क्यों हो स्वच्छ भारत

Tuesday, December 23, 2014 - 16:08

मनोज श्रीवास्तव

 

स्वतंत्रता के 67 वर्ष पूरे हो गए हैं। भारत विकासशील देश से विकसित देश की ओर तेजी से बढ़ रहा है। भारत गाँवों का देश रहा है पर आज के संचार युग में भारत का पिछड़ा गाँव भी ग्लोबल विलेज में बदल गया है। एक क्लिक पर भारत विश्व के किसी भी कोने से जुड़ जाता है। भारत हर तरफ आगे बढ़ रहा है। बाजारवाद में भारत ने खुद को स्थापित कर लिया है पर भारत आज भी एक बड़ी चीज से निजात नहीं पा सका है जिसे गन्दगी कहें, कचरा या प्रदूषण। भारत के जिस भी हिस्से में हम देखें हमें गन्दगी का अम्बार दिखाई देता है। भारत में हर चीज के लिए बड़े-बड़े आन्दोलन व धरने देखने को मिलते रहे हैं पर गन्दगी को हमने छोटा समझा। इसके लिए छोटे-छोटे स्तर पर प्रदूषण के खिलाफ तो आवाज उठी पर समग्र रूप में गन्दगी को दूर करने का प्रयास नहीं हुआ था। महात्मा गाँधी जिन्हें आदर्श माना जाता है वो गन्दगी के खिलाफ थे एवं स्वयं सफाई अभियान चलाते थे पर उनकी सोच भी सम्पूर्णता नहीं पा सकी। उन्होंने भारत को अंग्रेजो से तो मुक्त करा दिया पर गन्दगी से वो भी भारत को मुक्त नहीं करा पाए; न ही गन्दगी को राष्ट्रव्यापी आन्दोलन बना सकें।

 

2014 में भारत में एक युग का परिवर्तन होता है और राजनीतिक शिखर पर एक बड़ा नाम नरेन्द्र मोदी के रूप में उभरा और उन्होंने कांग्रेस को परास्त कर भाजपा के नेतृत्व में बहुमत की सरकार बनाई और प्रधानमन्त्री बनते ही उन्होंने सरदार पटेल, महात्मा गाँधी, जयप्रकाश नारायण, दीनदयाल उपाध्याय जैसे आदर्शों को सामने रखकर कार्य करने का निर्णय लिया और 15 अगस्त को लालकिले से उन्होंने सबसे बड़ा सन्देश जो दिया उससे पूरे देश में शौचालय बनाने पर बल दिया और महिलाओं व बच्चियों के लिए अलग से शौचालय निर्माण की बात की। साथ ही उन्होंने महात्मा गाँधी के आदर्श को सामने रखकर भारत को गन्दगी मुक्त करने का अभियान शुरू करने की बात की और 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान का शुभारम्भ कर दिया जिसमें उन्होंने 2019 तक भारत को कचरा मुक्त भारतबनाने का सन्देश दिया। इस कार्य को बड़ा रूप देने के लिए उन्होंने सचिन तेन्दुलकर, अनिल अम्बानी, सलमान खान, शशि थरूर सरीखे 9 लोगों को चयनित कर ऐसे ही 9 का दल बनाने की बात की और उन्होंने स्वयं बाल्मिकी आश्रम में झाड़ू लगाकर अभियान शुरू किया और देखते-देखते उनके सभी मन्त्री, केन्द्रीय कर्मचारी, सब लोग इस अभियान से जुड़ गए। झाड़ू चुनाव चिन्ह वाले आप पार्टी के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल ने भी सफाई अभियान में भागीदारी की। हम सभी लोगों ने भी झाड़ू लगाकर एवं गन्दगी हटाकर सफाई अभियान में अपना योगदान दिया।

 

हमे स्वच्छ भारत बनाना है तो हम सिर्फ झाड़ू लगाकर भारत को स्वच्छ नहीं बना सकेंगे। हमें अपनी सोच बदलनी होगी, हमें ऐसा माहौल बनाना होगा कि सड़क पर कचरा ही ना फैले। इसके लिए हमें नैतिक बल तो दिखाना होगा साथ ही हमें इसके लिए दण्डात्मक व्यवस्था भी लगानी होगी क्योंकि जब हम भारत में मेट्रो स्टेशन पर थूकने पर 200 रुपए के जुर्माने का बोर्ड पढ़ते हैं तो हम थूक आने पर भी अपनी थूक गटक जाते हैं। हम सिंगापुर एवं अन्य देशों का उदाहरण देखते हैं कि वहाँ पर गन्दगी फैलाने पर कितना जुर्माना लगता है। यानी कुल मिलाकर हमे भारत को स्वच्छ बनाना है तो मात्र यह गन्दगी व प्रदूषण झाड़ू से नहीं, स्वयं की सोच से दूर होगी। आइए हम देखे कि कैसे होगा हमारा भारत स्वच्छ?

 

1. हमें सबसे पहले जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जल और वायु को स्वच्छ बनाना होगा। हम जैसे एक्वागार्ड लगाकर घर में पानी साफ कर लेते हैं वैसा ही प्रयास हमें सार्वजनिक पानी के स्रोतों की स्वच्छता पर देना होगा - हमें नदियों – गंगा, यमुना एवं अन्य जल को प्रदूषण मुक्त बनाना होगा। इसके लिए पहला सार्थक प्रयास यह होगा कि हम स्वयं कचरा न डालें। पूजन सामग्री, घर की मूर्तियाँ या प्लास्टर ऑफ पेरिस व केमिकल युक्त दुर्गा, गणेश प्रतिमा नदियों में विसर्जित न करें। वहीं बड़े स्तर पर उद्योगों का अपशिष्ट, सीवर का गन्दा पानी नदियों में जाने से रोकें। एसटीपी व ईटीपी व्यवस्था को बेहतर कर पानी को शोधित कर उसे सिंचाई में प्रयुक्त करें।

 

2. हमें वायु प्रदूषण रोकने के लिए सीएनजी व एलपीजी गैसों व इलेक्ट्रॉनिक बैटरी चालित वाहनों का प्रयोग करना होगा। साथ ही, वाहनों में प्रदूषण की नियमित जाँच करानी होगी। प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर रोक लगे, फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएँ की भी हमें समुचित व्यवस्था करनी होगी। हमें अम्लीय वर्षा रोकने का प्रयास करना होगा, ग्रीन हाउस गैसों को नियन्त्रित करना होगा। एसी, फ्रिज से निकलने वाली ओजोन गैस पर नियन्त्रण लगाना होगा जिससे ओजोन छिद्र को कम किया जा सके। शवों को खुले में जलाने से वातावरण में फैलने वाले प्रदूषण को हमें विद्युत शवदाह गृह के माध्यम से कम करना होगा। धार्मिक रीति-रिवाज के अनुरूप गंगा-यमुना में मृत पशुओं व बच्चों के शवों को नहीं बहाना होगा।

 

3. खुले में शौच करने वाली व्यवस्था को रोकना होगा। नदी तटों को तो इससे पूरी तरह मुक्त करना होगा। शौच से फैलने वाली गन्दगी व प्रदूषण पर नियन्त्रण लगाना स्वच्छ भारत का पहला कदम होगा। सुलभ इन्टरनेशनल द्वारा शौचालय के लिए जैसा प्रयास हुआ है वैसा ही प्रयास पूरे भारत में किया जाए। सरकारी व निजी शौचालय न केवल बने वरन् उनका समुचित उपयोग हो सके इसके लिए प्रचार-प्रसार के माध्यम से लोगों को जागरूक करना होगा। इससे महिला सुरक्षा व स्वास्थ्य दोनों ही सुरक्षित हो सकेगा। साथ ही उत्तर प्रदेश के कुशीनगर की प्रियंका जैसी तमाम औरतों को अपने ससुराल से शौचालय के अभाव में वापस न लौटना पड़े।

 

4. भारत में कृषि कार्य में प्रयुक्त मृदा में रासायनिक खाद व कीटनाशक का अत्यधिक प्रयोग मृदा की उर्वरता को प्रभावित करता है, भूमि को बंजर बनाता है, वहीं भूमिगत जल को भी प्रभावित करता है। नदी तट के गांवों में रसायन का प्रयोग नदियों के जल को प्रभावित करता है। हमें रासायनिक खेती की जगह जैविक एवँ प्रकृतिक कृषि को बढ़ावा देना होगा। यह स्वच्छ भारत का एक और बड़ा कदम होगा।

 

5. स्वच्छ भारत अभियान के लिए जो एक और अनिवार्य व बड़ा कदम है वह है, ठोस अपशिष्ट का निपटान करना। जिसमें हम सबसे बड़े रूप में प्लास्टिक व पॉलीथीन को ले सकते हैं। आज पॉलिथिन संस्कृति की सस्ती सुविधा ने मनुष्य को सिर से पांव तक पॉलीथिन में कैद कर लिया है। खाने-पीने का समान हो- दूध, दही, चाय, घी, सब्जी, आटा, चावल, दाल सब इसमें ही पैक है। इसने झोला संस्कृति को नष्ट कर दिया है। लोग पॉलिथिन का प्रयोग कर इसे नालियों में फेंक देते हैं जो नालियों को जाम कर देता है जिससे बारिश में मुहल्लों में पानी भर जाता है। वही ये बहकर गंगा, यमुना एवं अन्य नदियों को प्रदूषित कर इनके तटों को गन्दा करते हैं और नदियों के प्रवाह को भी प्रभावित करते हैं। पॉलिथिन भूमिगत जल स्रोत को भी प्रभावित करता है। और जिस सफाई की बात आज हो रही है उस गन्दगी का 80 प्रतिशत पॉलिथिन की वजह से ही है क्योंकि बाकी गन्दगी तो बायोडिग्रेडेबल है एवं नष्ट भी हो जाती है पर पॉलिथिन कचरा नॉन-बायोडिग्रेडेबल है जिसके कारण वह 100 साल में भी नष्ट नहीं होता और चारों तरफ फैला रहता है। नगर निगम जैसी सरकारी संस्था उसका सही से निपटान भी नहीं कर पाती है। स्वच्छ भारत के मार्ग का पॉलिथिन कचरा सबसे बड़ा रोड़ा है।

 

6. ई-वेस्ट : आज के इस दौर में गन्दगी का एक बड़ा प्रारूप ई-वेस्ट से फैलने वाला कचरा भी है क्योंकि भारत में मोबाइल, कम्प्यूटर आदि का कचरा दूर तक फैला रहता है इसका उचित निपटान नहीं हो पाता है। कार्बन क्रेडिट की बात होती है पर यह लाभ कार्बन उत्पन्न करने वाली कम्पनियों को ही कार्बन क्रेडिट के रूप में मिलता है। भारत में हम अभी भी इसे हटा नहीं पाए हैं, यह स्वच्छ भारत की एक बड़ी बाधा है।

 

7. गन्दगी को दूर करने के कई प्रारूप हम देख रहे हैं। उनमें ही हम ध्वनि प्रदूषण व शोर को भी देखते हैं जो कान फोडू साउण्ड, डी.जे, बैण्ड प्रेशर, हार्न व पटाखों के शोर से होता है। आज इस गन्दगी ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। पार्टियों में शोर की वजह से लोग बात भी नहीं कर पाते हैं। श्रवण शक्ति के कई गुना अधिक डेसिबल का प्रयोग होता है। हम इसे कम नहीं कर पा रहे जो गन्दगी के रूप में हमें प्रभावित करता है।  इसके शोर से हमें नियन्त्रण पाना होगा नहीं तो मानसिक अवसाद व चिढ़चिढ़ेपन से हम परेशान होते रहेंगे।

 

8. शोर का एक बड़ा प्रारूप पटाखों से देखने को मिलता है जो शादी-विवाह में देर रात्रि तक बजता है। वहीं दीपावली जैसे पर्व पर तो अरबों रुपए के प्रतिबन्धित पटाखे बजाए जाते हैं जिसका स्वरूप बड़ी गन्दगी के रूप में दीपावली की अगली सुबह के रूप में हम देखते हैं जो वातावरण को प्रदूषित कर अमलीय वर्षा का भी कारक बनता है। स्वच्छ भारत अगर बनाना है तो हमें आतिशबाजी बन्द कर उसे प्रतिबन्धित करना होगा।

 

9. शहर में पशुओं को खुले में छोड़ देते हैं जो मल-मूत्र, गन्दगी आदि सड़क पर फैलाते हैं। नदियों में जाकर उसके पानी को प्रदूषित कर डालते हैं। सड़क पर घूमने वाले गाय, बैल, सांड, कुत्तों से फैलने वाली गन्दगी हमें हर हाल में रोकनी होगी। सुअर भी गन्दगी फैलाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इन पर पाबन्दी लगानी होगी। लावारिस पशुओं को पकड़ना होगा और यदि उसका मालिक है तो उस पर बड़ी पेनॉल्टी लगानी होगी।

 

 

हमें स्वच्छ भारत बनाना है तो हम सिर्फ झाड़ू लगाकर भारत को स्वच्छ नहीं बना सकेंगे। हमें अपनी सोच बदलनी होगी, हमें ऐसा माहौल बनाना होगा कि सड़क पर कचरा ही न फैले। इसके लिए हमें नैतिक बल तो दिखाना होगा साथ ही हमें इसके लिए दण्डात्मक व्यवस्था भी लगानी होगी। यानी कुल मिलाकर हमें भारत को स्वच्छ बनाना है तो मात्र यह गन्दगी व प्रदूषण झाड़ू से नहीं, स्वयं की सोच में परिवर्तन से दूर होगी।

 

 

10. स्लाटर हाउस से फैलने वाले रक्त व चमड़े के कचरे को फैलने से रोकना होगा। माँस का व्यवसाय खुले में न हो इसे भी रोकना होगा और अगर इससे गन्दगी फैले तो हमें इसका व्यवसाय करने वालों को दण्डित करना होगा।

 

11. अब गन्दगी फैलाने वाले सारे कारकों में सबसे बड़ा कारक जो हमें देखने में छोटा लगता है पर पूरे भारत विशेषकर उत्तर भारत को अपनी पूरी गिरफ्त में लिए है। जो थूकने की संस्कृति पीच-पीच करने में हम भारतीय अपनी शान समझते हैं। एक तो हम साधारण थूक को सड़क पर थूकते है वहीं दूसरी ओर रंगीन थूक से भी पूरे भारत के सार्वजनिक स्थलों, ऑफिस, बैंक आदि को रंगने में हम कहीं भी पीछे नहीं दिखते। इसका बड़ा कारण हम तम्बाकू, गुटखा, खैनी व पान के रूप में खा कर थूकते हैं। पान खाने वाला या गुटखा खाने वाला उसे घूंटता नहीं है उसे वह पीक बनाकर थूकता है। कुछ लोग सभ्य बनकर उसे बेसिनों में कुछ बाथरूम में या कुछ डस्टबिन में थूकते हैं पर यहाँ-जहाँ थूकते हैं वो स्थान गन्दा ही होता है।

 

लोग पान खाते हैं, मुहँ खोला व वहीं पिच मारी। लोग कार मोटर, रेल में चलते-चलते थूकते हैं जिससे सड़क तो गन्दी होती है कभी-कभी लोगों पर भी यह थूक पड़ती है। लोगों के कपड़े गन्दे हो जाते हैं। जब तक थूकने पर पेनॉल्टी व चालान नहीं लगेगा लोग नहीं मानेंगे। बेचनेवाले व खाने वाले दोनों को बराबर का दोषी मानकर सजा देनी होगी। नहीं तो हम कितना भी झाड़ू लगा लें कुछ नहीं होगा क्योंकि थूकने वालों की संख्या झाड़ू लगाने वालों से ज्यादा है।

 

हमारे प्रधानमन्त्री जी को आज कुछ करना है तो झाड़ू उठाने से पहले थूकने वालों के मुँह पर टेप लगाना होगा। आज  बड़े शान से गुटखा खाकर लोग गंगा में थूकते हैं पर उन पर कोई कार्यवाही नहीं होती। हमारे योग गुरु रामदेव कहते हैं कि सिंगापुर में च्यूइंग गम खाना भी जुर्म है पर भारत में तो खाइके पान बनारस वाले मुंबई तक फैले हैं। इसे रोकने के लिए सख्त कानून बनाना होगा। इसे राजस्व का साधन ना मानकर पान, गुटखा, सिगरेट, शराब सब पर सार्वजनिक रुप से बिक्री व खरीद परत पर साथ ही उपभोग पर रोक लगानी होगी।

 

स्वच्छ भारत निर्माण करना है तो पहली झाड़ू इन थूकने वाले अपराधियों पर चलाई जाए तो सड़क की गन्दगी वैसे ही दूर हो जाएगी। हर चीज में आधुनिक बनने वाले प्रधानमन्त्री अगर डिजिटल इण्डिया चाहते हैं तो पॉलिथिन, गुटखा सिगरेट, पान पर तत्काल पाबन्दी लगाएँ और सड़क पर एवं गंगा में थूकने पर 500 रुपए का जुर्माना लगाएँ और पकड़े जाने पर छह माह की कठोर कारावास की सजा भी हो। हमें प्रधानमन्त्री जी से एक निवेदन करना है कि जैसे स्वास्थ्य के लिए सीजीएचएस है वैसे ही केन्द्रीय सफाईकर्मी नियुक्त करने होंगे और सफाई व्यवस्था को नगर निगम को देने से बचना होगा क्योंकि नगर निगम तो राजनीतिक का अखाड़ा है, पार्षद व मेयर तो राजनीति करते हैं। नगर आयुक्त एवं अन्य पर्यावरण इंजीनियर चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते। बाकी भ्रष्टाचार अपना काम करता है। एक सक्षम सफाई की टीम बनानी होगी। एनजीओ को महत्व देना होगा, उनकी आईबी से जाँच कराने की जगह उनके कार्यों की गुणवत्ता देख उन्हें मानदेय देकर इस अभियान से जोड़ना होगा। अगर हमें थूकने वाले पर रोक लगानी है तो हर गली-मुहल्ले में चालान करने वाले वॉलण्टियर्स बनाने होंगे। इस कार्य में सीनियर सिटीजन को जोड़ना होगा।

 

हर शहर में फैलने वाले कचरे का डिस्पोज न केवल खाद बनाने में हो वरना उसे भविष्य के फ्यूल के रूप में भी बनाना होगा। इसकी शुरुआत जेपी ग्रुप ने पंजाब के चंडीगढ़ में की है। उसे पूरे देश में, हर बड़े शहरों में लागू करना होगा जिससे शहर की सारी गन्दगी नष्ट हो जाएगी और यह सस्ता ईन्धन भी उपलब्ध कराएगा। सारे देश के म्युनीसिपल कॉरपोरेशन के चेयरमैन को चंडीगढ़ शहर का उदाहरण लेना होगा जो भारत में स्वच्छता में नम्बर वन जिला है। हरियाली से भरा चारों तरफ सफाई दिखती है क्योंकि लोग यहाँ सफाई पर बल देते हैं। जहाँ देखो वहीं दुकान खोलना या सड़क पर रेहड़ी नहीं लगती है।

 

हमें गन्दगी हटानी है तो जलवायु परिवर्तन, जल, वायु, ध्वनि सभी प्रकार के प्रदूषण रोकने होंगे। हमें सक्षम एवं समग्र रुप से रोक लगानी होगी। हमें झाड़ू के साथ-साथ झाड़ू न लगाने पर भी बल देना होगा। यहाँ दण्ड के स्वरूप को मजबूत बनाना होगा। नहीं तो हम गाँधी जी की 150वीं जयंती क्या 200वीं जयंती भी मना लें हम भारत को गन्दगी से मुक्ति नहीं दिला पाएँगे। जैसे की सर्वोच्च न्यायालय का गंगा के सन्दर्भ में कहना है कि यही प्रयास रहा तो गंगा 200 साल में भी प्रदूषण मुक्त नहीं हो सकेगी। प्रधानमन्त्री मोदी जी चाहें मेडिसिन स्केवेयर, अमेरिका में जाकर गंगा की सफाई की बात करें या जापान जाकर गंगा को साफ करने का सहयोग माँगे हम गंगा को प्रदूषण मुक्त नहीं कर पाएँगे।

 

हमें पहले गन्दगी फैलाने वालों को रोकना होगा। चाहे जन-जागरुकता कितनी ही हो पर उसमें हमें दण्ड के स्वरूप को भी शामिल करना होगा। पॉलीथिन का प्रयोग करने वाले को पकड़ने पर 500 रुपए का तत्काल जुर्माना लगे। पॉलिथिन को माइक्रोन के जाल में ना उलझा कर उसकी बिक्री पर रोक लगानी होगी। गुटखा व तम्बाकू प्रतिबन्धित करना होगा न की पाउच पर साँप, बिच्छू का चित्र बनाकर झूठा डर पैदा करने का दिखावा करना। इससे भारत स्वच्छ नहीं होगा।

 

हमें दोहरी नीति नहीं अपनानी होगी की हम सड़क पर गुटखा खाकर थूकें और हमारे स्कूल के बच्चे या नौकरी करने वाले या स्वयंसेवी संस्था के लोग गाँधीवादी बन झाड़ू ले उसे साफ करते फिरें, यह उचित नहीं है। हम गन्दगी न करने की कसम लेते हैं और लोगों से भी न करने को कहेंगे। न मानने पर पेनॉल्टी लेने की टोल फ्री व्यवस्था होनी चाहिए। हाँ, चालान पुलिस के हाथ में न होकर इसे सीनियर सिटीजन या इसे स्वयंसेवी संस्थाओं के हवाले किया जाए जिन्हें पुलिस प्रोटेक्शन मिलनी चाहिए। जो लोग पेनॉल्टी लेने वालों की बात न मानें, इनकी शिकायत पर पुलिस द्वारा कार्यवाही की जाए।

 

हमें प्रदूषण रोकने एवं सफाई कार्य को स्कूली स्तर पर लेना होगा। बेसिक, माध्यमिक व उच्च शिक्षा में इसे कोर्स में डाला जाए एवं प्रैक्टिकल अंकों में जोड़ा जाए। एनएसएस, एनसीसी एवं स्काउट में इसे लिया जाए। बच्चों व महिलाओं को बायोडिग्रेडेबल व नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरे के बारे में बताया जाए और दोनो कचरे को इकट्ठा करने के लिए अलग-अलग डस्टबिन घर से लेकर स्कूल, कॉलेज व सार्वजनिक स्थल पर रखे जाएं। उसका निपटान दो बार किया जाए- एक बार सुबह व दूसरी बार शाम को। कानून का राज स्थापित हो। लोगों की सोच पर झाड़ू लगाकर उन्हें उसने सफाई युक्त यानी स्वच्छ भारत निर्माण कराने की ओर अग्रसर कर डिजिटल इण्डिया और मेक इन इण्डिया की अवधारणा को साकार करना होगा। हर घर, हर स्कूल एवं हर गांव को शौचालय सुविधा देनी होगी। तभी हम प्रदूषण मुक्त स्वच्छ भारत का निर्माण कर सकेंगे।

 

सम्पादक, ग्लोबल ग्रीन्स (पर्यावरणविद्), इलाहाबाद

ई-मेल : featuresunit@gmail.com

साभार : कुरूक्षेत्र दिसम्बर 2014

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