मैला ढोने की कुप्रथा

Friday, December 5, 2014 - 18:32

अमृत पटेल

किसी मनुष्य द्वारा त्याग किए गए मलमूत्र की साफ-सफाई के लिए व्यक्ति विशेष को नियुक्त करने की व्यवस्था सर्वथा अमानवीय है। और इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए महात्मा गांधी समेत तमाम महापुरुषों ने समय-समय पर प्रयास किए तथापि यह व्यवस्था न सिर्फ निजी बल्कि सरकारी प्रतिष्ठानों में भी अपनी जड़ें जमाए रही। अब जबकि पूरे देश में स्वच्छ भारत अभियान के जरिए साफ-सफाई पर जोर-शोर से चर्चा हो रही है, जरूरी है कि इस अमानवीय पेशे के उन्मूलन के लिए गंभीर प्रयास किए जाएं।

शौचालयों की साफ-सफाई के लिए व्यक्ति विशेष को नियुक्त करने की व्यवस्था सर्वथा अमानवीय है। और इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए महात्मा गांधी समेत तमाम महापुरुषों ने समय-समय पर प्रयास किए तथापि यह व्यवस्था न सिर्फ निजी बल्कि सरकारी प्रतिष्ठानों में भी अपनी जड़ें जमाए रही। अब जबकि पूरे देश में स्वच्छ भारत अभियान के जरिए साफ-सफाई पर जोर-शोर से चर्चा हो रही है, जरूरी है कि इस अमानवीय पेशे के उन्मूलन के लिए गंभीर प्रयास किए जाएं।

केंद्र में बनी नई सरकार ने 2 अक्टूबर 2014 से पांच वर्षों के लिए स्वच्छ भारत अभियान की पहल की है। वो चाहती है कि इसमें सभी लोग पूरी लगन और निष्ठा से शामिल हों, लेकिन इससे ज्यादा जरूरी है, मैला ढोने की सदियों पुरानी अमानवीय और अपमानजनक प्रथा को खत्म करना। इस काम को दो साल के भीतर किसी भी हालत में पूरा कर लिया जाना चाहिए। इसके लिए चाहे जो करना पड़े। मौजूदा कानून को पूरी सख्ती से लागू करने से लेकर जरूरत पड़ने पर उसमें उचित बदलाव किया जा सकता है। साथ ही बुनियादी ढांचे से जुड़ी हर जरूरत को मुहैया कराया जाना। सरकार की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए। स्वच्छ भारत अभियान को केवल सफाई के मुद्दों से जोड़ने की जगह मानव की गरिमा पर केंद्रित किया जाना चाहिए। भारत में मैला ढोने की प्रथा भारत की विकास प्रक्रिया के चेहरे पर एक गहरा काला धब्बा है। आजादी के 6 दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी ये राष्ट्रीय शर्म का विषय है कि 21 वीं सदी में साफ-सफाई में लगे हजारों परिवार सामाजिक तौर पर अपमानित और अमानवीय जीवन जीने को मजबूर हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जीवन भर समाज के इस हिस्से के काम करने और उसके जीने की स्थितियों में सुधार के लिए संघर्ष करते रहे। उसकी खोई गरिमा को वापस दिलाना गांधी जी के प्राथमिक एजेंडे का हिस्सा था।

मैला ढोने की कुप्रथा

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में इस शताब्दी के पहले दशक के दौरान उल्लेखनीय आर्थिक वृद्धि दर हासिल की है और लाखों लोगों के लिए भारत अवसरों की एक जमीन बन गया है। साथ ही विदेशी निवेशों के लिए एक लक्ष्य भी। हालांकि जीवन के सभी क्षेत्रों में जाति आधारित गहरे भेदभाव के चलते बहुत सारे लोग पीछे छूट गए हैं। ये वही लोग हैं, जो भेदभाव के शिकार थी और सदियों से मैला ढोने की कुप्रथा घृणित-अपमानजनक काम का हिस्सा हैं। और समाज उनके साथ ‘गंदा और केवल मैला ढोने के गंदे काम के लिए बने’ की तरह व्यवहार करता है। मैला ढोने की प्रथा की अपनी जगह उन सामाजिक बुराइयों में हैं, जो सदियों पुरानी जाति व्यवस्था से निकली हैं। ‘मैला ढोने वाले’ का ठप्पा लगने के चलते दूसरे लोग उन्हें उस काम अलावा किसी अन्य काम के लिए नहीं बुलाते हैं, जिसको उनके पुरखे हजारों साल से करते चले आ रहे हैं। इस तरह से इन लोगों को सम्मानजनक काम के अवसर को पाने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है।

कानून को लागू करने वाली अधिकारियों के उदासीन रवैए के चलते ये गंभीर भेदभाव लगातार बना हुआ है। साथ ही इसके बने रहने के पीछे मैला ढोने की प्रथा को जड़ से खत्म करने के लिए बने मौजूदा कानूनों में कमियां प्रमुख कारण हैं। मैला ढोना दुनिया में कहीं भी अमानवीय और छुआछूत की सबसे ज्यादा अपमानजनक जीवित कुप्रथा है। भारत में इसे मानवीय गरिमा की बजाय सफाई के मुद्दे से जोड़कर देखा जाता है। जबकि संविधान हर नागरिक के सम्मान की गारंटी करता है। सामाजिक उत्पीड़न का का दंश झेलने के अलावा मैला ढोने वाले इस पेशे के साथ जुड़ी कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का भी सामना करते हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर श्री नारायणन की जनहित याचिका के मुताबिक अन्य बातों के साथ मीथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी हानिकारक गैसों के संपर्क में आने से तत्काल मृत्यु और हृदय अधःपतन, मांसपेशियों और हड्डियों से जुड़े रोगों जैसे पुरानी ऑस्टियोआर्थराइटिस परिवर्तन और इंटरवेर्टब्रल डिस्क हर्नियेशन, संक्रमणों जैसे हेपेटाइटिस, लेप्टोस्पाइरोसिस और हेलीकोबैक्टर, त्वचा की समस्याओं, श्वसन तंत्र की समस्याओं और फेफड़े के काम करने के बदले हुए मानक पैरा-मीटर आदि जीवन से जुड़े खतरे शामिल हैं।

1993 का कानून

मैला ढोने के काम को लंबे समय से नागरिक समाज में अपराध के साथ एक अमानवीय प्रथा के तौर पर चिन्हित किया गया है। महात्मा गांधी ने 1917 में पूरा जोर देकर कहा था कि साबरमती आश्रम में रहने वाले लोग अपने शौचालय को खुद ही साफ करेंगे। गौरतलब है कि आश्रम की स्थापना गांधीजी ने की थी और वो उसे कम्यून की तरह चलाते थे।

उठती रही हैं आवाजें: महात्मा गांधी ने 1917 में पूरा जोर देकर कहा था कि साबरमती आश्रम में रहने वाले लोग अपने शौचालय को खुद ही साफ करेंगे। गौरतलब है कि आश्रम की स्थापना गांधीजी ने की थी और वो उसे कम्यून की तरह चलाते थे। महाराष्ट्र हरिजन सेवक संघ ने 1948 में मैला ढोने की प्रथा का विरोध किया था और उसने इसको खत्म करने की मांग की थी। ब्रेव-कमेटी ने 1949 में सफाई कर्मचारियों के काम करने की स्थितियों में सुधार के लिए सुझाव दिए थे। मैला ढोने की हालातों की जांच के लिए बनी एक अन्य समिति ने 1957 में सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने का सुझाव दिया था।।

महाराष्ट्र हरिजन सेवक संघ ने 1948 में मैला ढोने की प्रथा का विरोध किया था और उसने इसको ख़त्म करने की मांग की थी। ब्रेव-कमेटी ने 1949 में सफाई कर्मचारियों के काम करने की स्थितियों में सुधार के लिए बिंदुवार सुझाव दिए थे। मैला ढोने की हालातों की जांच के लिए बनी समिति ने 1957 में सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने का सुझाव दिया था। राष्ट्रीय मजदूर आयोग ने 1968 में  ‘सफाईकर्मियों और मैला ढोने वालों’ के काम करने की स्थितियों के अध्ययन के लिए एक कमेटी का गठन किया था। इन सभी समितियों ने मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने और सफाईकर्मियों  के पुनर्वास का सुझाव दिया था। इन समितियों के कुछ सुझावों को स्वीकार करने के साथ देश ने महिला धोने का काम और शुष्क शौचालय निर्माण रोकथाम कानून 1993 कानून बनाया। जो (क) मैला ढोने वालों के काम और उचित तरीके से ड्रेनेज चैनल से जुड़ने पर शुष्क शौचालय के निर्माण पर प्रतिबंध लगाता है। (ख) इस कानून के उल्लंघन पर किसी शख्स को एक साल तक की सजा और दो हजार रुपए तक का जुर्माना या दोनों हो सकता है। हालांकि भारत के ‘नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी)’ की 2003 की रिपोर्ट के मुताबिक केवल 16 राज्यों ने ही इस कानून को अपनाया है। और किसी ने भी इसे लागू नहीं किया है। श्रम मंत्रालय के ‘कर्मचारी क्षतिपूर्ति कानून’ को केवल 6 राज्यों ने लागू किया है। दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) ने 2007 तक मैला ढोने की प्रथा को पूरी तरह से खत्मा करने का लक्ष्य तय किया था। बावजूद इसके सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के मुताबिक भारतीय रेल, जो वास्तव में मैला ढोने के लिए कर्मचारियों को रखता है, ने 2 लाख 40 हजार करोड़ के अपने एकीकृत रेलवे आधुनिकीकरण योजना में मैला ढोने के खात्मे के प्रावधान को शामिल नहीं किया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इससे जुड़े 1993 के कानून को अपनाने और उसे लागू करने के लिए राज्यों को पत्र लिखा, लेकिन उनका भी नतीजा सिफर रहा। सफाई कर्मचारी आंदोलन और 13 दूसरे संगठनों की ओर से 2003 में दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2005 में सुनवाई करते हुए इस बात को चिन्हित किया कि भारत में मैला ढोने वालों की संख्या बढ़ी है। और केंद्र सरकार के सभी विभागों और मंत्रालयों और राज्य सरकारों को अपने एक अफसर के जरिए शपथ पत्र दायर करने का निर्देश दिया, जिसमें उक्त अधिकारी याचिका में दायर तथ्यों की जांच कर उस पर छह महीने के भीतर रिपोर्ट देने के लिए व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार होगा। अगर किसी दिए गए विभाग में मैला ढोने की बात को स्वीकार किया जाता है, तो मेला ढोने वालों को उससे मुक्त कर उसकी उनके पुनर्वास के लिए, एक समयबद्ध कार्यक्रम बनाने का निर्देश दिया जाना चाहिए।

अप्रवर्तित कानून

मैला ढोने के काम और शुष्क शौचालय निर्माण (प्रतिबंध) का कानून, 1993 को मैला ढोने के व्यापक परिप्रेक्ष्य को हल करने के लक्ष्य से बनाया गया था, लेकिन सरकार 18 साल बाद भी इसे लागू करने में नाकाम रही, जिसका नतीजा ये रहा कि हजारों लोग अभी भी मैला ढोने की अमानवीय प्रथा का हिस्सा बने हुए हैं। मैला ढोने वाले ज्यादातर लोग दलित और आदिवासी समुदाय से जुड़े हुए हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 2011 में सभी राज्यों को निर्देश दिया था कि अगर कोई दलित या फिर आदिवासी समुदाय से मैला ढोने के काम में किसी व्यक्ति को शामिल करता है। तो वो दलित एक्ट के दायरे में आ जाएगा और उसके खिलाफ दलित एक्ट के कानून के तहत कार्रवाई होगी। हालांकि सच्चाई ये है कि ‘1993 के कानून के तहत अभी तक एक भी शख्स को सजा नहीं हुई है।’ हालांकि कई राज्यों ने मैला ढोने की कुप्रथा के अस्तित्व की पुष्टि की है। पीने के साफ पानी और सफाई पर मानव अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत के सामने 2012 में पानी तक पहुंच और भारत में सफाई में दलितों का कलंकीकरण पर एक रिपोर्ट पेश की गई थी। इस रिपोर्ट में भारत में मैला ढोने की कुप्रथा में काम करने के दौरान मानवाधिकार की स्थितियों के बारे में भी बताया गया था। रिपोर्ट के एक छोटे हिस्से यूएन में पब्लिक कंसल्टेशन के सामने भी पेश किया गया था।

नया कानून

 

17 जून 2011 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मैला ढोने को ‘भारत की विकास प्रक्रिया पर एक गहरा धब्बा करार दिया था’ और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से इस कुप्रथा को भारत के सभी कोनों से अगले छः महिने के भीतर यानी 2011 के अंत तक पूरी तरह से समाप्त करने के लिए शपथ लेने का आह्वान किया था। सरकार मैला ढोने के सभी तरीकों से लेकर सीवेज सफाई और सेप्टिक टैंक की सफाई समेत सफाई कर्मचारियों की पूरी मुक्ति के लिए एक नया और व्यापक कानून बनाने के लिए बाध्य थी। तमिलनाडु विधानसभा ने मौजूदा कानून के कमजोर होने और उसे एक नए और मजबूत कानून के जरिए प्रतिस्थापित करने की बात को चिन्हित करते हुए 10 सितंबर 2011 को आम सहमती से विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें उसने केंद्र सरकार के पास 1993 के कानून में कुछ चीजो में बदलाव कर व्यापक बनाने के साथ उसे और स्पष्ट करने का प्रस्ताव भेजा। इसमें मैला ढोने की परिभाषा को और बड़ा करने, उसे लागू करने वाले अधिकारी की नियुक्ति, पर्यावरण के प्रदूषण को रोकने की अधिकारी के पास शक्ति जैसे क्षेत्र शामिल थे। कानून को सार्वजनिक जवाबदेही के तंत्र को मजबूत करना चाहिए और उसे केवल सफाई की जगह मानव गरिमा पर केंद्रित करना चाहिए और सभी राज्यों के लिए अपने आप बाध्यकारी होना चाहिए। 12 मार्च 2012 को संसद के संबोधन के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल नें सामाजिक न्याय के लिए वादा करते हुए कहा कि ‘सरकार मैला ढोने की कुप्रथा और गंदे शौचालयों को खत्म करने के लिए संसद में एक नया विधेयक पेश करेगी। ये मेला ढोने वालों को एक वैकल्पिक पेशे के साथ उचित पुनर्वास भी मुहैया कराएगा, जिससे वो गरिमामय जीवन के योग्य बन सकें’।

इसी तरह की एक प्रतिबद्धता चार दिन बाद सुप्रीम कोर्ट के सामने भी व्यक्त की गई थी। विधेयक संसद के मानसून सत्र में पेश किए जाने के लिए प्रस्तावित था। यह सुप्रीम कोर्ट में पेश किए गए एक मामले के बाद सामने आया जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया गया था, जो ये कहता था कि अगर केंद्र इस कानून में बदलाव करने पर नाकाम रहा तो ऐसी स्थिति में पीएमओ समेत उच्च गणमान्य लोगों को व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में उपस्थित होने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। नए विधेयक की प्रस्तावना इस बात का संज्ञान लेती है कि ‘मैला ढोने वालों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय और अमानवीय कष्टों को दुरुस्त करना और एक गरिमामय जीवन के लिए उनका पुनर्वास जरूरी है।’ मैला ढोने वाले की परिभाषा 1993 के कानून में कुछ ऐसी है ‘एक शख्स जो मानव मल ढोने के काम में शामिल किया जाता है’, जबकि 2012 के नए विधेयक में मैला ढोने की परिभाषा व्यापक, समावेशी और इसमें ये शामिल करता है कि ‘कोई शख्स मानव मल को हाथ से साफ करने, उसे ढोने और फेंकने या फिर किसी भी तरीके से उसे पकड़ने, या फिर खुले ड्रेन या पिट या खुले में शौचालय से इंसान के मैले को जहां डाला जाता है, वहां तक ले जाने आदि के काम में शामिल है।’
 

पुनर्वास कार्यक्रम

1993 में सफाई कर्मचारी अधिनियम के लिए राष्ट्रीय आयोग के तहत सफाई कर्मचारियों के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया। मैला ढोने वालों और उनके आश्रितों को इस कार्य से मुक्ति दिलाने और पुनर्वास के लिए मार्च 1993 में राष्ट्रीय योजना को जारी किया गया और सामाजिक न्याय एवम अधिकारिता मंत्रालय को इसे लागू करने का निर्देश दिया गया। हालंकि, सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक इस योजना पर 600 करोड़ रुपए से अधिक का खर्च होने पर भी यह योजना अपने लक्ष्य को पाने में असफल ही रही। इसकी प्रस्तावना में ही कहा गया ‘‘योजना का लक्ष्य निस्संदेह सही था लेकिन उच्च स्तरीय समाज की जटिल संरचना जो व्यावसायिक सुधारों का विरोध करती है, के कारण इसके संचालन मानकों को काम में नहीं लिया जा सका और यह योजना सुस्त पड़ गई। योजना की केवल नेक नियति ही काफी नहीं थी, क्योंकि इस दिशा में 10 वर्षों के सतत लेकिन अधूरे मन से किए गए प्रयासों के कारण अपनी योजना, अपनी सामाजिक प्रयोजन रखने में असफल रही। मैला ढोने के रोजगार को निषिद्ध करने वाले कानून का लाभ नहीं उठा पाने की वजह से यह नीतिगत पहलों को आगे बढ़ाने की दृष्टि से एक सुनियोजित रणनीति पर काम करने में असफल रही। पुनर्वास से मैला ढोने वालों को अलग रखना निर्णय में एक चूक थी जिसने योजना की नींव को ही कमजोर बना दिया और यह बिखरे हुए असंगठित प्रयासों के साथ आगे बढ़ने लगी। यह लाभार्थियों के व्यवसाय में बदलाव के लिए आवश्यक कौशल-स्तर के विकास और उसे अनुकूल बनाने में भी विफल रही। इन्हीं सब कारणों से यह कौशल आधारित कार्य के रूप में स्थापित होने में विफल रही। योजना के मानकों को सीधे तरीके से अपनाने और लागू करने में कमी के कारण ही योजना अपने मूल धारणाओं से ही विचलित हो गई।’’

योजना के असंतोषजनक प्रदर्शन के लिए सफाई कर्मचारी राष्ट्रीय आयोग राज्य सरकारों की इच्छा-शक्ति में अभाव और पूरी प्रक्रिया में उनकी और संबंधित एजेंसियों के बीच मिलीभगत को जिम्मेदार मानती है। यहां तक कि राज्य सरकारों ने नियमित रूप से अपने यहां मैला ढोने वालों की मौजूदगी से इंकार करती रही। कई सरकारी कार्यालयों और भवनों में अब भी शुष्क शौचालय हैं और नगरपालिका के मैला ढोने वाले कर्मचारी वहां मैला की सफाई करते हैं। सीएजी रिपोर्ट में सामाजिक न्याय एवम अधिकारिता मंत्रालय को अनुसूचित जाति विकास वित्तीय निगम (आय-सृजन पुनर्वास योजनाओं को लागू करने के लिए जिम्मेदार) को देरी से धनराशि वितरित करने तथा मंत्रालय, राज्य एवं जिला स्तरों पर बमुश्किल कोई कार्यरत निगरानी व्यवस्था होने के लिए दोषी ठहराया है।

निगम और बैंक व्यावसायिक परिवर्तन की स्पष्ट परिभाषा के अभाव में धन देने में असफल रहे। सीएजी ने महाराष्ट्र में 47 फीसदी और तमिलनाडु में 74 फीसदी ऋण अस्वीकार करने की पुष्टि की है। रिपोर्ट में दृढ़ता से कहा गया है, ‘‘अशिक्षित और गरीब मैला ढोने वालों के लिए, परियोजना के लिए वाणिज्यिक बैंक द्वारा वित्त पोषण की बात सोचना बहुत मुश्किल था।’’ सीएजी ने निष्कर्ष निकाला कि इस योजना की सबसे गंभीर त्रुटि ‘‘इस व्यवसाय को निषिद्ध करने वाली कानून को लागू करने में असफल होना है।’’

ढिलाई : ‘नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी)’ की 2003 की रिपोर्ट के मुताबिक केवल 16 राज्यों ने ही सिर पर मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध के कानून को अपनाया है और किसी ने भी इसे पूरी तरह लागू नहीं किया है। श्रम मंत्रालय के ‘कर्मचारी क्षतिपूर्ति कानून’ को भी सिर्फ 6 राज्यों ने लागू किया है।

सीएजी ने कहा ‘‘राज्य एवं केंद्रीय योजनाओं से कानून से मजबूती प्राप्त करने की आशा की जाती है। हालांकि कानून का उपयोग शायद ही कभी किया गया।’’ मैला ढोने के कार्य से मुक्त कराए गए लोगों के पुनर्वास के लिए पिछले कार्यक्रम असफल रहे क्योंकि अनुमानित तौर पर 95 फीसदी मैला ढोने वालों में महिलाएं शामिल हैं। जबकि ज्यादातर योजनाएं पुरुषों के लिए हैं और लाभार्थी भी वही हैं। इसके अतिरिक्त यह भी देखा गया है कि अधिकतर मैला ढोने वाली वृद्ध महिलाएं ही हैं जिनके पास साक्षरता, कौशल और अनुभव बहुत न्यून या बिल्कुल नहीं है। उनके लिए बैंक से ऋण और छूट पुनर्वास के उद्देश्यों को पूरा नहीं करते, योजनाओं में पारदर्शिता की कमी, भ्रष्टाचार, देरी, अनिश्चितता और छूट और ऋण लेने में होने वाले उत्पीड़न की तो बात ही अलग है। इस क्षेत्र में अनुभव बताता है कि योजनाएं पूर्ण रूप से अनुदान आधारित होनी चाहिए, व्यक्तिगत आमदनी उत्पन्न करने वाली योजनाओं को पीछे और आगे से क्षमता निर्माण प्रशिक्षण और परामर्श सेवाओं जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से मजबूती दी जानी चाहिए।

विवादास्पद संख्याएं

 

भारत में ‘‘मैला ढोने वालों को रोजगार और शुष्क शौचालयों के निर्माण (निषेध) अधिनियम 1993’’  होने के बावजूद देश भर में अब भी तेरह लाख लोगों का किस काम के रोजगार में लगे होने का रिपोर्ट है, जबकि राज्यों ने यह संख्या 1.16 लाख होने की रिपोर्ट दी है। मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए चलाई जाने वाली केंद्रीय योजना के लिए केवल 80,000 मैला ढोने वालों को योग्य पाया गया है। यद्यपि कर्नाटक ने 1970 में ही हाथ से मैला सफाई पर प्रतिबंध लगा दिया था, फिर भी एनएचआरसी (राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग) की रिपोर्ट अब भी इस कार्य में 8,000 लोगों के लगे होने की पुष्टि करती है। भारत सरकार द्वारा 2011 में जारी की गई आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2007 में हाथ से मैला उठाने वालों के पुनर्वास के लिए, स्वरोजगार योजना (एसआरएमएस) के तहत 1,18,474 मैला ढोने वालों या उनके आश्रितों की पहचान की गई थी।

2011 की जनगणना में 26 लाख घरों में अब भी अस्वास्थ्यकर शौचालय होने का खुलासा हुआ है, जिसको सफाई मैला ढोने वालों के माध्यम से की जाती है। भारत में प्रतिदिन तेरह लाख लोगों (दलित महिलाओं का अस्सी प्रतिशत) को मानव मल को साफ करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसे मैला ढोने कहा गया है। हाल ही में केंद्र सरकार ने वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के साथ मैला ढोने की कुप्रथा के उन्मूलन के लिए समीक्षा बैठक की घोषणा की है, जिसमें मैला ढोने वालों की समस्याओं और उनके लिए चलाए जा रहे तमाम योजनाओं का लाभ उन तक पहुंचाकर इस समस्या के प्रभावी निराकरण के बारे में सर्वेक्षण किए जाने की बात है।
 

कार्य योजना

इस मानवीय गतिविधि को सदा के लिए समाप्त करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, सरकार की चिंता और प्रतिबद्धता तथा कानून को लागू करने वाले प्राधिकारी की योग्यता, पारदर्शिता और जिम्मेदारी के बारे में किसी तरह के संदेह को समाप्त करने के लिए निश्चित रूप से कार्य योजना बनाई जानी चाहिए। जिसमें अन्य बातों के साथ ही निम्नलिखित प्रावधान भी होने चाहिए। सरकारी अधिकारियों के नामित दलों और सामुदायिक सदस्यों के द्वारा संयुक्त रूप से मैला ढोने वालों और शुष्क शौचालयों की पहचान की जानी आवश्यक है। ताकि सरकारें इस मामले में पहले की भांति आकड़ों को न झुठला सकें। (मैला ढोने वालों की मुक्ति के लिए तकनीकी परिवर्तनों के माध्यम से उनका मानवीय, सम्मानजनक और सुरक्षित तरीके से मल-मूत्र के सीधे संपर्क से परहेज, पहली आवश्यक शर्त है। नए कानून के तहत ग्रामीण पंचायत और नगरीय स्थानीय निकायों के साथ ही जिला के जिला न्यायाधीश के लिए यह आवश्यक कर दिया जाए कि वे सुनिश्चित करें कि कोई भी परिवार अस्वास्थ्यकर शौचालय का निर्माण या रखरखाव न करे या किसी बाहरी व्यक्ति को इनकी सफाई के लिए न रखे।

ग्रामीण भारत में जहां शुष्क शौचालय उपयोग में लाए जा रहे हैं। वहां हाथ से मैला सफाई की कुप्रथा का अंत करने के लिए स्वच्छता की दयनीय स्थिति को निश्चित रूप से सुधारा जाना चाहिए। सीवर-तंत्र की सुविधाओं के अभाव में यहां तक कि स्थानीय शहरी निकायों में भी श्रमिकों को हाथ से ही सैप्टिक टैंक साफ करने के काम पर रखा जाता है। अतः मैला ढोने की प्रथा का अंत ग्रामीण क्षेत्रों में उल्लेखनीय रूप से संपूर्ण स्वच्छता के तरीकों में सुधार कर के ही किया जा सकता है।

नगरपालिकाओं, सरकारी, अर्ध-सरकारी या निजी कंपनियों में कार्यरत मैला ढोने वालों के लिए कानून में विशेष रूप से एक खंड/धारा ‘‘कार्य से बर्खास्त नहीं किया जाएगा बल्कि उसे मैला ढोने के कार्य को छोड़कर किसी अन्य कार्य के लिए नियमित किया जाएगा’’ जोड़ा जाना चाहिए। शुष्क शौचालय के स्थान पर फ्लश शौचालयों के प्रचार के लिए सरकारी कार्यक्रमों, आजीविका पुनर्वास में मैला ढोने वालों का मुक्त स्वास्थ्य और उनके बच्चों की शिक्षा को स्थानीय निकायों और गैर-सरकारी संगठनों के द्वारा प्रभावी तरीके से लागू किया जाना, ऐसे मामलों में प्रशासनिक अधिकारियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों को लक्षित परिणाम हासिल करने के प्रति जवाबदेह बनाना चाहिए। मौजूदा और मुक्त कराए गए मैला ढोने वालों के बच्चों को सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयी शिक्षा से लेकर कॉलेज या रोजगार-उन्मुख तकनीकी कौशल प्रदान करने वाली व्यावसायिक प्रशिक्षण मुक्त देने की गारंटी दी जानी चाहिए। मैला ढोने वालों को सदियों पुरानी प्रथा से सामूहिक रूप से लड़ने के लिए सशक्त बनाया जाना चाहिए। जन-प्रतिनिधियों को नए विधेयक पारित करने में राजनीतिक प्रतिबद्धता दिखानी होगी और सरकार को इसे तीन महीने के भीतर कानून बनाकर इसे लागू करने वाली प्राधिकरण को निर्देश देने होंगे कि वे इसे बिना किसी देरी के लागू करें। 12-वीं पंचवर्षीय योजना के तहत् गांव के स्तर पर पंचायतों और शहरी केंद्रों पर स्थानीय निकाय सिर पर गंदगी ढोने वालों की पहचान कर उन्हें इस काम से मुक्ति करने और उनके पुनर्वास के लिए विकास कार्य योजना लागू करेंगे। ब्लॉक स्तर पर खंड विकास अधिकारी की अध्यक्षता में एक निगरानी कमेटी गांव और शहरी केंद्रों की हर महीने निगरानी करेगी। जिला स्तर पर जिलाधिकारी/कलेक्टर की अध्यक्षता वाली निगरानी कमेटी तिमाही आधार पर ब्लाक वार इसके कामकाज की निगरानी करेगी। जिलाधिकारी को इसके लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए कि एक निर्धारित संख्या में लोगों को इस काम से हटाया और उनका पुनर्वास किया जाए। राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली निगरानी कमेटी छमाही आधार पर जिलावार इस काम की निगरानी करे। राष्ट्रीय स्तर पर गृह मंत्री की अगुवाई वाली निगरानी कमेटी इसकी समीक्षा करके सालाना तौर पर इसे संसद के सामने रखे।

साभार : योजना नवम्बर 2014

लेखक बैंक ऑफ बड़ौदा के सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक हैं। वह भारत, अजरबैजान, तजाकिस्तान, कजाकिस्तान, बांग्लादेश और यूगांडा आदि में विश्वबैंक, एशियाई विकास बैंक और अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास निधि की परियोजनाओं में ग्रामीण साख एवं माइक्रो फाइनेंस के लिए अंतरराष्ट्रीय परामर्शी के रूप में काम कर रहे हैं। ग्रामीण साख एवं माइक्रोफाइनेंस के जमीनी अध्ययन के लिए वह एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय ग्रामीण एवं कृषि साख संघ की परियोजनाओं के तहत् फिलीपींस, इंडोनेशिया थाईलैंड और मलेशिया की यात्राएं कर चुके हैं। कृषि, ग्रामीण विकास, ग्रामीण बैंकिंग, माइक्रो-फाइनेंस आदि के संबंध में 400 से अधिक शोध-पत्रों के अतिरिक्त उनकी कई किताबें भी प्रकाशित हो चुकी हैं।

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