मैला मुक्ति की जंग को अदालती मुहर

Friday, February 20, 2015 - 19:54

भाषा सिंह

 

सर्वोच्च न्यायालय में 11 साल कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद मैला ढोने वाली महिलाओं और पुरुषों को आखिरकार इस बात का सन्तोष मिला की अब उन्हें हर बार यह साबित करने के कष्ट से गुजरना नहीं पड़ेगा की उनका अस्तित्व है और वे मैला ढोने पर मजबूर किए जा रहे हैं।

मैला प्रथा के उन्मूलन के लिए देशभर में संघर्षरत संगठन सफाई कर्मचारी आन्दोलन तथा अन्य संगठनों के द्वारा वर्ष 2003 में दाखिल जनहित याचिका पर फैसला सुनते हुए सर्वोच्च अदालत ने माना कि गैर-कानूनी होने के बावजूद देशभर में यह कुप्रथा चल रही है और यह सरेआम संविधान कि धारा 17 का उल्लंघन है, जो छुआछूत के खात्मे कि बात करती है और किसी भी रूप में छुआछूत को चालू रखने को अपराध मानती हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश पी. सदाशिवम के नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय पीठ ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि मेनहोल-सीवर की सफाई करने के लिए आपातकालीन स्थितियों में उतरना या उतरने के लिए मजबूर करना अपराध है। इसके साथ ही अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि वह 1993 के बाद से सीवर सफाई के दौरान मरने वालों की शिनाख्त करें और उनके परिजनों को 10 लाख रूपए कि राशि मुहैया कराए। इस तरह से अदालत सीवर में उतरने वालों को मैला ढोने वाला माना और 1993 से देश में जारी हुए मैला ढोना रोकने वाले कानून को कट-ऑफ साल माना। अदालत के इस फैसले का दूरगामी असर पड़ेगा क्योंकि अभी तक सीवर में मरने वाले स्थायी या ठेके वाले सफाई मजदूरों के बचाव या मुआवजे के लिए कोई योजना नहीं है। ऐसी हर मौत के बाद या तो नगर निगम प्रशासन मामला रफा-दफा कर देता है या फिर कुछ हजार देकर अपनी आपराधिक जिम्मेदारी से बच जाता है। ऐसा करना अब सम्भव नहीं होगा। हालांकि सुरक्षा कवच की पूरी अवधारणा पर भी सफाई कर्मचारी समुदाय और उनके संगठनों को गहरी आपत्ति है। सफाई कर्मचारी आन्दोलन के नेता बेजवाड़ा विल्सन का कहना है, 'छुआछूत सुरक्षा उपकरणों से दूर नहीं हो सकती। हम सीवर में किसी मनुष्य के उतरने के खिलाफ हैं क्योंकि यह संविधान की धारा 21 का निषेध करता है जो नागरिकों को जीवन का अधिकार देता है। अदालत के फैसले का हम स्वागत करते हैं लेकिन उसे सुरक्षा कवच के बजाए सीवर प्रणाली को आधुनिक करने की बात करनी चाहिए थी। निश्चित तौर पर अदालत का यह फैसला हजारों सफाईकर्मी औरतों की जीत है।'

इस फैसले में अदालत का यह मानना बेहद महत्वपूर्ण है कि याचिका दाखिल करने वाले संगठन सफाई कर्मचारी आन्दोलन ने जो आँकड़ें जुटाए थे, उन्हें नकारने में ही केन्द्र और राज्य सरकारों ने अपनी मशीनरी को लगा दिया। अदालत ने सरकार कि मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा, 1993 के कानून को लागू करने और छुआछूत को खत्म करने की संवैधानिक अनिवार्यता को नकारने में ही सारी सरकारें लगी रही हैं, उधर, मैला ढोने की प्रथा बेरोकटोक चलती रही। पहली बार अदालत ने साफ-साफ कहा कि अगर इस कुप्रथा को खत्म करना है तो पुनर्वास के साथ-साथ

1. मैला ढोने वालों को सबसे बड़ी संख्या में रखने वाले रेलवे को समयबद्ध रणनीति बनाकर रेलवे पटरी पर मैला ढोने कि प्रथा खत्म करनी चाहिए।

2. मैला प्रथा से बाहर आने वालों को कानून के तहत मिलने वाली मदद में कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए, और

3. सफाई कर्मचारी महिलाओं को अपनी पसन्द की सम्मानजनक आजीविका मिलनी चाहिए।

अदालत के इस फैसले से एक तरफ जहाँ सफाई कर्मचारी समाज और विशेषकर मैले के नरक में धकेली गई महिलाओं को देर से ही सही, इन्साफ मिलने से राहत का अहसास है वहीं यह हुक भी है कि इतनी लम्बी लड़ाई के बाद लगातार झूठ बोलने वाली सरकारों और अधिकारियों पर कोई कार्यवाई नहीं कि गई। इसके बावजूद, चाहे वह आंध्र प्रदेश की नारायण अम्मा हों या हरियाणा की कौशल, लखनऊ की विमला और देहरादून की रानी और उनके जैसी सैंकड़ों मैले के नरक के खिलाफ अपनी उम्र का एक अच्छा हिस्सा खर्च करने वाली औरतें, सबको यह सन्तोष जरूर है कि आखिर उनकी सच्चाई को अदालत को मानने पर मजबूर होना पड़ा। अन्तरराष्ट्रीय कानूनविद् उषा रामनाथन की नजर में जिस तरह से अदालत ने मैला ढोने की प्रथा को छुआछूत से जोड़ा है और इसके जारी रहने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को दोषी माना है, उसका दूरगामी असर पड़ेगा।

साभार : हिन्दी आउटलुक जुलाई 2013

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