लघु जल-स्रोतों पर ध्यान दिये बिना स्वच्छता अभियान अधूरा

Sunday, February 1, 2015 - 12:57

हरिशंकर शाही

 

स्वच्छता अभियान की चर्चा जोरों पर हैं। लोग अपने घरों और आस-पास के इलाकों की स्वच्छता के लिए बात भी कर रहे हैं लेकिन इस अभियान में एक मुख्य बात छूट रही है, वो है हमारे आस-पास के जल स्रोतों की स्वच्छता। हमारे आस-पास नदियों के अतिरिक्त लघु जल स्रोतों के रुप में बरसाती नदी, किसी जल-धारा से निर्मित छोटी नदी, तालाब, ताल, पोखरे, कुएं, जोहड़ इत्यादि तमाम ऐसे जल स्रोत हैं, जिनसे हमारा जुड़ाव पीढ़ियों से रहा है, लेकिन जाने-अनजाने हम उनकी उपेक्षा कर रहे हैं जिससे ये जल स्रोत या तो लुप्त हो चुके हैं या गन्दगी के पर्याय बन चुके हैं। स्वच्छ भारत अभियान को तब तक पूर्णता नहीं मिलेगी जब तक यह जल-स्रोत स्वच्छ नहीं होंगे।

 

तमाम सभ्यताओं के विकास में जलस्रोतों का महत्व सबसे प्रमुख रहा है और भारतीय समाज के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि यह पूर्ण रूप से जल आधारित सभ्यता है। जिसके प्रमाण भारत के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मान्यताओं में साफ तौर पर देखे जा सकते हैं। जल स्रोतों के संरक्षण और संवर्द्धन पर जब भी बात की जाती है, तो यह सारा विमर्श केवल कुछ बड़ी नदियों जैसे गंगा, यमुना और किसी बड़े मशहूर शहर के किनारे की नदी (जैसे लखनऊ की गोमती) पर ही आकर रूक जाता है। देश के तमाम जिलों, कस्बों और गाँवों में कई ऐसे लघु जल-स्रोत हैं, जो काफी हद तक उस स्थान की आत्मा से जुड़े हुए रहे हैं, लेकिन आज बदहाल और बहुत स्थानों पर लुप्त हो चुके हैं। इन पर बात शायद होती ही नहीं है और ये जल स्रोत किसी बड़े औद्योगिक विकास या किसी व्यावसायीकरण से ज्यादा अपने ही आस-पास के लोगों की उपेक्षा और अस्वच्छता के कारण बहुत ही तीव्रता से नष्ट हो रहे हैं।

 

जल स्रोतों की उपयोगिता

 

तालाब या ताल भारतीय ग्रामीण संस्कृति का एक अहम अंग रहे हैं। इन जल-स्रोतों से मझौली खेती-किसानी के लिए पानी लिया जाता था व साथ ही आस-पास के लोग अपने घरेलू जरुरतों के लिए पानी यहीं से लेते थे। पशु पालन के कार्य के लिए यह तालाब, ताल, पोखरे काफी जरुरी होते हैं। जहाँ काफी मात्रा में पानी की उपलब्धता से पशुओं को नहलाने और उनके लिए पानी की जरुरत पूरी हो जाती हैं। साथ ही मछली, सिंघाड़ा जैसे जल आधारित खाद्य उपजों और कपड़े धुलने जैसे व्यवसाय के लिए भी यह जल स्रोत काफी उपयोगी होते थे।

 

इन जल स्रोतों की रक्षा और स्वच्छता बनाए रखने के लिए कई सामाजिक व धार्मिक रीतियों को इनसे जोड़कर रखा गया था। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से निकला और देश में भर प्रसिद्ध छठ पूजा के उदाहरण को देखें तो इसमें जल स्रोतों से जुड़ाव साफ दिखेगा। ऐसी ही तमाम छोटी बड़ी परम्पराओं से जलस्रोत जुड़े रहे हैं।

 

आज इन जल स्रोतों का स्वरूप कैसा है? क्या ये ताल, तालाब, कुएँ और छोटी जल धाराएं उसी अवस्था में हैं, जिसमें हमारे बुजुर्गों ने हमें सौंपा था? ताल, तालाब, कुएँ, पोखरे और छोटी नदियों की जलधाराएं जिनसे ताल, तालाब, कुएँ, पोखरे और छोटी नदियों की जलधाराएं जिनसे तमाम सामाजिक सरोकार जुड़े थे, वो कहाँ हैं, क्या अपने गांव या कस्बों में हम ढूंढ सकते हैं?

 

मानव जीवन के लिए सबसे ज्यादा जरूरी तत्वों में शुमार है स्वच्छ जल। जल स्वच्छ हो और सहज सुलभ भी, इसके लिए जरूरी है कि हमारे पास-पड़ोस के जलस्रोत साफ रहें। इन दिनों इस मोर्चे पर स्थिति चिंताजनक है। कुएँ तो मानो लापता ही होते जा रहे हैं। छोटे तालाबों, बरसाती नदियों आदि की इस कदर उपेक्षा हो रही है मानो उनसे हमारा कोई वास्ता ही नहीं हो। अगर यही रवैया रहा तो, न सिर्फ जलीय जरूरतों को पूरा करने के लिए त्राहिमाम् मचेगा बल्कि अस्वच्छ जल सामान्य जन-जीवन के लिए हर कदम

 

उत्तर प्रदेश से सटे पर्वतीय राज्य उत्तराखंड और पर्वतीय राष्ट्र नेपाल की सीमा से सटे तथा कई प्राकृतिक संपदाओं से भरे जिले पीलीभीत के एक उदाहरण से इस बात को और आसानी से समझा जा सकता है। इस जिले के मुख्यालय पर स्थानीय मान्यताओं का एक धार्मिक स्थल है, जिसे ब्रह्मर्षि घाट कहते हैं। यहाँ नेपाल से आने वाली शारदा नदी और और उत्तराखण्ड की पहाड़ी से आने वाली छोटी नदी जल-धारा, जिसे स्थानीय लोग खाखरा या खकरा कहते हैं, उन दोनो का संगम होता है। भारतीय जन-मानस में नदियों के संगम का गहरा असर है, और इस कारण यहाँ एक छोटा सा तीर्थ भी बन गया है।

घाट पर मंदिर और खास तिथियों पर स्नान यहाँ की परंपरा में है लेकिन पूर्व में जब यह परंपराएं बनी होंगी तब चाहें जो रूप रहा हो, लेकिन आज यहाँ नदी इस स्वरूप में बची नहीं है कि यहाँ स्नान की परंपरा का पालन किया जाए। खखरा नदी में यहाँ स्थापित एक चीनी मिल के द्वारा प्रवाहित किए जा रहे कचरे के कारण, पूरी जल-धारा एक गंदी नाली सी बन गई है। साथ ही शहर भर की नालियां भी इसी जल-धारा में ब्रह्मर्षि घाट से पहले गिराई जाती हैं। शहर भर के मल-मूत्र के प्रवाह को ये संगम भी साफ करने में असमर्थ है।

साफ स्वच्छ जल-धारा गंदे बदबूदार काले पानी की नाली बन चुकी है, ऐसे में परम्पराएँ और मान्यताएँ चाहकर भी लोगों को यहाँ तक लाने में सफल नहीं हो रही हैं। यहाँ फूल बेचने का काम करने वाले करीब 55 वर्ष की आयु के राम प्रसाद सैनी का कहना है, हमने अपने लड़कपन के दिनों में इस नदी में खूब नहाया है, और क्या साफ पानी होता था कि बस इसका पानी सीधे पी लेते थे, लेकिन आज इस नदी के पास बैठना भी सजा बन चुका है, नदी पूरी तरह से काली हो चुकी है, और धारा भी कमजोर हो गई है।

एक खखरा या एक पीलीभीत की समस्या मात्रा उदाहरण भर है, जल स्रोतों पर संकट हर जगह मौजूद है। आखिर हम उन जल स्रोतों जिनके किनारे हमारी सभ्यताएं फली-फूलीं उनके ही प्रति हम कैसे इतने लापरवाह हो गए हैं। जल-स्रोतों के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी पर ये तमाम ऐसे प्रश्न हैं, जिन पर हम विचार नहीं कर रहे हैं, या करना नहीं चाहते हैं।

क्यों लुप्त और निष्प्रयोज्य हो रहे जल स्रोत

गोरखपुर जनपद के सरस्वती नगर इलाके के निवासी रतन पाल सिंह बताते हैं, “मेरी बेटी की शादी में मटकोरा की रस्म करने के लिए तालाब या कुएँ की मिट्टी की जरुरत थी, इस प्रथा में घर की औरतें गाते हुए तालाब तक जाती हैं, और वहाँ से मिट्टी खोदकर लाती हैं। जब इसके लिए तालाब का पता लगाया गया, तो पता चला कि आस-पास के तालाब तो पाट दिए गए हैं, और वहाँ घर बन चुके हैं। बेटी की शादी की रस्म के लिए करीब 5 किलोमीटर दूर जाकर एक तालाब मिला वहाँ ये रस्म की गई लेकिन जिस तालाब पर ये रस्म हुई वहाँ केवल नाले के पानी की बदबू और सड़न थी। हमें तो आज तक पता ही नहीं चला कि आस-पास के तालाब कब समाप्त हो गए”।

छोटे जल स्रोतों के इस विनाश में सबसे बड़ा योगदान रासायनिक व मानव जन्य प्रदूषण और बढ़ते शहरीकरण का है। इसके अतिरिक्त उत्तरोत्तर विकसित होते समाज में इन तालों, तालाबों, कुओं और अन्य जल स्रोतों पर निर्भरता कम होने से, लोग इनके प्रति लगाव खो रहे हैं। बढ़ते शहरीकरण में शहरों व कस्बों की नदियां केवल शहर और उनके उद्योगों के कचरा डालने के काम आ रही हैं। तालाबों की जमीन पर मकान बन रहे हैं, और लोगों को इससे कोई फर्क नहीं है कि तालाब पाट दिए जाएं। शहरों में बस रही बस्तियों के प्लान में तालाबों का उपयोग केवल अपनी कालोनी के गंदे पानी और अपशिष्ट को डालने भर का रह गया है। यही हाल छोटी नदियों की धारा के भी हैं, जहाँ पूरे शहर की नालियां आकर गिरती हैं, और अधिकतर शहरों में लगी छोटी बड़ी इकाइयों के प्रदूषकों को सहने के लिए अभिशप्त हैं।

जल-स्रोतों में नालियों का पानी डालना एक आसान व्यवस्था लगती है, लेकिन कभी-कभी ये स्थिति बहुत जटिल हो सकती है। उत्तर प्रदेश के बहराइच जनपद में घसियारीपुरा मोहल्ले की करीब 10 हज़ार की आबादी वहीं के तालाब में अपने घरों की नालियों का पानी डालती थी। प्रकारांतर में उस तालाब के भर दिए जाने के बाद आज हालत ये हैं कि वो पूरा इलाका और सैकड़ों घर अपने ही नालियों के पानी से डूबे हुए हैं। कोई वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण ये लोग नारकीय हालात में जीने के लिए विवश हैं।

जमीन की बेतहाशा माँग, धारा 143 और भू-माफिया वर्ग का अतिक्रमण

बेतहाशा बढ़ रहे शहरीकरण के कारण लोगों की आवासीय व बाज़ार की आवश्यकता के लिए शहरी जमीन की बढ़ती माँग ने अपने पाँव तेजी से पसारे हैं। छोटे शहरों में सरकारी नगर नियोजन का नितांत अभाव है और साथ ही नए बस रहे लोगों में इन जल-स्रोतों से पूर्व आत्मीय-सम्बन्धों के अभाव में इनकी उपयोगिता न के बराबर ही महसूस हो रही है। इसके अतिरिक्त शहरीकरण की जरुरत के बीच भू-माफिया का एक वर्ग ऐसा तैयार हो चुका है जो खास तौर पर तालाबों की जमीन पर ही नजर गड़ाए रहता है। इसके पीछे कारण यह है कि शहरों में तालाब की जमीन को अब बेकार ही माना जा रहा है।

शहरों के पास के गाँवों या उन राजस्व अभिलेखों में दर्ज जल स्रोतों के विनाश में, उत्तर प्रदेश राजस्व अधिनियम की धारा 143 काफी बड़ी भूमिका निभा रही है। लैंड यूज यानि भू-उपयोग को बदलने के लिए इस धारा का उपयोग करते हुए कहीं आवश्यकतानुसार, तो कहीं सांठ-गांठ करके जल-स्रोतों को सामान्य जमीन दिखा दिया जा रहा है। जिसके बाद इस जमीन की खरीद बिक्री करके कालोनी बस रही हैं।

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में शहर के पास एक छोटी नदी धारा कुर्ना की है, जो देवरिया शहर से होकर गुजरती है। इस नदी का जिक्र 1935 में लिखी गई किताब ‘देवरिया जनपद का इतिहास’ में है कि वैष्णव पंथ की प्रथम पौहारी इसी नदी के किनारे के जंगल में निवास करते थे, अर्थात इस नदी का प्रचीन इतिहास है, इस पुस्तक के अनुसार कुर्ना नदी कभी बड़ी रही होगी। परंतु आज इस नदी का अस्तित्व शून्य के बराबर हो चुका है, नदी में चीनी मिल और पेपर मिल के प्रदूषण से भरी गन्दगी के अतिरिक्त इसके खादर के इलाके में कालोनियां भी दिखने लगी हैं।

शहरों के पास के गाँवों या उन राजस्व अभिलेखों में दर्ज जल स्रोतों के विनाश में, उत्तर प्रदेश राजस्व अधिनियम की धारा 143 काफी बड़ी भूमिका निभा रही है। लैंड यूज़ यानि भू-उपयोग को बदलने के लिए इस धारा का उपयोग करते हुए कहीं आवश्यकतानुसार, तो कहीं सांठ-गांठ करके जल-स्रोतों को सामान्य जमीन दिखा दिया जा रहा है। जिसके बाद इस जमीन की खरीद बिक्री करके कालोनी बस रही हैं।

शहर के समाजसेवी और जनकार्यकर्ता शमीम इक़बाल का कहना है, “कुर्ना के किनारे स्थित जमीनों के लैंड यूज बदलावकर आज वहाँ जमीनें खरीदी बेची जा रही हैं, जबकि ऐसा करना अवैध है। नदी के किनारे सोमनाथ नगर नाम की पूरी कालोनी ही नदी की जमीन पर बसी हुई है, और इसे नगर पालिका के सांठ-गांठ ने मन्जूरी भी दे रखी हैं। जबकि फ्लड एरिया में नक्शे की मन्जूरी नहीं दी जाती है”।

जल स्रोतों की आवश्यकता

जल स्रोतों की पर्यावरण संतुलन में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। जल स्रोतों की सबसे बड़ी आवश्यकता वर्षा जल के संचयन के साथ पर्यावरण को सबलता प्रदान करने की है। इन जल स्रोतों में वर्षा का जल संचित होता है और वो भू-गर्भ जल के भंडार को बढ़ाता है। जिन इलाकों में जल स्रोत तेजी से घटे हैं, वहाँ उसी अनुपात में भू-गर्भ जल के स्तर में कमी आई है। शहरी इलाकों में जल स्रोतों के न होने और भू-गर्भ जल के सतत दोहन से आने वाले भविष्य में जल-संकट भी गहरा सकता है।

इन लघु जल-स्रोतों के संरक्षण में सबसे बड़ी समस्या यही है कि इनके वास्तविक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। सिंचाई और कृषि से जुड़े विभागों में इनके बारे में थोड़े आंकड़े मिल जाते हैं। अब चूंकि इनका उपयोग किसी भी तरह की सिंचाई वगैरह में होता नहीं होता है, इस कारण विभाग भी प्रायः इनसे उदासीन ही रहते हैं। उत्तर प्रदेश की नगर पालिकाओं से प्राप्त अपुष्ट जानकारियों के आधार पर करीब 2500 से अधिक कुएँ पूरे प्रदेश की नगर पालिकाओं और टाउन एरिया के रिकार्ड में दर्ज हैं, लेकिन इनमें से कितने जीवित हैं, इस बारे में कोई भी जानकारी नहीं है।

जल स्रोतों के लिए सरकारी प्रयास

जल स्रोतों की गुणवत्ता और इसमें प्रदूषण व इसके संरक्षण के लिए सरकार की ओर विशेष प्रयासों की बहुत आवश्यकता है। 26 नंवबर 2014 को लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मन्त्री (स्वतन्त्र प्रभार) प्रकाश जावड़ेकर ने यह जानकारी दी थी कि केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा राष्ट्रीय जल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (एनडब्ल्यूएमपी) के अन्तर्गत देश में जलीय संसाधनों की जल गुणवत्ता की निगरानी की जा रही है। इस निगरानी नेटवर्क में 445 नदियाँ, 154 झीलें, 12 कुण्ड, 78 तालाब, 41 संकरी खाड़ियाँ/समुद्र जल, 25 नहरें, 45 नाले, 10 जल शोधन संयंत्र (अशोधित जल) और 805 कुएँ शामिल हैं।

 

प्रदूषण नियंत्रण हेतु आवंटित राशि (करोड़ रुपये में)

 

      स्वीकृत/व्ययित राशि

क्रं.सं.

स्कीम का नाम

2011-12

2012-13

2013-14

1.

एनआरसीपी/एनजी आरबीए

187.46

270.60

442.61

2.

एनएलसीपी/एनपीसीए

79.90

52.30

48.26

3.

सीईटीपी

2.70

4.20

5.45

 

 

जैविक प्रदूषण अभी भी जलीय संसाधनों का सबसे बड़ा प्रदूषक है। जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग (बीओडी) और कॉलीफार्म की जीवाण्विक गणना की दृष्टि से मापे गए जैविक प्रदूषण से देश के विभिन्न भागों में नदियों की जल गुणवत्ता के अवक्रमण की सीमा का पता चलता है। मन्त्री ने यह भी बताया कि 3 मिलिग्राम प्रति लीटर (एमजी/एल) के बीओडी मानक की तुलना में लगभग 63 प्रतिशत प्रेक्षणों में बीओडी 3 एमजी/एल से कम, 19 प्रतिशत में 3.6 एमजी/एल के बीच और 18 प्रतिशत में 6 एमजी/एल से अधिक है। इसी प्रकार, कुल कॉलीफार्म और फीकल कॉलीफार्म, जिनसे जल में रोगजनक तत्वों की उपस्थिति का पता चलता है, भी चिन्ता के प्रमुख कारण हैं। लगभग 50 प्रतिशत नमूनों में कुल कॉलीफार्म और 65 नमूनों में फीकल कॉलीफार्म 500 सर्वाधिक सम्भावित संख्या (एमपीएन) 100 एमएम के मानक से कम है।

जल गुणवत्ता के आँकड़ों के दीर्घावधिक मूल्यांकन के आधार पर केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड ने देश में राष्ट्रीय जल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम के अन्तर्गत 150 प्रदूषित नदी क्षेत्रों की पहचान की है। जल गुणवत्ता की बहाली के लिए केन्द्रीय और राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्डों द्वारा जल (प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण) अधिनियम, 1974 का कार्यान्वयन किया जा रहा है।

प्रदूषण को रोकने और इसके नियन्त्रण के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। जिसमें जल (प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण) अधिनियम, 1974 के उपबन्ध के अन्तर्गत औद्योगिक प्रदूषण का नियन्त्रण, विभिन्न प्रतिबद्धताओं सम्बन्धी बैंक गारंटी सहित पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी कॉरपोरेट दायित्व (सीआरपीई) के अन्तर्गत पारस्परिक रूप से सहमत समय लक्षित कार्यक्रम का कार्यान्वयन शामिल है। साथ ही औद्योगिक क्षेत्र के प्रदूषण से निपटने के लिए 17 श्रेणी के उद्योगों में विशेष अभियान और लघु स्तरीय औद्योगिक इकाइयों के समूहों हेतु साझा बहिस्राव शोधन संयंत्रों की स्थापना।

शहरी नालों और कचरों के प्रबन्धन के लिए शोधन सुविधाओं रहित जलीय संसाधनों में जल प्रभावित करने वाले शहरी केन्द्रों का अभिनिर्धारण और समुचित कार्रवाई करने हेतु सम्बन्धित प्राधिकरणों की सिफारिश की गई है। अवरोधन, अपवर्तन और शोधन सुविधाओं के विकास हेतु विभिन्न नदी कार्य योजनाओं के अन्तर्गत शहरी केन्द्रों का  अभिनिर्धारण किया जा रहा है।

जल स्रोतों के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों के लिए पर्यावरण ऑडिटिंग और परिस्थितिकीय दृष्टि से नदियों में प्रवाह को तेज करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं और सम्बन्धित मंत्रालयों/विभागों को नदियों में पर्याप्त प्रवाह की व्यवस्था करने के लिए प्रेरित किया गया है। ताकि अनेक लाभप्रद उपयोगों हेतु अपेक्षित जल गुणवत्ता सहित नदियों को पारिस्थतिकीय संतुलन की प्राप्ति हो सके। जल स्रोतों के कम होने से घटे हुए जल स्तर को बढ़ाने और तत्पश्चात उप-तलीय जल की गुणवत्ता में सुधार के लिए देश की विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन की पद्धतियों का संवर्द्धन के भी उपाय सरकार अपना रही है।

 

जल प्रदूषण को नियन्त्रण करने हेतु केन्द्र सरकार के कार्यक्रम

1. राष्ट्रीय नदी संरक्षण कार्यक्रम (एनआरसीपी)

2. राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (एनजीआरबीए)

3. राष्ट्रीय झील संरक्षण योजना (एनएलसीपी)

4. राष्ट्रीय जलीय पारि-प्रणाली संरक्षण योजना (एनपीसीए)

5. साझा बहिःस्राव शोधन संयंत्र (सीईटीपी)

 

जनभागीदारी

 

सरकारी व्यवस्थाएँ तो आवश्यक कदम उठाएंगी ही, लेकिन इन जल स्रोतों को बचाने और इनको पुनः स्वरूप देने के लिए सामाजिक भागीदारी सबसे अधिक आवश्यक है। अपने शहर, कस्बों और गाँवों में मौजूद इन जल स्रोतों को बचाने के लिए सबसे पहले इनमें नाले और गन्दगी को जाने से रोकने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही सरकारी तन्त्र पर सामूहिक दबाव से प्रयास करने की जरुरत है। उसके बाद सामुदायिक भागीदारी के तहत इन जल-स्रोतों का सौंदर्यीकरण करते हुए, इस स्थान को अपने सामाजिक कार्यक्रमों में अधिक से अधिक शामिल करना चाहिए। इस मामले में बंगाल के गाँवों में सामुदायिक भागीदारी से बने तालाबों से उदाहरण लिया जा सकता है। जहाँ तालाब को ग्रामीण समाज की जिम्मेदारी पर डाला गया है। जब तक स्वच्छता अभियान में इन जल स्रोतों को शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक स्वच्छता की बात ही बेमानी रहेगी।

 

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। जल, जंगल और जमीन से सम्बन्धित विषयों, खासकर, जल संसाधनों के विषय पर नियमित लिखते हैं। देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन। ईमेलः harishankar.shahi@gmail.com

साभार : योजना जनवरी 2015

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