मैला ढोने से निजात मिली, बदली जिन्दगी

Friday, February 13, 2015 - 10:22

रतन जैसवानी

बिलासपुर 29 जनवरी 2015। मुंगेली शहर के आगे दाऊपारा के आगे जवाहर वार्ड, में 30-35 घरों की अलग सी बसाहट है। सुदर्शन समाज की इस बस्ती में तीन ऐसी महिलाएँ भी अपने परिवार के साथ रहती हैं, जिन्होंने बरसों-बरस तक सिर पर मैला ढोने का काम किया। बदबूदार माहौल में कटती आधी जिन्दगी में इनके लिए यह सब किस्मत का लिखा ही था। सरकार ने मैला ढोने के काम पर रोक लगाई, तब जाकर इनकी जिन्दगी में बदलाव आया। और अब शहर में साफ- सफाई करने का काम मिला।

एक जनवरी 2014 से अनुसूचित जाति वर्ग की इन महिलाओं को नगर पालिका में कलेक्टर दर पर सफाई कर्मी बनाया गया है। पिछले एक बरस में इन महिलाओं के काम-काज में बदलाव आया है। और अब वे परिवार के साथ ठीक तरह से गुजर बसर कर रही है।

मंगलीन कुर्रे उम्र 29 वर्ष, मिट्टी से बनी झोपड़ी, उसमें दो कमरे और परिवार में 6 लोगों का परिवार। बातचीत करते हुए मंगलोन बताती है कि नौकरी से पहले मैला उठाने का काम कर रही थी। 13 वर्ष की उम्र से अपनी माँ के साथ घर-घर जाकर ये काम करती थी। किसी के घर के सामने गन्दगी होती तो बुलाकर हमसे उठवाते थे। इसके एवज में कोई 1-2 रुपय़े दे देता था और बचा हुआ भोजन भी। 20 से अधिक घरों में भी निय़मित सफाई के लिए जाते थे, जिससे महीने में 20-30 रुपए घर मालिक दे देते थे।

कच्चे पाखाने बने हुए थे, अब तो सब कुछ पक्के फर्श पर आधुनिक तरीके के शौचालय बन गए हैं, सरकार की योजनाओं से भी इस दिशा में काम हो रहा है, इसलिए यह प्रथा बन्द हुई और अब जिन्दगी पहले से काफी कुछ बदल गई है। नगर निगम से ठेका पद्धति के अन्तर्गत कलेक्टर दर पर उन्हें सफाई कर्मचारी बनाया गया है। अब रोजाना अलसुबह उठकर शहर की सफाई करने में लग जाती हैं।

मैला ढोने पर कैसा महसूस होता था, इस सवाल पर मंगलीन कहती हैं कि 15 साल तक यह काम किया लेकिन किसी तरह की शर्म या झिझक महसूस नहीं होती क्योंकि यह तो रोजी-रोटी थी। बचपन से काम करने की वजह से आदी हो गए थे। कभी कोई झिड़क देता था, फिर थोड़ा बुरा लगता था, फिर सोचते थे कि हमारी तो यही जिन्दगी है।

परिवार में 6 लोग हैं, बड़ी बहन-जीजा, उनके बेटा-बेटी और माँ, यही तो हमारा परिवार है, शादी नहीं हुई है। पहले मैला उठाने जाते थे, तो रोजगार निश्चित नहीं था, अब नौकरी का वेतन मिलता है, तो एक अलग सी खुशी होती है। घर- परिवार के अन्य सदस्य भी काम करते हैं तो परिवार का गुजारा हो जाता है।

राजकुमारी रगड़े, 38 वर्ष, परित्यक्ता दो बेटे अविवाहित। ईंट-मिट्टी की की बनी झोपड़ी और ऊपर बांस से बनी लगी हुई है। इसी में इसी में तीन लोगों का यह परिवार रहता है। राजकुमारी अपने पुराने दिनों को याद करते हु बताती हैं कि 20 साल से मैला ढोने का काम करते थे। पति द्वारा छोड़ने के बाद रोजी-रोटी की समस्या थी, पर जीना तो जरूरी था। बच्चे 4-5 साल के थे, इस वजह से मैला ढोने का काम शुरू किया। माँ–बाप भी यही काम करते थे। काम तो कोई बुरा नहीं होता, पहले पेट पालने की मजबूरी में यह काम करते थे। काम का तरीका बदल गया है। काम का तरीका बदल गया है, हमारी दुनिया भी पहले से थोड़ी बदल गई है।

बेहद दुर्गन्ध के बीच जिन्दगी का आधा समय गुजरता था, तो लगता था कि यही जिन्दगी हमारे हिस्से में आई है पर ईश्वर की कृपा से माहौल बदला है। सरकार ने हमें इससे मुक्त कराया है और इज्जत की जिन्दगी बख्शी है।

रोज सुबह उठकर झाड़ू लगाने के लिए शहर निकल जाती हैं। सुबह 10 बजे तक काम करने के बाद फुर्सत हो जाती है, तो घर का कामकाज करती हैं। दोनों बेटे अब 20-21 बरस के हो गए हैं। अभी तक तो कोई काम नहीं कर रहे हैं।

बच्चों को पढ़ाया क्यों नहीं, इस सवाल पर राजकुमारी का कहना है कि पति के छोड़कर जाने के बाद मासूम बच्चों और खुद का पेट पालना ही कठिन था, तो पढ़ाते कैसे? खुद भी गरीबी की वजह से तीसरी चौथी तक ही पढ़ सकी , दस्तखत करना आ जाता है और थोड़ा पढ़ना भी।

चंद्रकली सोनवानी, 46 साल, एक बेटा, दो बेटी और उनके बच्चों का परिवार। चंद्रकली का घर ईंटों और मिट्टी से बनी एक पक्की झोपड़ी है। चंद्रकली बताती है कि 15 साल की उम्र से मैला ढोने का काम शुरू किया। अब पिछले साल ही नगरपालिका में ठेके के तहत हमें सफाई कर्मचारी बनाया गया। अभिभावक भी यही काम करते थे। इसलिए विरासत में यही सब मिला। पहले घरों की सफाई से 20-25 रुपये  प्रति घर मिल पाता था। मैला ढोने पर भी कुछ पैसे हासिल हो जाते थे। आज 5 हजार रुपये महीने मिलते हैं, तो गुजारा ठीक तरह से हो जाता है।

मैला ढोने के दौरान कभी किसी तरह से छुआछूत का सामना करना पड़ा? इस सवाल पर चंद्रकली कहती हैं कि ऐसा महसूस तो कभी नहीं हुआ। लोग घर पर बुलाने आते थे काम करने के लिए। लोगों के सहयोग से ही अपने बच्चों की शादी कर सकी। आज भी लोग हमें बुलाने आते हैं। पहले मैला ढोते थे अब झाड़ू लगाकर सफाई करते हैं।

ऋण नहीं रोजगार माँगा

स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना के अन्तर्गत सभी को ऋण देने की योजना सरकार ने बनाई थी, लेकिन इन तीनों महिलाओं ने इस योजना के तहत ऋण लेने से इंकार कर दिया था। इसकी वजह थी कि रोजगार नहीं होने के कारण कहाँ से अपना कर्ज चुकाते। इसलिए इन्होंने ऋण देने की बजाय रोजगार दिलाने की माँग की। इस पर कलेक्टर मुंगेली के आदेश पर इन्हें नगरपालिका में ठेके पर सफाई कर्मी रखा गया है।

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