भारत में शहरी स्वच्छताः एक भटकी हुई कहानी

Tuesday, January 6, 2015 - 10:41

त्रिषा अग्रवाल

 

यह एक सुविज्ञात वास्तविकता है कि किसी भी देश की प्रगति सिर्फ आर्थिक संकेतकों के जरिये ही निर्धारित नहीं होती, बल्कि उसके मानव विकास संकेतकों के माध्यम से भी निर्धारित होती है। इस समय भारत को चीन के बाद अगली महाशक्ति के रूप में पेश किया जा रहा है, तो ऐसा कहना बिल्कुल सच नहीं होगा कि भारतीय संदर्भ में निराशाजनक सामाजिक संकेतक से साफ साफ दिखायी पड़ते हैं। जैसा कि एक संयुक्त राष्ट्र संघ-आईडब्लूएचई के अध्ययन में रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है कि भारत में ज्यादातर लोगों के पास शौचालयों तथा उन्नत स्वच्छता की तुलना में मोबाइल फोन तक पहुंच ज्यादा है। भारत में अनुमानतः 62.6 करोड़ लोग खुले में शौच करते हैं, जो विश्व भर में खुले में शौच करने वाले लोगों की कुल संख्या का 60 प्रतिशत है। इसके अलावा भारत में अपर्याप्त स्वच्छता के कारण प्रतिवर्ष कुल आर्थिक क्षति अनुमानतः 2.44 खरब (53.8 अमेरिकी डॉलर) की होती है, जो कि 2006 में भारत की जीडीपी की 6.4 प्रतिशत है (जल एवं स्वच्छता कार्यक्रम, 2007)। पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय ने 2020 तक खुले में शौच वाली स्थिति से पूरी तरह मुक्ति पाने के प्रति प्रतिबद्धता जतायी है, हालांकि यह अभी देखा जाना है कि ऐसा हो भी पायेगा या नहीं।

 

मलजल, अपशिष्ट जल  और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन अच्छी तरह से संचालित किये जाने चाहिए और शहर के अधिकारियों को भी एक निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए। मलिन बस्तियों में सुरक्षित तथा टिकाऊ सफाई से महिलाओं और लड़कियों को उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा, निजता तथा सम्मान को लेकर असीमित लाभ मिलता है। बहुत बड़े पैमाने पर अधिक स्थायी और मज़बूत अभियान ‘स्वच्छता का अधिकार’ की दिशा में शुरू किया जाना चाहिए और यह मुख्य रूप से मैला ढ़ोने के उन्मूलन पर ध्यान केंद्रित करने वाला होना चाहिए। शौचालय के लिए नई और अभिनव प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

जुलाई 2010 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा जल एवं स्वच्छता मान्यता अधिकार 2010 ने शिक्षा, खाद्य सुरक्षा अधिकार तथा स्वास्थ्य जैसे अन्य अधिकार आधारित आंदोलनों के बीच इसकी जगह बनाने की शर्त पर जल एवं स्वच्छता पर ज्यादा ज़ोर देने की आवश्यकता पर बल दिया है। स्वच्छ पेयजल एवं उन्नत स्वच्छता, गरीबी कम करने तथा सभी तरह के मानवाधिकार (यूएनडीपी, 2011) को हासिल करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। इस पर्याप्त वित्तपोषण को सुनिश्चित करने के अलावा यह जल एवं स्वच्छता परियोजना के सफल कार्यान्वयन के लिए निर्णायक है। सुरक्षित पेयजल एवं स्वच्छता के मानवाधिकार पर विशेष दूत की रिपोर्ट के अनुसार पर्याप्त वित्तपोषण न सिर्फ सेवा प्रावधान से संबंधित है बल्कि नियामक उपाय, संस्थागत शक्ति के बढ़ाने तथा नियोजन प्रक्रिया की लागत से भी संबद्ध है (संयुक्त राष्ट्र तथा मानवाधिकार परिषद, 2011)।

भारत में शहरी स्वच्छता की स्थिति

पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत से ही पेयजल आपूर्ति तथा स्वच्छता कार्यक्रम का कार्यान्वयन नहीं हो पाया है। राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता उपलब्ध कराये, जबकि शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता उपलब्ध कराने की जि़म्मेदारी राज्य तथा नगर पालिकाओं की है। केन्द्र सरकार राज्य सरकार के प्रयासों का पूरक बनती है तथा राज्यों की सहायता करती है। यह क्षेत्र दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले अकेला खड़ा नहीं हो पाता है। इस पर आगे प्रकाश डाला गया है जब हम देखते हैं कि इस क्षेत्र पर सरकार द्वारा खर्च की गई कुल राशि न सिर्फ एक प्रतिशत से भी कम है बल्कि यह खर्च सही मायने में 2008 में 0.57 प्रतिशत के मुकाबले घटाकर 2010 में 0.45 प्रतिशत कर दिया गया, अतः इस क्षेत्र में धन की कमी को ध्यान में लाना जरूरी है (वाटरएड,2011)।

इसलिए स्वच्छता सही अर्थों में भारत में विकास की सबसे बड़ी चुनौती है। भारत में शहरी जनसंख्या का चौथाई हिस्सा सुरक्षित स्वच्छता सुविधा की कमी झेल रहा है तथा 30-40 प्रतिशत ही जलनिकासी तथा अपशिष्ट जल उपचार प्रणाली द्वारा स्वच्छता सेवा के अंतर्गत आता है। शहरीकरण का यह स्तर 2001 में 27.8 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 31.2 प्रतिशत तक बढ़ा है (जनगणना, 2011)। खुले में शौच कई शहरों तथा नगरों में व्यापक रूप से प्रचलित है, जिसका नकारात्मक परिणाम वहां की पर्यावरण स्वच्छता तथा जनस्वास्थ्य पर पड़ता है।

देश में शहरी स्वच्छता परिदृश्य की समझ में आने वाली तस्वीर के लिए स्वच्छता के साथ केन्द्र सरकार के स्तर पर चलने वाली योजनाओं के स्वरूप का सूक्ष्म आकलन करने की जरूरत है।

शहरी स्वच्छता पर नीतियां तथा योजनाएं

देश में शहरी स्वच्छता परिदृश्य की समझ में आने वाली तस्वीर के लिए स्वच्छता के साथ केन्द्र सरकार के स्तर पर चलने वाली योजनाओं के स्वरूप का सूक्ष्म आकलन करने की जरूरत है। नीतियों और योजनाओं में से कुछ निम्नांकित हैंः

1. जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम): (क) शहरी गरीबों के लिए बुनियादी सेवा (बीएसयूपी), (ख) राजीव आवास योजना (आरएवाई), तथा (ग) एकीकृत आवास स्लम विकास कार्यक्रम (आईएचएसडीपी)

2. शहरी स्वच्छता नीति, 2008

3. राष्ट्रीय शहरी निवास और आवास नीति, 2007

4. एकीकृत निम्न लागत स्वच्छता(आईएलसीएस) कार्यक्रम

शहरी विकास मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला जेएनएनयूआरएम शहरी क्षेत्रों में जल-आपूर्ति तथा स्वच्छता के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराता है और इसका लक्ष्य हैः उन शहरों की आर्थिक तथा सामाजिक बुनियादी संरचनाओं को उन्नत बनाना तथा उसमें सुधार लाना, सस्ती कीमतों पर आजीवन आजीविका की सुरक्षा सहित शहरी गरीबों के लिए बुनियादी सेवाओं का विस्तार, 74वें संविधान संशोधन के प्रावधानों के मुताबिक नगरपालिका प्रशासन तथा उनकी कार्य पद्धति को मज़बूत करना। जल  आपूर्ति तथा स्वच्छता समेत शहरी गरीबों को मिलने वाली सेवाएं एक सक्षम स्थानीय प्रशासन पर टिकी हुई हैं। जेएनएनयूआरएम के अंतर्गत आने वाले शहरों में अपनी योजनाओं तथा जेएनएनयूआरएम के लक्ष्यों को लेकर प्रतिबद्धता दिखाते हुए नगर विकास योजनाओं (सीडीएस) का विकास करना है। इस मिशन में सभी शहरों के लिए योजनाओं का विकास किया गया है लेकिन ये सब समाज के सभी तबकों को शामिल करते हुए परामर्शदायी तरीके से नहीं किया गया है। इस मिशन में केन्द्रीय भूमिका निभाने वाले शहरी स्थानीय निकायों की अपर्याप्त सामर्थ्य को लेकर सही मायने में यही  अपरामर्शदायी स्थिति जिम्मेदार है। यह 74वें संविधान संशोधन के साथ अनुबद्ध है, जो शहरी स्थानीय निकायों के धन के हस्तांतरण, कार्यों तथा उसे पूरा करने वाले पदाधिकारियों की मांग करता है।

जेएनएनयूआरएम के अंतर्गत बीएसयूपी ने शहरी गरीबों के लिए बुनियादीसेवाओं के विकास पर ज्यादा ज़ोर दिया है, जिसमें पानी और स्वच्छता शामिल हैं। इस बुनियादी सेवाओं को बनाये रखने के लिए इन योजनाओं के कई लक्ष्यों में से एक है परिसंपत्ति सृजन तथा परिसंपत्ति प्रबंधन के बीच के प्रभावशाली जुड़ाव को मज़बूत और सुरक्षित किया जाना ताकि समय के साथ वो आत्मनिर्भर बन सकें। हालांकि जल एंव स्वच्छता के लिए अलग से किसी कोष का प्रावधान नहीं है।

आरएवाई के पास ‘मलिन बस्ती से मुक्त राज्य’ वाला एक दृष्टिकोण है। मलिन बस्ती निर्माण के गंभीर मुद्दों को उठाते हुए यह औपचारिक तंत्र के भीतर मौजूद मलिन बस्ती को लाने की कोशिश करती है यह योजना स्थानीय निकाय बजट के भीतर शहरी गरीबों को बुनियादी सुविधाओं को निर्धारित करने की बात करती है इसके सुधारात्मक उपायों में से एक के रूप में यह शहरी गरीबों के लिए जल आपूर्ति तथा स्वच्छता समेत बुनियादी सुविधाओं के प्रावधान को भी उद्धृत करती है। इस योजना का उद्देश्य इस तथ्य को झुठलाना है कि यह अपने दृष्टिकोण को हासिल करने के लिए किसी भी तरह के अलग से कोष को निर्धारित नहीं करता है।

शहरी गरीब भूमि अधिकार के मुद्दों का सामना कर रहे हैं, जो उनके रह रहे स्थानों को लेकर उनमें अनिश्चितता और असुरक्षा पैदा करता है। उन्हें हमेशा बेदखली का डर सताता है तथा साफ पानी एवं स्वच्छता जैसी बुनियादी सेवाओं की कमी से जूझना पड़ता है, जहां जल संग्रहण तथा घर के स्वास्थ्य को कायम रखने का भार महिलाओं पर होता है और उन्हें ही मलिन बस्तियों में अपर्याप्त तथा इस बेकार की सेवा का खामियाजा सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता है।

उन्नयन और नए मकानों के निर्माण के माध्यम से आश्रय प्रदान करने के अलावा, आईएचएसडीपी उद्देश्य सामुदायिक शौचालय, जल आपूर्ति, खराब पानी के नालियों का निर्माण, मौजूदा गलियों का चौड़ीकरण तथा पक्कीकरण, सीवर तथा स्ट्रीट लाइटस की व्यवस्था करना भी है। समावेशी शहरी नियोजन पर ध्यान केंद्रित करने वाली इस योजना का अहम हिस्सा गंदी बस्तियों का उन्नयन तथा उसका पुनर्वास करना है। धन की व्यवस्था करने वाली पद्धति को स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है।

राष्ट्रीय शहरी स्वच्छता नीति 2008 का लक्ष्य शहरी भारत को उन समुदाय नीत स्वस्थ तथा जीवंत शहरों एवं कस्बों में रुपांतरित करना है, जिसके पास एक व्यापक स्वच्छता व्यवस्था हो। इसके पास शहरी गरीबों तथा महिलाओं पर ध्यान केन्द्रित करने वाली एक महत्वाकांक्षी योजना है जिसके द्वारा भारत में शहरी स्वच्छता के लिए एक ऐसे दृष्टिकोण का निर्माण किया जा सके, जिसमें सभी भारतीयशहर तथा कस्बे पूरी तरह स्वच्छ, स्वस्थ तथा जीवंत हों और शहरी गरीबों एवं महिलाओं के लिए सस्ती स्वच्छता सुविधाएं तथा स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान केन्द्रित करने के साथ अपने सभी नागरिकों के लिए अच्छे जनस्वास्थ्य तथा बेहतर पर्यावरण परिणामों की व्यवस्था को सुनिश्चित करे तथा उन्हें टिकाऊ बनाये (शहरी विकास मंत्रालय, 2008)। इस नीति का मुख्य लक्ष्य पीढ़ियों को जागरूक करना, उनके व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाना, खुले में शौच से मुक्त शहर, एकीकृत शहरोन्मुख स्वच्छता, स्वच्छता और सुरक्षित निपटान तथा समुचित संचालन और सभी सेनेटरी प्रतिष्ठानों का रखरखाव करना है। यहां भी यह नीति इस धारणा पर टिकी हुई है कि राज्य राज्य शहरी स्वच्छता रणनीतियों और शहर स्वच्छता योजनाओं को आकर्षित करेगा। शहरी गरीब भूमि अधिकार के मुद्दों का सामना कर रहे हैं, जो उनके रह रहे स्थानों को लेकर उनमें अनिश्चितता और असुरक्षा पैदा करता है। उन्हें हमेशा बेदखली का डर सताता है तथा साफ पानी एवं स्वच्छता जैसी बुनियादी सेवाओं की कमी से जूझना पड़ता है, जहां जल संग्रहण तथा घर के स्वास्थ्य को कायम रखने का भार महिलाओं पर होता है और उन्हें ही मलिन बस्तियों में अपर्याप्त तथा इस बेकार की सेवा का खामियाजा सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता है। स्वच्छता नीति इन मुद्दों पर प्रकाश ज़रूर डालती लेकिन जल एवं स्वच्छता सेवाओं के कार्यान्वयन में संलग्न हितधारकों तथा एजेंसियों की बहुलता को लेकर कोई तरीका नहीं सुझाता है।

राष्ट्रीय शहरी आवास और आवास नीति (2007)

समाज के सभी तबकों को सस्ती कीमतों पर भूमि, आवास तथा सेवाओं की समान आपूर्ति को सुनिश्चित करने के साथ देश में आवास के सतत विकास को बढ़ावा देने का काम करती है। यह नीति आवास नीतियों तथा कार्यक्रमों के निर्माण तथा उसके कार्यान्वयन में भागीदारी सुनिश्चित करने तथा सभी स्तरों पर महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करती है। इसके अलावा इस नीति का लक्ष्य पानी तथा साफ-सफाई को शामिल करते हुए महिला मुखिया वाले परिवारों, अकेली महिलाओं, कामकाजी

महिलाओं तथा बुनियादी सुविधाओं द्वारा घरेलू सेवा के संदर्भ में कठिन परिस्थितियों में रह रही महिलाओं पर ध्यान देना है। यह इकलौती नीति है अपने दिशा-निर्देशों में महिलाओं को शामिल करती है।

आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय (एमओएचयूपीए) शहरी क्षेत्रों के लिए आईएलसीएस नामक केन्द्र प्रायोजित योजना की व्यवस्था करता है। इस योजना का मुख्य लक्ष्य देश में शहरी क्षेत्रों के ईडब्लूएस श्रेणी से संबंधित जिन परिवारों के पास अब भी शौचालय नहीं हैं, उनके मौजूदा शुष्क शौचालयों को बेहतर संरचना एवं निर्माण वाले बंद शौचालयों में बदलना है। इससे शहरों में स्वच्छता की समग्र स्थिति में बेहतरी आयेगी लेकिन इससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण मैला ढोने वाली अमानवीयता का उन्मूलन करना है। आईएलसीएस की मूल्यांकन रिपोर्ट (आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय) में यह पाया गया कि इस योजना के बड़े प्रभावों में से एक स्वच्छ शौचालयों के मालिकों की सामाजिक प्रतिष्ठा में उन्नयन था।

मलिन बस्तियों में सफाई के मुद्दे पर तमिलनाडु का तिरुचिरापल्ली एक अच्छा उदाहण है, जहां शहर में स्वच्छता समस्याओं से निपटने के लिए शहर के अधिकारी, समुदाय तथा गैर-सरकारी संगठनों ने मिलकर काम किया है। इस शहर की मलिन बस्तियों में रहने वालों ने स्नान तथा कपड़े धोने की सुविधाओं वाला समुदाय प्रबंधित शौचालय वाला मॉडल प्रस्तुत किया है।

इस वास्तविकता के बावजूद नीतियां और योजनाएं स्वच्छता के मुद्दे का उल्लेख करती तो हैं, हालांकि इन योजनाओं के ज़रिये शहरी स्वच्छता पर आवंटित रकम को चिन्हित कर पाना बेहद मुश्किल है। आईएलसीएस योजना इकलौती योजना है जिसमें बजट का पता लगाया जा सकता है। तालिका 1 में आईएलसीएस के लिए एचयूपीए के अंतर्गत आवंटित रकम जो दर्शायी गई है, वह न्यूनतम है तथा मौजूदा वर्ष में यह कम होती हुई दिखायी जा रही है। यह महत्वपूर्ण है, चूंकि आवास सूचीकरण तथा आवास गणना 2011 के अनुसार पूरे देश में 7.94 लाख शौचालय थे जिनमें से मिट्टी हटाने का काम खुद इंसानों द्वारा किया गया था, जिसका अर्थ यह है कि बड़े पैमाने पर हाथ से मैला ढोने की प्रथा आज भी मौजूद है (भारत की जनगणना, 2011)।

 

तालिका 1: आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मन्त्रालय (एमओएचयूपीए) के तहत आईएलसीएस के लिए बजट आवंटन (करोड़ रुपये में)

 

 

2009-10

2010-11

2011-12

2012-13

2013-14

2014- 15

     

बी.ई

आर.ई.

बी.ई

आर.ई.

बी.ई.

55

106.01

69.76

25

100

125

22

5

बी.ई.=बजट अनुमान, आर.ई.=संशोधित अनुमान। स्रोतः विभिन्न वर्षों के लिए व्यय बजट खंड II

 

 

शहरी स्वच्छता नीति और एकीकृत कम लागत स्वच्छता (आईएलसीएस) कार्यक्रम के अलावा इन नीतियों और योजनाओं में से कोई भी साफ-सफाई और पानी की सीधी आपूर्ति की व्यवस्था नहीं करती है। पानी और साफ-सफाई या तो गरीबों के लिए आवास के साथ जुड़ी हुई है या फिर रोज़गार सृजन के साथ संबद्ध है और कभी भी इकलौती नीति की तरह इसे नहीं देखा गया है। यह दिखाता है कि नीति निर्माताओं ने खासकर शहरी मलिन बस्तियों में जलापूर्ति तथा स्वच्छता से संबंधित शहरी गरीबों की आवश्यकता की तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है।

शहरी गरीबी तथा साफ सफाई

शहरी मलिन बस्तियां एक वास्तविकता तथा शहरी गरीबी की सबसे बड़ा अमूर्त रूप है। शहरी मलिन बस्तियों के महत्वपूर्ण संकेतकों में से कुछ तालिका 2 में दर्शाया गया है। 45 प्रतिशत जल निकासी सुविधाओं की कमी से जूझने वाली गैर-अधिसूचित मलिन बस्तियां 42 हैं। चूंकि स्वच्छता का मतलब सिर्फ शौचालयों ही नहीं है बल्कि एक स्वास्थ्यकारी पर्यावरण भी है, गैर-अधिसूचित मलिन बस्तियों में 38 प्रतिशत तक पाये जाने वाले कचरे को निपटाने की सुविधाओं की कमी की तरफ भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

 

तालिका 2: शहरी मलिन बस्तियों के महत्वपूर्ण संकेतक (%)

 

शहरी मलिन बस्तियों के महत्वपूर्ण संकेतक

एनटी

एनएन

शौचालयों की कोई सुविधा नहीं

16

42

जल निकासी की सुविधा विहीन मलिन बस्तियां

11

45

कचरा निपटान व्यवस्था विहीन मलिन बस्तियों

11

38

एनटी=अधिसूचित, एनएन=ग़ैर-अधिसूचित। स्रोतः भारत में शहरी बस्तियों के महत्वपूर्ण संकेतक, एनएसएस 69वां दौर, राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, 2013

 

शहरी मलिन बस्तियों में साफ-सफाई के मुद्दे को स्पष्ट करने के लिए तमिलनाडु का तिरुचिरापल्ली एक अच्छा उदाहण है, जहां शहर में स्वच्छता समस्याओं से निपटने के लिए शहर के अधिकारी, समुदाय तथा गैर-सरकारी संगठनों ने मिलकर काम किया है। इस शहर की मलिन बस्तियों में रहने वालों ने स्नान तथा कपड़े धोने की सुविधाओं वाला समुदाय प्रबंधित शौचालय वाला मॉडल प्रस्तुत किया (वाटरएड इंडिया, 2008)। ऐसा सिर्फ शहर के अधिकारियों, समुदायों तथा गैर-सरकारी संगठनों के एक साथ मिलजुलकर काम करने के कारण संभव हो पाया। ऐसा पाया गया कि स्वच्छ तथा स्वस्थ मलिन बस्तियों का लक्ष्य हासिल करने के लिए बहुत बड़े वित्तीय निवेश की ज़रूरत बिल्कुल नहीं है। इससे ज्यादा ज़रूरी है कि समस्याओं से निजात पाने के लिए संबंधित समस्याओं के हल के लिए नियुक्त अधिकारी, समुदाय तथा गैर-सरकारी संगठनों के कार्य और उनका समर्पण भाव। चूंकि कोई भी निश्चित समुदाय अपने शौचालय का प्रबंधन खुद ही करता है, लिहाज़ा यह व्यक्तिगत और सामुदायिक विकास के मामले में कई सकारात्मक प्रभावों के साथ महिलाओं के सशक्तिकरण को भी आगे बढ़ाता है।

दूसरी तरफ, जागोरी एवं वीमेन इन सिटीज़ इंटरनेशनल द्वारा आयोजित महिला अधिकार तथा एशियाई शहरों में पानी तथा सफाई की पहुंच पर किया गया एक अंतर्राष्ट्रीय विकास तथा शोध केन्द्र (आईडीआरसी) के अध्ययन (2009-2011) में यह पाया गया कि 2011-12 में दिल्ली सरकार प्रति कॉलोनी जल आपूर्ति पर महज़ 30 रुपये (0.66 अमेरिकी डॉलर) तथा सफाई पर 80 रुपये (1.78 अमेरिकी डॉलर) खर्च करती है (आईडीआरसी, 2011)। चूंकि दिल्ली में पानी और सफाई की व्यवस्था में कई एजेसियां लगी हुई हैं, यही कारण है कि स्वामित्व का कोई मतलब नहीं था और इसलिए कोई जवाबदेही भी नहीं थी। शहरी पानी तथा सफाई की व्यवस्था को उन्नत बनाने के लिए इस क्षेत्र में वित्त का मामूली आवंटन भी राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को प्रतिबिंबित करती है, और तो और, जेजे पुनर्स्थापन कॉलोनियों में शहरी स्थानीय निकायों का वहां के निवासियों के प्रति अध्किारवादी रवैया भी दिखायी पड़ता है। अतः इन दो उदाहरणों से ये साफ हो जाता है कि देश भर में शहरी सफाई को लेकर  अलग-अलग अनुभव हैं और इसकी कामयाबी कई कारकों पर निर्भर करती है, जिसमें ‘सब धन बाईस पसेरी’ वाला सूत्र काम नहीं करता है।

निष्कर्ष

भारत की प्रगति की कहानी हालांकि बहस का एक दिलचस्प मुद्दा है और जब कोई इसके स्वच्छता आंकड़े का विश्लेषण करता है, तो वह उसमें पानी को ज्यादा उल्लेखनीय नहीं पाता है। मलिन बस्तियों की जनसंख्या के लगातार बढ़ते जाने से पानी और सफाई जैसी बुनियादी सुविधाओं पर ज्यादा बल दिया जाएगा। शौचालय साफ-सफाई समाधान का केवल एक हिस्सा हैं। मलजल, अपशिष्ट जल और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन अच्छी तरह से संचालित किये जाने चाहिए और शहर के अधिकारियों को भी एक निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए। मलिन बस्तियों में सुरक्षित तथा टिकाऊ सफाई से

box item : शहरी स्वच्छता पर नीतियों एवं योजनाओं का सीमित प्रभाव होगा जबतक कि इन योजनाओं के लिए पर्याप्त बजट मुहैया नहीं कराया जाए तथा असरदार तरीके से इन्हें लागू नहीं किया जाए। राज्य तथा नगरपालिका प्रशासन की ओर से मज़बूत इच्छा शक्ति ही शहरी स्वच्छता के क्षेत्र में एक ठोस अन्तर ला सकती है।

महिलाओं और लड़कियों उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा, निजता तथा सम्मान को लेकर उन्हें असीमित लाभ मिलता है। हालांकि शहरी सफाई पर बनने वाली ज्यादातर योजनाओं और नीतियों में महिलाएं प्रतिबिंबित नहीं होतीं। यह वास्तविकता कि मैला ढोने की प्रथा आज भी अस्तित्व में है, यह दिखाता है कि शुष्क शौचालयों के बंद करने तथा फ्लश

शौचालयों को बढ़ावा देने को लेकर अभी भी बहुत कुछ नहीं किया गया है। बहुत बड़े पैमाने पर अधिक स्थायी और मज़बूत अभियान ‘स्वच्छता का अधिकार’ की दिशा में शुरू किया जाना चाहिए और यह मुख्य रूप से मैला ढ़ोने के उन्मूलन पर ध्यान केंद्रित करने वाला होना चाहिए। शौचालय के लिए नई और अभिनव प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जबकि साथ-ही-साथ सुरक्षित स्वच्छता प्रथाओं पर अधिक से अधिक जागरूकता को बढ़ावा देने की भी ज़रूरत है। मलिन बस्तियों में भूमि स्वामित्व का अधिकार, आजीविका के विकल्प तथा शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएं जैसे मोटे मुद्दों को भी मलिन बस्तियों में सफाई की ज्यादा असरदार योजनाओं को लाकर इसे हल किये जाने की ज़रूरत है (पांडा एवं अग्रवाल, 2013)। शहरी स्वच्छता पर नीतियों एवं योजनाओं का सीमित प्रभाव होगा जबतक कि इन योजनाओं के लिए पर्याप्त बजट मुहैया नहीं कराया जाए तथा असरदार तरीके से इन्हें लागू नहीं किया जाए। राज्य तथा नगरपालिका प्रशासन की ओर से मज़बूत इच्छा शक्ति ही शहरी स्वच्छता के क्षेत्र में एक ठोस अन्तर ला सकती है।

‘स्मार्ट सिटी’ पद आजकल बड़ा आम हो गया है, ऐसे में वर्तमान सरकार की इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए कि सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान तथा करोड़ों डॉलर वाले स्वच्छता अभियान, महात्मा गाँधी स्वच्छ भारत कार्यक्रम के माध्यम से  साफ-सफाई को चर्चा में ला दिया है। हालांकि यह समय ही बतायेगा कि स्वच्छता एक गंदा शब्द नहीं रह जाता है तथा देश में यह एक प्राथमिक क्षेत्र बन जाता है।

संदर्भः

1. जनगणना (2011): भारत के महापंजीयक का कार्यालय, गृह मंत्रालय, भारत सरकार

2. आईएलसीएस योजना का मूल्यांकन (2007): शहरी गरीबी उपशमन व आवास मंत्रालय, भारत सरकार

3. समेकित कम लागत स्वच्छता योजना (2008): पुनरीक्षित दिशानिर्देश, शहरी गरीबी उपशमन व आवास मंत्रालय, भारत सरकार

4. इंटरनेशनल डेवेलपमेंट एंड रिसर्च सेंटर (2011): एशियाई शहरों में महिला अध्किार एवं जल उपलब्ध्ता पर शोध परियोजना के निष्कर्षों पर आधरित रिपोर्ट

5. राष्ट्रीय शहरी स्वच्छता नीति (2008): शहरी गरीबी उपशमन व आवास मंत्रालय, भारत सरकार

6. पांडा, जी.आर. एवं अग्रवाल, टी (2013): इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली वर्ष XLVIII, अंक 5, 2 फरवरी 2013

7. यूएनडीपी (2011): मानव विकास रिपोर्ट, सस्टेनिबिलिटी एंड इक्विटीः अ बेटर फ्यूचर फॉर ऑल

8. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (2011): संयुक्त राष्ट्र महासभा में जुलाई 2011 को प्रस्तुत सुरक्षित पेयजल तथा स्वच्छता का मानवाध्किार विषयक स्पेशल

रिपोर्टियर की रिपोर्ट

9. जल एवं स्वच्छता कार्यक्रम (2007): भारत में अपर्याप्त स्वच्छता के आर्थिक प्रभाव, विश्व बैंक

10. वाटर एड इंडिया (2008): तिरुचिरापल्ली शोज द वे

11. वाटर एड इंडिया (2011): ऑफ ट्रेक, ऑफ टारगेटः पॉलिसी रिपोर्ट, नवंबर, 2011

लेखिका स्वतंत्र शोधार्थी हैं। जल, स्वच्छता तथा पर्यावरण पर कार्य करती हैं। उन्होंने सरकारी कार्यक्रमों की निगरानी व मूल्यांकन हेतु प्राथमिक डाटा सृजन तथा परियोजना विकास पर काफी काम किया है। हाल में वह जल तथा पर्यावरण-न्याय जैसे विषयों पर काफी सक्रिय रही हैं। ईमेलः trisha14@gmail.com

साभार : योजना जनवरी 2015

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