भारत में स्वच्छता और सामाजिक परिवर्तन

Saturday, January 3, 2015 - 14:16

विजयन के पिल्लई

रूपल पारेख

दुनिया में 2.6 अरब लोगों के पास शौचालय की सुविधा नहीं हैं और उनमें से लगभग 65 करोड़ लोग भारत में रहते हैं। स्वच्छता के इस विशालकाय समस्या से निजात पाने के लिए भारत सरकार ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत की है। इस कार्यक्रम की सफलता तथा विशेष तौर पर इसका दीर्घायु होना संभवतः सामाजिक संरचनात्मक शक्तियों के साथ जुड़ने पर निर्भर करता है, जो निन्म स्वच्छता स्थिति को संचालित करती है। इस अध्ययन का उद्देश्य भारत में स्वच्छता के सामाजिक संरचनात्मक संदर्भ की खोज करना है। हम स्वच्छता के एक बहुभिन्नरूपी मॉडल का प्रस्ताव देते हैं तथा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-प्प्प् से लिए गए आंकड़ों के साथ इसके अनुभवजन्य वैधता का मूल्यांकन करते हैं। हम पाते हैं कि स्वच्छता की स्थिति की बेहतरी में आधुनिकीकरण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ज्यादा महत्वपूर्ण तरीके से हम सलाह देते हैं कि यह कार्यक्रम सफल हो सके, इसके लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है, जो आधुनिक सुख सुविधाएं तथा जनस्वास्थ्य शिक्षा को लोगों के दरवाजे तक ले जाएं।

2050 तक विश्व की जनसंख्या संभवतः 9.6 अरब तक पहुंच जाएगी और इस जनसंख्या का लगभग 66 प्रतिशत लोग शहरी क्षेत्रों में रह रहे होंगे (पोर्टर, डायबॉल, डमार्स्क, डॉच एवं मत्सुदा, 2014 यइवान्स, 1998)। इसका मतलब है कि 2050 तक इस जनसंख्या में 2.4 अरब लोग और जुड़ जायेंगे और शहरी जनसंख्या में 12 प्रतिशत का इजाफा हो जाएगा। भारत जैसे विकासशील देशों में जनसंख्या वृद्धि बेहद उच्च है, हालांकि हाल के दशकों में कुल प्रजनन दर में गिरावट आयी है, लेकिन जनसंख्या गति के कारण जनसंख्या आकार लगातार तेजी से बढ़ता रहा है (चंद्रशेखर, 2013)। यद्यपि विकसित देशों के मुकाबले विकासशील देशों में शहरी जनसंख्या का अनुपात कम है, विश्व की शहरी जनसंख्या की लगभग 53 प्रतिशत जनसंख्या एशियाई विकासशील देशों में रहती है। संभवतः इस तेजी से बढ़ती जनसंख्या का सबसे अनापेक्षित परिणाम लचर स्वच्छता स्थिति है, जिसके कारण यहां निम्न स्वास्थ स्थिति है (रेनर एवं लंग 2013)।

 

निम्न स्वच्छता दर को बहुत सारे आर्थिक तथा सामाजिक मुद्दों के साथ जोड़ दिया गया है। जल तथा स्वच्छता कार्यक्रम रिपोर्ट के अनुसार 2006 में अपर्याप्त स्वच्छता के कारण 53.8 अरब यूएस डॉलर का नुकसान हुआ जो भारत के कुल घरेलू उत्पाद का 6.4 प्रतिशत है। इस असर का लगभग 72 प्रतिशत जिम्मेदार स्वास्थ्य सम्बन्धित मामले थे। निम्न स्वच्छता दर के सामाजिक परिणामों की अभी तक पर्याप्त छानबीन नहीं हुई है।

1990 से 2008 के बीच के तथ्यों द्वारा यह साफ संकेत मिलता है कि ज्यादातर विकासशील देशों में जन योजनाएं तथा नीतियां बुनियादी सफाई मुद्दे पर असफल हुई हैं। बुनियादी स्वच्छता के उपयोग के साथ दुनिया की आबादी की हिस्सेदारी सिर्फ 54 प्रतिशत से बढ़कर 61 प्रतिशत हुई है और अब भी विश्व स्तर पर लगभग 2.6 अरब लोगों के पास किसी तरह के शौचालय की सुविधाएं नहीं हैं ;माजरा एवं गर, 2008: (मो एवं र्हिंगन्स, 2006)। इस मामले की गंभीरता 2000 में एक सहस्राब्दि विकास लक्ष्य के उस सूत्रीकरण की तरफ ले जाती है जिसमें कहा गया है कि विकासशील देशों में  शौचालयों की असुविधा में जी रहे लोगों की संख्या आधी तक लायी जाए (कैनेडी, 2011: बर्त्राम एवं कैर्नक्रॉस, 2010)।

निम्न स्वच्छता दर को बहुत सारे आर्थिक तथा सामाजिक मुद्दों के साथ जोड़ दिया गया है। जल तथा स्वच्छता कार्यक्रम रिपोर्ट के अनुसार 2006 में अपर्याप्त स्वच्छत्ता के कारण 53.8 अरब यूएस डॉलर का नुकसान हुआ जो भारत के कुल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6.4 प्रतिशत है (जल तथा स्वच्छता कार्यक्रम, 2011)। इसका लगभग 72 प्रतिशत जिम्मेदार स्वास्थ्य सम्बन्धित मामले थे। निम्न स्वच्छता दर का सामाजिक परिणामों की अभी तक पर्याप्त छानबीन नहीं हुई है। निम्न स्वच्छता स्थिति के सामाजिक परिणाम पर ज्यादातर साक्ष्य अभी भी उतनी अच्छी तरह नहीं अंकित किये गए हैं और न ही पर्याप्त रूप से उसकी खोज की गई है (शु. 2013)।

भारत में लगभग 65 करोड़ लोगों के पास शौचालय की सुविधाओं की कमी है। स्वच्छता की इस विशालकाय समस्या से निजात पाने के लिए सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थानों के प्रयास द्वि-आयामी रूप में सामने आते हैं। सरकारी कार्यक्रमों का ध्यान खासकर सामुदायिक अभियान पर रहा है। जनदबाव तथा पुरस्कृत समुदायों के माध्यम से खुले में शौच को 2017 समाप्त करना इसका मुख्य लक्ष्य है। ये पुरस्कृत समुदाय वो समुदाय है जिन्होंने खुले में शौच से मुक्ति पा ली है। वर्तमान सरकार ने लगभग 1000 शहरों को साफ करने तथा मैला ढोने को खत्म करने के लिए ‘महात्मा गांधी स्वच्छ भारत कार्यक्रम’ की शुरुआत की है। इस कार्यक्रम की सफलता तथा विशेषकर इसका दीर्घायु होना उन सामाजिक संरचनात्मक शक्तियों के साथ इसके तालमेल पर निर्भर करता है, जो निम्न स्वच्छता की स्थिति को संचालित करती है। इस अध्ययन का उद्देश्य भारतीय परिवारों में स्वच्छता स्तर से सम्बन्धित तथ्यों की खोज करना है। [ इस अध्ययन में भारत के तृतीय राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण से लिये गए आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है (जनसंख्या विज्ञान के अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, 2006)।]

मापन, विश्लेषण तथा परिणाम

सैद्धांतिक स्तर पर हमारी सलाह है कि स्वच्छता की स्थितियां आधुनिकीकरण को विस्तार देकर, गरीबी को घटाकर, धार्मिक जुड़ाव तथा शिक्षा स्तर में सुधार लाकर बेहतर की जा सकती हैं। इस अध्ययन का मुख्य केन्द्र स्वच्छता स्तर है और इसका मापन तीन संकेतों के आधार पर किया जाता हैः शौचालय सुविधाओं तक पहुंच, कोई शौचालय सुविधा नहीं, गढ्ढे तथा फ्लश। इन श्रेणियों में से प्रत्येक में उत्तरदाताओं का अनुपात तालिका 1 में प्रस्तुत किया गया है।

 

तालिका 1: आश्रित चरों की आवृत्ति (अनुपात), स्वच्छता का स्तर एनएफएचएस-III (एन=124,385)

 

स्वच्छता श्रेणी

विवरण

आवृत्ति

कोई सुविधा नहीं

कोई सुविधा नहीं

50,298 (40.5%)

गढ्ढे

गढ्ढे शौचालयों की सभी किस्म

9,878 (7.9%)

फ्लश

प्रवाहित होने वाले शौचालयों की एक व्यापक किस्म

64,096 (51.5%)

 

नमूने के लगभग 51 प्रतिशत की पहुंच फ्लश शौचालयों तक है जबकि 40 प्रतिशत के पास शौचालय जैसी कोई सुविधा नहीं है। 29 राज्यों में शौचालय निस्तारण वाले उत्तरदाताओं का प्रतिशत नमूना वितरण तालिका 2 में प्रस्तुत किया गया है। देश के जिन चार शीर्ष राज्यों में फ्लश शौचालयों को लेकर उत्तदाताओं का उच्च अनुपात है, वो हैंः केरल, दिल्ली, सिक्किम तथा मिजोरम। निचले पायदान पर रहने वाले चार राज्य हैंः राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़ तथा ओड़िशा।

 

तालिका 2: फ्लशिंग शौचालयों वाली जनसंख्या का वितरण प्रतिशत

 

राज्य

फ्लशिंग शौचालय %

श्रेणी

केरल

88.3

29.0

दिल्ली

87.9

28.0

सिक्किम

78.2

27.0

मिजोरम

72.1

26.0

महाराष्ट्र

69.3

25.0

नागालैण्ड

66.5

24.0

गोवा

65.9

23.0

आन्ध्रप्रदेश

62.5

22.0

पंजाब

62.0

21.0

पश्चिम बंगाल

61.9

20.0

उत्तरांचल

57.0

19.0

तमिलनाडु

53.7

18.0

गुजरात

53.1

17.0

मणिपुर

51.3

16.0

हिमाचल प्रदेश

50.9

15.0

मेघालय

50.8

14.0

मध्य प्रदेश

48.4

13.0

त्रिपुरा

47.8

12.0

हरियाणा

45.4

11.0

असम

42.7

10.0

उत्तर प्रदेश

41.7

9.0

अरुणाचल प्रदेश

36.8

8.0

कर्नाटक

36.6

7.0

बिहार

34.6

6.0

जम्मू एवं

कश्मीर

33.4

5.0

राजस्थान

32.0

4.0

झारखण्ड

29.0

3.0

छत्तीसगढ़

24.1

2.0

ओड़िशा

19.6

1.0

 

स्वच्छता को निर्धारित करने वाले नौ चरों के एक समुच्चय का इस्तेमाल करके स्वच्छता को मापने का सैद्धांतिक सुझाव दिया गया। इनमें से पांच हैंः पाइप से गुजरने वाले पानी की उपलब्धता, बिजली तथा टेलीविजन का उपयोग, पेशे के प्रकार (आधुनिक बनाम असंगठित क्षेत्रा में रोजगार) तथा एचआईवी संचरण के बारे में जानकारी। ये सब के सब आधुनिकीकरण से जुड़े हुए कारक हैं। ये संकेत कारक बिजली-पानी तथा टीवी जैसी वस्तुओं की तरह की आधुनिक सुविधाओं के इस्तेमाल से सम्बन्धित हैं। आधुनिकता की हद तक संभवतः आधुनिक वैज्ञानिक नौकरियो और संगठनों के लिए जोखिम के माध्यम से अवशोषित पेशे के प्रकार (आधुनिक या गैर-आधुनिक) वाले ये चर आधुनिक वैज्ञानिक रोजगार तथा संगठनों के प्रदर्शनों के जरिये संभवतः बहुत हद तक आधुनिकता को अपने आप में समाहित करते हैं। एचआईवी की जानकारी का स्तर स्वच्छता तथा व्यक्तिगत रूप से स्वस्थ रहने की कला के प्रति जरूरी आधुनिक स्वास्थ्य अवधारणाओं को लेकर जागरूकता का संकेत देता है। धार्मिक संबद्धता को एक कल्पित चर, हिन्दू या हिन्दू भिन्न के रूप में मापा जाता है। ज्ञात एनएफएचएस धन की स्थिति के उपाय के पुनर्वर्गीकरण से लिये गए आंकड़े से उपलब्ध गरीबी सिर्फ नाम के लिए ही मापी जाती है। मध्य तथा ऊपरी श्रेणियों को 0 कोड दिया जाता है जबकि बाकी को 1 से कूटित किया जाता है। शिक्षा एक कल्पित चर के द्वारा प्रतिबिंबित होती है और प्राथमिक शिक्षा से ज्यादा को 1 से तथा शेष को 0 से कूटित किया जाता है। इस अध्ययन में चयनित निर्धारकों की विभिन्न श्रेणियों के बीच में उत्तरदाताओं का प्रतिशत वितरण तालिका 3 में प्रस्तुत किया गया है।

 

तालिका 3: स्वच्छता के स्तर से जुड़े चयनित चर के वर्णनात्मक आँकड़े, एनएफएचएस III

 

चर नाम

विवरण

मान

आवृत्ति (%)

शिक्षा

प्राथमिक से अधिक

1

66848 (53.7%)

प्राथमिक या उससे कम

0

57525 (46.3%)

सुरक्षित जल

पाइप जल /बोतल जल

1

99382 (79.9%)

अन्य स्रोत

0

24990 (20.1%)

बिजली

उपलब्ध बिजली

1

95764 (77.0%)

अनुपलब्ध बिजली

0

28598 (23.0%)

टेलीफोन

घर में टेलीविजन

1

71081 (57.1%)

कोई टेलीविजन नहीं

0

53304 (42.9%)

हिन्दू

हिन्दू

1

89957 (72.4%)

अन्य धर्म

0

34270 (27.6%)

सम्पत्ति

निम्न या निम्नतम आय श्रेणी

1

31729 (25.5%)

मध्य आय या उच्च आय

0

92656 (74.5%)

आधुनिकता

साझीदार वाले आधुनिक पेशे

1

33460 (26.9%)

आधुनिक क्षेत्र में साझीदार नहीं

0

90634 (72.9%)

बिना किसी यंत्र वाला

साझीदार का हाथ से किये जा रहे काम में होना

1

34385 (27.7%)

हाथ से किये जा रहे कार्यों के अलावे वाले रोजगार में होना

0

89729 (72.3%)

एड्स-ज्ञान

एचआईवी, एड्स के बारे में जानकारी

1

71025 (57.1%)

एचआईवी, एड्स के बारे में जानकारी नहीं होना या थोड़ी जानकारी

0

53360 (42.9%

 

 

तालिका 4 पारसारणीकरण पर नौ आश्रित चरों के साथ तीन आश्रित चर श्रेणियों - कोई सुविधा नहीं, गढ्ढे तथा फ्लश को प्रस्तुत करता है। चूंकि परिणामी चर बहु-श्रेणीय है, इसलिए हम स्वच्छता के स्तर पर चर के स्वतंत्र प्रभाव का आकलन करने के लिए बहुपदी तार्किक परावर्तन का उपयोग करते हैं। प्रतिगमन परिणाम तालिका 5 में प्रस्तुत किये गये हैं। आधार श्रेणी ‘कोई सुविधा नहीं’ वाली है। तालिका का पहला खंड ‘कोई सुविधा नहीं’ के मुकाबले ‘फ्लश शौचालय’ की सुविधा को प्रस्तुत करता है। दूसरा खंड ‘कोई सुविधा नहीं’ के मुकाबले ‘गढ्ढे वाली लैट्रीन’ की सुविधा को प्रस्तुत करता है। कठिनाइयों के अनुपात को स्तंभ छह में प्रस्तुत किया गया है तथा यह स्तंभ हमें बताता है कि किस तरह ‘फ्लशिंग शौचालय’ (या पिट लैट्रीन) की सुविधाएं प्रत्येक स्वतंत्र चरों द्वारा प्रभावित होते हैं। जिनके पास बिजली नहीं है, उनके मुकाबले जिनके घरों में बिजली है, वो फ्लशिंग शौचालय’ का इस्तेमाल संभवतः तीन बार ज्यादा करते हैं। बिजली की उपलब्धता ‘गढ्ढे वाले शौचालयों’ की सुविधाओं में बढ़ोत्तरी करता है। हालांकि ये सुविधाएं ‘गढ्ढे वाले शौचालयों’ के मुकाबले ‘फ्लशिंग शौचालय’ के ज्यादा मुफीद हैं। एक प्राथमिक शिक्षा से ज्यादा शिक्षा हासिल करने वालों, घर पर पाइपलाइन के जरिये पानी हासिल करने वालों, टेलीविजन रखने वालों तथा आधुनिक क्षेत्रा में रोजगार पाने वालों या हस्तकृत क्षेत्रों में रोजगार पाने वालों एवं दूसरी तरह के रोजगार पाने वालों, एचआईवी संचरण के बारे में जानकारी रखने वालों के पास ‘फ्लशिंग शौचालय’ की उन्नत सुविधा है। दो चर जो ‘फ्लशिंग शौचालय’ की सुविधाओं में कमी लाते हैं, वो हैं, ‘हिन्दू’ होना या ‘निम्न धन श्रेणियों’ में होना है।

 

वर्तमान सरकार ने लगभग 1000 शहरों को साफ करने तथा मैला ढोने को खत्म करने के लिए ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत की है। इस कार्यक्रम की सफलता तथा विशेषकर इसका दीर्घायु होना उन सामाजिक संरचनात्मक शक्तियों के साथ इसके तालमेल पर निर्भर करता है, जो निम्न स्वछता दर की स्थिति को संचालित करती है।

 

‘गढ्ढे वाले शौचालयों’ को पाने की सुविधाओं के साथ चुने गए स्वतंत्र चर का साहचर्य की दिशा के मुकाबले ‘कोई सुविधा नहीं’ में ‘फ्लशिंग शौचालय’ की दिशा में कोई अंतर नहीं है। हालांकि ‘गढ्ढे वाले शौचालयों’ के मुकाबले ‘फ्लशिंग शौचालय’ वाले के साथ स्वतंत्रा चरों का साहचर्य ज्यादा मजबूत है। सामान्यः हमारे परिणाम इस विश्वव्यापी धारणा का समर्थन करते हैं कि हिन्दू संभवतः घर के भीतर के मुकबले घर के बाहर की स्वच्छता स्थिति की ज्यादा उपेक्षा करते हैं। हम पाते हैं कि ‘कोई सुविधा नहीं वाले’ हिन्दुओं की कठिनाइयां दूसरे समुदायों के बनिस्पत उल्लेखनीय रूप से ज्यादा है। आधुनिकीकरण की प्रक्रियाएं भी स्वच्छता के स्तर को बढ़ाने में सहयोग करती हैं। आधुनिक सुविधाएं तथा बिजली, पाइप द्वारा आपूर्ति किया जा रहा पानी तथा टेलीविजन जैसी वस्तुओं का उपभोग अन्यों के मुकाबले ‘फ्लशिंग शौचालयों की सुविधा वाले’ के साथ अधिक संगत होते दिखाई देते हैं। इसके अलावा आधुनिक क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी, जिनके दिन-प्रति-दिन के कार्य-अनुभव वैज्ञानिक तथा बौद्धिक प्रक्रियाओं से प्रभावित हैं,वो आधुनिक तरीके से बने उन्नत ‘फ्लशिंग शौचालय’ के इस्तेमाल की सुविधाओं को संभवतः ज्यादा अपनाते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि हम पाते हैं कि निम्न सामाजिक-आर्थिक वर्ग सही मायने में निम्न शैक्षणिक-आय स्तर का परिणाम है तथा यही वर्ग आखिरकार ‘कोई सुविधा नहीं’ वाले स्वच्छता समुदाय से संबद्ध हैं।

 

तालिका 4: स्वच्छता स्तर वाले स्वतंत्र चर की श्रेणियों का क्रॉस-सारणीकरण

 

 

       चर

उपयोग में आने वाली स्वच्छता सुविधाओं का प्रकार

सुविधाहीन (%)

गढ्ढे (%)

फ्लश (%)

कुल

पियर्सन ची के-वर्ग (पी-मान)

प्राथमिक शिक्षा से अधिक

23.5

7.4

69.2

66,797

19050 (0.000)

पाइप द्वारा पानी/बोतल बंद पानी

35.8

6.5

57.7

57,296

7560 (0.000)

उपलब्ध बिजली

28.4

7.5

64.0

95.687

27590 (0.000)

घर में टेलीविजन

20.4

6.2

73.4

71.020

32440 (0.000)

हिन्दू

46.1

5.2

48.7

89,878

6090 (0.000)

निम्न या निम्नतम आय श्रेणी

84.5

9.2

6.2

31,693

37470 (0.000)

साझीदार के पास आधुनिक पेशा

22.9

6.5

70.6

33,452

6819 (0.000)

साझीदार के पास हस्तकृत रोजगार

45.3

7.5

47.2

34,353

459 (0.000)

एड्स ज्ञान-हां

26.0

8.4

65.6

70,971

14890 (0.000)

 

निष्कर्ष

सामान्यतः हमारे नतीजे जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में सुस्थापित उन मान्यताओं का समर्थन करते हैं जिसका सुझाव है कि आधुनिकीकरण स्वच्छता को बढ़ावा देता है और अंततः जिसका परिणाम व्यक्तियों के लिए स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण लाभ के रूप में सामने आता है। इस व्यापक आधार वाले सामान्यीकरण के भीतर हमारे निष्कर्ष स्वच्छता के सुधार के स्तरों की ओर एक-सामाजिक संरचनात्मक और बहु चर दृष्टिकोण के महत्व को रेखांकित करते हैं। भारत में ‘संपूर्ण स्वच्छता अभियान’ तथा ‘महात्मा गांधी स्वच्छ भारत कार्यक्रम जैसे’ मौजूदा अभियान का मुख्य लक्ष्य लोगों को पारिवारिक शौचालय मुहैया कराकर उन्हें खुले में शौच से छुटकारा दिलाना है। ऐसे अभियान इस अवधारणा पर आधारित है कि अभी तक ‘गढ्ढे वाले शौचालयों’ तथा ‘फ्लशिंग शौचालयों की पहुंच लोगों तक नहीं बन पायी है और उन्हें आवश्यक रूप से यह सुविधा मुहैया कराना है। हालांकि इसे हासिल करने वाले परिवार इस सुविधा का इस्तेमाल करते हैं या नहीं, यह भी एक बड़ा प्रश्न है। इसके अतिरिक्त यह अवधारणा कि शौचालय सुविधाएं बढ़ा दिये जाने के बाद संक्रामक रोगों की घटनाओं तथा शौच पदार्थों (मल, विष्ठा) के जरिये फैलने वाले रोगों में कमी आयेगी, इसकी भी पर्याप्त रूप से जांच किया जाना अभी बाकी है।

स्पष्टतः जनस्वास्थ्य लाभ को प्राप्त करने के लिए इस स्वच्छता कार्यक्रम को अर्थपूर्ण व्यवहारिक बदलाव के साथ जोड़ना जरूरी है। इस सम्बन्ध में हमारे अध्ययन परिणाम का

मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि विद्यालय तथा श्रम बाजार जैसी सामाजिक संस्थाओं का स्वच्छता स्तरों पर अपना एक प्रभाव है। श्रम बाजार के मामले में,जैसा कि इसकी संरचना असंगठित से संगठित पेशों में बदल जाती है, स्वच्छता स्तरों में शायद इसका लाभ मिलेगा।

निहितार्थ सामाजिक- रचनात्मक तथा सांस्कृतिक संदर्भ है के लिए है, जिस पर स्वच्छता अभियान आधारित है। हमारा अध्ययन स्वच्छता के स्तरों के साथ जुड़े दोनों तरह के सामाजिक- संरचनात्मक एवं सांस्कृतिक कई चरों को प्रस्तुत करता है। शिक्षा एवं पेशे के प्रकार जैसे चर स्वच्छता स्तर से संब( हैं। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि विद्यालय तथा श्रम बाजार जैसी सामाजिक संस्थाओं का स्वच्छता स्तरों पर अपना एक प्रभाव है। श्रम बाजार के मामले में,जैसा कि इसकी संरचना असंगठित से संगठित पेशों में बदल जाती है, स्वच्छता स्तरों में शायद इसका लाभ मिलेगा। एक हद तक स्वच्छता अभियान के साथ धार्मिक समूहों, विद्यालयों तथा श्रम बाजारों को शामिल किया जा सकता है।

 

तालिका 5: नौ चयनित श्रेणिगत चर के समुच्च वाला स्वच्छता स्तर का बहुपदी तार्किक परिगमन

 

 

             फ्लश बनाम कोई फ्लश नहीं

       वर्ग

चर

B

सेट-बी

वाल्ड का शी स्क्वायर (df=1)

पी मान

पूर्व B

अगड़ा

निचला

अवरोधन

-1.825

.034

2892.0

0.000

     

शिक्षा

.928

.018

2655.0

0.000

2.530

2.442

2.621

सुरक्षित जल

.887

.021

1731.0

0.000

2.427

2.328

2.531

बिजली

1.177

.027

1911.0

0.000

3.245

3.078

3.421

टेलीफोन

.932

.019

2426.0

0.000

2.541

2.448

2.637

हिन्दू

-1.087

.020

3090.0

0.000

.337

.325

.350

सम्पत्ति

-2.067

.028

5476.0

0.000

.127

.120

.134

आधुनिक

.813

.020

1617.0

0.000

2.255

2.168

2.346

हस्तकृत

.420

.019

464.7

0.000

1.522

1.465

1.582

एड्स ज्ञान

.441

.018

622.5

0.000

1.554

1.501

1.609

            गड्ढा बनाम कोई सुविधा नहीं

       वर्ग

     चर

B

सेट-B

वाल्ड का शी स्क्वायर (df=1)

पी मान

पूर्व(बी)

अगड़ा

निचला

अवरोधन

-1.038

.040

679.846

0.000

     

शिक्षा

.364

.027

184.926

0.000

1.440

1.366

1.517

सुरक्षित जल

-.202

.026

60.003

0.000

.817

.777

.860

बिजली

.449

.031

211.259

0.000

1.566

1.474

1.664

टेलीफोन

.249

.029

74.496

0.000

1.283

1.213

1.358

हिन्दू

-1.703

.024

4833.0

0.000

.182

.174

.191

सम्पत्ति

-.383

.031

157.795

0.000

.682

.642

.724

आधुनिक

.271

.031

78.629

0.000

1.311

1.235

1.392

हस्तकृत

.002

.028

.005

0.944

1.002

.948

1.058

एड्स ज्ञान

.532

.026

406.452

0.000

1.702

1.616

1.792

सम्भावना अनुपात टेस्टः 69050 (शी-स्क्वॉयर), 18 (df). P = 0.000. कॉक्स और स्नेल आर स्क्वॉयर = 0.427। नागलकर्के आर-स्क्वॉर्ड (मैक्स पुनर्मापित आर स्क्वॉर्ड) = 0.510। मैकफैडेन = 0.307

 

हमने जैसा कि पहले बताया है कि निम्न स्वच्छता स्तरों के सामाजिक परिणामों पर साहित्य या लेखन का अभाव है। हालांकि हमारे इस अध्ययन का उद्देश्य इन मामलों को लेकर बात करना नहीं है, लेकिन लोगों के स्वास्थ्य को उन्नत बनाने के लिए निम्न स्वच्छता के सामाजिक परिणामों पर शोध आवश्यक है। निम्न स्वच्छता के सामाजिक परिणाम पर अध्ययन को ढांचा देने के लिए हम कुछ निम्नांकित टिप्पणियों साथ हम अपने इस पत्र को यहीं समाप्त करते हैं। पर्याप्त स्वच्छता सम्बन्धी बुनियादी संरचनाएं उपलब्ध कराने में असफल रहे सार्वजनिक क्षेत्र ने निजी क्षेत्र को यह अवसर दे दिया है कि वो अभी तक सार्वजनिक स्वच्छता के लिए पूरी नहीं हो सकी आवश्यकताओं को पूरा करे।

हालांकि स्वच्छता सेवाएं उपलब्ध कराने वाले निजी क्षेत्रों का उभार स्वच्छता के जनस्वास्थ्य परिणामों के कारण सरकारी नियमन की मांग करता है। अक्सर कमजोर सरकारी संगठन पर्याप्त जन स्वच्छता स्तर को कार्यान्वित करने, नियमित करने तथा बनाये रखने में प्रभावहीन हैं (ट्रेमोलेट, कार्डन एवं फॉन्सेका, 2013)। शहरी क्षेत्रों के अनधिकृत स्थानों में अपशिष्ट पदार्थों के अवैध फैलाव में संलग्न शौचालय सुविधाएं मुहैया कराने वाले कई निजी सेवादाताओं को यह उपलब्ध कराता है, जो अपशिष्ट पदार्थों की बदबू और उसके अंबार के रूप में सामने आता है। बेहद गंदगी वाले क्षेत्रों में स्थित आवास संभवतः उनके रहने वाले स्थान की निम्न पर्यावरण गुणवत्ता से जोड़ता है तथा इससे भी ज्यादा शायद उनके साथ होने वाले निम्न बर्ताव तथा सामाजिक तौर पर हाशिये पर उन्हें रखे जाने की ओर इशारा करता है (अग्रवाल, 2014)।

भीड़भाड़ वाले शहरी क्षेत्रों में शौच जाने के लिए सार्वजनिक स्थान दुर्भल हैं, बच्चों जैसे समूहों को रखकर देखें तो वो बेहद नुकसान में हैं जबकि इन्हें असहज और असुरक्षित महसूस करने के लिए छोड़ दिया जा रहा है। आखिरकार युवा पीढ़ी संभवतः अपने आपको स्वच्छता सम्बन्धी सूचनाओं से लैस मानती है तथा स्वच्छता एवं स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता महसूस करती है। वे ही शायद समुदायों की सामाजिक एकता के संभावित खतरे के रूप में सामने आते बुजुर्ग साथियों के बेखबर तथा निम्न स्वच्छता दर व्यवहार की दयनीय स्वच्छता स्थितियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह

करें (बिरीट्वम, मेंसह, मिनिकूशी, यॉसन, नायडू, चटर्जी एवं कोवल, 2013)।

सन्दर्भः

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{ टेक्सास विश्वविद्यालय, आर्लिंगटन, टेक्सास में प्रोफेसर हैं। उनकी शोध रुचि विकासशील देशों के समाजशास्त्रा तथा उर्वरता एवं प्रजनन स्वास्थ जैसे विषयों में है। उनकी हालिया किताबें हैंः ‘यमन में प्रजनन स्वास्थ्य’ (टी.एस.सुनील के साथ) तथा ‘सामाजिक कार्यों में वृहद विश्लेषण’ (जुडिथ लिटिल और जैक्वेलिन कॉरकोरन के साथ)। ईमेलः pillai@uta.edu

[ रूपल पारेख टेक्सास विश्वविद्यालय, आर्लिंग्टन, टेक्सास में सामाजिक खंडपीठ में शोध छात्रा हैं। इनकी शोध रुचि विकासशील देशों में सामाजिक नीति, स्वास्थ्य तथा बुजुर्ग वयस्कों के मानसिक स्वास्थ्य और देखभालकर्ता, देखभाल प्राप्तकर्ता की भूमिका आदि विषयों में है। ईमेलः rupal.parekh@mavs.uta.edu ] }

साभार :  योजना जनवरी 2015

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