स्वच्छता की ओर एक कदम समृद्धि की ओर बढ़ते कदम

Monday, January 5, 2015 - 15:04

शिशिर सिन्हा

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने झाड़ू क्या उठाया उसके तो दिन ही बहुर गए। साफ-सफाई के उत्पादों के सरोकार बदल गए। साफ-सफाई पहले भी होती रही, लेकिन अब सफाई सुर्खियों में है। जी हां, महात्मा गाँधी के जन्म दिवस 2 अक्टूबर को शुरू किए गए राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान ने स्वच्छता को नयी परिभाषा दे दी है। साफ-सफाई का काम गरीब-गुरबों तक सीमित नहीं रहा। नामी गिरामी हस्तियां सड़कों पर सफाई करती दिख रही हैं तो देसी ही नहीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को अपने बही खाते को और मजबूत करने का एक नया जरिया मिल गया है। साफ-सफाई का नया अर्थशास्त्र अब आपके सामने है।

हाथ अच्छे से धोकर खाना खाने की बात हमारे मां-पिता अरसे से बताते रहे, लेकिन ये बात घर की चारदिवारी तक ही सीमित रही और हमने कभी इसके आर्थिक मायने को समझने की कोशिश नहीं की। साफ-सफाई को हमने कभी गाँधी के उस चश्मे से नहीं देखा जैसा प्रधानमन्त्री ने समझाने की  कोशिश की। उन्होंने 2 अक्टूबर को कहा, “इस चश्मे से गाँधी देख रहे हैं - क्या किया? क्या कर रहे हो, कैसे कर रहे हो। कब तक करोगे। इसलिए जब गाँधी के चश्मे का लोगो देखते हैं, जो चश्मे खुद हमें कहते हैं, स्वच्छ भारत का संदेश देते हैं।”

लगता है कि इसी चश्मे से कारोबार जगत ने भी सफाई को देखा तभी तो उन्हें लगा कि ये कारोबार बढ़ाने का पहले से भी बड़ा जरिया है। एक प्रसिद्ध अंग्रेजी कारोबारी दैनिक ने बहुराष्ट्रीय कम्पनी रैकिट बेंकाइजर के प्रबंध निदेशक नीतिश कपूर को उद्धृत करते हुए लिखा कि लम्बे समय में जब ज्यादा से ज्यादा लोग स्वस्थ स्वच्छ आचरण को अपनाएंगे तो वहां पर डेटॉल और हारपिक जैसे उनकी कम्पनी के उत्पाद लोगों के लिए ज्यादा प्रासंगिक बन जाएंगे।

देश की स्वच्छता जरूरत को ध्यान में रखते हुए इस कम्पनी ने 100 करोड़ रुपये के एक अभियान की शुरूआत है जिसके जरिए सालभर में 2000 गांवों तक पहुंचने का लक्ष्य है। अमिताभ बच्चन इसके ब्रांड एम्बेसडर हैं। अभियान के जरिए शुरुआती तौर पर हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के 400 गांवों में वीडियो, पर्चे, पोस्टर, हाथ धोने के सत्र और नुक्कड़ नाटकों के जरिए साफ-सफाई का संदेश देने का लक्ष्य है। घनी आबादी वाले राज्यों में 100 करोड़ रुपये का यह निवेश कारोबार फैलाएगा, ये तो तय है, लेकिन कितना फैलाएगा, इसका आकलन नहीं किया गया है।

वैसे रैकिट की प्रतिद्वंदी हिंदुस्तान यूनिलीवर वर्ष 2010 से शहरी और ग्रामीण इलाकों में अपने जाने माने साबुन ब्रांड लाइफबॉय को जोड़कर हाथ धोने का अभियान चला रही है। कम्पनी का दावा है कि अब तक ये पौने छह करोड़ से भी ज्यादा लोगों तक पहुंच चुका है। अब कम्पनी ने शौचालय के लिए एक खास अभियान शुरू किया है जिसके तहत अगले वर्ष तक 24,000 शौचालय बनाने का लक्ष्य तय किया है।

 

स्वच्छता का सम्बन्ध केवल आस-पड़ोस की सफाई या स्वास्थ्य तक सीमित नहीं। साफ-सुथरा रहने की आदत इसके लिए जरूरी सामग्रियों के बाजार को भी एक गति देती है और इस तरह से कहीं न कहीं उद्योग में एक गति आती है। इसके विविध पहलुओं पर विभिन्न नज़रियों से बहस संभव है परंतु इतना तो सच है कि हाल के अभियान ने स्वच्छता उत्पाद बनाने वाली कंपनियों में एक नयी ऊर्जा भर दी है और वे अपने कारोबार को निकट भविष्य में कई गुणा फलता-फूलता देख रही हैं।

स्वच्छता के ब्रांडेड उत्पादों के बाजार की अग्रणी इन दो कम्पनियों के मुकाबले में देसी कम्पनियां जैसे डाबर और फ्यूचर ग्रुप पीछे नहीं रहना चाहती। घर साफ करने में इस्तेमाल होने वाले अपने सनीफ्रेश ब्रांड के प्रोडक्ट के साथ डाबर सार्वजनिक शौचालय बनाने की योजना शुरू कर कर रही है। इस योजना में बालिकाओं के लिए शौचालय पर बनाने खासा जोर होगा। वहीं बिग बाजार नाम से सुपर स्टोर चलाने वाले फ्यूचर ग्रुप की योजना स्वच्छता से जुड़े अपने खुद के ब्रांड को प्रचलित करने की है।

इन सभी कम्पनियों का जोर मौजूदा ग्राहकों में खपत बढ़ाना तो है ही, साथ ही ज्यादा से ज्यादा नए ग्राहकों को लुभाने की है। रणनीति है कि लोग साफ-सफाई के उत्पादों को महज उच्च जीवन शैली के साथ जोड़ कर नहीं देखे, बल्कि ये समझें कि जीवन को बेहतर बनाने के लिए ये उत्पाद कितने जरूरी हैं। मिट्टी या राख से हाथ धोने से कीटाणु जाते नहीं, बल्कि साबुन या लिक्विड शोप से धोने पर जोर देना कम्पनियों की सोच का हिस्सा लगता है। यही नहीं महज स्वाइन फ्लू का खतरा मंडराने पर ही हैंड सेनेटाइजर का इस्तेमाल हो, ये उचित नहीं होगा और कम्पनियां इस बात को प्रचारित करना चाहेंगी।

आखिरकार, ज्यादा लोग साफ-सफाई के लिए ऐसे उत्पादों को क्यों नहीं अपनाते? इसकी एक वजह ऊंची कीमत हो सकती है। फिलहाल, कम्पनियों के पास इसका भी जवाब है। याद कीजिए एक जानी मानी कम्पनी के लिक्विड शोप का विज्ञापन। विकल्प दिया गया कि बड़ा पैक नहीं ले सकते, कोई बात नहीं, छोटा पैक ले लीजिए। जेब के हिसाब से फिट बैठेगा। यानी शैंपू के शैसे और साबुन के छोटे आकार के साथ लिक्विड शोप और हैंड सेनेटाइजर छोटे छोटे पैक में उपलब्ध हैं जिस पर खर्च करने में ज्यादा परेशानी नहीं हो।

इन कम्पनियों की आशावादिता की एक वजह और भी है। देश की 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यहां दो बातें ध्यान देने की हैं। एक, स्वच्छता का नारा जिसे प्रधानमन्त्री ने दिया, उन्हें युवाओं का एक बड़ा तबका आदर्श के रूप में देखता है। दो, युवा वर्ग ब्रांडेड उत्पादों को लेकर ज्यादा उत्साहित होता है। ऐसे में कम्पनियों के लिए स्वच्छता अभियान में बड़ा बाजार देखना कहीं से असामान्य नहीं लगता।

स्वच्छता कारोबारः अब तक

यह तो बात हुई संगठित बाजार की। तरल साबुन, ठोस साबुन और यहां तक की घर में झाड़ू पोछे में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय और असंगठित क्षेत्र से आता है। स्थानीय भाषा में ब्रांड, पड़ोस के किराने की दुकान में उपलब्धता और कम कीमत के ये उत्पाद अलग-अलग जगहों पर अपना दबदबा रखते हैं। भले ही इनका विज्ञापन भव्य नहीं हो, ये बड़े बड़े मेले या अभियान आयोजित नहीं करतीं, लेकिन इनका अपना एक अलग स्थान है और स्वच्छता अभियान से इन्हें बड़ा फायदा मिलने वाला है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

कुछ ऐसी ही स्थिति फूल झाड़ू, तिनके वाले झाड़ू और फिनाइल जैसे उत्पादों की है। झाड़ू का उत्पादन बड़े पैमाने पर छोटे-छोटे व्यवसायी करते हैं। दुकानों पर हम अमूक ब्रांड का झाड़ू नहीं मांगते, बस जो ज्यादा मजबूत दिखे, ज्यादा बड़ा दिखे और जिस पर ज्यादा से ज्यादा मोलभाव हो सके, उसे खरीद लेते हैं। वर्षों से इनका इस्तेमाल हर तबके के

घर में होता रहा, लेकिन इनके अर्थशास्त्र पर चर्चा नहीं हुई। हां, विभिन्न वेबसाइट खंगालने पर ये बात जरूर सामने आयी कि फूल झाड़ू के जरिए पूर्वाेत्तर के कुछ हिस्सों में आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है, क्योंकि वहां इस तरह से झाड़ू के लिए जरूरी घास की पैदावार के लिए माहौल अनुकूल है। इसी तरह से पत्तों से बने झाड़ू जनजातियों के लिए रोजी रोटी का एक अहम जरिया है।

वैसे कुछ कम्पनियों ने प्लास्टिक के झाड़ू के जरिए बांस या घास के जरिए बने झाड़ुओं की जगह लेने की कोशिश की लेकिन प्लास्टिक के ये झाड़ू शौचालयों तक ही सीमित होकर रह गए क्योंकि वैक्यूम क्लिनर के इस दौर में भी धूल हटाने में फूल झाड़ू का कोई सानी नहीं। तो जरूरत इस बात की है कि हर तरह के झाड़ू के उत्पादन को बढ़ावा दिया जाए। वैसे राहत की बात ये है कि भारत सरकार ने अपने तमाम मंत्रालयों और विभागों के लिए झाड़ू की खरीद सूक्ष्म व लघु उद्योग से आवश्यक तौर पर खरीदे जाने वाले 350 सामानों में शामिल कर रखी है।

हाथ सही तरीके से धो लिया, घर और उसके आसपास तमाम किस्म के झाड़ू का इस्तेमाल कर लिया लेकिन घर के सतह पर खुली आंखों से नहीं दिखने वाले अत्यंत छोटे कीटाणु या रोगाणु रह गए। इनसे निपटने के लिए तरह-तरह के तरल का इस्तेमाल होता है जिसमें सबसे आगे फिनाइल है। अलग-अलग स्रोतों से जुटाए आंकड़ों के मुताबिक, हर वर्ष देशभर में करीब 9-10 हजार टन सतह साफ करने वाले तरल का इस्तेमाल होता है और इसमें अकेले फिनाइल की हिस्सेदारी आधे से भी ज्यादा है। इन तरल का 95 प्रतिशत से ज्यादा इस्तेमाल शहरी इलाकों में होता है।

रैकिट बेंकाइजर, हिंदुस्तान यूनिलीवर और बलसारा जैसी कई कम्पनियां रोगाणु मुक्त सतह और शौचालयों के लिए ब्रांडेड तरल बाजार में उपलब्ध कराती हैं। वहीं फिनाइल की बात करें तो गिनती की कुछ संगठित क्षेत्र की कम्पनियों को छोड़ बड़े पैमाने पर उत्पादन छोटे उद्योग ही करते हैं। बाजार में फिनाइल की बिक्री भी ब्रांड के आधार पर नहीं, बल्कि झाड़ू की तरह सस्ते और ज्यादा मोलभाव के आधार पर होती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नए अभियान के बाद फिनाइल की मार्केटिंग पर जोर होगा, जिससे छोटे उद्योगों का फायदा हो सकेगा।

स्वच्छता का बाजार

यह बाजार महज उपरलिखित उत्पादों तक सीमित नहीं, बल्कि कई अन्य उत्पादों को अपने में समेटे है। मसलन शौचालय की बात आएगी, तो ईंट, रेत, सीमेंट, लोहे, लकड़ी के साथ-साथ संडास पौट, पाइप, नल और पानी की टंकी का कारोबार भी बढ़ेगा। कुल मिलाकर बाजार को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है, एक बुनियादी सुविधाओं का बाजार और दूसरा सुविधाओं के इस्तेमाल के लिए जरूरी उत्पाद व सेवाओं का बाजार।

कम्पनियों की आशावादिता की एक वजह और भी है। देश की 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यहां दो बातें ध्यान देने की है। एक, स्वच्छता का नारा जिसे प्रधानमन्त्री ने दिया, उन्हें युवाओं का एक बड़ा तबका आदर्श के रूप में देखता है। दो, युवा वर्ग ब्रांडेड उत्पादों को लेकर ज्यादा उत्साहित होता है। ऐसे में कम्पनियों के लिए स्वच्छता अभियान में बड़ा बाजार देखना कहीं से असामान्य नहीं लगता।

विश्व बैंक के जरिए प्रशासित और विभिन्न देशों व संस्थाओं की वित्तीय मदद से चलने वाले जल एवं स्वच्छता कार्यक्रम (डब्ल्यूएसपी) की एक रिपोर्ट ने भारत में स्वच्छता के बाजार की संभावनाओं का आकलन किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, स्वच्छता की प्राथमिकताओं से निपटने के लिए सरकारी निवेश (इसमें शौचालय बनाना, कचरे के निपटारे की व्यवस्था तैयार करने, लोगों को स्वच्छता के व्यवहार को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना जैसे मुद्दे शामिल हैं) के साथ लोगों का खुद ही शौचालय बनाना या मौजूदा शौचालयों को और बेहतर बनाने जैसे उपायों से देश में स्वच्छता के उत्पाद और सेवाओं का एक बहुत ही बड़ा बाजार बन सकेगा।

रिपोर्ट में कहा गया कि 2007 से 2020 के बीच स्वच्छता के बाजार का संभावितआकार 6.87 खरब रुपये का हो सकता है। यहां बाजार से आशय स्वच्छता के प्रयासों की उपज संभावित आर्थिक गतिविधियों से है। इसमें बुनियादी सुविधाओं की हिस्सेदारी करीब 64 प्रतिशत की हो सकती है, जबकि बाकी रकम उन सुविधाओं के रखरखाव व संचालन पर खर्च किए जाने का अनुमान है। रिपोर्ट में स्वच्छता का सालना बाजार 2007 के 300 अरब रुपये से 2020 में 683 अरब रुपये तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया।

रसायन युक्त उत्पादों से अगर स्वच्छता का बाजार नए सिरे से सज गया है तो देसी तरीके से साफ-सफाई का तरीका काफी समय से ही चलन में रहा है। गांव में आज भी शौच के बाद नदी-तालाब-पोखरा किनारे मिट्टी या राख से हाथ ही नहीं लोटा धोने का चलन रहा है तो उल्टी पर राख डालने का तरीका गांव ही नहीं शहरों में भी अपनाया जाता रहा है।

याद कीजिए गोबर की पुताई। फूस व मिट्टी से बने घर में गोबर और मिट्टी को मिलाकर जमीन की पुताई की जाती रही। इससे ना केवल घर शुद्ध होता है बल्कि यह कीटनाशक का भी काम करता। ये तो हुई बात कच्चे घर की। पक्के घरों में मक्खी को भगाने के लिए सबसे सरल माध्यम आम नमक है। बस इसके लिए पोछा लगाते समय पानी में थोड़ा नमक मिलाना होगा। जमीन ही नहीं डायनिंग टेबल की भी सफाई कर लीजिए, मक्खियां दूर से ही तौबा करेंगी। किताबों को बचाना है तो उनमें नीम की पत्तियां डाल दीजिए दीमक या कोई और कीड़ा पास पटकने की हिम्मत नहीं करेंगे।

नमक छोड़ बाकी इन चीजों को बाजार के दायरे में बांधा नहीं जा सकता। इन सब का कोई अर्थशास्त्र भी नहीं है। फिर भी ये बाजार में उपलब्ध तमाम देसी विदेशी कम्पनियों के उत्पादों को ये कड़ी टक्कर दे सकते हैं। वैसे इन दिनों कुछ आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली देसी कम्पनियों ने स्वच्छता के लिए ऐसे उत्पाद बाजार में पेश किए हैं जो गौ मूत्र वगैरह से बने हैं। वैसे तो पूजा पाठ के लिए गौ मूत्र समेत पंच द्रव्य वाले उत्पादों का प्रयोग काफी समय से होता रहा है लेकिन पूरे घर की साफ-सफाई के लिए इनका बड़े पैमाने पर प्रयोग शुरु होने में समय लगेगा।

सच तो यही है कि साफ-सफाई के लिए घरेलू नुस्खों का ना तो कोई ब्रांड है और ना ही ब्रांड एम्बेसेडर। फिर भी देसी-विदेशीकम्पनियों के भारी प्रचार-प्रसार के बीच ये बने थे, बने हैं और बने रहेंगे।

स्वच्छता और उत्पादकता

स्वच्छता के अर्थशास्त्र की चर्चा व्यक्तिगत उत्पादकता और पूरे देश के आर्थिक असर के बगैर अधूरी रहेगी। इस उत्पादकता का आशय, स्वच्छ व्यवहार के नहीं अपनाने से होने वाले नुकसान को लेकर है। याद कीजिए प्रधानमन्त्री के 2 अक्टूबर के भाषण की। उन्होंने कहा, “विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि गन्दगी के कारण हर वर्ष भारत के प्रत्येक नागरिक को करीब 6500 रुपयों का अतिरिक्त नुकसान झेलना पड़ता है। बीमार, बीमारी के कारण ऑटो रिक्शा नहीं चला पाता है। टैक्सी नहीं चला पाता है। अखबार बांटने के लिए नहीं जा पाता है। दूध बेचने के लिए नहीं जा पाता है। यहां भारत की कुल संख्या का औसत निकाला गया है, लेकिन सुखी घर के लोगों को ये नहीं भुगतना पड़ता है। अगर उनको निकाल दिया जाए तो औसत 6500 से बढ़कर गरीब आदमी के सर पर बोझ 12-15 हजार रुपये हो सकता है।”

गन्दगी क्यों फैली? बस इसीलिए नहीं कि उसकी रिहाइश के आसपास की जगह गंदी थी, चारों तरफ कचरा फैला था। ये इसीलिए भी हो सकता है कि व्यक्ति विशेष को शौच की पर्याप्त सुविधा नहीं मिली हुई थी, उसी की तरह कई और लोग खुले में शौच करते थे और पीने के लिए साफ पानी नहीं मिला। यही नहीं काम में इसीलिए भी नुकसान हुआ कि व्यक्ति विशेष को हर रोज अपने काम काज के लिए उपलब्ध समय का एक भाग शौच व पीने के पानी तक पहुंचने के लिए खर्च करना पड़ता है।

राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (एनएसएस) के 69 वें दौर के नतीजे बताते हैं कि देश की बड़ी आबादी के लिए पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध तो है, लेकिन ग्रामीण इलाके में आधे से भी ज्यादा और शहरी इलाके में करीब 23 फीसदी आबादी के लिए यह आवासीय परिसर में उपलब्ध नहीं। इस आबादी के एक बड़े हिस्से को आधे किलोमीटर तक की दूरी तय कर पानी लाना पड़ता है। पानी लाने के लिए ग्रामीण इलाकों में औसतन 20 मिनट और शहरी इलाकों में औसतन 15 मिनट समय जाया होता है। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में पानी के स्रोत की जगह पर अपनी बारी आने में औसतन 15 मिनट और शहरी इलाकों में 16 मिनट का समय लगना आम बात है।

सर्वेक्षण ये भी बताता है कि 62 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण घरों और 16 प्रतिशत से ज्यादा शहरी घरों में बाथरूम तक नहीं। इसी तरह शौचालय की बात करें तो ग्रामीण इलाकों में करीब 60 प्रतिशत और शहरी इलाकों में करीब 9 प्रतिशत घरों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं। ये वो लोग हैं जो खुले में शौच के लिए मजबूर हैं। ये सभी तथ्य व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं, पूरे देश की आर्थिक स्तर पर असर डालते हैं।

box item: लक्ष्य बड़ा है, जाहिर है कि काफी ज्यादा आर्थिक संसाधनों की जरूरत होगी। खुद सरकार ने 4000 हजार से भी ज्यादा शहरों में स्वच्छता अभियान पर 62 हजार करोड़ रुपये के करीब की पांच सालों की योजना बनायी है। इसमें केंद्र सरकार 14,600 करोड़ रुपये से ज्यादा की सहायता देगी। ग्रामीण इलाकों के लिए पेय जल व स्वच्छता मन्त्रालय अपने बजटीय अनुदान से धन मुहैया कराएगा।

डब्ल्यूएसपी की रिपोर्ट में अपर्याप्त स्वच्छता की वजह से वर्ष 2006 में 2.44 खरब रुपये या प्रति व्यक्ति 2,180 रुपये का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया। ये सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 6.4 प्रतिशत के बराबर है। इसमें स्वास्थ्य पर होने वाला असर अकेले 1.75 खरब रुपये (कुल असर का 72 प्रतिशत) की हिस्सेदारी रखता है। कुल नुकसान में चिकित्सा पर होने वाले खर्च का अनुमान 212 अरब रुपये और बीमार होने से उत्पादकता के नुकसान का अनुमान 217 अरब रुपये लगाया गया। जीडीपी में पांच प्रतिशत औसत सालाना बढ़ोतरी भी रखें तो आकलन किया जा  सकता है कि आज की तारीख में ये नुकसान कितना ज्यादा हो जाएगा।

अभियान के लिए धन

लक्ष्य बड़ा है, जाहिर है कि काफी ज्यादा आर्थिक संसाधनों की जरूरत होगी। खुद सरकार ने 4000 हजार से भी ज्यादा शहरों में स्वच्छता अभियान पर 62 हजार करोड़ रुपये के करीब की पांच सालों की योजना बनायी है। इसमें केंद्र सरकार 14,600 करोड़ रुपये से ज्यादा की सहायता देगी। ग्रामीण इलाकों के लिए पेय जल व स्वच्छता मंत्रालय अपने बजटीय अनुदान से धन मुहैया कराएगा।

अब अकेले सरकार से ये सब कुछ संभव नहीं, इसीलिए कॉरपोरेट सेक्टर से भी सहयोग की अपेक्षा है। इसी को ध्यान में रखते हुए कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी यानी सीएसआर के तहत कुछ नयी बातें जोड़ी गयी हैं। एक, कम्पनियां सीएसआर के तहत तय राशि स्वच्छ भारत कोष में जमा करा सकती हैं। दो, सीएसआर के तहत स्वीकृति गतिविधियों में स्वच्छता को बढ़ावा देने को शामिल किया गया है। और तीन, सरकारी कम्पनियों को खास तौर पर कहा गया है कि उन्हे अपनी सीएसआर गतिविधियों में सभी के लिए साफ पीने का पानी, शौचालयों (विशेष तौर पर बालिकाओं के लिए), स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देनी चाहिए। नए कम्पनी कानून के

तहत कम्पनियों के लिए तुरंत के विगत तीन वर्षों में कमाए विशुद्ध लाभ का कम से कम दो प्रतिशत हर वर्ष सीएसआर पर खर्च करने का प्रावधान रखा गया है। आम आदमी भी स्वच्छता कोष में अपना योगदान दे सकता है। सरकार ने संकेत दिए हैं कि स्वच्छता कोष में योगदान पर वह कर में छूट की सुविधा दे सकती है।

वैसे तो स्वच्छता को लेकर बातें पहले भी कही जाती रहीं, लेकिन यह पहला मौका है जब प्रधानमन्त्री अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं। माहौल भी तैयार है। ये मत सोचिए कि आपका एक कदम स्वच्छता की ओर बढ़ाया गया ना केवल आसपास के माहौल को साफ बनाएगा, बल्कि हम-आपको और पूरे देश को आर्थिक तौर पर भी सबल बनाएगा और विश्व अर्थव्यवस्था में खास जगह दिलाएगा। बस जरूरत है सोच बदलने की और सोच को व्यापक बनाने की।

अन्त में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर स्थित मेडिसन स्क्वायर गार्डेन में भारतीय समुदाय को दिए प्रधानमन्त्री मोदी के भाषण का एक अंशः “गाँधीजी ने हमें आजादी दिलाई थी। भारत मां को गुलामी की जंजीरों से मुक्त किया। भारत मां को गन्दगी से मुक्त करना, क्या यह हमारी जिम्मेदारी है या नहीं है। क्या हम 2019 में जब गाँधीजी की 150वीं जयंती मनाए, तब महात्मा गाँधी के चरणों में  स्वच्छ-साफ हिंदुस्तान उनके चरणों में दे सकते हैं या नहीं दे सकते हैं? जिस महापुरुष ने हमें आजादी दी, उस महापुरुष को हम ये दे सकते हैं कि नहीं दे सकते हैं? देना चाहिए कि नहीं देना चाहिए? ये जिम्मेदारी उठानी चाहिए कि नहीं उठानी चाहिए? अगर एक बार सवा सौ करोड़ देशवासी तय कर लें कि मैं गन्दगी नहीं करुंगा, तो दुनिया की कोई ताकत नहीं है जो हिंदुस्तान को गन्दा कर सकती है।”

 

लेखक आर्थिक मामलों के जानकार-पत्रकार हैं। सम्प्रति ‘द हिन्दू बिजनेस लाइन’ में डिप्टी एडिटर हैं। आर्थिक नीतियों व संसदीय गतिविधियों पर नियमित लेखन। करीब दो दशक से पत्रकारिता में इसमें एक दशक से ज्यादा समय टीवी समाचार चैनलों में बीता। ईमेलः hblshishir@gmail.com

साभार : योजना जनवरी 2015

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