स्वच्छ भारत अभियान में सूचना प्रौद्योगिकी की महत्ता

Sunday, January 4, 2015 - 17:25

सन्दीप कुमार पाण्डेय

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जन्मतिथि 2 अक्तूबर को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत हुई और इस अभियान को नागरिक कर्तव्य से जोड़ कर राष्ट्रभक्ति की भावना से संजोया गया। हालांकि पिछली सरकारों ने भी इस तरह के कई प्रयास किये हैं लेकिन इस अभियान को मिल रहा व्यापक जनसहयोग और प्रचार-प्रसार, त्वरित और प्रभावी संचार क्रांति की ओर इंगित करता है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि स्वच्छ भारत अभियान और डिजिटल इण्डिया तथा इनके अन्तर्सम्बंधों का सम्यक अध्ययन किया जाये।

स्वच्छ भारत अभियान

स्वच्छ भारत अभियान का लक्ष्य साल 2019 (गांधीजी की 150वीं जयंती) तक हर गांव, शहर, कस्बे को साफ करने का उद्देश्य, पक्के टॉयलेट, पीने का साफ पानी, कचरा निपटाने की ठोस व्यवस्था करना है। वर्ष 2019 तक भारत को खुले में शौच (ओडीएफ) की प्रवृत्ति से मुक्त बनाना होगा और यह उद्देश्य व्यक्तिगत, सामूहिक और सामुदायिक शौचालय के निर्माण के माध्यम से हासिल किया जाना है तथा स्वच्छ ग्राम पंचायत के जरिये ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन के साथ गांवों को साफ रखे जाने, मांगानुसार सभी घरों को नलों के साथ जोड़कर सभी गांवों में पानी पाइपलाइन तक बिछाये जाने हैं। अभियान को सही तरीके से लागू करने के लिए 19 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया है जिसकी अध्यक्षता वैज्ञानिक रघुनाथ अनंत माशेलकर (वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के पूर्व महानिदेशक) कर रहे हैं। यह समिति विभिन्न राज्यों में स्वच्छता और पानी की सुविधा देने के सबसे श्रेष्ठ और आधुनिक तरीकों पर सुझाव सौंपेगी।

2011 की जनगणना के हिसाब से, 16.78 करोड़ घरों की लगभग 72.2 प्रतिशत भारतीय जनसंख्या 6,38,000 गांव में रहती है। इनमें से सिर्फ 5.48 करोड़ ग्रमीण घरों में शौचालय है जिसका मतलब यह है कि देश के 67.3 प्रतिशत घरों के लोग अब भी शौच के लिए झाडि़यों के पीछे, खेतों में या सड़क के किनारे जाते हैं। कुछ ग्रामीण इलाकों में जहां शौचालय हैं वहां भी पानी की उपलब्धता नहीं है और ग्रामीण, शौचालयों की उपयोगिता पर सवाल खड़े करते हैं। इससे अन्य कई समस्याएं उत्पन्न होती हैं, जैसे बच्चों की असमय मौत, संक्रमण और बीमारियों का फैलना और सबसे अहम सुनसान स्थान पर शौच के लिए गई युवतियों का बलात्कार आदि।

स्वच्छ भारत अभियान के दो उप अभियान हैं, स्वच्छ भारत ग्रामीण अभियान तथा स्वच्छ भारत शहरी अभियान जिसके क्रियान्वयन पर 1.96 लाख करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। इसमें से 1.34 लाख करोड़ गांवों में 11 करोड़ पक्का टॉयलेट बनवाने पर खर्च होंगे और शहरी इलाकों में 5.1 लाख पब्लिक टॉयलेट्स पर 62 हजार करोड़ खर्च का अनुमान है। इसे तालिका 1 में देखा जा सकता है।

 

तालिका 1: आधारभूत सर्वेक्षण 2013 के अनुसार आवश्यक स्वच्छता संरचनाए

          घटक

      संख्या

भारत में कुल घरों की संख्या

17.13 करोड़

आईएचएचएल

11.11 करोड़*

विद्यालय में शौचालय

56,928

आंगनवाड़ी शौचालय

1,07,695

सामुदायिक स्वच्छता परिसर

1,14,315

*(इनमें से केवल 8,84,39,786 ही पात्र # श्रेणी के अंतर्गत है)

            योजना के लिए शेष परिवार :

कुल परिवार

11.11 करोड़

(-) अपात्र एपीएल

0.88 करोड़

(-) निष्क्रिय

1.39 करोड़

शुद्ध # बीपीएल पात्र एवं 8.84 करोड़ एपीएल पात्र

  

स्रोतः योजना, अक्टूबर, 2014

 

लेखक सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्रा के विशेषज्ञ हैं। भारत सरकार के पोर्टल ww.india.gov.in में टीम लीडर का दायित्व संभालने के साथ राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र की पत्रिका इंफोर्मेटिक्स के सम्पादन मंडल में रह चुके हैं। सम्प्रति आइडिया क्रैकर्स नाम से आईटी सोल्युसंस कम्पनी तथा ब्लॉग एग्रीगेटर www.blogprahari.com का संचालन कर रहे हैं। ईमेलः mail@kanishkakashyap.com

डिजिटल इण्डिया मिशन

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्रा में भारतीय अग्रणी राष्ट्रों में से एक है। वेब, एप्लीकेशन और क्लाउड कम्प्यूटिंग के बात करें तो सबसे बेहतरीन कौशल भारत में मिलेंगे। ऐसे में भारत सरकार द्वारा नागरिक सहभागिता और सुशासन को ध्यान में रखकर, अभिनव विचार-विमर्श को आमंत्रित करने के लिए माई गवर्नमेंट जैसी वेब परियोजनाओं को बड़ी संख्या में जन समर्थन मिल रहा है। विचार-विमर्श से आगे बढ़कर जमीनी योगदान देने वालों के लिए माई गवर्नमेंट पोर्टल अनेक अवसर देता है। माईगॉव पर ‘डिजिटल इण्डिया’ समूह के भाग के रूप में 1,70,000 से अधिक सदस्य हैं। नागरिकों द्वारा विभिन्न कार्यों के लिए प्रविष्टियां भारी संख्या में प्राप्त हो रही हैं। इस मंच को स्वच्छ गंगा, बालिका शिक्षा, स्वच्छ भारत, कौशलपूर्ण भारत, डिजिटल भारत और रोजगार सृजन जैसे विभिन्न समूहों में बांटा गया है। प्रत्येक समूह को ऑनलाइन तथा  ऑनग्राउंड कार्य दिए गए हैं जिसे योगदानकर्ता अपने हाथ में लेंगे। इसका उद्देश्य लोगों की भागीदारी के जरिए गुणात्मक परिवर्तन लाना है। स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत हो रही प्रगति को माई गवर्नमेंट साईट पर समयक्रम में देखा जा सकता है।

डिजिटल इण्डिया में नौ स्तम्भ सम्मिलित हैं - ब्राडबेण्ड हाई-वे, मोबाइल कनेक्टिविटी के लिए सार्वभौमिक एक्सेस, जनता इन्टरनेट एक्सेस कार्यक्रम, ई-गवर्नेन्स-तकनीकी के जरिये सरकार में सुधार, ई-क्रान्ति-सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रदान करना, सभी के लिए सूचनाएं, इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन, नौकरियों के लिए आईटी, जल्दी पैदावार कार्यक्रम। ये सभी एक मिश्रित कार्यक्रम है और सभी मंत्रालयों एवं सरकारी विभागों से जुड़े हुये है।

डिजिटल इण्डिया के तहत जिस फार्मूले पर ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है, वह है भारतीय प्रतिभा (आईटी)+ सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी)= कल का भारत (आईटी)। रेखांकित करने योग्य पहलू यह है कि डिजिटल इण्डिया की रचना और निगरानी कमेटी के चैयरमेन स्वयं प्रधानमंत्री हैं। डिजिटल इण्डिया पर कुल मिलाकर लगभग एक लाख तेरह हजार करोड़ रुपये खर्च होना संभावित है। साथ ही डिजिटल डाटा के बढ़ते प्रवाह को देखते ही सुपर कम्प्यूटिंग के क्षेत्रा में भी बड़ी छलांग की जरूरत महसूस कि जा रही

है। सुपर कंप्यूटिंग कार्य कलापों को शुरु करने के लिए वर्ष 2014-15 में राष्ट्रीय सुपर कंप्यूटिंग मिशन के लिए 42.50 करोड़ रुपए का प्रस्ताव किया गया है। भारत के शहरी क्षेत्रों में मोबाइल की कनेक्टिविटी 146 प्रतिशत है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 46 प्रतिशत के करीब है। डिजिटल इण्डिया के अंतर्गत शहर और ग्राम के बीच इस अंतराल को भरने के लिए सभी गाँव को ब्रॉडबैंड से जोड़ा जाना है।

डिजिटल इण्डिया अभियान के अनुप्रयोग

सोशल मीडिया और कन्वर्जेंस, एप्लीकेशंस और डाटा ट्रांसफर स्पीड में आये क्रांतिकारी बदलाव, सुपरकम्प्यूटर्स की बढ़ती डाटा प्रोसेसिंग क्षमता ने डाटा प्रबंधन और शोध के आधार पर नयी संभावनाओं को जन्म दिया है। फलस्वरूप सरकारी नीतियों के लिए सुविधापूर्वक और पारदर्शिता के साथ क्रियान्वित होने की संभावनाओं को भी बल मिला है। ‘डिजिटल इण्डिया’ का उद्देश्य भारत को तकनीकी दृष्टि से मजबूत बना सशक्त समाज और ज्ञान-अर्थव्यवस्था में तब्दील करना है। विकास की नयी परिभाषा स्मार्ट सिटी के रूप उभर कर, स्वस्थ और सबल नागरिक जीवन की तस्वीर को सामने रखती है। इसलिए डिजिटल इण्डिया अभियान के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया जायेगा कि सरकारी सेवाओं का लाभ सभी को सुचारू ढंग मिले तथा स्मार्ट सिटी की नयी परिकल्पना के लिए आवश्यक तकनीक, संसाधन और अनुभव सामने आयें। सूचना और संचार प्रौद्योगिकी में आये बदलावों के प्रत्यक्ष प्रभाव को विनिमय, अपराध नियंत्रण, मीडिया, राजनीती, बाज़ार, विपणन, स्वास्थ्य, शिक्षा, शासन आदि में स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है और ऐसे में स्मार्ट सिटी को भी डिजिटली स्मार्ट बनना होगा।

इन्टरनेट और कंप्यूटर के गांवो में तेजी से हो रहे विस्तार ने विभिन्न योजनाओं की जमीनी स्तर पर सक्रिय जनोपयोगिता को सुनिश्चित किया है। स्वस्थ और सुरक्षित जीवन की व्यापक परिधि के केंद्र में तकनीक पर निर्भरता को सक्रिय सरकारी योजनाओं में पिरोकर बहुत कुछ बदला जा सकता है। ‘डिजिटल इण्डिया’ व्यापक कार्यक्रम है जो अनेक सरकारी मंत्रालयों और विभागों के कार्यप्रणाली और योजनाओं को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह तरह-तरह के विचारों को एकल एवं व्यापक दृष्टि में समाहित कर एक बड़े लक्ष्य को सामने रखेगा। डिजिटल इण्डिया कार्यक्रम का समन्वय इलेक्ट्रोनिक्स एवं संचार प्रौद्योगिकी विभाग (डीईआईटीवाई) द्वारा किया जाना है और अमल समूची सरकार द्वारा किया जाना है। डिजिटल इण्डिया का विज़न तीन प्रमुख क्षेत्रों पर केन्द्रित है। ये हैं - हर नागरिक के लिए उपयोगिता के तौर पर डिजिटल ढांचा, मांग पर संचालन एवं सेवाएं और नागरिकों का डिजिटल सशक्तीकरण। तकनीक और सूचना प्रौद्योगिकी के बढ़ते हस्तक्षेप के बीच जहाँ स्वच्छ भारत अभियान को स्वयं तकनीकी रूप से मजबूत होने की आवश्यकता है वहीं प्रत्येक व्यक्ति को इसके लिए जागरूक करना मीडिया और गैर-सरकारी संगठनों की सक्रिय भागदारी से ही सुनिश्चित हो सकेगा। मंत्रालयों तथा केंद्रीय एवं राज्य की योजनाओं के बीच सहयोग और तालमेल, सीएसआर एवं द्विपक्षीय/बहुपक्षीय सहायता के साथ सभी तरह के नवीन एवं अभिनव उपायों के वित्तपोषण के माध्यम से यह संभव किया जाना है।

भारत सरकार की महत्वपूर्ण आईसीटी योजनायें

सरकार ने सेवा प्रदायगी के लिए आईसीटी के इस्तेमाल को प्राथमिकता दी है और नागरिकों के विचार जानने के लिए फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया टूल्स का सदुपयोग कर रही है। प्रमुख आईसीटी योजनाओं में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य देखरेख सेवाओं का पता लगाने के लिए मातृ एवं शिशु ट्रैकिंग प्रणाली (एमसीटीएस), सुविधा स्तर पर सेवा प्रदायगी की निगरानी के लिए स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली (एचएमआईएस), संशोधित टीबी नियंत्राण कार्यक्रम की निगरानी, केन्द्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) के अंतर्गत पंजीकरण एवं औषधि प्रदायगी के लिए ऑनलाइन टेली-मेडिसिन प्रणाली, चिकित्सकीय स्थापनाओं, मेडिकल स्टोर का ऑनलाइन पंजीयन, आपूर्ति-श्रृंखला प्रबंधन आदि जैसी आईटी प्रणालियों का अखिल भारतीय स्तर पर कार्यान्वय शामिल है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने नागरिकों के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य पोर्टल लांच किया है जिसकी मदद से स्वास्थ्य सूचना आसानी से प्राप्त की जा सकती है।

आईसीटी और स्वच्छ भारत अभियान

स्वच्छ भारत अभियान में भी नागरिक सहभागिता को आईसीटी के माध्यम से अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है, जिससे आम आदमी भी डाटा के संचयन और निगरानी में सक्रिय योगदान दे सके। इनमें प्रमुख हैंः

1. मोबाइल एप्लीकेशंस के माध्यम से लोगों के कचरे के ढेर और अनियमितता को स्थानीय निकायों को सूचित करने के लिए जीपीएस से जोड़ कर, तस्वीरों को भेजने का विकल्प दिया जा सकता है। इस तरह प्राप्त किये गए सचित्रा प्रतिक्रिया के डाटा को मैप से जोड़कर संवेदनशील क्षेत्रों को चिन्हित किया जा सकेगा ताकि उन्हें वरीयता दी जा सके।

2. जन सहभागिता से निर्मित हीट-एरिया का डाटा स्वास्थ्य सम्बन्धी नीतियों की प्राथमिकता निर्धारित करने में भी सहायक होगा।

3. अपशिष्ट को ठोस, तरल, रासायनिक व गैर-रासायनिक, प्लास्टिक, ई-वेस्ट, बायोमॉस आदि वर्गों में छांटने की समझ विकसित करने में भी एप्लीकेशंस की मदद ली जा सकती है, जिससे पैदा हुए अपशिष्ट के सही निपटान की जानकारी लोगों को मिल सके।

4. सार्वजनिक शौचालयों के आलावा निजी शौचालयों को भी स्वैच्छिक भागीदारी से जन उपयोग में लाया जा सकता है जिसके लिए लोग अपने निजी शौचालय को भी लिस्ट कर औरों के लिए उपलब्ध करा सकते हैं।

मल निपटान/पुनर्चक्रण में नवीनतम प्रथाएं

वैश्विक स्तर पर लगभग 2.5 अरब से भी ज्यादा की आबादी के पास शौचालय नहीं है। गौरतलब है कि जहाँ सरकार इतने पैसे शौचालयों के निर्माण पर खर्च कर रही वहीं यह भी आवश्यक हो जाता है कि इन शौचालयों को भी नवीनतम तकनीक से जोड़ा जाए।

गेट्स फाउंडेशन इस दिशा में शोध को प्रोत्साहित करता रहा है। उनका उद्देश्य कम लागत के ऐसे शौचालयों के तकनीक विकसित करना है जिसे बिना जल और बिना किसी बाहरी ऊर्जा के उपयोग में लाया जा सके। साथ ही जैविक मल ही ऊर्जा और जल का स्रोत बने। गेट्स फाउंडेशन ने 2011 में रिइन्वेंट द टॉयलेट चैलेंज नाम की पहल की, जिससे शोधकर्ताओं को उन्नत किस्म के शौचालयों के निर्माण के लिए प्रेरित किया जा सके। कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी को 2012 में 1,00,000 लाख अमेरिकी डॉलर का इनाम सौर ऊर्जा से संचालित शौचालयों के मॉडल प्रस्तुत करने के लिए मिला। यह शौचालय हाइड्रोजन और बिजली के उत्पादन में सक्षम थे। 2013 में इस चैलेंज को भारत और चीन में लाया गया। गेट्स फाउंडेशन ने अभी तक सोलह से भी अधिक शोध संस्थानों को इस दिशा में शोध के लिए अनुदान दिया है।

 

सूचना-प्रौद्योगिकी इन दिनों जीवन के हर क्षेत्र में दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुकी है। छोटी-छोटी जरूरतों पर भी समाधन बस अंगुलियों की हलचल के जरिए आपके डेस्कटॉप या स्मार्टफोन की स्क्रीन पर हाजिर होता है। ऐसे में क्या स्वच्छ भारत अभियान को अधिक प्रभावी बनाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अपना कमाल नहीं दिखा सकती! एनआरएचएम, एम-गवर्नेंस व मोबाइल आधारित कई सेवाओं की सफलता को देखते हुए ठोस अपशिष्ट के प्रबंधन से लेकर जैविक मल निपटान तक इस दिशा में अपार संभावनाएं दिखती हैं।

 

बिल एंड मेलिंडा गेटस फाउंडेशन द्वारा मार्च 2014 में नई दिल्ली में दूसरा ‘रिइन्वेंट द टॉयलेट चैलेंज’ भारत के शहरी विकास मंत्रालय के समर्थन और जैव प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के सह-आयोजन में संपन्न हुआ। इस आयोजन का उद्देश्य 2.5 अरब लोगों के लिए सुरक्षित, सस्ती स्वच्छता लाने के लिए चर्चा को प्रोत्साहित करना और भागीदारी सुनिश्चित करना था। टॉयलेट फॉर पीपल नाम की संस्था ने घर के अंदर प्रयोग में आने वाले नवीन शौचालयों के निर्माण में सफलता पाई है जो बगैर पानी के काम करते हैं, इनका रख-रखाव आसान है और इनकी लागत मूल्य लगभग 10 हजार रुपये है। पीपूल नाम की एक स्वीडिश कंपनी 6 रुपये मूल्य की एकल उपयोग, बायो-डिग्रेडेबल बैग का उत्पादन करती है, जिसके प्रयोग के बाद पीपू बैग में मौजूद यूरिया रोगज़नक़ों के विकास को अवरुद्ध कर देता है। हालांकि जानकारों का यह भी मानना है कि हाई-टेक शौचालयों के निर्माण के बदले कम लागत के टिकाऊ शौचालयों के निर्माण और शोध को वरीयता दिया जाना ज्यादा व्यावहारिक होगा।

अन्य अपशिष्ट निपटान के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकी प्रयोग

सूचना प्रौद्योगिकी जीवन के अन्य क्षेत्र अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के साथ ही अपशिष्ट संग्रह और निष्पादन उद्योग में कारगर साबित हुई है। अपशिष्ट निष्पादन समुदायों और उद्योगों दोनों के लिए महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दा है। स्थायी प्राकृतिक पर्यावरण को बढ़ावा देने के क्रम में, अपशिष्ट पुनर्चक्रण के माध्यम से कचरा उत्पादन को कम करने और उसे पुनः उपयोग में लाने को अब विश्व स्तर पर महत्व दिया जा रहा है।

प्रभावी कचरा प्रबंधन जागरूकता और जन-सामाजिक भागीदारी के साथ शुरू होता है। ज्ञान के संग्रह और डाटा के उचित विश्लेषण के माध्यम से जानकारी और सूचना एकत्रित किया जाता है। अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में तेजी से हो रहे विस्तार के पीछे सक्षम प्रौद्योगिकी समाधान की भूमिका महत्वपूर्ण है।

स्वच्छ भारत अभियान की सफलता में तकनीक की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। जहाँ सार्वजनिक शौचालयों को भी कचरा निष्पादन में प्रयुक्त तकनीक को शौचालयों के परिप्रेक्ष्य में लागू किया जा सकता है वहीं मोबाइल एप्लीकेशंस की मदद से सार्वजनिक शौचालयों को मैप से जोड़कर कर इस जरुरी जनसुविधा को अंगुलियों पर उपलब्ध कराया जा सकता है।

प्रभावी कचरा प्रबंधन जागरूकता और जन-सामाजिक भागीदारी के साथ शुरू होता है। ज्ञान के संग्रह और डाटा के उचित विश्लेषण के माध्यम से जानकारी और सूचना एकत्रित किया जाता है। अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में तेजी से हो रहे विस्तार के पीछे सक्षम प्रौद्योगिकी समाधान की भूमिका महत्वपूर्ण है।

एप्लिकेशंस की मदद

ऐसे कई एप्लीकेशन गूगल प्ले स्टोर और एप्पल स्टोर पर मिल जायेंगे जो शौचालयों को मैप से जोड़कर आपको सबसे करीब उपलब्ध शौचालय तक का रास्ता दिखाते हैं। ब्रिस्टल शहर के आई-फोन उपभोक्ताओं के लिए टॉयलेट फाइंडर नाम से एक एप्प मौजूद है, जो 70 हज़ार टॉयलेट्स को गूगल मैप से जोड़ता है। गूगल स्टोर पर भी ‘फाइंड टॉयलेट्स’ नाम के एप्लिकेशन को देखा जा सकता है।

 

व्यवसायिक पहलुओं पर नज़र डालें तो आई-फोन उपभोक्ताओं के लिए Airpnp.co नाम का एप्प (चित्र 1) अमेरिका में खासा लोकप्रिय है। जहाँ आप अपने निजी शौचालय को जरूरतमंदों के लिए एक मामूली शुल्क पर उपलब्ध करा सकते हैं। एप्लिकेशन की मदद से जरूरतमंद व्यक्ति, सबसे नजदीकी शौचालय को बुक कर सकता है और प्रयोग करने के बाद अपनी रिव्यू दे सकता है। ऐसे में टीवी, पत्रा-पत्रिकाओं, संगीत आदि से सज्जित खुशनुमा माहौल के शौचालय भी आपको कम शुल्क पर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।

 

आस्ट्रेलिया सरकार अपने नेशनल कंटीनेंस प्रोग्राम के अंतर्गत 16,000 जन शौचालयों को मैप से जोड़कर, उनके खुलने और बंद होने के समय और उपलब्ध सुविधाओं जैसे स्नान करने की सुविधा इत्यादि के साथ अभियान के आधिकारिक वेबसाईट पर उपलब्ध कराती है। इस वेबसाईट की मदद से आप अपनी यात्रा को प्लान करते समय, रास्ते में आने वाले सभी शौचालयों को चिन्हित कर सहेज सकते हैं और साथ ही नए शौचालयों को भी वेबसाईट से जोड़ने का सुझाव दे सकते हैं। नेशनल कंटीनेंस प्रोग्राम के क्रियान्वयन के लिए एक राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया गया है

जिसपर सुझाव और शिकायतों का निपटारा किया जाता है।

क्या है तकनीकी समाधान

डाटा एकत्रा करने की प्रौद्योगिकी, पुनर्चक्रण योजनाओं के प्रदर्शन और निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में निजी क्षेत्र की भागीदारी से पूर्व यह सुनिश्चित करना होगा कि ठेकेदारों को आवश्यक अनुभव और समझ हो। वह नियत स्थान पर भरे हुए कंटेनर उठाने तभी पहुचें जब वह पूरी तरह भर चुके हों जिससे अनावश्यक फेरी की आवृत्तिकम हो सके। कंटेनर से प्राप्त सूचना के आधार पर सबसे नजदीक घूम रही कचरा गाड़ी को जीपीएस से चिन्हित कर सूचित करने से ईंधन, कर्मचारियों के समय और पैसे की बचत की जा सकती है।

अपशिष्ट प्रबंधन उद्योग के लिए बुनियादी सॉफ्टवेयर को बनाना और उसे उपयोग में लाना जटिल प्रक्रिया है। कई संभावित परस्पर विरोधी नियमों के बिच, क्षमता और उच्च सुरक्षा मानकों को पूरा कर पाना आसन नहीं होता। ऐसे में भारतीय परिप्रेक्ष्य में ऐसी कोई भी सूचना प्रौद्योगिकी समाधान को अभिनव होना होगा। साथ ही इसके व्यापार सम्बन्धी प्रक्रियाओं पर बारीक निगरानी रखनी होगी। चुकि इतने विशाल डाटा के प्रबंधन के साथ-साथ, उसकी सुरक्षा, बिल भुगतान सम्बंधित अनियमितताओं जैसी चुनौतियां प्रबल होंगी। इस योजना को निम्नलिखित तीन महत्वपूर्ण तकनिकी खेमे में बाँट कर समझा जा सकता है।

रेडियो फ्रीक्वेंसी पहचान (आरएफआईडी) तकनीक

यह तकनीक व्यापक रूप से अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली में प्रयोग में लायी जाती है। कूड़ेदान में लगे माइक्रोचिप की मदद से कूड़ा की स्थिति पता लगाया जाता है। जब अपशिष्ट संग्रह वाहन, घर के सामने से गुजरता है तो वह चिप को स्कैन कर सिग्नल प्राप्त करता है, और उस डाटा को घर विशेष के डाटाबेस से सम्बद्ध कर देता है। इस तकनीक के माध्यम से सेवा के नियमितता और बिल भुगतान संबंधी परेशानियों को ख़त्म किया जा सकता है। ऐसे में गलतियों की सम्भावना नहीं रह जाती। वास्तविक समय संचार प्रौद्योगिकी (रियल टाइम कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी) के साथ संयुक्त

रूप से उपयोग से, इस डाटा को कभी भी, कहीं भी उपयोग में लाया जा सकता है।

अपशिष्ट प्रबंधन ट्रैकिंग (जीपीएस)

अपशिष्ट प्रबंधन उद्योग में जीपीएस ट्रैकिंग, संपूर्ण कार्यप्रणाली की दक्षता में सुधार, त्रुटियों को कम करने, कर्मचारियों के प्रदर्शन को बेहतर बनाने और ईंधन की खपत को कम करने में सहायक है। जीपीएस ट्रैकिंग की मदद से अपशिष्ट संग्रह वाहन और कर्मचारियों को वास्तविक समय में ट्रैक कर पाना और उनसे निरंतर प्रतिक्रिया प्राप्त करना संभव हो जाता है। ऐसे में वाहनों को विभिन्न अपशिष्ट केन्द्रों पर जाने का निर्देश ज्यादा तीव्रता और कुशलता से भेजा जा सकता है। जीपीएस ट्रैकर चिन्हित और भर चुके अपशिष्ट बिंदु के सबसे नजदीक घूम रहे वाहन को सूचित कर, समय, धन, ईंधन और श्रमशक्ति की बचत में सहायक होता है।

ऑफ साइट रियल टाइम मॉनीटरिंग

ऑफ-साईट रियल टाइम मॉनीटरिंग सॉफ्टवेयर को व्यापक तौर पर अपशिष्ट प्रबंधन उद्योग में अपनाया जाता है। जब अपशिष्ट संग्रह वाहन एक जगह से दूसरी जगह कचरा इकट्ठा कर रहा होता है, वह एक तस्वीर भी पर्यवेक्षकों तक भेजता है, जिसमे कूड़ेदान की भू-स्थिति, तिथि, समय और स्टैम्प आदि का विवरण होता है। सभी महत्वपूर्ण डाटा तस्वीरों के माध्यम से सहेज कर एक केंद्रीकृत सर्वर पर रखा जाता है। अक्सर इस सॉफ्टवेयर को जनरल पाकेट रेडियो सेवा (जीपीआरएस) तकनीक के साथ संयुक्त रूप से कॉन्फिगर किया जाता है जिससे कि मोबाइल नेटवर्क पर भी सूचनाओं का आदान-प्रदान हो सके। समस्त डाटा केंद्रीय सर्वर पर सुरक्षित रहने के कारण विभिन्न हितधारकों अपने-अपने स्तर पर डाटा, डाटा प्रोसेसिंग में भाग ले पाते हैं।

 

विकासशील देशों में अपशिष्ट उत्पादन एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है जिसमे वेस्ट इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट ;डब्ल्यूईईईद्ध जिसे इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) भी कहते हैं, कृषि बायोमास और बेकार प्लास्टिक अपशिष्ट के उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई है। 3R (रिड्यूस, रियुज और रिसाइकल) के माध्यम से प्रभावी और कुशल अपशिष्ट प्रबंधन से खपत और उत्पादन के मध्य उचित सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। एकीकृत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (आईएसडब्ल्यूएम) और अपशिष्ट से उपयोगी सामग्री/ऊर्जा निकाल लेने से जहाँ एक ओर संसाधन क्षमता को बढ़ाया जा सकता है वहीं पर्यावरण पर इसके प्रतिकूल प्रभाव को भी कमतर किया जा सकता है। पर्यावरण उन्मुख टेक्नोलॉजी ;ईएसटीएसद्ध अपशिष्ट प्रबंधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण

प्रौद्योगिकी केंद्र (आईईटीसी) ने इस दिशा में वैश्विक स्तर पर सराहनीय प्रयास किये हैं। अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्रा में आईईटीसी ने निम्नलिखित चार महत्वपूर्ण दिशाओं में कार्य कियेः

1. प्रदर्शन/प्रायोगिक परियोजनाओं का क्रियान्वयन

2. प्रौद्योगिकी समर्थन देना

3. क्षमता निर्माण के लिए कार्य करना

4. अपशिष्ट प्रबंधन में वैश्विक भागीदारी के लिए सचिवालय का निर्माण करना

लेसोथो व श्रीलंका में किये एकीकृत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (ISWM) के माध्यम से भारी मात्रा में उपयोगी सामग्री और ऊर्जा निकलने में सफलता मिली है जिससे की निपटान के लिए अपशिष्ट की मात्रा को बेहद कम किया जा सकता है। आईईटीसी की दूसरी सार्थक पहल अपशिष्ट प्रबंधन पर वैश्विक भागीदारी (GPWM) सुनिश्चित करना है। अपशिष्ट प्रबंधन पर वैश्विक भागीदारी (GPWM) अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों, सरकारों, स्थानीय/नगर निगम के अधिकारियों, व्यापार, शिक्षा और

गैर-सरकारी संगठनों के लिए स्वतन्त्रा साझेदारी के अवसर देता है। इसे चित्रा 2 में समझा जा सकता है। इसके प्रमुख लक्ष्य हैंः

1. राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर अपशिष्ट प्रबंधन के विकास का समर्थन करना ताकि अपशिष्ट जनित पर्यावरण, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों पर विजय पाया जा सके

2. अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में चल रहे क्रियाकलापों को बढ़ावा देना ताकि सही दृष्टिकोण पैदा हो सके और अपशिष्ट प्रबंधन में समग्र प्रयास की जो खाई है, उसे कम किया जा सके

3. ऐसे सभी उपक्रम को बढ़ावा देना जो नीति वार्ता और अन्य सम्बंधित गतिविधियों से सम्बन्ध रखते हो ताकि अनुभव और सफल प्रथाओं का आदान-प्रदान हो सके

4. अपशिष्ट प्रबंधन के लिए आवश्यक आधारभूत जरूरतों और मौद्रिक आवश्यकताओं को पूरा करने में बाहिरी मदद की कोशिश करना तथा तकनीक और वितीय सहयोग से लेन-देन की लागत को कम करना

5. जानकारी मंच एक ऐसा फ्रेमवर्क है जो ठोस अपशिष्ट के प्रबंधन और निपटान से संबंधित मुद्दों पर जानकारी जुटाने तथा साझा करने की प्रवृति को बढ़ावा देने के लिए कार्य करता है। यह कई देशों, क्षेत्रों, और अनेक शहरों में सार्वभौमिक पहुँच बनाने में सफल रहा है।

हमें स्वच्छ भारत अभियान के सफल क्रियान्वयन के लिए ऐसे सभी मॉडल्स को सूक्षमता से परखना होगा ताकि उचित तकनीक और व्यवहारिक शोध को शामिल कर अभियान की सफलता के प्रति आश्वस्त हुआ जा सके। सरकार अब पहले से ज्यादा आशावान और सकारात्मक जरूर दिख रही है, परन्तु सफलता के लिए विस्तृत ब्लू प्रिंट बनाना जरूरी है, जिसमें तकनीक की अहम भूमिका होगी। समग्र तरीके से स्वच्छ भारत अभियान को लागू करने, उसे तकनीकी रूप से सुदृढ़ बनाने, सरकार, लोगों और गैर सरकारी संगठनों, राज्यों इत्यादि के प्रयासों से आने वाले सालों में भारत अवश्य एक स्वच्छ देश बन सकता है और हम वैश्विक मानदंड पर उच्चतर श्रेणी में शामिल हो सकते हैं।

सन्दर्भ:

1.http://pib.nic.in/newsite/hindifeature.aspx?

relid=31554

2.http://hindi.mapsofindia.com/government-ofindia/ swachh-bharat-abhiyan.html

3.स्वच्छ भारत अभियानः चुनौतियां और समाधन, योजना, अक्टूबर 2014

4.http://www.bhaskar.com/news-ht/NAT-primeminister-narendra-modi-starts-swach-bharatabhiyan-pays-tribute-to-mahatma-476358-

PHO.html

5.http://pib.nic.in/newsite/hindirelease.aspx?

relid=31925

6.http://pib.nic.in/newsite/hindirelease.aspx?

relid=2927

7.http://swachhbharat.mygov.in/

8.http://pib.nic.in/newsite/hindirelease.aspx?

relid=29947

9.http://pib.nic.in/newsite/hindirelease.aspx?

relid=29947

10.http://pib.nic.in/newsite/PrintHindiRelease.aspx?relid=32004

11.http://pib.nic.in/newsite/PrintHindiRelease.aspx?relid=31925

12.https://www.gatesfoundation.org/What-We-Do/Global-Development/Reinvent-the-Toilet-

Challenge

13.https://www.gatesfoundation.org/What-We-Do/Global-Development/Reinvent-the-Toilet-

Challenge

14.http://www.airpnp.co/

15.https://toiletmap.gov.au/

16.http://www.unep.org/ietc/OurWork/Waste

Management/tabid/56239/Default.aspx

साभार : योजना जनवरी 2015

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