इस्लाम और स्वच्छता

Sunday, March 29, 2015 - 14:52

डॉ. कायनात काज़ी

 

इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुरु किए गए स्वच्छ भारत अभियान ने लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरुकता फैलाई है। उन्होंने विभिन्न धर्मों और सम्प्रदायों के लोगों से इस अभियान को सफल बनाने की अपील भी की है। इस्लाम में भी स्वच्छता को बेहद महत्व दिया गया है। इस्लाम में न केवल शारीरिक स्वच्छता पर बल्कि मानसिक और आचरण की शुद्धता पर भी बहुत जोर दिया गया है। क़ुरान में इसके लिए बाकायदा नियम भी बताए गए हैं।

 

व्यक्तिगत स्वच्छता के विषय में इस्लाम

इस्लाम में पवित्रता और स्वच्छता पर विशेष ज़ोर दिया गया है। “तहारत” ऐसे अनुष्ठानों और प्रक्रियाओं  को कहते हैं कि जो किसी एक व्यक्ति या समाज की स्वच्छता और स्वास्थ्य एवं ऊर्जा में वृद्धि के लिए अंजाम दी जाती हैं। इनगतिविधियों में वह समस्त जानकारियां और शैलियां शामिल होती हैं जो व्यक्ति एवं समाज के स्वास्थ्य की सुरक्षा में प्रभावी होती हैं। निःसंदेह, हर समाज के धार्मिक विश्वास, समाज के नागरिकों के स्वास्थ्य और स्वच्छता में महत्वपूर्ण भूमिकानिभाते हैं। इस्लाम धर्म में आचरण की शुद्धता, मानसिक एवं शारीरिक स्वच्छता को बहुत महत्व दिया गया है। क़ुरान में जगह-जगह इनसे जुड़े नियमों का उल्लेख है। है।क़ुरान और हदीसों की रौशनी में धर्म गुरुओं और समाज द्वारा तय किये गएइन नियमों को शरीयत के मसले कहते है। हदीसों(कुरान की व्याख्या) में विस्तार सहित इन नियमों की व्याख्या मिलती है।

 

पाकीज़गी (पवित्रता) पर ज़ोर

 

किसी भी समाज में होने वाले अनुष्ठान, व्यवहार, नियम और आचरण उस समाज द्वारा पालन किये जाने वाले धर्म से प्रभावित होते हैं। साथ ही धार्मिक अवधारणाओं को देश, काल और परिस्थिति प्रभावित करती है। क्योंकि इस्लाम का उदयरेगिस्तानी इलाक़े में हुआ जहाँ पानी की उपलब्धता वैसी नहीं थी जैसी की हमारे देश में है।अतः स्वच्छता सम्बन्धी अनुष्ठानों को पूरा करने के लिए पाक-नापाक की अवधारणा का उदय हुआ।जिस प्रकार वैदिक संस्कृति में शारीरिक शुद्धता के लिएस्नान पर बल दिया गया है उसी तरह रेगिस्तानी इलाके में हर दिन सुबह उठते ही स्नान करना शायद सभी के लिए सम्भव न रहा हो इसलिए वहाँ पर पाक (शुद्ध) रहना अनिवार्य किया गया था।

पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं- “ईश्वर स्वच्छ है और स्वच्छता को पसंद करता है और गंदगी से घृणा करता है”

 

धर्मशास्र के अनुसार पवित्रता क्या है?

 

शरीर एवं मन को साफ़ और स्वच्छ रखना ही पवित्रता है। पवित्रता आचरण की, पवित्रता सोच और व्यवहार की। वैसे तो इस्लाम सभी प्रकार की शुद्धता पर बल देता है. जैसे: आचरण और व्यवहार की शुद्धता, मानसिक और शारीरिक शुद्धता, भोजनसम्बन्धी शुद्धता (हलाल और हराम की अवधारणा) आदि। यहाँ हम शारीरिक शुद्धता के विषय में चर्चा करेंगे। शारीरिक शुद्धता हांसिल करने के लिए इस्लाम में कई प्रक्रियाए हैं जिनका नियम पूर्वक पालन करना होता है। निजासत (अशुद्ध) से शुद्ध होने कीप्रक्रिया को “तहारत” कहते हैं। तहारत हांसिल करने के लिए अनेक प्रक्रियाएं हैं। जिनके द्वारा शुद्ध हुआ जा सकता है।

 

1. वुज़ू Wudu (Ablution)

2. ग़ुस्ल- Full body washing ablution

3. इस्तिंजा- Islamic toilet etiquette

4. यौन स्वच्छता से सम्बंधित नियम- Islamic sexual hygienical jurisprudence

5.  दन्त स्वच्छता (मिस्वाक का प्रयोग) से सम्बंधित नियम - Islamic dental hygienical jurisprudence

 

निजासत और तहारत

नजासत के विषय में क़ुरान और धर्म ग्रंथों में विस्तार से व्याख्या मिलती है।

तहारत के विषय में क़ुरान की आयात:

 

“अल्लाह ने आसमान से पानी नाज़िल किया ताकि तुम उससे तहारत हासिल करो”  (अनफ़ाल11)

इसके लिए अनेक नियम बनाए गए हैं। आम लोग व्यवहारिक जीवन में इसे भली प्रकार से लागू कर पाएं इसके लिए इसे दो श्रेणियों में बांटा गया है। नजासत के दो प्रकार होते है:

 

नजासते ग़लीज़ा

एक वह जिसकी नजासत ज़्यादा सख्त है. थोड़ी भी लग जाए, तब धोने का हुक्म है, इसको नजासते ग़लीज़ा कहते हैं। जैसे इन्सान, जानवरों यहाँ तक के नवजात बच्चों तक के मल मूत्र को इस श्रेणी में रखा गया है।

 

नजासते ख़फ़ीफ़ा

 

हलाल परिन्दे जैसे कबूतर, गौरय्या, घरेलु चिड़िया की बीट नजासते ख़फ़ीफ़ा की श्रेणी में आती है, अगर वह आस्तीन पर लग जाए तो उतने हिस्से को धो कर तहारत हांसिल की जा सकती है। इस्लाम में तहारत के लिए उपयोग में लेने वाले पानीके लिए भी नियम निर्धारित किये गए हैं। शरीयत में साफ सफाई पर विशेष बल दिया गया है। इसलिए पानी तक के लिए नियम बनाए गए हैं। आज विज्ञान कहता है कि पीने के पानी में ऊँगली नहीं डुबानी चाहिए। इस्लाम इस बात पर शुरू सेज़ोर देता रहा है।इस्लाम में ऐसे ढ़ेरों उदहारण मौजूद हैं। साफ सफाई से सम्बंधित बाल से बारीक मसले हैं जिनका एक मुसलमान को पालन करना चाहिए। हज़रात मुहम्मद स० ने साफ सफाई के महत्व को समझाते हुए साफ रहने को “आधे ईमान”की संज्ञा दी है।

“Cleanliness is the half of belief.” (Hadith)

हज़रात मुहम्मद स० ने सड़कों पर भी साफ सफाई रखने की हिदायत दी है

"Removing harmful things from the road is an act of charity”(Sadaqah).

 

“ऐ पैग़म्बर अपने लिबास को पाक रखें कसाफ़त से दूर रहें।” (मद्दस्सिर 4-5)

 

पाक और नापाक की अवधारणा

अल्लाह ने क़ुरआन मे वज़ू, ग़ुस्ल और तयम्मुम के बहुत से सबब ब्यान किये हैं जैसे----

 

ताकि तुम्हे पाक करे (सूरए मायदा आयत 6)

ताकि अल्लाह तुम पर अपनी नेअमतों को तमाम करे।(सूरए मायदा आयत 6)

ताकि तुम शुक्र गुज़ार बन जाओ।(सूरए मायदा आयत 6)

अल्लाह पाकीज़ा लोगों से मुहब्बत करता है। (सूरए बक़रा आयत 222)

 

जब ज़ाहिरी पाकीज़गी के ज़रिये ये तमाम चीज़ें हासिल हो सकती हैं तो अगर दिल निफ़ाक़, रियाकारी, शक, शिर्क, कँजूसी, हिर्स और लालच जैसी बुराईयों से पाक हो जाये तो इसका इंसान पर कितना अच्छा असर पड़ेगा।

 

पाकीज़गी क्या है?

पाकीज़गी के विषय में क़ुरान की आयात:

“हम ने आसमान से पाक करने वाला पानी नाज़िल किया।” (फ़ुरक़ान 48)

 

“ऐ मोमिनों हमारे दिये हुए पाक रिज़्क़ को खाओ।” (बक़रह 172)

वह स्थिति जब कोई व्यक्ति शरीयत में बताए गए नियमों के मापदण्डों के अनुसार पाक (शुद्ध) नहीं होता, उसके शरीर या वस्त्र पर किसी प्रकार की गन्दिगी लगी होती है या वह किसी गन्दिगी या व्यव्हार के सम्पर्क में आया होता है उसे नापाक कहते हैं

“अल्लाह पाकीज़ा लोगों से मुहब्बत करता है।“ (सूरए बक़रा आयत 222)

 

इस्लाम में पवित्रता के लिए किये जाने वाले अनुष्ठान व नियम

वुज़ू Wudu (Ablution) - नमाज़ से पहले हाथ मुँह धोने के ख़ास तरीक़े को वुज़ू कहते हैं।

“ऐ ईमान वालो जब भी नमाज़ के लिए खड़े हो तो पहले अपने चेहरों को और कोहिनियों तक हाथों को धोओ और अपने सिर और गट्टे तक पैरों का मसह करो और अगर जनाबत की हालत में हों तो ग़ुस्ल करो और अगर मरीज़ हो या सफ़र मेंहों या पख़ाना वग़ैरह किया हो या औरतों के साथ हमबिस्तर हुए हो और पानी मिले तो पाक मिट्टी से तयम्मुम कर लो, इस तरह कि अपने चेहरे हाथों का मसह कर लो कि ख़ुदा तुम्हारे लिए किसी तरह की ज़हमत नही चाहता, बल्कि यहचाहता है कि तुम्हें पाक पाकीज़ा बना दे और तुम पर अपनी नेअमतों को तमाम कर दे। शायद तुम इस तरह उसके शुक्र गुज़ार बंदे बनजाओ। ।(मायदा 6)”

 

जैसा मैं पहले ही कह चुकी हूँ। इस्लाम एक वैज्ञानिक सोच रखने वाला धर्म है। इसमें बताए हुए नियम और कानून के पीछे जनमानस के हित से जुड़ी कोई न कोई भावना ज़रूर होती है। वुज़ू में दुहराई जाने वाली प्रकिृयाओं के भी स्वास्थ्य से जुड़ेअनेक लाभ हैं। इसके लिए एक उदहारण प्रस्तुत है.

 

वुज़ू में पैरो के धोने के फायदे / मसाज थेरेपी

डॉक्टर का अक्सर मश्विरा होता है शुगर के मरीज़ों के लिए कि अपने पैरो की हिफाज़त करते रहें क्योकि अक्सर लोग सुबह जूता पहन के शाम को उतारते हैं या जो लोग धुल मिटटी में काम करते हैं उनके पैरो में अक्सर ज़ख्म हो जाते हैं जोकिजल्दी भरते नहीं हैं। पैरों कि उंगलियो के बीच में खेलाल का हुक्म है ताकि किसी किस्म कि कोई गन्दगी बाकी न रह जाये। पैर के धोने से ज़्यादातर इन बीमारियो का खात्मा भी हो जाता है जैसे-डिप्रेशन, पैरो में दर्द, बेचैनी, दिमाग़ी खुश्की औरनींद का न आना वगैरा। इससे पैरो का मसाज भी हो जाता है।

 

इसके अलावा वुज़ू के और भी बहुत से फायदे हैं-

·  वुज़ू गुस्से को काबू करता है।

·  वुज़ू से हाई ब्लड प्रेशर कण्ट्रोल में रहता है।

·  वुज़ू फालिज और लकवे से बचाता है।

·  वुज़ू का बचा पानी पीने से मेदे और मसाने कि गर्मी और खुश्की से बचा जा सकता है।

 

ग़ुस्ल

शरीयत में बताए गए नियमों के अनुसार पूरे शरीर को धोना ग़ुस्ल (स्नान) कहलाता है। ज्ञात हो कि वनस्पति तेलों के प्रयोग से साबुन बनाने का अविष्कार और पश्चिमी लोगों का परिचय शैम्पू से इस्लामी दुनिया के लोगों ने ही किया था।

 

इस्तिंजा-शौचालय के प्रयोग से सम्बन्धित नियम

शरीयत में बताए गए नियमों के अनुसार प्रसाधन के प्रयोग के बाद पानी द्वारा शरीर को शुद्ध करना इस्तिंजा कहलाता है। पानी की उपलब्धता न होने पर अन्य विकल्प दिए गए हैं। पर गन्दिगी और अशुद्धि को दूर करना अनिवार्य है।

 

दन्त स्वच्छता-मिस्वाक का प्रयोग

आज देश में ह्रदय रोग से ज़्यादा दन्त रोग से पीड़ित लोग अधिक पाए जाते हैं। इस्लाम में मुँह की स्वच्छता पर ज़ोर देते हुए मिस्वाक के प्रयोग पर बल दिया है। मिस्वाक एक प्रकार की लकड़ी होती है जिसमे कैल्शियम बहुतायत में होता है।दातुन के लिए इसका प्रयोग बहुत लाभकारी है। ऐसा कहा जाता है कि मिस्वाक का प्रयोग करने वाले अपनी क़ब्र तक दाँत साथ लेकर जाते हैं। एक मुसलमान दिन और रात में कई बार मिस्वाक का प्रयोग करता है। मिस्वाक का प्रयोग करने से मुँहको पवित्रता मिलती है। स्वच्छता का एक उदाहरण मूंह को साफ़ रखना है। जब कभी कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थलों पर जाना चाहे तो उसे चाहिए कि वस्त्रों, मूंह और दांतों की सफ़ाई का ध्यान रखे और सुगन्ध का प्रयोग करे।

 

यौन स्वच्छता से सम्बन्धित नियम

इस विषय पर भी विस्तारपूर्वक नियम दिए गए हैं। जैसे एक स्त्री और पुरुष को दाम्पत्य जीवन में किस प्रकार से व्यवहार करना है। इस विषय पर जितना आवश्यक शारीरिक स्वच्छता का होना है उतना ही ज़रूरी मानसिक व व्यवहारिक स्वच्छता का होना भी है। यहाँ बल दिया गया है, सोच की शुद्धता पर, जिसका सीधा सम्बन्ध है व्यक्ति के आचरण और व्यवहार से। एक परिवार और समाज में अनुशासन और नैतिकता के लिए ऐसे नियम और कानून होना किसी भी समाज की पहली आवश्यकता है।

 

वर्तमान परिस्थिति

स्वच्छता और साफ सफ़ाई के सम्बन्ध में

ऊपर दिए गए विवरणों से यह बात स्पष्ट होती है कि व्यक्तिगत स्वच्छता के विषय में इस्लाम उच्चस्तरीय नियम व मापदण्ड रखता है। पर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि देश में स्वच्छता को लेकर मुसलमानों में काफीपिछड़ापन मौजूद है। आम लोगों की धारणा तो उससे भी नीचे की ओर जाती है। लोग मानते हैं कि मुस्लिम मलिन और गन्दी बस्तियों में रहते हैं और सिर्फ़ जुम्मे के जुम्मे नहाते हैं। इस धारणा में कितने प्रतिशत सच्चाई है हम इसपर बहस नहींकरेंगे। पर वास्तव में ऐसा क्यों है? हम इसे समझने का प्रयास करेंगे।

 

इन कारणों को जानने के लिए हम सच्चर समिति की रिपोर्ट का सहारा लेंगे। यह रिपोर्ट भारत में मुसलमान समुदाय की सामाजिक-आर्थिक हालत समझने का का अबतक का यह सबसे प्रमाणिक उपलब्ध दस्तावेज  मानी जाती है। इस समिति नेआजादी के बाद से भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का आंकलन किया है।

 

पूर्व न्यायमूर्ति राजिन्द्र सच्चर द्वारा तैयार की गई ‘भारत के मुस्लिम समुदाय की सामाजि‍क, आर्थि‍क और शैक्षि‍क स्थिति‍’ वि‍षयक रि‍पोर्ट के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इस रिपोर्ट से पता चला है कि भारतीय मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जातिऔर जनजाति से भी ज्यादा खराब है।

 

बोलते आंकड़े

जनधारणा और दृष्टिकोण:

Ø मुसलमानों में यह हीन भावना घर कर गई है कि अन्य समाज उन्हें शक की

निगाह से देखते हैं। हर दाढ़ी वाला आईएसआई एजेंट समझा जाता है। मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा यह मानता है कि उनके साथ भेद-भाव किया जाता है तथा इसका परिणाम है- सामूहिक पृथकीकरण। जिसके चलते यह लोग सघन मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में ही रहते हैं।

Ø सघन मुस्लिम आबादी वाले इलाकों  में संरचनात्मक सुविधाओं की  कमी है।

 

शैक्षिक स्थितिः

Ø  6 से 14 वर्ष कि आयु वर्ग के मुस्लिम बच्चों में 25 फीसदी या तो कभी स्कूल  ही नहीं गए या उन्होंने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी।

Ø  मुसलमानों के केवल 17 फीसदी बच्चे ही मैट्रिक्युलेशन पूरी कर पाते हैं।

Ø  मुसलमानों में 20 वर्ष और उससे ऊपर कि आबादी में मात्र 4  फीसदी से भी कम स्नातक हैं या डिप्लोमा धारक हैं। तकनीकी शिक्षा ग्रहण करने में यह आंकड़ा सिर्फ एक प्रतिशत है।

Ø  प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर मुसलमानों में अन्य सामाजिक-धार्मिक श्रेणियों की तुलना में पढ़ाई छोड़ने की दर सबसे अधिक है।

Ø  श्रेष्टतम कॉलेजों में पूर्व स्नातक छात्रों में से हर 25 में सिर्फ एक और हर परा-स्नातक छात्रों में से 50 में सिर्फ एक मुसलमान है।

Ø  गरीब और जो गरीब नहीं है, दोनों ही वर्ग में मुसलमान स्नातकों में बेरोजगारी की दर अन्य सामाजिक-धार्मिक श्रेणियों में सबसे अधिक है।

 

एक नजर अर्थव्यवस्था और रोजगार परः

Ø  सार्वजानिक और निजी क्षेत्रों की वेतन वाली नौकरियों में मुस्लिम श्रमिकों की हिस्सेदारी बहुत ही कम है।

Ø  कृषि क्षेत्र में भी मुसलमानों की भागीदारी काफी कम है।

Ø  प्रोफेशनल व प्रबंधकीय क्षेत्रों में भी मुसलमानों की भागीदारी बहुत कम है।

Ø  अधिकतर  मुसलमान हस्त कौशल से जुड़े रोजगार में संलग्न हैं पर उनमें तकनीकी कौशल की कमी है। कई बैंक मुस्लिम सघन आबादी वाले इलाकों को नकारात्मक क्षेत्र बताकर कर्ज नहीं देते।

 

यह आंकड़े आंखें खोलने वाले हैं।  न अच्छी शिक्षा है और न ही रोजगार। सरकारी नौकरियां तो इनसे कोसों दूर हैं। उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा तक इनकी पहुंच ना के ही बराबर है। व्यापार करने के लिए बैंक इन्हें कर्जनहीं देती। आम मुसलमानों में यह बात घर कर चुकी है कि उनको नजरअंदाज किया जाता है। इस मुल्क में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ एक वोट बैंक के रूप में है। जिसे चुनावों से पहले थोड़ा हिला लिया जाता है। उनके क्षेत्रों के विकास के लिए सरकारें योजना तो बनाती हैं पर वह योजनाएं चुनावी वायदों से ज्यादा कुछ नहीं होतीं। जिन मलिन बस्तियों को हम देखते हैं वहाँ पर लोग कई समस्याओं से ग्रसित हैं। जिसमे मुख्य है अशिक्षा, गरीबी,बेरोज़गारी, वित्तीय सहायता का ना मिलना आदि।

 

इस देश में पाए जाने वाले अधिकतर मुसलमान अशिक्षित होने के कारण इस्लाम और शरीयत से भी दूर है। शरीयत में व्यक्तिगत स्वच्छता के विषय में क्या नियम कानून हैं उसकी भी पूरी जानकारी नहीं रखते हैं। जिसका मुख्य कारण अशिक्षा और जीविकोपार्जन की चिन्ता है।

 

चूक कहाँ?

अब सवाल यह उठता है कि चूक कहाँ पर हो रही है? जिस धर्म में व्यक्तिगत स्वच्छता के विषय में इतने उच्च स्तरीय कानून और मापदण्ड दिए गए हैं उस धर्म के अनुयायी ही स्वच्छता में पीछ हैं।

 

हम सब में यह आम धारणा पाई जाती है कि हम जहाँ भी गरीब और मलिन बस्ती देखते हैं उसे पिछड़ा वर्ग कह कर आगे बढ़ जाते हैं। पर यह कोई नहीं मानता कि मुसलमानों में भी पिछड़ा वर्ग होता है, और अति पिछड़ावर्ग भी होता है। इस देश के मुसलमानों का यह दुर्भाग्य था कि भारत पाक विभाजन के समय देश का अभिजात्य, शिक्षित मुस्लिम वर्ग पाकिस्तान चला गया और बच गए वह गरीब और पिछड़े लोग जिनके पास वहां जानेतक के साधन नहीं थे और कुछ देश भक्त जिन्हें अपनी जन्म भूमि छोड़ना गवारा नहीं था। ऐसे में देश में दिखने वाले अधिकतर मुसलमान कई पिछड़े तथा अति पिछड़े वर्ग से हैं और जो कि गरीब और अशिक्षित हैं। यहाँमैं एक उदाहरण पेश करुँगी। कभी मौक़ा लगे तो किसी कंस्ट्रक्शन साईट पर बेलदारी करने वाली लेबर को देखिएगा। सब लगभग एक जैसे ही दिखाई देते हैं। फिर उनके नाम पूछियेगा। उनमें आपको अलग-अलग धर्म केलोग मिल जाएंगे और सम्भव है कि कोई मुस्लिम भी मिल जाए। आप पाएँगे कि स्वच्छता के प्रति उदासीनता का स्तर दोनों में लगभग समान ही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत स्वच्छता केप्रति जागरूक होने का सम्बन्ध किसी धर्म से न होकर अन्य कारक, जैसे अशिक्षा, बेरोज़गारी, निर्धनता आदि से ज़्यादा है।

अपर्याप्त प्रयास

 

अभी तक हम ने जाना कि व्यक्तिगत स्वच्छता के विषय में इस्लाम क्या कहता है? और वर्तमान में मुसलमानों की स्थिति क्या है?  धार्मिक किताबों में तो उच्च स्तरीय मापदण्ड लिखे हुए हैं मगरआम आदमी जोकि दो वक़्त की रोटी की मारामारी में लगा हुआ है, से यह नियम कानून दूर हैं। ऐसा नहीं है कि इस दिशा में जन जाग्रति अभियान नहीं चलाए गए हैं। कई संगठन समाज में सुधार केलिए प्रयास रत हैं। जैसे: तब्लीग़ी जमाअत और इस्लामी जमाअत अपने अपने स्तरों पर समाज में सुधार के लिए लगी हुई है। पर यह प्रयास नाकाफ़ी हैं। तब्लीग़ी जमाअत 1926 से देश में ही नहींविश्व भर में जनजागृति के कार्यों में लगी हुई है। इसका प्रयास बहुत ही ज़मीनी स्तर पर कार्य करते हुए लोगों को धर्म के नज़दीक लाना था और जिस रास्ते पर मुहम्मद साहब ने अपना पूरा जीवनजिया उसी का अनुसरण करवाना था। इस संगठन के अनुयायी 150 देशों में पाए जाते हैं। साथ ही यह संगठन किसी भी राजनैतिक पार्टी से जुड़ा हुआ नहीं है। इनके उसूल बहुत ही साधारण हैं। लोगअपने खर्चे पर जमाअत में जाते हैं और ऐसे देहातों में जाते हैं जहाँ निरक्षरता और अज्ञानता है। उन्हें धर्म की बातें तो बताते ही हैं। साथ ही व्यक्तिगत स्वच्छता के विषय में इस्लाम क्या कहता है यहभी बताते हैं। इस्लामी जमाअत भी अपने स्तर पर जनजागृति का प्रयास करती है। इस्लामी जमाअत मानती है कि इस्लाम सिर्फ मुसलमानों के लिए ही नहीं है। यह जीवन जीने का तरीक़ा है। जोकिसबके लिए फायदेमंद है।

 

समय की माँग है।

भारतीयों में साफ सफाई के लिए जागरूकता फैलाना कोई आसान कार्य नहीं है। हम भारतीयों  की आदत है कि अपना घर साफ करते हैं और कचरा उठा कर सड़क पर फेंक देते हैं। इस आदत कोबदलने के लिए चहुमुखी प्रयास आवशयक हैं। ऐसे प्रयास जो कि व्यक्तिगत स्वच्छता के साथ-साथ सामूहिक स्वच्छता पर ज़ोर देते हों। हमने देखा कि धर्म ग्रन्थ तो व्यक्तिगत स्वच्छता के लिएउच्चीस्तरीय नियम और कानूनों की व्याख्या करते हैं। पर गरीब और पिछड़ा वर्ग इन जानकारियों से दूर है। आवश्यकता है इस दूरी को मिटाने की। यहाँ मैं एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूँगी। आज सेपचास वर्ष पूर्व मुस्लिम समाज में विवाह योग्य लड़कियों को एक किताब पढ़ाई जाती थी। जिसका नाम बहिश्ती ज़ेवर था। जिसमे जीवन से जुड़े व्यवहारिक ज्ञान दिया होता था। उस किताब कीख़ासियत यह थी कि उसमे जीवन के हर पक्ष से जुड़े मसले पर ज्ञान दिया गया था। आप उसे व्यवहारिक जीवन की “एन्सायकलोपीडिया” भी कह सकते हैं। उस किताब का एक बड़ा भाग व्यक्तिगतस्वच्छता पर केन्द्रित होता था। जहाँ माता-पिता अपनी बेटियों को किसी गुरु के मार्ग दर्शन में यह किताब पढ़वाते थे वहीं दहेज़ में “बहिश्ती ज़ेवर” देना एक अनिवार्य परम्परा भी मानी जाती थी। जिससेकि व्यवहारिक जीवन में आवश्यकता पड़ने पर महिलाऐं उस किताब से परामर्श ले सकें। इन किताबों का बड़ा ही स्पष्ट उद्देश्य था। कहा जाता है कि मनुष्य की पहली पाठशाला घर और परिवार होताहै। और घर का केन्द्र होती है उस घर की स्त्री। परिवार में आचरण और व्यवहार एक स्त्री द्वारा ही बच्चों में डाले जाते हैं। इसीलिए एक स्त्री का शिक्षित होना परम आवश्यक माना गया है।

 

ऐसी ही एक किताब हिन्दू समाज में भी होती थी जिसका नाम था “स्त्री सुबोधिनी” है। यह पुस्तक भी बहिश्ती ज़ेवर जैसी होती थी। और उसी उद्देश्य के साथ हिन्दू समाज में उपयोग में लाई जातीथी। मेरी माँ को यह पुस्तक दहेज में दी गई थी। मैंने केवल इसका नाम सुना था।

 

फिर समय बदला और लड़कियों की दीक्षा पूरी तरह से स्कूली हो गई और इन किताबों की परम्परा कहीं पीछे छूट गई। लोगों ने माना कि अब इन किताबों की आवशयकता नहीं है। पर यह पूर्ण सत्यनहीं है। हो सकता है कि संभ्रांत और शिक्षित वर्ग में यह पुस्तकें अपना अर्थ खो चुकी हो पर हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में एक बड़ा वर्ग काम पढ़ा लिखा और अशिक्षित है। और यही वह वर्गहै जिसे स्वच्छता के लिए जागरूक करने की आवश्यकता है। मैंने स्वम् इन दोनों पुस्तकों का अध्धयन किया है, और पाया है कि यह पुस्तकें कुछ उन्नयन (Up-gradation) के साथ आज भी प्रासंगिकहैं। ज़रुरत है इन पुस्तकों को समकालीन दुनिया की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पुनः लिखने और समाज द्वारा व्यवहार में लाने  की। यह पुस्तकें हमारी संस्कृति और परम्पराओं की धरोहरहैं। हमें कालान्तर में इन्हें गंवाना नहीं चाहिए बल्कि इन्हें जीवन में उतारना चाहिए। शिक्षित होने का मैं सिर्फ एक दोष पाती हूँ कि इन्सान शिक्षित हो जाने पर सिर्फ अपने लिए जीने लगता है। ऐसानहीं होना चाहिए। समाज और देश के प्रति भी कुछ दायित्व है। उनके लिए भी समय निकालना चाहिए। आज समाज को ज़रूरत है ऐसे लोगों की जो व्यक्तिगत स्तर पर आगे आएँ, और स्वच्छता के लिए जनजागृति फैलाएँ। हमें अशिक्षित लोगों और जानकारियों के बीच एक सेतू बनना होगा। ऐसे बहुत सारे कार्य हैं जो व्यक्तिगत स्तर पर किये जा सकते हैं। भारत युवाओं का देश है। हम युवाओं कोआगे आकर ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए। इसके लिए ज़रूरी नहीं कि किसी संगठन से जुड़कर ही कार्य किया जाए।

 

सन्दर्भ:

1. बहिश्ती ज़ेवर मुकम्मल लेखक - मौलाना अशरफ अली थानवी, संस्करण 2008

2. भारत के मुस्लिम समुदाय की सामाजि‍क, आर्थि‍क और शैक्षि‍क स्थिति‍’ सच्चर कमेटी की रि‍पोर्ट

3. http://www.minorityaffairs.gov.in/sites/upload_files/moma/files/sachar_comm_report_hindi.pdf

4. http://www.inventions-handbook.com/islamic-inventions.html

5. http://al-quran.info/

6. http://hi.quransharif.org/

7. http://tablighijamaat.org/

8. http://chooseislam.org/

 

लेखक परिचय : डॉ.कायनात काजी फोटोग्राफर, ट्रेवेल राइटर और रिसर्चर के साथ-साथ साहित्यकार भी हैं। प्रसिद्ध साहित्यकार कृष्णा सोबती के साहित्य पर पीएचडी करने वाली कायनात काजी ने फोटोग्राफी के गुर जानेमाने फोटोग्राफर ओपी शर्मा और रघु राय से सीखा है। दिल्ली के इण्डिया हैबिटेट सेंटर की आर्ट गैलरी सहित कई जगहों पर उनके छाया चित्रों की प्रदर्शनी भी लग चुकी है। दुनिया की जानीमानी आईटी कंपनी एचसीएल द्वारा ग्रेटर नोएड़ा में स्थापित अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिव नाडर विश्वविद्यालय में कार्यरत कायनात काजी के फोटो फीचर, ट्रेवेलाग, कविताएं और कहानियां कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. उनकी दर्जनों लघु कहानियों का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है। पत्रकारिता और जनसंचार में परास्तानक कायनात काजी कुशल फोटोग्राफर के साथ-साथ बेहतरीन शिक्षक भी हैं. उन्होंने चौदह भाषाओं में प्रकाशित होने वाली पत्रिका द संडे इंडियन के संपादकीय टीम में काम करने के साथ-साथ दिल्ली के विभिन्न मीडिया संस्थानों में अध्यापन भी किया है। अकादमिक रुचि वाली डा कायनात काजी के कई शोध पत्र भी प्रकाशित हो चुके हैं।

ईमेल: kaynatkazi@gmail.com

वेबसाइट: www.kaynatkazi.in

 

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