

1. अगर मेरे पास देने को कुछ और होता तो मैं इस अभिशाप को दूर करने के लिए दे डालता। मगर मेरे पास इस प्राण के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

2. मेरे सपने के स्वराज में जातीय अथवा धार्मिक भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है।

3. छुआछूत की कुरीति का उन्मूलन समय की सबसे बड़ी अनिवार्यता है।

4. जब तक एक इंसान खुद को दूसरे इंसान से निम्नतर समझता रहेगा, उस समय तक समानता-समता कदापि स्थापित नहीं होगी।

गाँधीजी की तीव्र इच्छा थी कि सभी इंसान अपने कर्तव्य से भली-भाँति परिचित हों और अपनी ज़िम्मेदारियों का पालन करें ताकि समाज में अपनी सही भूमिका निभा सकें। यदि अपने कर्तव्यों और ज़िम्मेदारी का बोझ दूसरों पर डाल कर चलेंगे तो कुव्यवस्था पैदा हो जाएगी और यही दायित्वहीनता लोगों को अस्तव्यस्त कर देगी। समाज में कुव्यवस्था तथा उपद्रव से शान्ति एवं सुरक्षा क़ायम न रहेगी तो यह अपने कर्तव्यों से अनभिज्ञता तथा दायित्वहीनता समाज के लिए किसी गन्दगी से कम नहीं है।

गाँधीजी का मानना था कि कोई काम करना है तो उसे उतनी ही सावधानी के साथ करो जितना आप उस काम में दिल लगाते हैं जो आपके निकट महत्वपूर्ण होता है। इसलिए कि इन्हीं छोटी-छोटी ची़ज़ों से आपके चरित्र का आकलन किया जाएगा।

हमारे समाज में एक बड़ी ख़राबी यह पैदा हो गई है कि पूँजीपति और ज़मींदार अपने अधिकारों का उल्लेख करते हैं और दूसरी ओर मज़दूर अपने अधिकारों का। राजा-महाराजा अपने शासन का राग अलापते हैं और प्रजा अपने इस अधिकार का कि वह आज्ञापालन करती है। यदि यही लोग अपने अधिकारों पर ज़ोर देने के साथ अपने कर्तव्यों और इंसान की हैसियत से अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास पैदा कर लें तो क्या कहना।

हमारा फ़र्ज़ होना चाहिए कि हम एक दूसरे से दोस्ताना सम्पर्क स्थापित करें। एक दूसरे के दुख और सुख में शरीक हों। मुसीबत में एक दूसरे के काम आएँ। अगर हमारे पास कुछ है और दूसरा उससे वंचित है तो उसका हिस्सा भी लगाएँ। किसी को हीन और अपने को श्रेष्ठ न समझें। और जीवन के किसी भी क्षेत्र में खुद को भेदभाव का कारण न बनने दें।

इस सम्बन्ध में गाँधीजी के कुछ विचार निम्नलिखित हैं :

1. मानवता का हित अन्य सभी हितों से श्रेष्ठ है।

2. यदि हम अपने कर्तव्य निभाएँगे तो अधिकारों की प्राप्ति में कोई बाधा नहीं आएगी।

3. यदि कोई व्यक्ति दूसरों के मुकाबले ख़ुद को श्रेष्ठ समझता है तो यह दुर्भावना खुदा और इंसान की निगाह में पाप है।

4. दैनिक जीवन की कठिनाइयों का सहज भाव से मुक़ाबला करने में इंसान की भावी तरक़्क़ी निर्भर है।

5. जो क़ौम अपार त्याग पेश करने की भावना और साहस रखती है वह प्रगति की असीमित ऊँचाइयों पर पहुँचने की क्षमता भी रखती है। जितना त्याग वास्तविक होगा उतनी ही सफलता जल्द प्राप्त होगी।

6. जब तक देश का कोई भी योग्य एवं सक्षम पुरुष स्त्री रोज़गार एवं भोजन में वंचित है, हम पर दो समय का खाना और आराम हराम है। बल्कि हमें इस सूरतेहाल पर शर्मिन्दा होना चाहिए।

7. राजनेताओं से जिन गुणों की अपेक्षा की जाती है वे हैं संयम, निडरता और सबसे बढ़ कर त्याग और कुर्बानी।

8. यदि हमें तरक़्क़ी करनी है तो हम इतिहास को दोहराएँ नहीं, बल्कि नया इतिहास बनाएँ। हम उस पैतृक धरोहर को जो हमारे पुरखों ने छोड़ी है अपनी ओर से उसमें वृद्धि करें। और दृश्य-जगत में नये अविष्कार तथा खोज कार्य करें।

9. मेरी राय में सत्ता सेवा का माध्यम है। जिन लोगों पर पद सम्भालने की ज़िम्मेदारी आती है उन्हें यह काम प्रसन्नता और उत्तम क्षमता का प्रयोग करते हुए करना चाहिए।

गाँधीजी अहिंसा और सच्चाई के पक्षधर थे। उनका मानना था कि मेरा शरीर उसी तरह नश्वर है जैसे मेरे कमज़ोर सहजीवी का। मैं उतना ही पापी हूँ जितना कोई अन्य मानव।

छुआछूत हमारे समाज में अभिशाप की तरह फैला हुआ है। यह ऐसी गन्दगी है कि इसे जड़ से उखाड़ फेंकना समय की सबसे बड़ी अनिवार्यता है। कौन ”छूत” है कौन ”अछूत”, यह विभेद मिटाकर दोनों पक्ष भाई-भाई की तरह गले लग जाएँ, यह गाँधीजी का एक अरमान, एक सुनहरा स्वप्न रहा है।

अपने पापों का स्वीकार एक झाड़ू की तरह है जिससे अन्तःकरण की धूल झड़ जाती है और वह पहले की अपेक्षा अधिक शुद्ध हो जाता है। मुझे अपनी गलती को स्वीकार करने के बाद यह महसूस होता है कि मेरी शक्ति पहले से बढ़ गयी है। गाँधीजी की अभिलाषा थी कि लोग आपस में इस तरह घुलमित कर रहें कि किसी का किसी पर वर्चस्व न रहे।वर्चस्व की ज़रूरत तो सम्राटों को दरबार में होती है। उनका कहना था कि मैं मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों और यहूदियों का उसी तरह सेवक हूँ जैसे हिन्दुओं का। सेवक को प्रेम की आवश्यकता होती है रौब और दबदबे की नहीं।

सभी इंसानों को हिंसा से मुक्त होकर जीने और मरने की कला आनी चाहिए।

गाँधीजी को यक़ीन था कि वह समय ज़रूर आएगा चाहे उसकी अवधि अल्प क्यों न हो जब बुराई करने की क्षमता लोगों में कम हो जाएगी। और विचारधारा के आधार पर दुनिया जुल्म, अन्याय, दम्भ, नैतिक बुराइयों से दूर होने लगेगी। तभी जाकर मेरी अहिंसा सम्पूर्ण-मानवजाति के दिलों को प्रभावित करेगी, इससे पहले नहीं। इस सम्बन्ध में कुछ कथन निम्नलिखित हैं :

1. अहिंसा पराक्रम का सबसे ऊँचा शिखर है।

2. नफ़रत हिंसा की दुर्बलतम स्थिति है।

3. मेरे निकट एक इंसान का किसी अन्य इंसान पर वर्चस्व पाना मानवता के विपरीत है।

4. प्रेम से जो कुछ मिलता है वह सदैव क़ायम रहता है। नफ़रत से जो कुछ मिलता है वह बोझ बन जाता है। क्योंकि इससे नफ़रत और अधिक बढ़ जाती है। हम सबका यह फ़र्ज़ है कि नफ़रत को मिटाएँ और प्रेम को बढ़ाएँ।

5. यदि तुम इसका एहसास नहीं कर सकते कि दूसरे की आस्था भी तुम्हारी आस्था की तरह सच्ची है तो कम से कम तुम्हें इतना तो मानना चाहिए कि अन्य लोग इतने सच्चे हैं, जितने कि तुम हो।

6. अहिंसा और एकता से पैदा होने वाली शक्ति इंसान द्वारा आविष्कृत समस्त हथियारों से हज़ार गुना बेहतर है।

7. गाँधीजी विश्व स्तर पर शान्ति एवं सुरक्षा के इच्छुक थे, उनका उद्देश्य था कि सारे विश्व से मित्रता की जाए। अत्याचार तथा बुराई का अधिक से अधिक विरोध किया जाए, और इंसानों से जितना अधिक हो सके प्रेम किया जाए। गाँधीजी का मानना था कि अगर एक व्यक्ति आध्यात्मिक उत्थान करता है तो सारी दुनिया उसके साथ उत्थान करती है। यदि एक व्यक्ति नीचे गिरता है तो सारी दुनिया एक सीमा तक गिर जाती है।

कोई एक नेकी भी ऐसी नहीं जिसमें केवल व्यक्ति की भलाई उद्देश्य या पर्याप्त समझी जाए। इसी तरह कोई नैतिक अपराध ऐसा नहीं जिसका प्रभाव अपराधी के अलावा और बहुत से लोगों पर न पड़ता हो। इसीलिए किसी व्यक्ति का बुरा या भला होना सिर्फ़ उसका निजी मामला नहीं है। वस्तुतः उसका सम्बन्ध सिर्फ़ सम्पूर्ण समाज से नहीं है बल्कि पूरे विश्व से है।

जिस तरह समुद्र की एक बूँद में समुद्र की विशालता विद्यमान है, यद्यपि उसे इसका आभास नहीं। मगर जैसे ही वह समुद्र से अलग होकर एक पृथक अस्तित्व बनना चाहता है- सूख कर रह जाता है। इसमें कोई अतिरंजना नहीं।

जिन्दगी बुलबुला है पानी का

हम सब इंसानों को चाहिए कि दिल व जान से सारी सृष्टि का भला चाहें और यह दुआ करें कि हमें सबके साथ भलाई करने की शक्ति प्राप्त हो। सबका भला चाहने में ख़ुद हमारा भला है। जो व्यक्ति अपना या सिर्फ़ अपने समुदाय का कल्याण चाहता है, वह स्वार्थी है, उसका कभी भला नहीं हो सकता। हमारा देशप्रेम का दायरा सीमित नहीं बल्कि इसके दायरे में सारी दुनिया आ जाती है।

 

प्रेम कभी कोई अपेक्षा नहीं करता बल्कि वह हमेशा कुछ देता है। प्रेम हमेशा दुख सहता है शिकायत नहीं करता। न ही वह किसी से बदला लेता है।

अम्ने आलम का तलबगार अगर है इंसां

मेरी तालीम पर सर उसको झुकाना होगा

नफ़रत व बुग्ज़ू की लानत को मिटाकर यकसर

रास्ता ज़ीस्त का हमवार बनाना होगा

 

सच्ची शिक्षा यह है कि हमारे भीतर जो उत्तम क्षमताएँ हैं उन्हें उभारें। मानवता की पुस्तक से बेहतर कोई पुस्तक नहीं। गाँधीजी की दृष्टि में मन-मस्तिष्क की सच्ची शिक्षा सिर्फ शरीरांगों जैसे हाथ, पैर, नाक, कान आदि के सही इस्तेमाल और प्रशिक्षण ही से हो सकती है। दूसरे शब्दों में बच्चे का अपने अंगों से समझबूझ कर काम लेना, उसके मानसिक एवं शारीरिक विकास के लिए सबसे अच्छा और सबसे निकट का रास्ता है। मगर ऐसा मानसिक एवं शारीरिक विकास जिसके साथ आत्मा की जागृति न हो अधूरा और त्रुटिपूर्ण है। जैसे यदि आपका हृदय शुद्ध नहीं है और आप अपनी भावनाओं पर काबू नहीं पा सकते तो आप शिक्षित इंसान कभी नहीं हो सकते।

 

शिक्षा से उनका आशय बच्चे और प्रौढ़ दोनों हैं। उनके मस्तिष्क, शरीर और आत्मा के भीतर जो उच्च क्षमताएँ मौजूद हैं, उन्हें उभारना है। लिखने-पढ़ने की योग्यता शिक्षा का मापदण्ड नहीं है। बल्कि वास्तव में यह शिक्षा का प्रारम्भ भी नहीं है। यह मात्र एक माध्यम है जिससे कि शिक्षा दी जा सकती है। इसलिए बच्चे की शिक्षा इस तरह शुरू की जाए कि उसे कोई लाभप्रद दस्तकारी सिखायी जाए, ताकि बच्चे को इस योग्य बनाया जा सके कि वह पहले ही दिन से कोई काम की वस्तु पैदा करने लगे। इस तरह हर व्यक्ति आत्मनिर्भर बन सकता है।

 

इस तरह की शिक्षा शैली से मस्तिष्क और आत्मा का समुचित उन्नयन हो सकता है। इस ग़लत और निराधार विचार को मन से निकाल दें कि योग्यता सिर्फ़ पुस्तकें पढ़ने से प्राप्त हो सकती है।

 

लिखना और पढ़ना सीख लेना स्वयं से मानव की नैतिक क्षमता में कोई वृद्धि नहीं करता। चरित्र निर्माण का साक्षर होने से कोई सम्बन्ध नहीं है। इंसान जो कुछ करता है, उसके कर्म ही बाकी रहते हैं, न कि उसका लेखन और भाषण।

सम्पर्क: जामिया मिलिया इस्लामिया, जामिया नगर ओखला, नई दिल्ली-25

ईमेल : zohrafatima912@gmail.com

साभार : राजघाट समाधि पत्रिका, मार्च 2015

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