स्वच्छ भारत से ही साकार होगा स्वस्थ भारत

Saturday, January 10, 2015 - 16:29

आशुतोष कुमार सिंह

 

किसी भी राष्ट्र के विकास को मापने का उत्तम मानक वहां का स्वस्थ समाज होता है। नागरिकों की स्वास्थ्य का सीधा असर उनकी कार्य-शक्ति पर पड़ता है। नागरिक कार्य-शक्ति का सीधा संबंध राष्ट्रीय उत्पादन-शक्ति से है। जिस देश की उत्पादन शक्ति मजबूत है वह वैश्विक स्तर पर विकास के नए-नए मानक गढ़ने में सफल होता रहा है। इस संदर्भ में स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी राष्ट्र के विकास में वहां के  नागरिक-स्वास्थ्य का बेहतर होना बहुत ही जरूरी है। शायद यही कारण है कि अमेरिका जैसे वैभवशाली राष्ट्र की राजनीतिक हलचल में स्वास्थ्य का मसला अपना अहम स्थान पाता है। दरअसल किसी भी राष्ट्र के लिए अपने नागरिकों की स्वास्थ्य की रक्षा करना पहला धर्म होता है।

स्वास्थ्यः एक चुनौती

जब से मानव की उत्पत्ति हुई है तभी से खुद को स्वस्थ रखने की जिम्मेदारी उस पर रही है। बदलते समय के साथ-साथ स्वास्थ्य की चुनौतियां भी बदलती रही हैं। वर्तमान में किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती है राष्ट्र के जनसंख्या के अनुपात में  स्वास्थ्य सुविधाओं को मुहैया कराना। इस समस्या से हम भारतीय भी अछूते नहीं है।

यदि हम भारत की बात करें तो 2011 की जनगणना के हिसाब से मार्च, 2011 तक भारत की जनसंख्या का आंकड़ा एक अरब 21 करोड़ पहुंच चुका था व निरंतर इसमें बढ़ोत्तरी हो रही है। हालांकि जनसंख्या की स्वच्छता और स्वास्थ्य कि औसत वार्षिक घातीय वृद्धि दर तेजी से गिर रही है। यह 1981-91 में 2.14 फीसद, 1991-2001 में 1.97 फीसद था वहीं 2001-11 में यह 1.64 फीसद है। बावजूद इसके जनसंख्या का यह दबाव भारत सरकार के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्थित व्यवस्था करने में बड़ी मुश्किलों को पैदा कर रहा है।

स्वास्थ्य और स्वच्छता में संबंध

ठीक से देखें तो कई ऐसी बीमारियां हैं जिनका प्रत्यक्ष संबंध साफ-सफाई की आदतों से है। मलेरिया, डेंगू, डायरिया और टीबी जैसी बीमारियां इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। समाचारों के अनुसार अकेले देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में पिछले छह वर्षों में टीबी से 46,606 लोगों की जाने गयी हैं। अर्थात् देश की आर्थिक राजधानी में केवल टीबी से प्रत्येक दिन 18 लोग अपना दम तोड़ रहे हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर, यूपी के गोरखपुर क्षेत्र व पश्चिम बंगाल के उत्तरी क्षेत्रों में जापानी बुखार से लगातार बच्चों की मौत हो रही है। जुलाई-2014 के दूसरे सप्ताह में त्रिपुरा में मलेरिया से मरने वालों की संख्या 70 से ज्यादा हो गयी थी और 30 हजार से ज्यादा लोग मलेरिया की चपेट में थे। ये सभी बीमारियां ऐसी हैं जिनसे बचाव स्वच्छता में अंतर्निहित है।

 

यह सर्वविदित है कि साफ-सफाई मानव स्वास्थ्य पर सीध असर डालती है। जिन बीमारियों के मामले ज्यादातर सामने आते हैं और जिनसे ज्यादा मौतें होती हैं, अगर उनके आंकड़ों पर गौर करें तो कहा जा सकता है कि शरीर की तथा परिवेश की वह अचूक मांग है जिसके माध्यम से न सिर्फ स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है बल्कि बीमारियों से लड़ने पर देश भर में हो रहा अरबों का सालाना खर्च बचाया जा सकता है। स्वस्थ शरीर में निवसित स्वस्थ मस्तिष्क की उत्पादकता बढ़ने से देश की उत्पादकता जो बढ़ेगी, सो अलग ही है।

इतना ही नहीं शरीर के स्वस्थ रहने के लिए हर स्तर पर स्वच्छता आवश्यक है और इस तथ्य को हमारे महापुरुषों ने भी लगातार स्वीकारा है। जिन महात्मा गांधी के जन्म दिवस पर स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया गया वही महात्मा स्वास्थ्य का नियम बताते हुए कहते हैं, “मनुष्य जाति के लिए साधारणतः स्वास्थ्य का पहला नियम यह है कि मन चंगा तो शरीर भी चंगा है। निरोग शरीर में निर्विकार मन का वास होता है, यह एक स्वयं सिद्ध सत्य है। मन और शरीर के बीच अटूट सम्बन्ध है। अगर हमारे मन निर्विकार यानी निरोग हों, तो वे हर तरह से हिंसा से मुक्त हो जाए, फिर हमारे हाथों तंदुरूस्ती के नियमों का सहज भाव से पालन होने लगे और किसी तरह की खास कोशिश के बिना ही हमारे शरीर तन्दुरुस्त रहने लगे।” (व्यास, 1963, पृ. 181)

स्वच्छता और स्वास्थ्य के सम्बन्धों को रेखांकित करते हुए गांधी ने निरोग रहने के लिए ग्राम स्वराज में कुछ नियम सुझाएं हैं, जो निम्नवत हैः-

क. हमेशा शुद्ध विचार कीजिए और तमाम गंदे

और निकम्मे विचारों को मन से निकाल दीजिए।

ख. दिन-रात ताजी-से-ताजी हवा का सेवन करें।

ग. शरीर और मन के काम का तौल बनाए रखें, यानी दोनों को बेमेल न होने दें।

घ. आप जो पानी पिएं, जो खाना खाएं और जिस हवा में सांस लें, वे सब बिल्कुल साफ होने चाहिए। आप सिर्फ अपनी निज की सफाई से सन्तोष न मानें, बल्कि हवा,पानी और खुराक की जितनी सफाई आप अपने लिए रखें, उतनी ही सफाई का शौक आप अपने आस-पास के वातावरण में भी फैलाएं। (व्यास, 1963, पृ. 182)

गांधी स्वास्थ्य को न केवल भौतिक स्वच्छता से जोड़ते हैं बल्कि वह आंतरिक स्वच्छता के पहलू को भी यहां रेखांकित करते हैं। उनका यह विचार निम्न पंक्तियों में प्रतिबिम्बित होता है। “मेरी राय में जिस जगह शरीर-सफाई, घर-सफाई और ग्राम-सफाई हो तथा युक्ताहार और योग्य व्यायाम हो, वहां कम से कम बीमारी होती है और अगर चित्तशुद्धि भी हो तब तो कहा जा सकता है कि बीमारी असंभव हो जाती है। राम नाम के बिना चित्तशुद्धि नहीं हो सकती। अगर ग्रामवासी इतनी बात समझ जाए, तो उन्हें वैद्य, हकीम या डॉक्टर की जरूरत न रह जाए।” (व्यास, 1963, पृ. 183)

भारत में स्वास्थ्यः वर्तमान स्थिति

भारतीयों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वो अपने जोश, जुनून व मेहनत के बल विपरीत से विपरीत परिस्थिति से भी खुद को उबार लेते हैं। यह स्थिति स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी देखने को मिली है। तमाम समस्याओं के बावजूद पिछले दशकों में सरकारी-गैरसरकारी स्वास्थ्य चेतना के कारण भारत में जीवित रहने की आयु बढ़ी है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट में उद्धृत किया गया है कि 1970-75 के दौरान जन्म के समय भारत के लोगों की जीने की औसत आयु 49.7 वर्ष थी वह 2002-06 में बढ़कर 63.5 वर्ष हो गयी है।

इस दौरान मृत्यु दर में लगातार गिरावट दर्ज की गयी। केरल में यह दर अच्छी सामाजिक-आर्थिक स्थिति होने के कारण 74 वर्ष है तो दूसरी तरफ बिहार, असम, मध्यप्रदेश व उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में यह दर 58 से 61 वर्ष है। वहीं डब्ल्यूएचओ भारतः स्वास्थ्य प्रोफाइल 2012 में बताता है कि भारत में जन्म जीवन प्रत्याशा 66 वर्ष है, जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया में यह 67वर्ष और वैश्विक जन्म जीवन प्रत्याशा 70 वर्ष है।

 

आरेख 1: स्वास्थ्य कार्यबल की क्षेत्रीय स्थिति

 

*द.पू. एशिया      स्रोतः www.who.int/gho/countries/ind.pdf

इसका मतलब यह हुआ कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार तो हो रहा है। 2013 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2011 तक देश में एक लाख 76 हजार 820 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (ब्लॉक स्तर), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उप-केंद्र स्थापित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त देश में 11 हजार 493 सरकारी अस्पताल हैं और 27 हजार 339 आयुष केंद्र। देश में (आधुनिक प्रणाली के) 9 लाख 22 हजार 177 डॉक्टर हैं। नर्सों की संख्या 18 लाख 94 हजार 968 बताई गई है। डब्ल्यूएचओ द्वारा जारी आंकड़ें (देखें आरेख 1) बताते हैं कि भारत में 10,000 जनसंख्या पर औसतन 7 फीजिशियन है, वहीं दक्षिण-पूर्व एशिया में यह प्रतिशत 5.9 है। नर्सों के मामले में भी दक्षिण-पूर्व एशिया के बाकी देशों से भारत की स्थिति ठीक है। भारत में जहां प्रति 10,000 जनसंख्या पर औसतन 17.1 नर्स हैं वहीं दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में यह औसत 15.3 फीसद है। इन सबके बावजूद ऐसा नहीं है कि देश का स्वास्थ्य में सुधर संतोषजनक हो गया है। ऊपर वर्णित मलेरिया, टीबी और जापानी बुखार के दृष्टांत ही इन तथ्यों पर विरोधभास उत्पन्न करते हैं।

 

रोगों से मृत्यु

असंक्रामक बीमारी जैसे कैंसर, डायबिटिज, कार्डियोवैस्कुलर बीमारियां व क्रोनिक ऑबस्ट्रक्टिव पलमोनरी बीमारियां बदलते जीवन शैली के कारण बढ़ रही हैं, वहीं संक्रामक बीमारियां सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ी समस्या बनी हुई हैं। बहुत सी संक्रामक बीमारियां जैसे कुष्ठ, क्षय रोग, वेक्टरजनित बीमारियां जैसे मलेरिया, काला-अ-जार, डेंगू, चिकनगुनिया, फलेरिया, जापानी इनसे फ्लाइटिस, जलजनित बीमारियां (कलरा, डायरिया, वायरल हेपेटाइटिस ए और ई, टाइफाइड बुखार), जेनेटिक बीमारियां (रैबिज, प्लेग, लेप्टोस्पीरोसिस, एंथ्रेक्स, ब्रूसीलोसिस, सलमोनेलोसिज़ आदि), टीका से बचाव वाली बीमारियां (खसरा, डिप्थीरिया, टिटनेस, काली खांसी, पोलियो, वायरल हैपेटाइटिस बी आदि) के साथ-साथ समय-समय पर नए-नए रोगों से देश को जूझना पड़ता है। इन बीमारियों में अधिकांश, खासकर जलजनित और संक्रामक बीमारियां, ऐसी हैं जिनके फैलने का संबंध प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से स्वच्छता से है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 9 दिसंबर, 2011, देखें आरेख 2) के अनुसार संक्रामक बीमारियों, मातृ जन्म संबंधी, प्रसवपूर्व और पोषण संबंधी बीमारियों के कारण 38 फीसदी मौतें होती हैं। वहीं गैरसंचारी बीमारियों के कारण 42 फीसद मौतें हो रही हैं।

 


आरेख 2: रोग और मौत

 

स्रोतः वार्षिक रिपोर्ट, स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार (2011)

वहीं दूसरी तरफ डब्ल्यूएचओ द्वारा जारी भारत हेल्थ प्रोफाइल (देखें आरेख 3) में बताया गया है कि दक्षिण पूर्व एशिया में जहां संक्रामक रोगों से 40 प्रतिशत मौत 2012 में हुईं है, वहीं भारत में भी संक्रामक रोगों से मरने वालों की तादाद 41 फीसद रही है। असंक्रामक अथवा गैरसंचारी रोगों से दक्षिण पूर्व एशिया में 46 प्रतिशत लोगों की जाने गईं वहीं भारत में 44 फीसद लोग मरे। चोट लगने के कारण दक्षिण पूर्व एशिया में जहां 14 फीसद लोगों ने अपनी जान गंवाई वहीं भारत में इसकी संख्या 15 फीसद रही है।

महिला स्वास्थ्य और स्वच्छता

यह सर्वविदित है कि स्त्री-पुरुष की शारीरिक बनावट के कारण भी कुछ रोग महिलाओं को जल्द ग्रसित करते हैं तो कुछ पुरुषों को। इसलिए महिलाओं से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं पर अलग से चर्चा लाजिमी है। लखनऊ में महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए काम कर रही ऋचा सिंह ने महिलाओं की समस्याओं को बहुत नजदीक से देखा है। वह कहती हैं कि स्वच्छता का नाता महिलाओं की पूरी जीवन-चर्या से है। चाहे यूटीआई इन्फेक्शन की बात हो ल्यूकोरिया की सबका नाता स्वच्छता से ही है। अनहाइजेनिक डाइट व पोशाक के कारण भी महिलाओं को कई तरह की बीमारियां होती हैं। उनका तो यहां तक मानना है कि महिलाओं में बढ़ रहे ट्यूबरोक्लोसिस के मामले का भी संबंध स्वच्छता से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ता है। कंवेंट स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों को शारीरिक बदलाव के बारे में दिशा-निर्देशित किया जाता है, उन्हें मासिक-धर्म से संबंधित जानकारी दी जाती है लेकिन देश के बाकी स्कूलों में शायद ऐसी व्यवस्था नहीं है। ग्रामीण इलाकों में प्रसव के बाद महिलाओं को जिन अस्वच्छ परिस्थितियों में रखा जाता है उससे कई बार जच्चा-बच्चा की जान भी चली जाती है। घर-घर शौचालय की हिमायत कर वह कहती हैं कि सामाजिक सुरक्षा की दृष्टिकोण से व स्वास्थ्य के लिहाज से महिलाओं के लिए शौचालय का होना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार महिलाओं को शौच जाने के लिए अंधेरा होने का इंतजार करना पड़ता है, जिससे उनके पेट में कई तरह की बीमारियां होती हैं।

 

आरेख 3: वर्ष 2013 में विभिन्न बीमारियों से मौत

 

 

भारत,  क्षेत्रीय औसत, स्रोतः इंडियाः हेल्थ प्रोफाइल, डब्ल्यूएचओ, 2015

*द.पू. एशिया

आयुर्वेदाचार्य एसएस विश्वामित्र के अनुसार यदि आपका शरीर गंदा है तो चर्म रोग यानी त्वचा रोग, योनि रोग, मानसिक विकृति, गुप्तांग रोग आदि उत्पन्न होने लगते हैं। इसी तरह यदि घर-कमरा गंदे हैं तो विषैले दांतों-डंकों वाले जीवाणु उत्पन्न हो जाते हैं, जैसे - मक्खी, मच्छर, चिंटी, चींटे आदि। इनकी अधिकता बढ़ते ही डेंगू ज्वर, मलेरिया, उदर संबंधी विकार जैसे उल्टी, दस्त, हैजा आदि रोग पैदा होने लगते हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अस्वच्छता से उत्पन्न होने वाले ये रोग पुरुषों की बजाए महिलाओं को अपनी गिरफ्त में जल्द लेते हैं। हमारे देश की सामाजिक परिस्थितियां ऐसी है कि महिलाओं को अमानसिक वातावरण में अपने जीवन का अधिकांश समय व्यतीत करना पड़ता है। नारी की शारीरिक बनावट जिस तरह की है, उसमें उसके लिए साफ-सफाई से रहना और भी जरूरी हो जाता है। महिलाएं विशेषकर मूत्र संक्रमण की विकृति का शिकार होती हैं। कुछ तो इसे समझ नहीं पाती और जो समझ भी पाती हैं वो लोक-लाज में इसे व्यक्त करने की स्थिति में नहीं रहती हैं। कई बार ऐसा देखने को मिला है कि अस्वच्छता के कारण महिलाओं के हार्माेन्स असंतुलित हो जाते हैं, जिसके कारण कई और बीमारियों के उत्पन्न होने की आशंका बढ़ जाती है। उपरोक्त जीवाणुओं की संक्रमण गति बहुत ही तीव्र होती है और ये महिलाओं के शरीर में बहुत तेजी से फैलते-बढ़ते हैं। रजोवृति के बाद प्रौढ़ावस्था में पहुंच चुकी महिलाओं में भी मूत्र संबंधी विकृति पायी जाती है। इतना ही नहीं इस रोग के फैलने पर मूत्र मार्ग पर नियंत्रण शिथिल हो जाता है और न चाहते हुए भी कई बार मूत्र स्वतः स्रावित हो जाते हैं, साथ ही इस रोग के बढ़ने से गुर्दे खराब होने की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है।

अस्वच्छताजनित प्रमुख बीमारियां

अस्वच्छता को तो बीमारियों का जनक कहा जाता है। पिछले कुछ दशकों में भारत में अस्वच्छताजनित बीमारियों में डेंगू, मलेरिया और टीबी ने बहुत नुक्सान किया है। भारत में इन बीमारियों की वर्तमान स्थिति का वर्णन नीचे किया जा रहा हैः-

मलेरिया

इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार वेक्टरजनित बीमारियों में मलेरिया अपनी भयावहता की कसौटी पर प्रथम स्थान पर है। वर्ष 1953 में राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम (एनएमसीपी) के शुरू होने से पहले मलेरिया से लगभग 75 लाख लोग प्रभावित थे और यह बीमारी 8 लाख मौतों का कारण थी। राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम 1965 आते-आते सफलता के सोपान छू रहा था, मलेरिया से मरने वालों की संख्या शून्य पर जा पहुंची थी लेकिन 1976 में मलेरिया ने फिर से अपना सिर उठाया और इसकी चपेट में 64 लाख लोग आ गए और बड़ी संख्या में मौत हुई। इसके बाद राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम (एनएमईपी) की शुरूआत की गयी। फिर नेशनल एंटी मलेरिया कार्यक्रम (एनएएमपी) चलाया गया। फिलहाल राष्ट्रीय वेक्टरजनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनवीबीडीसीपी) चलाया जा रहा है। 2007-11 के दौरान मलेरिया के मामले 13-16 लाख के बीच रहे हैं।

डेंगू

विश्व स्वास्थ्य संगठन के 16 जनवरी, 2013 के वक्तव्य में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर डेंगू पिछले 50 वर्षों में 30 गुणा तेजी से बढ़ा है। भारत भी इसकी चपेट में तेजी से आ रहा है। इसका उदाहरण है कि 2012 में पूरे देश में 47,029 डेंगू से प्रभावित मरीज पाए गए जबकि 242 डेंगू प्रभावित मरीजों की मौत हो गयी। दिल्ली और मुंबई हर साल डेंगू के मामले बड़ी संख्या सामने आते हैं और इन शहरों में तो अस्पताल तथा सरकारी विभाग बकायदा नियमित तौर पर डेंगू के मामलों की बुलेटिन भी जारी करते रहते हैं।

टीबी

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार-2012 में वैश्विक स्तर पर टीबी के 86 लाख नए मामले दर्ज किए गए और 13 लाख लोगों की टीबी से मौतें हुईं। टीबी से होने वाली मौतों में से 95 प्रतिशत से अधिक मौतें निम्न और मध्यम आय वाले देशों में होती हैं। कहने की जरूरत नहीं कि निम्न आय वर्ग के लोगों के बीच स्वच्छता की स्थिति दयनीय ही रहती है। यह रिपोर्ट बताती है कि 15-44 आयु वर्ग के महिलाओं की मौत के शीर्ष तीन कारणों में से एक टीबी भी है। इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में लगभग 20-23 लाख लोग प्रत्येक साल टीबी से ग्रसित होते हैं जो कि वैश्विक टीबी मरीजों का 26 फीसद है। इस रोग से भारत में तकरीबन तीन लाख लोग प्रत्येक साल काल के गाल में समा रहे हैं।

जल स्वच्छता

अब तक हमने देखा कि स्वास्थ्य के लिए जल व जलस्रोतों की स्वच्छता एक आवश्यक पहलू है। इस दृष्टि से पेय जल एवं स्वच्छता मंत्रालय ने 1508.76 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से 1,649 ग्राम पंचायतों को गंगा नदी के किनारे खुले में शौच करने से मुक्त करने के लिए एक कार्य योजना तैयार की है। इसके अतिरिक्त, गंगा नदी के किनारे स्थित 118 शहरी निवास स्थलों पर सीवरेज अवसंरचना को उचित कवरेज हेतु विस्तारित करने के लिए शहरी विकास मंत्रालय द्वारा अस्थायी रूप से अभिज्ञात किया गया है। वहीं दूसरी तरफ सरकार ने 2022 तक देश के सभी ग्रामीण लोगों को सुरक्षित पेयजल सुविधा उपलब्ध कराने की योजना बनायी है।

लोकसभा में सरकार ने बताया है कि 17 लाख घरों को 2022 तक पेयजल सुविधाएं दी जाएगीं। ग्रामीण विकास और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री ने बताया कि देश में 78 हजार गांवों में प्रदूषित जल जैसे फ्लोराइड, आर्सेनिक तथा अन्य भारी धातु की गंभीर समस्या है और सरकार की प्राथमिकता इस समस्या से युद्ध स्तर पर निपटने की है। पंजाब में दूषित जल के कारण कैंसर की बीमारी पर पंजाब के सांसदों की चिंताओं को दूर करते हुए सरकार ने लोकसभा में बताया कि राज्य सरकारें दूषित जल की समस्या से निपटने के लिए आवंटित बजट का 67 प्रतिशत इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र हैं। सरकार ने जल गुणवत्ता की निगरानी के लिए विशेष व्यवस्था की है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा राष्ट्रीय जल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (एनडब्ल्यूएमपी) के अंतर्गत देश में जलीय संसाधनों की जल गुणवत्ता की निगरानी की जा रही है। जल गुणवत्ता की बहाली के लिए केन्द्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों द्वारा जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 का कार्यान्वयन किया जा रहा है।

स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी सफाई की आदतें

स्वच्छता व स्वास्थ्य का एक दूसरे से अन्योन्याश्रय संबंध हैं। यदि आप अस्वस्थ रहते हैं तो एक बार अपनी जीवनचर्या पर चिंतन कीजिए आपका मन आपके अस्वस्थ होने के कई कारण आपके समक्ष प्रस्तुत करेगा, इन कारणों में स्वच्छता का अभाव भी एक कारण निश्चित रूप से होगा। इसी सन्दर्भ में यहां पर कुछ महत्वपूर्ण जानकारी साझा की जा रही है, जिसको अपनाकर आप स्वच्छ व स्वस्थ रह सकते हैं।

आपके घर का बर्तन व जीवाणुः आपके स्वास्थ्य से स्वस्थ भोजन का जितना संबंध है उतना ही संबंध स्वच्छ बर्तन का भी है। आपके बर्तन की स्वच्छता का संबंध आपके स्वास्थ्य से सीधे-सीधे है। गंदे बर्तनों को साफ करने के बावजूद सिंक में कितने सारे जीवाणु रह जाते हैं। जो जीवाणु आपके सिंक में पैदा होते हैं, वे आपके हाथों, बर्तन साफ करने वाले स्पंज या स्कर्ब और इससे भी बदतर आपके भोजन के संपर्क में आ सकते हैं। इसलिए दिन में एक बार अपने सिंक को ब्लीच व पानी से अच्छी तरह से धोएं और उसे सूखने दें। इससे जीवाणु भी खत्म हो जाएंगे!

आपका टूथब्रशः हर रोज इस्तेमाल के बाद अपने टूथब्रश को न सिर्फ सूखा रखने की जरूरत है, बल्कि वॉशरूम को भी बिल्कुल स्वच्छ रखना चाहिए। यह सामान्य-सी बात लग सकती हैए लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब आप टॉयलेट को फ्लश करते हैं, तो इसके दो घंटे बाद तक पूरे वॉशरूम में जीवाणु तैरते रहते हैं? अतः टूथ्रब्रश को वाशरूम से दूर रखें।

सेहत और आपका हाथः जरा गौर से सोचिए कि आप दिन भर में कितनी सारी चीजों को अपने हाथों से छूते हैं। फिर आप यह सोचिए कि आपके घर के लोग किन-किन चीजों को हाथ लगाते हैं, यहां हम घरेलू चीजों की बात कर रहे हैं। मसलन, दरवाजे के हैंडल, पावर स्विच, कंप्यूटर की-बोर्ड (घर और दफ्तर, दोनों जगह) और सबसे अधिक रिमोट कंट्रोल। इन चीजों की हमेशा सफाई करते रहना आपका विवेकपूर्ण कदम होगा, क्योंकि ऐसा करके आप घर के सदस्यों और दफ्तर में सहयोगियों की सेहत की रक्षा करेंगे।

 

20 सेकेंड और हाथ की सफाईः इसमें कोई दो राय नहीं कि अपनी सेहत का खयाल रखते हुए आप अपने हाथ बार-बार धोते रहते हैं। लेकिन जरा ठहरिए, साबुन की कुछ बूंदें अपनी हथेली पर गिराकर उन्हें झट-से टोंटी के नीचे धो डालना काफी नहीं है। साबुन के झाग में अपने हाथ को मलें कम से कम 20 सेकंड तक तो हाथ जरूर मलना चाहिए।

 

पानी को ठहरने न देंः सभी जानते हैं कि बिस्तर के आस-पास मच्छर मारने वाला स्प्रे करना चाहिए और मच्छरदानी लगाकर सोना चाहिए ताकि मच्छरों को शरीर से दूर रखा जा सकें। क्योंकि वे डेंगू या मलेरिया की सौगात हमें दे सकते हैं। स्थिर पानी में मच्छर हजारों की संख्या में अंडे देते हैं? ऐसा पानी घर के भीतर अनेक जगहों पर हो सकता है, मसलन फूलदानों, पालतू जानवरों के पानी रखने के बर्तनों या फिर मछलीघर में। इन बर्तनों के पानी को सप्ताह में एक बार ज़रूर बदलना चाहिए और उन्हें अच्छी तरह से साफ करना चाहिए ताकि रोगों की गिरफ्त में आने से बचा जा सके। इस तरह आप मच्छरों को यह पैगाम देंगे कि उनका आपके घर में कतई स्वागत नहीं होने वाला।

उपसंहार

2 अक्टूबर, 2014 को देश के प्रधानमंत्री ने जिस स्वच्छ भारत की परिकल्पना को देश के सामने रखा है, यह परिकल्पना वैसे नयी नहीं है लेकिन जिस अंदाज व मुस्तैदी के साथ इस बार भारत सरकार ने स्वच्छता के मसले को उठाया है, उसके परिणाम बहुत ही सार्थक दिख रहे हैं। इसके पूर्व भी सरकारों ने स्वच्छता के लिए कार्य किए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता कवरेज की गति बढ़ाने के उद्देश्य से भारत सरकार ने वर्ष 1986 में केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम (सीआरएसपी) शुरू किया था। सीआरएसपी को नया दृष्टिकोण अपनाते हुए वर्ष 1999 में नए सिरे से तैयार संपूर्ण स्वच्छता अभियान (टीएससी) नाम दिया गया।

स्वच्छता अभियान शुरू करने के बाद पत्रकारों से मुलाकात में प्रधानमंत्री ने कहा था, “मुझे खुशी है कि कलम उठाने वाले हाथों ने कलम को झाड़ू बना लिया।” प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य महात्मा गांधी के इस कथन की याद दिलाता है, “अगर ऐसा उत्साही कार्यकर्ता मिल जाए, जो झाड़ू और फावड़े को भी उतनी ही आसानी और गर्व के साथ हाथ में ले लें जैसे वे कलम और पेंसिल को लेते हैं, तो इस कार्य में खर्च का कोई सवाल ही नहीं उठेगा। अगर किसी खर्च की जरूरत पड़ेगी भी तो वह केवल झाड़ू, फावड़ा, टोकरी, कुदाली और शायद कुछ कीटाणु-नाशक दवाइयां खरीदने तक ही सीमित रहेगा।” (व्यास, 1963, पृ. 180-81)

सन्दर्भः

1. वार्षिक रिपोर्ट, 2011: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण

मंत्रालय, भारत सरकार

2. व्यास, हरिप्रसाद 1963: ग्राम स्वराज्य-महात्मा गांधी, नवजीवन प्रकाशन मंदिर, अहमदाबाद, पृ. 179-83 https://www.who.int/gho/countries/ind.pdf?ua=1

3. डोगरा भारत, 2013: जनसत्ता, स्वास्थ्य नीति की

बीमारी, 25.5.2013 https://www.who.int/gho/countries/ind.pdf?ua=1

4. वार्षिक रिपोर्ट 2011: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण

मंत्रालय, भारत सरकार, पृष्ठ 21-22 https://www.who.int/gho/countries/ind.pdf?ua=1

5. 12वीं पंचवर्षीय के लिए रोगवार दस्तावेज, (डेंगू/ चिकनगुनिया), 2012-13: अनुलग्नक ग्ट, भारतीय चिकित्सा शोध संस्थान (आईसीएमआर) नयी दिल्ली

https://www.who.int/campaigns/tb-day/2014/event/en/

6. पीआईबी रिलीजः जल संसाधन मंत्रालय/27.11.14

7. पीआईबी रिलीजः ग्रामीण विकास मंत्रालय/27.11.2014

8. पीआईबी रिलीजः पर्यावरण एवं वन मंत्रालय/26.11.14

http://pib.nic.in/newsite/PrintHindiRelease.aspx?relid=32082 (4.12.14)

9. पीआईबी फीचरः वी. कसौटिया, 12.9.2011

 

लेखक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यकर्ता तथा  समाचार-विचार पोर्टल  www.swasthbharat.in के संपादक हैं। स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर  पत्र-पत्रिकाओं में अनेक आलेख लिखने के अलावा वह कंट्रोल एमएमआरपी (मेडिसिन मैक्सिमम रिटेल प्राइस) तथा ‘जेनरिक लाइये, पैसा बचाइये’ जैसे अभियानों के माध्यम से दवा कीमतों व स्वास्थ्य सुविधओं पर जन जागरुकता के लिए काम करते रहे हैं। ईमेलः orhealthyindia@gmail.com

 

साभार : योजना जनवरी 2015

TAGS