स्वच्छता एवं सामूहिकता

Saturday, March 21, 2015 - 12:22

प्रो. मनोज कुमार

 

गाँधी दर्शन में समाज परिवर्तन का स्थान महत्वपूर्ण है। गाँधी समाज व्यवहार के तीनो पहलुओं व्यक्तित्व समाज एवं संस्कृति को एक साथ परिवर्तित करने पर बल देते हैं। समाज परिवर्तन में लक्ष्य की पवित्रता के साथ-साथ साधन की पवित्रता पर भी बल दिया गया है। परिवर्तन स्वयं सेवकों के द्वारा या समाज के लोगों के द्वारा ही सम्भव है। दक्षिण अफ्रीका और भारत में गाँधी जी द्वारा संचालित सत्याग्रह के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि गाँधीजी ने, अंग्रेजी सत्ता की मुक्ति से समाज परिवर्तन को अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया था। हिन्द स्वराज में उन्होंने लिखा है कि वे हिन्दुस्तान को अंग्रेज नहीं बनाना चाहते थे। ‘कांग्रेस का उद्देश्य’ शीर्षक से उन्होंने लिखा है कि राजनीतिक स्वतन्त्रता मिलने के बाद कांग्रेस को स्वयं ही अगले महान कार्य अर्थात देश में वास्तविक प्रजातन्त्र की स्थापना के काम के लिए तैयार करना चाहिए, ताकि सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में भी प्रजातन्त्र की स्थापना हो सके।

 

कांग्रेस के संविधान में उन्होंने लिखा है कि विदेशी प्रभुत्व से पूर्ण स्वतन्त्र होने का लक्ष्य पूरा हो चुका है इसलिए कांग्रेस संगठन को नए सिरे से ढालना होगा, यह सुधार हुए संविधान का मसौदा खास तौर से बुलाए गए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के जनवरी 1948 के अन्त से पहले-पहले पेश करेगी। कांग्रेस के उद्देश्य में वे लिखते हैं कि उद्योगों को समाज से सम्बन्धित होना चाहिए तथा उनका इस प्रकार संगठन करना चाहिए कि, उसमें काम करने वाले का उद्योगों के लाभ, प्रबन्ध और प्रशासन में भागीदार हो, उत्पादन, वितरण और विनियम सभी साधनों पर समाज का नियन्त्रण गाँधी चाहते हैं।

 

गाँधी ने रचना एवं आन्दोलन का समन्वय किया है। सत्याग्रह में निषेधात्मक तत्वों के साथ भावात्मक मूल्य जुड़े हैं। रचनात्मक कार्यक्रम सत्याग्रह का भावात्मक पक्ष है। गोपनीय धवन ने नैतिक शक्ति और अनुशासन को दृढ़ करने के लिए रचनात्मक कार्यक्रम को अवश्य माना है। सविनय अवज्ञा का अर्ध रचनात्मक कार्यक्रम है। सीतारमैया कहते हैं कि रचनात्मक कार्यक्रम गाँधीवादी सत्याग्रही आत्मा का शरीर है, यह सत्याग्रह का सहवर्ती एवं पूरक तत्व है। दरअसल यह शान्त, मूक और शुभ क्रान्ति है। रचनात्मक कार्यक्रम अहिंसक समाजवाद की पूँजी अर्थात समानता का दर्शन है। दरअसल गाँधी रचनात्मक कार्यक्रम के द्वारा अहिंसा की शक्ति को संगठित करना चाहते थे। उन्होंने अहिंसा को सामाजिक धर्म कहा है, इससे सामूहिक अहिंसा जागृत होती है। उन्होंने कहा है कि यदि रचनात्मक कार्यक्रम में जीवन्तता सम्भव नहीं है तो सामूहिक अहिंसा की बात करना बेईमानी है।

 

जयप्रकाश जी भी मानते हैं, कि गाँधी एवं विनोबा के सम्पूर्ण कार्यक्रम का मूल उद्देश्य अहिंसक कार्यक्रम का पुनर्निर्माण करना था। अहिंसक बल रचनात्मक कार्यक्रम के आधार के बिना परीक्षा के समय बुरी तरह असफल रहता है। इसलिए रचनात्मक कार्यक्रम के द्वारा गाँधी अहिंसा की ट्रेनिंग देना चाहते थे क्योंकि यह हमें सेवा और अनासक्त कर्म की ओर प्रवृत करता है। गाँधी जी का विश्वास था कि अहिंसक तरीके से स्वराज प्राप्त करने के लिए रचनात्मक कार्यक्रम अनिवार्य है। उनके अनुसार रचनात्मक कार्यक्रम के क्रियान्वयन का मतलब स्वराज का ढाँचा तैयार करना है। इसलिए गाँधी जीता हुआ स्वराज नहीं बल्कि रचनात्मक कार्यक्रम द्वारा समृद्ध स्वराज प्राप्त करना चाहते थे। बारडोली के किसानों से उन्होंने कहा था कि अगर आप रचनात्मक कार्यक्रम नहीं करते तो आपकी सारी कमाई धूल में मिल जाएगी। अंग्रेजों से लड़कर प्राप्त स्वराज जंगलियों का स्वराज होगा।

 

गाँधी और विनोबा दोनों ही मानते हैं कि सत्ता द्वारा सेवा नहीं हो सकती, सेवा करना सत्ता वालों के लिए सरल नहीं है। राजनीतिक सत्ता जनता की स्थिति सुधारने के लिए अनेक साधनों में से एक साधन है। जयप्रकाश नारायण ने भी कहा है कि हमें देश के निर्माण और परिवर्तन का सबसे बड़ा भाग राजनीतिज्ञों, राज्य या सरकार पर नहीं छोड़ना चाहिए। चारु चौधरी ने भी कहा है कि जनता को उद्यम एवं सरकार की सहायता से समाज का निर्माण करना चाहिए। शंकर राव देव कहते हैं कि रचनात्मक कार्यक्रम राजनीतिक शिक्षण है। रचनात्मक काम करने से जागृत जनता की बुद्धि, रचनात्मक और संगठनात्मक बनती है।

 

गाँव के लोगों में ग्राम-भावना जितनी मजबूत होगी उतनी ही तेजी से गाँव का विकास होगा। सामाजिक न्याय के मूल्यों को विकसित करते हुए एकता अगर न बढ़ायी जाए, तो आर्थिक या विकास के दूसरे काम टिक नहीं पाँएगे। एकता के लिए चित्तप्रवृतियों के शुद्धिकरण, सहकार बढ़ाने और आमदनी के वृद्धि के काम तथा स्वास्थ्य और सामूहिक मनोरंजन ऐसे त्रिविध कार्य अनिवार्य है, सामूहिक निर्णय एकता का प्रत्यक्ष और ठोस सबूत है।

 

आचार्य राममूर्ति लिखते हैं कि गाँव के जीवन में हर जगह द्वैत दिखाई देता है। गाँव के जीवन का ताना, दमन और बाना शोषण का है और इस ताने-बाने से बने कपड़े में द्वैत ही द्वैत है। मजबूत कमजोर को दबाता है और धनी कमजोर को चूसता है। आजादी के बाद विकास की त्रिवेणी, जिसे आचार्य जी तीर्थराज संगम कहते हैं वह टोपी, थैली और कुर्सी का है, टोपी नेता की, थैली ठेकेदार की, कुर्सी अफसर की। यही वह त्रिवेणी है जिसमें मुखिया जी स्नान करते है। सरकारी योजना ने सर्व सामान्य के जीवन को स्पर्श नहीं किया है जो समर्थ थे, वही ब्लॉक की त्रिवेणी में स्नान कर सकते हैं। भारत का ग्रामीण समाज, मालिक, मजदूर और ऊँच-नीच में बँटा है, आचार्य जी का मानना है कि मालिक मजदूर का नाता गाँव के जीवन की गंगा है और ऊँच-नीच का नाता जमुना, संगम पर दोनों अभिन्न हो जाती है, उन्हें अलग करना कठिन है। इसलिए ये मिलकर सोचे और मिलकर करें की योजना है। इनका मानना है कि गाँव के लोगों में ग्राम-भावना जितनी मजबूत होगी उतनी ही तेजी से गाँव का विकास होगा।

 

सामाजिक न्याय के मूल्यों को विकसित करते हुए एकता अगर न बढ़ायी जाए, तो आर्थिक या विकास  के दूसरे काम टिक नहीं पाँएगे। एकता के लिए चित्तप्रवृतियों के शुद्धिकरण, सहकार बढ़ाने और आमदनी के वृद्धि के काम तथा स्वास्थ्य और सामूहिक मनोरंजन ऐसे त्रिविध कार्य अनिवार्य है, सामूहिक निर्णय एकता का प्रत्यक्ष और ठोस सबूत है। गाँव के साधन, वहाँ के हुनर और लोगों के चरित्र को देखकर योजना बनाई जानी चाहिए। सामूहिकता के आदर्श में, अगर हम परिवार को छोड़ेंगे तो योजना बड़ों की होकर रह जाएगी।

 

‘रचनात्मक कार्यक्रम’ नामक पुस्तक में गाँधीजी ‘गाँव की सफाई’ में श्रम और बुद्धि के बीच के अलगाव से प्रारम्भ करते हैं। इस सम्बन्ध में कुमारप्पा कहते हैं कि जिस प्रकार खुराक जिस्म को बढ़ाती है और उसे तन्दुरुस्त रखती है उसी प्रकार कर्म का सच्चा उद्देश्य, मनुष्य की उच्च प्रवृत्तियों का विकास करता है। कर्म, तर्क-शक्ति, कल्पना शक्ति, साहसपूर्ण कार्य करने की रुचि तथा स्नायु मण्डल की व्यवस्थित क्रियाशील में वृद्धि करता है। ग्राम सुधार की योजना में जे.सी. कुमारप्पा सफाई को व्यक्तिगत और सामूहिक आधारों पर व्याख्यायित करते हैं, उन्होंने लिखा है कि आधुनिक सुधार के नाम पर व्यक्तिगत सफाई को हमने छोड़ दिया है। नयी आदतों के साथ-साथ पुरानी अच्छी आदतों का भान कराया जाना चाहिए।

 

गाँधी जी के ग्राम पुनर्निर्माण योजना में ग्राम आरोग्य और स्वच्छता का महत्वपूर्ण स्थान है। वे मानते हैं कि जब तक गाँव की सफाई पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक वहाँ के लोगों का हृदय कभी  स्वच्छ नहीं होगा। जनता का मन गाँवों के धुलों जैसा ही रहेगा, इसलिए ग्रामोद्धार में, ग्राम सफाई की महत्ता, उतनी ही है जितनी और बातों की है। ‘रचनात्मक कार्यक्रम उसका रहस्य और स्थान’ नामक पुस्तक में श्रम और बुद्धि के बीच के अलगाव को गाँधी जी ने रेखांकित किया है। इस अलगाव के कारण हम लापरवाह हो गए हैं। यह एक गुनाह है, इस कारण देश में, जहाँ सुन्दर, सुहावने और मनोभावन बस्तियाँ होनी चाहिए, वहाँ आज गाँवों के नाम पर घूरों के ढेर देखने को मिलते हैं। गाँव के बाहर और आस-पास इतनी गन्दगी होती है कि गाँव में प्रवेश करते समय अक्सर आँख मून्द कर और नाक को कपड़े से दबा कर जाना पड़ता है। गाँधी जी इसका कारण यह मानते हैं कि, हमने राष्ट्रीय सामाजिक सफाई को न जरूरी गुण माना और न ही उसका विकास किया। कुएँ, तालाब और नदियों में जहाँ हम स्नान करते हैं, वहीं बर्तन साफ किए जाते हैं, मवेशी पानी पीते हैं, हम मलमूत्र त्याग करते हैं, वही पानी पीने और भोजन पकाने के काम में आता है। धार्मिक क्रिया भी की जाती है। यह एक बड़ा दुर्गुण है। हम सफाई की छोटी-छोटी चीजों को बिल्कुल नहीं जानते हैं, यही कारण है कि हमारी पवित्र नदियों के पवित्र तटों की लज्जाजनक दुर्दशा और गन्दगी से पैदा होने वाली बीमारियाँ हमे भोगनी पड़ती है।

 

आधुनिक सुधार के नाम पर व्यक्तिगत सफाई को हमने छोड़ दिया है। नयी आदतों के साथ-साथ पुरानी अच्छी आदतों का भान कराया जाना चाहिए।

गाँधी जी ने स्वयं सेवकों से कहा था कि स्वयं सेवक रास्तों और गलियों की जाँच करेगा, जहाँ मलमूत्र दिखेगा उसे साफ करेगा, फावड़े की मदद से उसे टोकरी में भरेगा, पेशाब से गीली मिट्टी को भी टोकरी में भर लेगा और उस स्थान पर दूसरी साफ और सूखी मिट्टी फैलाएगा। शिक्षण आने साहित्य नामक नवजीवन की मासिक पत्रिका में ‘गाँव या घूरे’? शीर्षक से प्रकाशित लेख में श्री काटिस के द्वारा गाँव के बारे में, 1918 में भारत वर्ष की यात्रा के अनुभवों में लिखा गया था कि “दूसरे देशों के गाँवों से तुलना करें तो कह सकते हैं कि भारत के गाँव मानों घूरों पर बसी हुई बस्तियाँ हैं।” गाँधी इस सख्त टीका में सच्चाई देखते हैं, उन्होंने लिखा है कि गाँव के भीतर घुसने पर हमें बाहर और भीतर के हालत में कुछ खास फर्क नजर नहीं आएगा, वहाँ भी रास्ते में गन्दगी होगी, बालक गलियों और रास्तों में पाखाना-पेशाब करते मिलेंगे, बड़े-बूढ़े भी ऐसा ही करते हैं, उन्होंने इन पुरानी और बुरी आदतों को भूलने योग्य माना है। उन्होंने मनुस्मृति आदि हिन्दू धर्मशास्त्र, कुरान शरीफ, बाइबल, जरथुष्ट के फरमानों में रास्ते, आँगन, घर, नदी-नाला, कुआँ आदि को खराब न करने सम्बन्धी सूक्ष्म सूचनाओं की चर्चा की है और लिखा है कि आजकल हम उसका अनादर ही करते हैं। हमारे तीर्थ स्थान में भी गन्दगियाँ होती हैं। यहाँ तक कि तीर्थ स्थान अपेक्षाकृत अधिक गन्दे होते हैं। हरिद्वार का उन्होंने वर्णन किया है, वे लिखते हैं तीर्थ स्थानों के तलाबों का पानी, यात्रियों के हाथों इस तरह दुर्गति होते मैंने देखी है। उनके अनुसार ऐसे कामों में दया-धर्म का लोप होता और समाज-धर्म के निरादर का पातक लगता है। तीर्थ स्थान की हवा दूषित होने और पानी के कीटाणु-युक्त होने के कारण बीमारियों के होने को रेखांकित करते हैं और 75 प्रतिशत रोग हमारी गन्दगी के कारण फैलते हैं।

ग्राम सेवकों के कर्तव्य में प्रत्यक्ष उदाहरण द्वारा सफाई का पदार्थ पाठ सिखाने की सलाह देते हैं स्वयं सेवकों से उन्होंने कहा कि यह मानना निराधार होगा कि हमारी दो दिन की सेवा से, लोग अपने आप सभी काम करने लगेंगे, शिक्षा के लिए व्याख्यान या पत्रिकाओं से काम नहीं चलता। वे स्वयं सेवकों की बात नहीं सुनते, अगर सुनते भी हैं तो काम करने का उत्साह नहीं रखते। पत्रिकाएँ बाँटने पर कभी पढ़ते नहीं। दरअसल सच्ची जिज्ञासा के आधार में जो पढ़ना जानता है वह दूसरों को पढ़ाता या पढ़कर नहीं सुनाता। इसलिए स्वयं सेवक धैर्य से उदाहरण पेश करेंगे।

मैला और कूड़ा-करकट के निस्तारण के समबन्ध में कहते हैं कि मैला किसानों के लिए सोना है। उन्होंने लिखा है कि चीनी लोग इस काम में चतुर हैं। वे मलमूत्र का सोने के समान संग्रह करते हैं। स्वयं सेवकों को, किसानों को यह बात समझानी चाहिए। इन्होंने कूड़े का वर्गीकरण दो तरह से किया है- एक का उपयोग खाद की तरह हो सकता है, दूसरे का गड्ढे भरने में। उन्होंने लिखा है कि स्वयं सेवकों के कुछ दिनों की मेहनत के बाद लोग इस काम की कीमत को परखेंगे, जब वे समझेंगे तो खुद भार उठा लेंगे और जब किसी पर बोझ भी नहीं मालूम पड़ेगा।

खुले में सब किसी के देखते हुए पाखाना फिरना या बच्चों को फिरने देना असभ्यता का चिह्न है। इस असभ्यता का भान हमें है क्योंकि जब कोई आता है तो हम सिर नीचे झुका लेते हैं। वे एक गाँव में किसी एक जगह पर कम खर्च में पाखाना बनवाने और इससे बने खाद को किसानों में बाँटने की सलाह देते हैं, जब तक यह नहीं हो जाता तब तक स्वयं सेवक, खेत में मैला को गाड़ा करेंगे। मैले को गहरा नहीं गाड़ा जाए, 9 इंच गहरे भाग में अनेक परोपकारी जन्तु रहते है, जो मैले को शुद्ध कर खाद बना देते हैं। सूर्य की किरणें भी राम के दूत की भाँति सेवा करती हैं। मैले को छिछला गाड़ते हुए उस पर इस प्रकार मिट्टी फैलानी चाहिए कि कुत्ते उसे न खोदें और बदबू भी न फैले। कुत्ते से बचने के लिए काँटों के झंखाड़ रखने की भी सलाह देते हैं। हरी पत्तियों का खाद और मैला पर जन्तुओं की क्रिया एक समान नहीं होती। इस काम के लिए पैसे का कोई खर्च नहीं होता, न तो सरकार की मदद चाहिए, न बहुत ज्यादा विज्ञान की ताकत चाहिए, हाँ स्नेहसिक्त स्वयं सेवक जरूर चाहिए।

गाँधी जी ने गाय, भैंस वगैरह के गोबर के भी उपयोग की चर्चा की है। गोबर का उपलों के रूप में प्रयोग को उन्होंने ताँत के लिए भैंस मारने के समान माना है। गोबर का उपलों के रूप में प्रयोग के लिए हम दलील ढूँढ़ लेते हैं, गोबर का पूरा उपयोग उपले से दस गुना अधिक हो सकता है। उन्होंने कहा है कि अगर हम इससे होने वाली अप्रत्यक्ष हानि का ही हिसाब लगाएँ तो इसकी कीमत आँकना मुश्किल होगा। दरअसल गोबर का पूरा-पूरा सदुपयोग खाद बनाने में ही है, बगैर खाद के खेत, बगैर घी के लड्डू दोनों एक जैसे शुष्क होती हैं। 17.11.1929 के नवजीवन में उन्होंने लिखा है कि गोबर जला कर रासायनिक खाद खरीदने वाले मूर्ख किसान भारत में नहीं हैं। किसान यह भी मानते हैं कि रासायनिक खाद की अपेक्षा गोबर के खाद की कीमत कम है। इससे अनाज के सत्व की हानि होती है, कुदरती खाद वाले खेतों में, पैदा होने वाली फसल पौष्टिकता और मिठास में बढ़कर होंगे। उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि सम्पूर्ण शोध के बाद वैसे ही रासायनिक खाद का महत्व आज की अपेक्षा कहीं कम सिद्ध हो सकता है। उन्होंने स्वयं सेवकों से साफ कहा है कि गोबर का खाद के रूप में प्रयोग के सम्बन्ध में जानकारी देना आपका कर्तव्य है। उपलों के सम्बन्ध में भ्रम को दूर किया जाना चाहिए। यह पूरा विषय “जितना रोचक है उतना ही लाभप्रद भी है और औद्योगिक शोधकर्ताओं के लिए तो इसमें ज्ञान का अटूट भण्डार पड़ा है।” इसके लिए “द्रव्यन अथवा भारी विद्वता की आवश्यकता नहीं है।” प्रेम की आवश्यकता है।

गाँधी स्वच्छता के साथ आरोग्य को जोड़ते हैं। उनका मानना है कि अधिकांश बीमारियाँ आरोग्य सम्बन्धी नियमों से अनभिज्ञता तथा उसकी अपेक्षा के परिणाम हैं। गाँधी के अनुसार आरोग्य का मतलब है तन्दुरुस्त शरीर में निर्विकार मन का विकास होना। उन्होंने आरोग्य के लिए कुछ नियम भी बतलाये हैं, कुदरती उपचार का भी वर्णन किया है।

गाँधी स्वच्छता के साथ आरोग्य को जोड़ते हैं। उनका मानना है कि अधिकांश बीमारियाँ आरोग्य सम्बन्धी नियमों से अनभिज्ञता तथा उसकी अपेक्षा के परिणाम हैं। गाँधी के अनुसार आरोग्य का मतलब है तन्दुरुस्त शरीर में निर्विकार मन का विकास होना। उन्होंने आरोग्य के लिए कुछ नियम भी बतलाये हैं, कुदरती उपचार का भी वर्णन किया है, वे गरीबी को भी बीमारी का कारण मानते हैं। उनके अनुसार हमारी गिरी हुई दर्दनाक तन्दुरुस्ती का कारण हमारी दरिद्रता है। अगर गरीबी दूर हो सके तो तन्दुरुस्ती अपने आप आ जाएगी।

गाँधीजी पानी के पुनर्प्रयोग की भी योजना देते हैं। उन्होंने लिखा है कि मवेशियों को घरों में बाँधने की प्रथा को रोकना चाहिए। ग्रामीण खुराक, पीने का पानी, रोगों की रोकथाम आदि योजना को भी, विस्तार से समझाते हैं। कुमारप्पा ने उस समय ही लिखा था कि हरिजनों की बस्ती गाँव से अलग न रखी जाए, इसकी खास खबरदारी रखी जाए।

गाँधीजी स्वयं सेवकों के लिए स्वराज की शिक्षा देना अनिवार्य मानते हैं। वे गाँवों को साफ व स्वावलम्बी बनाने की शिक्षा देने की बात कहते हैं। उन्होंने कहा है कि स्वराज में सरकार गाँवों को साफ नहीं कराएगी, बल्कि लोग उन्हें अपना समझकर खुद ही साफ करेंगे। उनके स्वराज में कम बीमारियाँ होगी, कोई दरिद्र नहीं होगा, परिश्रम करने वाले को काम मिलेगा।

वर्धा से 20 जुलाई 1936 में गंगाबहन को गाँधीजी ने लिखा कि दान में कोई बड़ी रकम दें तो भी सफाई के काम में तुम्हें बाहर का पैसा खर्च नहीं करना चाहिए। क्योंकि हम खर्च करें तो लोगों को सीखने को नहीं मिलता। हमें केवल श्रम करके सन्तोष करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक लोग स्वयं खर्च नहीं उठाते तब तक काम अधूरा भले पड़ा रह जाए। झाड़ने-बुहारने, पाखाना उठाने और उसे गाड़ने का सब काम हम ही करें। जब तक लोग अपने पैसे से पाखाने नहीं बनवाते और खुले में शौच करते हैं, तब तक उन्हें वैसा करने दें। उनके अनुसार लोगों को सभ्यता सिखायी जा सकती है किन्तु सभ्य रहने के साधन तो खुद उन्हीं को जुटाने चाहिए। उन्होंने आगे लिखा है कि सफाई का काम और आरोग्यावर्धक खुराक का प्रसार ही सच्चा चिकित्सा-शास्त्र है। हमें सुबह भंगी की तरह झाड़ू, फावड़ा, टोकरी आदि लेकर निकल पड़ना चाहिए।

उन्होंने अपेक्षा की है कि ज्यादातर कांग्रेसी गाँव के बाशिन्दे होने चाहिए, यही कारण था कि 29 जनवरी 1948 को रात को सवा नौ बजे जो उनके जीवन की अन्तिम रात थी, थकान से उनका सिर घूम रहा था, फिर भी वे, “लोकसेवक संघ” के रूप में कांग्रेस के नए विधान की ओर इशारा करते हुए बोले “मुझे तो इसे आज पूरा कर ही देना चाहिए” बापू ने इस अन्तिम वसीयत में लिखा था “देश का बँटवारा होते हुए भी राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा तैयार किए गए साधनों के जरिए हिन्दुस्तान को आजादी मिलने के कारण मौजूदा स्वरूप वाली कांग्रेस का काम अब खत्म हो चुका।” यानि उसकी उपयोगिता अब समाप्त हो चुकी है। गाँव की दृष्टि से सामाजिक, नैतिक व आर्थिक आजादी हासिल करना अभी बाकी है। सैनिक सत्ता पर नागरिक शक्ति को प्रधानता देने की लड़ाई अनिवार्य है, इसलिए वे कांग्रेस को भंग कर गाँव-गाँव में बिखेर देना चाहते थे।

गाँधी यह “अच्छी तरह समझते थे कि सच्ची लोकशाही केन्द्र में बैठे हुए दस-बीस आदमी नहीं चला सकते। यह तो नीचे से हर गाँव के लोगों के द्वारा चलाई जानी चाहिए।” “स्वराज से उनका अभिप्राय लोक सम्मति के अनुसार होने वाला भारत वर्ष का शासन है (यंग इण्डिया 29.1.1928)।” गाँधी जी का स्वराज वस्तुतः ग्राम राज्य या ग्राम स्वराज है जो अधिकाधिक स्वावलम्बी व स्वशासित होगा।

एक ओर गाँधी रचनात्मक कार्यक्रम नामक पुस्तक में गाँव की दुर्दशा का वर्णन करते हैं वहीं दूसरी ओर फ्रीडमैन के द्वारा यह कहे जाने पर कि भारतीय गाँव जरा भी आगे बढ़ते नहीं दिखाई देते, गाँधी जवाब देते हैं कि ऊपरी तौर पर ऐसा ही प्रतीत होता है लेकिन जब आप उनसे बात करेंगे तो देखेंगे कि उनकी जिह्वा से ज्ञान झर रहा हैं, उनके अन्दर गहरी आध्यात्मिक वृत्ति है। ….भारत के ग्रामीणों में तो युगों पुरानी संस्कारिता छिपी हुई पड़ी है। भारत की सभ्यता को वे ग्रामीण सभ्यता कहते है। वे कहते हैं कि ब्रिटेन के विनाशकारी पंजे में जाने के पूर्व यहाँ के सात लाख गाँव आत्मनिर्भर, शान्त और अपेक्षाकृत सुखी थे।

सी.के. नारायणस्वामी को एक पत्र में उन्होंने लिखा था कि दुनिया को अगर कोई मिटने से बचा सकता है तो केवल गाँव और ग्रामीण मानसिकता ही क्योंकि यहाँ अहिंसा का बीज मौजूद है।

सन्दर्भ सूचि :

1. Laray, George “Revolution : Violent or non-violent, Gandhi Marg (English), 15, 1 January, PP,6-25 p.7

2. Society cannot Charge in bits, there has to be a mars revolution a mass movement and massive change, Haryana Jay Prakash, “Gandhi and Social revolution” Gandhi marg 13.4 (4.1969) 814, (Jan.1970) PP.5-15  P-7

3. सम्पूर्ण गाँधी वाड्मय खण्ड 90 पृ.519

4. सम्पूर्ण गाँधी वाड्मय खण्ड 90 पृ.518

5. धावन गोपीनाथ, सर्वोदय तत्व दर्शन अहमदाबाद : नवजीवन मन्दिर 1963, द्वितीय पृ.210

6. Iar civil disobedience it means the constructive programmer Marauamshrimaned. The Selected works of mahatma. Ahmedabad : Navajivan press 1968 vol.IV P.336

7. Sitarammaiya, B.P., Gandhi and Gandhism, Allahabad Kitabistan 1952, Vol. I.P.170

8. कालेलकर काका, शान्ति सेना और विश्व शान्ति, वाराणसी : सर्वसेवा संघ, 1966, पृ.91

9. हरिजन, 25.8.1940 देखिए सिंह, डॉ. रामजी, गाँधी दर्शन मीमांसा

10. सम्पूर्ण गाँधी वाड्मय खण्ड 75 पृ.151 वर्ष 1982सेवा संघ 1971

11. शान्ति सेना क्या है? राजघाट वाराणसी : सर्व

सेवा संघ 1964 पृ.13

12. उपरिवत

13. भावे विनेबा, लोकनीति, राजघाट वाराणसी : सर्व सेवा संघ 1971 पृ.81

14. सम्पूर्ण गाँधी वाड्मय, खण्ड 47 वर्ष 1972 पृ.104

15. “Whether we are doing our work as Gandhi an, Constructive workers, or as other Social workers, we are all Voluntary Workers. But we are leaving to the politicians, to the State and to the Government the main ask that we go wrong” Gandhi marg, 13,4 october 814 (January 1970) P.8

16. चौधरी, चारु, विनोबा की पाकिस्तान यात्रा, राजघाट वाराणसी : सर्व सेवा संघ 1963, पृ.138

17.उपवरित पृ.138

18. देव शंकरराव, गाँधी और लोक स्वराज, राजघाट, वाराणसी : सर्व सेवा संघ, जनवरी 83 पृ.72

19. कालेलकर काका, शान्ति सेना और विश्व शान्ति, वाराणसी : सर्व सेवा संघ, 1966, पृ.87

20. आचार्य राममूर्ति, गाँव का विद्रोह वाराणसी, सर्व सेवा संघ, 1965 पृ.13

21.उपवरित पृ.23

22. उपवरित पृ.31

23. उपवरित पृ.169

24. कुमारप्पा, जीवन व्यरक्तित्व और विचार पृ.222

25. सम्पूर्ण गाँधी वाड्मय खण्ड 81 पृ.246

26. त्रिवेदी काशीनाथ अनुवादक, अहमदाबाद नवजीवन प्रकाशन मन्दिर तृतीय, 1959 पृ.27

27. रचनात्मक कार्यक्रम पृ.27(वाड्मय 75, पृ.169)

28. रचनात्मक कार्यक्रम पृ.27

29. रचनात्मक कार्यक्रम पृ.28

30. वाड्मय खण्ड 41 पृ.491

31. वा. 41 पृ.490, नवजीवन 22.09.1929

32. वा. 41 पृ.490

33. वा. 41/ पृ.490

34. वा. 91 पृ.493

35. वही पृ.493

36. वा. 92 पृ.181

37. (वा. 92 पृ.181)

38. वा. 92 पृ.181

39. नवजीवन 17.11.1929 वा.42 पृ.182

40. गाँधी जी, आरोग्य की कुंजी 1958 पृ.1

41. हरिजन सेवक 18.3.1939

42. वाड्मय वही 48

43. यंग इण्डिया 29.1.1928

44. 1 जनवरी 1939 के आसपास फ्रिडमैन से बात-चीत में (वा. खण्ड 68 पृ.293)

45. खण्ड 82 पृ.225

46. खण्ड 71 पृ.112

 

साभार : राजघाट समाधि पत्रिका मार्च 2015

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