गाँधी के सपनों का स्वच्छ एवं समर्थ भारत

Tuesday, March 24, 2015 - 13:18

डॉ. निशा राय

सच्चे महापुरुषों को स्वार्थ के कीटाणु कभी रुग्ण नहीं बनाते। उनका चित्त दिन-रात दूसरों के कल्याण में रहा करता है, जैसा कि महाकवि बाणभट्ट ने लिखा है- लोकविधेयानि हि भवन्ति चेतांसि महताम्। विघ्नों के विन्ध्याचल भी उनके मार्ग में अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकते, वे आपत्तियों के अर्णव को भी अगत्स्य की तरह चुल्लुओं में पी जाते हैं।

महात्मा गाँधी मानवमात्र के हित-चिन्तक थे। उनके आदर्शपुरुष थे- राम और उनका आदर्श राज्य था- रामराज्य। उन्होंने स्वच्छ और समर्थ भारत का सपना देखा था। भारत देश नहीं समस्त देशों का प्राण है। यह मूल रूप में कर्मभूमि है, भोगभूमि नहीं। भारत का ध्येय दूसरे देशों के ध्येय से कुछ अलग है। भारत में ऐसी योग्यता है कि वह अध्यात्म के क्षेत्र में दुनिया का प्रथप्रदर्शक हो सकता है। स्वच्छता से हमारा तात्पर्य बाह्य एवं अन्तः स्वच्छता से है। जब तक हमारा अन्तः करण स्वच्छ नहीं होगा तब तक बाह्य स्वच्छता एक दिखावा भर हो सकता है।

स्वस्थ एवं समर्थ दोनों अन्योन्याश्रित है। जब तक हम अभ्यन्तर और बाह्य रूप से स्वच्छ नहीं होंगे तब तक समर्थ होना सम्भव नहीं है। स्वच्छता चाहिए- पहले आन्तरिक उपरान्त बाह्य। जब हम आन्तरिक रूप से स्वच्छ होते हैं अर्थात ‘अध्यात्मिक’ रूप से तब हमें बाह्य रूप से अर्थात भौतिक रूप से भी सर्वत्र स्वच्छ ही स्वच्छ दिखाई पड़ने लगता है- जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। गाँधी जी ने आजीवन इसी को साधने में अपना पूरा समय लगाया था।

उनके जीवन में शुरू से अन्त तक समस्याओं का अम्बार था, पर इस गुण के कारण कभी विचलित नहीं हुए। वे निरन्तर कार्य करते रहते थे ‘तन काम में और मन राम में’ रमा रहना चाहिए। कुछ भी करने से पहले प्रार्थना और ध्यान पर विशेष जोर देते थे जो भारतवर्ष का जन्मजात स्वभाव है। अपने ही नहीं वरन पूरी सभा को ‘रघुपतिराघव राजा राम’ का भजन कराते थे- जो रामराज्य अवतरित करने का महामन्त्र माना जाता है। जब हम इस भाव से बाह्य जगत में योगदान करेंगे तभी हम पूर्ण रूप से स्वच्छ एवं समर्थ बना पाएँगे। ‘समर्थ’ वही व्यक्ति होता है जो स्वच्छ  और शान्त हो। पूर्ण शान्त भाव से कोई भी कार्य हमें समर्थता का वरदान प्राप्त कराता है। यह पाठ गाँधी जी ने हमें अपना पूरा जीवन आहूत कर राष्ट्र के सामने एक दृष्टांत के रूप में प्रस्तुत किया। जिसे अपना कर एवं आदर्श मानकर चला जाए तो वह दिन दूर नहीं कि भारत पूरे विश्व में एक सामर्थ्यवान राष्ट्र के रूप में उभरेगा जो इस धरा के मानवमात्र जो जागृत करेगा। गाँधी जी ने कहा था- “भारत गाँवों का देश है किन्तु श्रम एवं बुद्धि के बीच अलगाव के कारण हम अपने गाँवों के प्रति लापरवाह होते जा रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि देश में जगह-जगह सुहावने और मनभावने छोटे-छोटे गाँवों के बदले हमें घूरे जैसे गन्दे गाँव देखने को मिलते हैं। हमने राष्ट्रीय या सामाजिक सफाई को न तो जरूरी गुण माना और न ही उसका विकास किया। हम ढंग से नहा भर लेते हैं, मगर जिस नदी, तालाब या कुएँ के किनारे हम श्राद्ध या वैसी ही दूसरी कोई धार्मिक क्रिया करते हैं और जिन जलाशयों में पवित्र होने के विचार से हम नहाते हैं उनका पानी गन्दा करने में हमें कोई हिचक नहीं होती। फलतः हमारे गाँवों की और हमारी पवित्र नदियों के पवित्र तटों की लज्जाजनक दुर्दशा और गन्दगी से पैदा होने वाली बीमारियाँ हमें भोगनी पड़ती है।”

स्वस्थ एवं समर्थ दोनों अन्योन्याश्रित है। जब तक हम अभ्यन्तर और बाह्य रूप से स्वच्छ नहीं होंगे तब तक समर्थ होना सम्भव नहीं है। स्वच्छता चाहिए- पहले आन्तरिक उपरान्त बाह्य। जब हम आन्तरिक रूप से स्वच्छ होते हैं अर्थात ‘अध्यात्मिक’ रूप से तब हमें बाह्य रूप से अर्थात भौतिक रूप से भी सर्वत्र स्वच्छ ही स्वच्छ दिखाई पड़ने लगता है।

“गाँवों में करने के कार्य ये हैं कि जहाँ-जहाँ कूड़े-करकट तथा गोबर के ढेर हो, वहाँ से उनको हटाया जाए तथा जलाशयों की सफाई की जाए। गलियों से कूड़ा-करकट हटा कर स्वच्छ बना लेना चाहिए तथा कूड़े का वर्गीकरण कर उसमें से कुछ का खाद बनाया जा सकता है तथा हड्डी आदि से बहुत-सी उपयोगी चीजें बनाई जा सकती है। इस प्रकार का कार्य शिक्षाप्रद होने के साथ अलौकिक रूप से आनन्ददायक भी है इसमें भारतवर्ष के सन्ताप पीड़ित जन समाज का अनिर्वचनीय कल्याण भर समाया हुआ है। हमें झाड़ू और फावड़े को भी उतने ही गर्व के साथ हाथ में लेना चाहिए जितना कलम और पेन्सिल से लेते हैं।” शहरों की स्वच्छता के सम्बन्ध में उन्होंने पश्चिम का उदाहरण दिया था- “पश्चिम से हम एक चीज जरूर सीख सकते हैं- वह है शहरों की सफाई का शास्त्र। पश्चिम के लोगों ने सामुदायिक आरोग्य और सफाई का एक शास्त्र ही तैयार कर लिया है, जिससे हमें बहुत कुछ सीखना है। भगवान के प्रेम के बाद महत्व की दृष्टि से दूसरा स्थान स्वच्छता के प्रेम का ही है। जिस तरह हमारा मन मलिन हो तो हम भगवान का प्रेम सम्पादित नहीं कर सकते, उसी तरह हमारा शरीर मलिन हो तो भी हम उसका आशीर्वाद नहीं पा सकते। और देश अस्वच्छ हो तो शरीर स्वच्छ रहना सम्भव नहीं है और अगर देश स्वच्छ नहीं रहेगा तो आरोग्य की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।”

गाँधी जी ने समर्थ भारत का सपना साकार करने के लिए ‘पूर्ण स्वावलम्बन’ का बीड़ा उठाया था, जिसे घर-घर में चरखा, हस्तकला अपने स्वभाव के अनुसार रोजगार ’खादीग्राम उद्योग’ के माध्यम से एक क्रान्ति के रूप में आन्दोलन चलाया गया था। जिससे अनेकों ग्रामवासी अपना जीवनयापन आनन्द से चला रहे थे। उनका कहना है- ‘मैं जितनी बार चरखे पर सूत निकालता हूँ उतनी ही बार भारत के गरीबों का विचार करता हूँ। भूख की पीड़ा से व्यथित और पेट भरने के सिवा और कोई इच्छा न रखने वाले मनुष्य के लिए उसका पेट ही ईश्वर है।’ चरखा देहात की खेती की पूर्ति करता था और उसे गौरव प्रदान करता था। वह विधवाओं का मित्र और सहारा था और वह लोगों को आलस्य से बचाता था। उनका कहना था ‘ग्रामोद्योग का यदि लोप हो गया तो भारत के सात लाख गाँवों का सर्वनाश ही समझिए।’ खादी हिन्दुस्तान की समस्त जनता की एकता की, उसकी आर्थिक स्वतन्त्रता और समानता की प्रतीक है। यह ‘हिन्दुस्तान की आजादी की पोशाक’ है। किन्तु आज तरह-तरह के ब्रान्डेड कपड़े बहुतायत से उपयोग में आने लगे हैं। यन्त्रों से काम लेना उसी अवस्था में अच्छा है, जब कि किसी निर्धारित काम को पूरा करने के लिए आदमी बहुत ही कम हो पर यह हिन्दुस्तान में तो हैं नहीं। यहाँ काम के लिए जितने आदमी चाहिए, उनसे कहीं अधिक बेकार पड़े हुए हैं। इसलिए उद्योगों के यन्त्रीकरण से यहाँ की बेकारी बढ़ रही है। लघु उद्योग और कुटीर उद्योग प्रायः समाप्त होते जा रहे हैं। उद्योग के नाश के फलस्वरूप गुलामी और गरीबी आयी। और उस अनुपम कला-प्रतिभा का लोप हो गया, जो किसी समय चमत्कार-पूर्ण भारतीय वस्त्रों में दिखाई देती थी और जो दुनिया की ईर्ष्या का विषय बन गयी थी, उस प्राचीन उद्योग को पुनर्जीवित करने के प्रयत्न को क्या स्वप्नसेवियों का आदर्श कहा जा सकता है?

गाँधी जी के सपनों का समर्थ भारत आज कहीं दूर जाता दिखाई पड़ रहा है। यह सभ्यता अच्छी हो या बुरी, भारत का पश्चिम जैसा उद्योगीकरण करने की क्या जरूरत है? पश्चिमी सभ्यता शहरी सभ्यता है। इंगेलैंड और इटली जैसे छोटे देश अपनी व्यवस्थाओं का शहरीकरण कर सकते हैं। अमेरिका बड़ा देश हैं, किन्तु उसकी आबादी बहुत विरल है। इसलिए उसे भी शायद वैसा ही करना पड़ेगा। लेकिन भारत जैसे बड़े देश को, जिसकी आबादी बहुत ज्यादा बड़ी है और ग्राम-जीवन की ऐसी पुरानी परम्परा में पोषित हुई है जो उसकी आवश्यकताओं को बराबर पूरा करती आयी है, पश्चिमी नमूने की नकल करने की कोई जरूरत नहीं है और न ऐसी नकल करनी चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि एक के लिए जो अच्छी हो दूसरों के लिए भी हो। जो चीज एक आदमी के लिए पोषक आहार का काम करती हो, वही दूसरे के लिए जहर जैसी चीज होती है। किसी देश की संस्कृति को निर्धारित करने में उसके प्राकृतिक भूगोल का हिस्सा होता है। ध्रुव-प्रदेश के निवासी के लिए ऊनी कोट बहुत जरूरी हो सकता है, लेकिन दूसरे जगह के निवासियों का तो उसमें दम ही घुट जाएगा।

 

भारत का भविष्य पश्चिम के उस रक्त रंजित मार्ग पर नहीं है, जिस पर चलते-चलते वह स्वयं थक गया है उसका भविष्य को सरल आध्यात्मिक जीवन द्वारा प्राप्त शान्ति के अहिंसक रास्ते पर चलने में ही है। भारत के समक्ष अपनी आत्मा को खोने का खतरा उपस्थित है और यह सम्भव नहीं है कि अपनी आत्मा को खोकर भी वह जीवित रह सके।

बड़े पैमाने पर औद्योगिकरण का अनिवार्य परिणाम हो रहा है कि ज्यों-ज्यों प्रतिस्पर्धा और बाजार की समस्याएँ खड़ी हो रही हैं त्यों-त्यों गाँव का प्रकट या अप्रकट शोषण हो रहा है। औद्योगिकरण हर हालत में किसी भी देश के लिए जरूरी ही हो ऐसा नहीं है। मेरा मानना है कि स्वतन्त्र भारत दुःख से कराहती हुई दुनिया के प्रति अपने कर्त्तव्य का ऋण अपने गाँवों का विकास करके और दुनिया  के साथ मित्रता का व्यवहार करके और सादा जीवन, उच्च चिन्तन और उदात्त व्यवहार अपनाकर ही चुकाया जा सकता है। लक्ष्मी की पूजा में हमने अपने ऊपर भौतिक समृद्धि के जिस जटिल और शीघ्रगामी जीवन को लाद दिया है, उसके साथ ’उच्च चिन्तन’ मेल नहीं खाता है। जीवन का सम्पूर्ण सौन्दर्य भौतिक भोग-विलास में सिमट कर रह गया है। भारत का भविष्य पश्चिम के उस रक्त रंजित मार्ग पर नहीं है, जिस पर चलते-चलते वह स्वयं थक गया है उसका भविष्य सरल आध्यात्मिक जीवन द्वारा प्राप्त शान्ति के अहिंसक रास्ते पर चलने में ही है। भारत के समक्ष अपनी आत्मा को खोने का खतरा उपस्थित है और यह सम्भव नहीं है कि अपनी आत्मा को खोकर भी वह जीवित रह सके। भारत के लिए इस सुनहले मायामृग के पीछे दौड़ने का अर्थ आत्मनाश के सिवा और कुछ नहीं है।

नदियों का प्रदूषण स्वच्छ भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन कर सामने खड़ी है और सबसे बड़ी चुनौती जो आज स्वतन्त्र भारत के समक्ष एक विकराल रूप धारण किये हुए है वह है- चरित्र की दृढ़ता की कमी। सामाजिक चेतना की आचारगत नैतिक अभिव्यक्ति ही चरित्र है। लोकसंग्रह की भावना से च्युत होने पर इसका अस्तित्व सन्देहास्पद हो जाता है। जो इसे जीवन में चरितार्थ करता है वह पुरुष है, महापुरुष है, महात्मा है। यह वैयक्तिक नहीं है, सामूहिक निधि है क्योंकि, यह लोक-जीवन की आशा, आकांक्षा, स्वप्न और आदर्श को अपनी क्रिया द्वारा सम्प्रकाशित करता है। ईशावास्योपनिषद का वह मन्त्र आज कहाँ खो गया है येनत्यक्तेन भुज्जीयी। भोगवाद अपनी पराकाष्ठा पर है। ऐसी परिस्थिति में महात्मा का वह आदर्श राम जिसे आदिकवि के शब्दों में-

कोन्वस्मिन् साम्प्रत लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान।

धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढ़ब्रतः।।

अर्थात इस समय इस संसार में गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, उपकार मानने वाला, सत्यवक्ता और दृढ़प्रतिज्ञ कौन है? मानव के सम्पूर्ण सद्गुणों के एक चरित्र में राशिभूत देखने की यह लोकपावन अभिलाषा कितनी महान है। गुणों का क्रिया में आचरित होना चरित्र है। इस चरित्र से विषाद का शमन और सुख का सम्पादन होता है। शारीरिक और मानसिक योग क्षेम राष्ट्र का दायित्व है। अपने उज्जवल चरित्र द्वारा समाज को सत्यपथ पर चलने के लिए अनुप्रेरित करना- यह महात्मा की अवधारणा थी। एक दूसरे के हित चिन्तन में निरत रहना, सत्यधर्म का पालन करना, यह आदर्श गाँधी के जीवन से उपस्थित होता है। राष्ट्र का सामान्य सुख, लोकहित का सम्पादन एवं मंगल कामना यह चुनौती है।

लेखक से सम्पर्क का पता : प्रधानाचार्य, एम.ए.एम. कॉलेज, नवगछिया, ति.मां. भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार

साभार : राजघाट समाधि पत्रिका मार्च 2015    

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