इस्लाम में साफ़-सफ़ाई (स्वच्छता)

Saturday, March 28, 2015 - 12:40

क़ाज़ी सैयद मुश्ताक अली नदवी, क़ाज़ी शहर, भोपाल, दारुल क़ज़ा (मसाजिद कमेटी) भोपाल

 

अल्लाह तआला ने सफ़ाई सुथराई को मनुष्य की प्रकृति में रखा है। इसलिए साधारणतयाः स्वयं की इच्छानुसार लोग सफ़ाई सुथराई का ध्यान रखते हैं। माताएँ अपने बच्चों को नहलाती धुलाती हैं। ये भी पाकी (साफ़-सफ़ाई) की एक व्यवस्था है। कपड़ों को बिस्तरों को धोया जाता है यहाँ तक कि स्वयं को भी धोया जाता है यह सब पवित्रता के ही दृश्य हैं। क्योंकि अल्लाह तआला ने इंसान (मनुष्य) के अन्दर स्वयं को ठीक रखने और साफ़ रखने का तत्व रखा है। चूंकि इस्लाम एक सम्पूर्ण व मुकम्मल दीन (धर्म) है और अल्लाह तआला ने उसे सम्पूर्ण रुप से शेष रखा है। इसलिए उसने पवित्रता पर अत्याधिक ज़ोर दिया है। इसके साथ ही इस्लाम ने पवित्रता का वर्गीकरण भी किया है। क्रमांक एक पर आरम्भिक स्तर की चीज़ स्वच्छता है उसका भी इस्लाम ने पूरा ध्यान रखा है और स्वच्छता में वो सारी चीज़ें हैं जिसमें घरों की सफ़ाई, आँगन की सफ़ाई, कमरों की सफ़ाई को संज्ञा दी गई है। इसी प्रकार मस्जिदें मैली हो जाती है तो उन्हें झाड़ा जाता है, उन पर रंग कराया जाता है। ये सारी चीज़ें स्वच्छता से सम्बन्ध रखती हैं। और इसी प्रकार मनुष्य के शरीर में भी स्वच्छता का प्रयोग कराया गया जिसको प्रकृति की संज्ञा दी गई है कि नाखून काटे जाये, दाढ़ी, मूंछे, बाल और आँखों को भी सही रखा जाये और तेल का भी इस्तेमाल किया जाये इसके अतिरिक्त शरीर को धोया जाये इत्यादि। ये सारी चीज़ें आरम्भिक वर्ग में सम्मिलित किया जायेगा। ये बाह्य सफ़ाई है जो कि इस्लाम का आरम्भिक आदेश है। इसके बाद सफ़ाई सुथराई का क्षेत्र फैलता चला जाता है और फ़िर आस्था की पवित्रता, कर्मों की सफ़ाई पर इस्लाम ज़ोर देता है। और उन सारी सफ़ाईयों को ईमान का हिस्सा घोषित करता है।

 

इस्लाम में जब भी सफ़ाई का शब्द बोला जाता है तो उसका क्षेत्र व्यक्तिगत सफ़ाई से समाज की सफ़ाई तक फैला हुआ दिखाई देता है। सुबह का आरम्भ नमाज़ से और नमाज़ से भी पहले वुजू को आवश्यक घोषित किया गया है। जिसमें हाथ पैर और चेहरे से पहले मिस्वाक (दतोन) की नसीहत की जाती है। ताकि मुँह की पूरी तरह सफ़ाई और साफ़ सुथरे मुँह के साथ अपने रब की पवित्रता बयान की जाये। इस तरह रात को आख़री नमाज़ रखी गई है ताकि सोने से पहले भी पूरी तरह सफ़ाई सुथराई का ध्यान रखा जाए। इसी प्रकार नमाज़ जैसी महत्वपूर्ण इबादत के लिए शर्त है कि वो हर प्रकार की नकारात्मक सोच से पाक हो। साल भर में ज़कात की व्यवस्था की गई है और रोज़े के द्वारा मनुष्य के शरीर एवं आत्मा की अन्तरमन में पैदा होने वाली गन्दगी को साफ़ करने का आदेश दिया गया है। इससे समाज की हर उस चीज़ से घृणा पैदा कराई गई जिससे समाज का वातावरण दूषित हो। रास्ते में मल-मूत्र त्यागने से मना किया गया बल्कि कहा गया कि अपनी इस आवश्यकता के लिए आबादी से जितना दूर सम्भव हो जाया करो। खाने एवं पहनने की वस्तुओं को खुला न रखा जाये यहाँ तक कि खाने पीने की वस्तुओं में फूंका भी न जाए। घरों में रोशनदान (सूरज की रोशनी आने जाने का रास्ता) बनाए जायें और अधिक से अधिक पेड़ पौधे भी लगाए जायें। रास्ते से हर प्रकार की हानिकारक वस्तुओं को हटाया जाये, इत्यादि।

 

एक नेक समाज का वजूद उस समय तक सम्भव नहीं जब तक के उसके लोग खुली हुई, छुपी हुई दोनों प्रकार की सफ़ाईयों में लेस न हों। घर के साथ मोहल्ले की गलियाँ भी साफ़ हों और बाहर से आने वालों को देखकर ये अनुभूति हो कि यह मुसलमानों के मोहल्ले हैं। यहाँ के घर व आँगन और गलियाँ इस बात की गवाह है कि यहाँ के लोग उस धर्म के मानने वाले हैं जिसने हर प्रकार की साफ़-सफ़ाई (स्वच्छता) और पवित्रता पर ध्यान दिया है। और जब इस धर्म के मानने वाले मानव समाज में कदम रखें और लोगों से बातें व मुलाकाते हों तो उनके विचार व कर्म और उनकी बातें गवाही दें कि उस नबी के मानने वालें है जिसने हर क़दम पर सफ़ाई (स्वच्छता) का आदेश दिया है। यहाँ तक की नमाज़ जैसी पवित्र इबादत से पहले भी मिस्वाक (दतोन) और वुजू के द्वारा स्वयं को पाक करने की हिदायत (आदेश) दिया ताकि पाँच बार में इस काम के बाद किसी तरह के बाहरी और अन्दरुनी गन्दगी की सम्भावना न रहे।

 

आज की परिस्थितियों में जहाँ इस्लाम को दूसरी बहुत सी शिक्षाओं और अच्छाईयों पर पक्षपात के मोटे पर्दे डाल दिए गये हैं। वहीं सफ़ाई (स्वच्छता) के क्रम में इस्लाम के आधारभूत और व्यापक आदेशों को भी उपेक्षित कर दिया गया बल्कि वास्तविकता ये है कि इस्लाम की उन खूबियों को पश्चिमी सभ्यता ने अपनाकर अपनी सौगात के तौर पर प्रस्तुत कर दिया और इस्लाम को हर सम्भव तरीके से बदनाम करने का प्रयास किया गया। उसका मौलिक कारण यह है कि अगर इस्लाम की ये विशेषताएँ और छोटी-छोटी बातों पर भी इस्लाम की रोशन और स्पष्ट नसिहतें लोगों के सामने आने लगेंगी तो लोग इधर-उधर ठोकरें खाने के बजाए सिर्फ इस्लामी आदेशों पर ही सन्तोष करने लगेंगे और फिर झूठ और गलत बयानी और प्रोपेगन्डों का जो बाज़़ार गर्म है वह ठप पड़ जायेगा।

 

इसलिए आवश्यकता है कि सफ़ाई सुथराई के क्रम में इस्लाम की शिक्षाओं का अपक्षपात पूर्ण निरिक्षण किया जाए और उसका मौलिक कर्तव्य मुसलमानों का है कि जब वे अपने जीवनों में इन आदेशों को लागू करेंगे तो दूसरे स्वयं उन वास्तविकताओं को समझेंगे और इस्लामी शिक्षाओं से जो दूरी अपनाई जा रही है वह दूर होगी और मुसलमानों और ग़ैर मुस्लिमों के बीच की जो खाई स्थापित होती जा रही है वह खत्म हो सकेगी।

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