बम्मा जिंदगी, झाड़ू जिंदगी

Friday, December 5, 2014 - 18:32

हेमंत

वह औरत है। आज भी अंधेरे मुंह उठती है। शहर की संकरी गलियों में छिपते-छिपाते उन बीस घरों के पिछवाड़े पहुंचती है। गली में खुलते दरवाजे से पाखाना साफ करती है। चैबीस घंटे में जमा मल को बम्मा या टीन की बाल्टी में भरती है। और उसे सिर पर रख कर चुपचाप निकल जाती है। शुरू में कुछ परेशानी होती थी। मैला से भरा ‘बम्मा’ सिर पर रखकर संकरी गली से गुजरना! उफ! कच्ची, उबड़-खाबड़ गली, गड्ढे और अंधेरा! ऊपर से भौंकते कुत्ते। मैला छलककर देह पर आता था। बारिश में ऐसा अक्सर हो जाता था। धीरे-धीरे सब कुछ आसान हो गया। बाप-दादा का पेशा है, सो आदत पड़ गई। कमाऊ पाखाना से घिन कैसी? 
 
अंग्रेजों का अस्तबल, आजाद भारत में घर बन गया
 
वह जब पेट से थी तो नौवें महीने में उसका पति अपने 30-40 घरों के साथ उन बीस घरों का मैला भी ढो लिया करता था। शुकरा पैदा हुआ तो काम आसान हुआ। पति को अंग्रेजों के जमाने की ठेलागाड़ी हाथ लगी थी तो वह एक साथ दो-दो बम्मा कमाने लगा। अब तो तीन बच्चे हैं। दो की शादी भी हो गई। फिर उनके बच्चे। पति कुछ बुढ़ा गया है। वह भी कमजोर हो गई है। वैसे अब घर में कुल चार-पांच लोग बम्मा कमाते हैं। एक बेटा अब नगर पालिका में सफाई कर्मचारी हो गया है। सब ठीेके चल रहा है। बाकी सब जन उसी एक कमरे 6 फीट गुना 4 फीट में रहते हैं, जिसे अंग्रेज सरकार ने अपनी घोड़ों के लिए बनवाया था। आजाद भारत की सरकार ने अस्तबल को भंगी-मेहतर का क्वार्टर बना दिया। घर के नाम पर यही है। जहां वे पिछले 50 साल से रहते आए हैं। छत चूती है। सो रेल लाइन के किनारे एक झोपड़ी उठा ली है। कई बार सोचा की भाड़े के अच्छे मकान में जाएं, जैसे बाबू साहब लोग रहते हैं। लेकिन भंगी को कौन भाड़ा दे। बम्मा कमाने के नए घर मिलते हैं लेकिन भाड़े में कोई मकान नहीं मिलता। 
 
खैर, तमाम कमाऊ शौचालय वाले घरों के वासी जब सुबह उठते हैं, पिछली रात भर पेट खाए पचे-अनपचे से मुक्ति पाने के लिए शौचालय दौड़ते हैं। तो उन्हें यह देखकर तसल्ली मिलती है कि उनका शौचालय चकाचक है। तली की बाल्टी बिल्कुल साफ और खाली है। नाक दबाकर बैठने की जरूरत नहीं। पेट से लेकर पाखाना तक की हर दिन की सफाई के लिए प्रतिबद्ध उन घरों के अधिसंख्य सदस्य कल तक सिर पर मैला ढोने वालों के न नाम जानते थे और न चेहरे पहचानते थे। अब उन घरों के कुछ लोग भले चेहरा न देखा हो नाम जान गए हैं। कुछ घर वाले नाम नहीं जानते लेकिन चेहरे पहचानते हैं। मैला ढोने वाले पुरुष आज कल सुबह देर से निकलते हैं और दोपहर तक खुलेआम बम्मा कमाते हैं। ढीठ जो हो गए हैं। 
 
प्रदेश का हर कोना एक बिहार है
 
पिछले 17 सालों से तेजी से जारी भंगीमुक्ति अभियान की यह सबसे बड़ी उपलब्धि है। देश के अन्य राज्यों की प्रगति क्या है, नहीं मालूम। बिहार का सच यही है। और यह भी तो सच है कि हर प्रदेश का कोई न कोई कोना एक बिहार है।
 
भंगीमुक्ति अभियान में बरसों से लगे सरकारी योजनाकारों से पूछिए कि आज की तारीख में सिर पर मैला ढोने वालों की संख्या कितनी है तो वे बताएंगे कि बिहार में कितने कमाऊ शुष्क शौचालय बचेे हैं जिन्हें कम लागत के फ्लश शौचालय में बदलना है। कुछ और कुरेदिए तो किंचित उदार अफसर बताएंगे कि बिहार में आज भी कम से कम 2 लाख कमाऊ शौचालय हैं। एक भंगी प्रतिदिन कम से कम 25 कमाऊ शौचालयों का मैला ढो लेता है। इस हिसाब से आज भी सिर पर मैला ढोकर पेट पालने वाले भंगी परिवारों की संख्या 8 हजार है। यानी करीब 40 हजार की आबादी बिहार में कमाऊ पाखानों की कमाई पर गुजर-बसर करती है। वैसेए सरकारी फाइलों के अनुसार राज्य में सिर पर मैला ढोने वालों की संख्या 5 से 6 हजार से अधिक नहीं है।
 
1980 से भंगीमुक्ति अभियान चला। उसका मुख्य सूत्र कमाऊ शौचालय खत्म करो। जोरदार अभियान था लेकिन यह आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया कि कमाऊ् की कमाई पर निर्भर आबादी कितनी है। उनके नाम क्या हैं? उनके चेहरे कैसे हैं? जिनको समाज भंगी मेहतर चांडाल या हलालखोर कहता है।
 
 कुछ साल पूर्व की कथित अगड़ी सरकार और न वर्तमान पिछड़ी सरकार को ही उनकी सही स्थिति का पता है। पिछली सरकार शौचालयों की संख्या के आधार पर सिर पर मैला ढोने वालों की संख्या का अनुमान लगाती थी। वर्तमान सरकार उसी गिनती के भरोसे भंगीमुक्ति का अभियान चला रही है। आखिर अंधेरे में आती-जाती, अंधेरे में जीती-मरती आबादी की गिनती कैसे हो? इसलिए आज तक अंधेरों से जूझने को अभिशप्त लोगों तक सर्वेक्षण की रोशनी भी नहीं पहुंची।
 
सिर पर मैला ढोने वालों की संख्या बढ़ी है!
इससे भी विचित्र किंतु सत्य एक और तथ्य है। वह यह कि शहरीकरण की अनियंत्रित अंधी दौड़ में सिर पर मैला ढोने वालों की संख्या बढ़ रही है। इधर भंगीमुक्ति अभियान चल रहा है। और उधर शहर में तब्दील हो रहे हैं इससे बेखबर गांव! मैला ढोने की ग्रामीण प्रथा तेजी से शहरी आधुनिकता के पैमाने में ढल रही है। सरकारी आकड़े और संचिकाएं इसके गवाह हैं।
 
वर्ष 1980-1990 तक को अंतरराष्ट्रीय पेयजलापूर्ति और सफाई का दशक घोषित किया गया। भारत सरकार ने लक्ष्य निर्धारित किया कि 1990 तक देश की 80 प्रतिशत शहरी आबादी को पूर्ण सफाई की सुविधा उपलब्ध करानी है। राज्य सरकारों ने योजना बनाई। बिहार सरकार ने भी पुराने अनुमान और आंकड़े बांचे। नई योजना का प्रारूप केंद्र के समक्ष पेश किया। घोषणा की गई कि 1990 तक बिहार को भंगीमुक्त कर दिया जाएगा। कुल करीब 156 करोड़ रुपए की योजना बनी। केंद्र से पैसा आया। काम शुरू हुआ।
 
योजना प्रारूप के अनुसार बिहार के 202 अधिसूचित शहरों में 2.80 लाख कमाऊ शौचालय थे। 1971 की जनगणना के अनुसारए 1974 से 1980 तक राज्य सरकार ने अपने सीमित उपलब्ध संसाधनों से 35 हजार कमाऊ शौचालयों को सुलभ शौचालयों में बदल दिया। सिर्फ 2.45 लाख कमाऊ शौचालयों को बदलना रह गया था। 1980 से 1985 तक तेज अभियान चला और फटाफट 23 शहरों को भंगीमुक्त करार दिया गया। छठी पंचवर्षीय योजना का काल था वह।
 
उपलब्धियों के आंकलन के लिए 1985 से 1987 तक लंबी मध्यावधि समीक्षा.यात्रा चली। मालूम हुआ कि 1987 तक राज्य के 107 शहरों में 1.57 लाख कमाऊ शौचालयों को बदलने की कार्रवाई जारी थी। लेकिन मामला गड़बड़ा गया। राज्य सरकार 28-30 करोड़ रुपए के विरुद्ध सिर्फ 6-18 करोड़ रुपए खर्च कर पाई।
खैर, समीक्षा में पुनः अनुमान किया गया। निष्कर्ष निकला कि राज्य में अब सिर्फ 1.70 लाख कमाऊ शौचालय बच गए है। भंगीमुक्ति अभियान बेहद तेज चल रहा थाए इसलिए कम खर्च के बावजूद कम से कम 74 हजार कमाऊ शौचालय कम लागत वाले सुलभ शौचालयों में बदल गए।
 
फिर क्या था? राज्य सरकार ने बाकी दो वर्ष 1988 से 1989 की योजना बनाई। सातवीं योजना की उस बची अवधि में 15.96 करोड़ रुपए में 1 लाख कमाऊ शौचालयों को बदलने का संकल्प किया। तब आठवीं पंचवर्षीय योजना के लिए सिर्फ 70 हजार कमाऊ शौचालयों का बोझ रह जाएगा। उन्हें भी एक-डेढ़ साल में खत्म कर दिया जाएगा।
 
वर्ष 1997 आया। नौवीं पंचवर्षीय योजना का प्रथम वर्ष। सरकारी, गैरसरकारी आंखों ने पीछे देखा तो यह अनुमान प्रकट हुआ कि 1991 की गणना के अनुसार बिहार में कम से कम दो लाख कमाऊ शौचालय हैं। आठवीं पंचवर्षीय योजना 1990-95 की अवधि में भंगीमुक्ति अभियान ठप्प रहा। तो भी कमाऊ शौचालयों की संख्या 70 हजार से कम होनी चाहिए थीए लेकिन हो गए दो लाख ।
 
1985-87 की मध्यावधि समीक्षा यजिसकी रिपोर्ट केंद्र सरकार की शहरी विकास मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य संगठन को भेजी गई थीद्ध में यह अनुमानित आंकड़ा मान्य हुआ था कि बिहार में सिर पर मैला ढोनेवाले 5 हजार भंगी परिवारों को मुक्ति दिलानी है। वर्ष 1990 तक 2000 परिवारों को मैला ढोने के अभिशाप से मुक्ति दिलाकर उन्हें पुनर्वासित करना संभव होगा। बाकी तीन हजार लोगों को आठवीं पंचवर्षीय योजना की प्रतीक्षा करनी होगी।
 
लेकिन अब 1997 में आंकड़े बताते हैं कि राजधानी से जुड़े अकेले पटना सिटी में 10,000 कमाऊ शौचालय हैं। तब सिर पर मैला ढोने वालों की गिनती का अनुमान कैसे हो?
 
सो अब पूरे बिहार में सिर पर मैला ढोने वालों की संख्या 5 हजार कहें या 8 हजार। राज्य सरकार के लिए क्या फर्क पड़ता है? अलबत्ता गैरसरकारी विशेषज्ञ कहते हैं कि फिलहाल राज्य में सिर पर मैला ढोकर पेट पालनेवाली आबादी 50 से 60 हजार होगी। इस आबादी को चाहे जितने परिवारों मे बांटिए। तस्वीर में कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। कुल मिलाकर भंगीमुक्ति अभियान की 17 साल लंबी यात्रा के बाद भी सिर पर मैला ढोने वालों के चेहरे की मुकम्मिल पहचान नहीं बन पाई। मुक्ति की बात तो दूर रही।
 
बहरहाल उक्त आंकड़ों के भ्रमजाल ने इस क्रूर तथ्य को उजागर कर दिया कि बिहार में शहरीकरण और शहरी विकास की अंधाधुंध दौड़ में कमाऊ शौचालयों  की संख्या बढ़ी है। 15-17 सालों में इधर भंगीमुक्ति अभियान चलता रहा लेकिन इससे बेखबर उधर गांव शहरों में तब्दील होते रहे। शहरीकरण और आधुनिकता का अर्थ यह हुआ कि शौच के लिए मैदान जाने वाले लोग घर में बने लैट्रिन में जाएं। इसके लिए सबसे आसान तरीका कमाऊ शौचालय बनाना हुआ। पहले गांव में इक्के-दुक्के बाबू साहब घर में कमाऊ शौचालय बनवाते थे। यजमानी प्रथा् के तहत निचली जात के पौनिया रखे जाते थे। उनमें भंगी शामिल था जो रोज उनके शौचालय को साफ कर जाता था। गांव में आज भी यह प्रथा जारी है। गांव जब शहर बनने लगे तो वही प्रथा आधुनिकता को आसान रास्ता दिखा गई। सो भंगीमुक्ति अभियान के बावजूद कमाऊ शौचालयों की संख्या बढ़ गई। इसे सरकारी पदाधिकारी न स्वीकार कर पाते हैं और न ही इससे  इनकार कर पाते हैं। 
 
वैसे, राज्य सरकार ने शहरी आबादी में वृद्धि और उनके शौच के इंतजाम पर जिस भयानक सच का आंकलन किया है वह तस्वीर का दूसरा पहलू भी उजागर करता है। उसमें कमाऊ शौचालयों में वृद्धि और उसी अनुपात में मैला ढोने वालों की संख्या में वृद्धि के तर्क को अस्वीकार किया गया है। लेकिन बदले में इस तथ्य को रेखांकित करने से नहीं बचा जा सका है कि आज की तारीख में भी बिहार के 46 प्रतिशत शहरी मकानों में शौचालय नहीं हैं।  
 
अद्यतन सरकारी आंकड़े कहते हैं कि अनुमानतः सिर्फ नौ प्रतिशत शहरी परिवार फ्लश लैट्रिन का उपभोग करते हैं। 20 से 25 प्रतिशत परिवार निजी सुलभ शौचालय का उपयोग करते हैं। 25 से 30 प्रतिशत तक शहरी घरों में कमाऊ शौचालय विद्यमान हैं। बिहार के 21 शहरों में 124 सामुदायिक सुलभ शौचालय बने हैं। उनमें प्रतिदिन पैसा देकर पेट साफ करनेवालों की संख्या करीब एक लाख है। बाकी शहरी लोग गांवों की तरह मैदान जातें हैं। यानी सड़को-गलियों अथवा रेल पटरियों के किनारे फारिग होते हैं।
 
शहरी आबादी और शौचालय का अद्यतन आंकड़ा यह है कि बिहार में 1990 में शहरी आबादी 1.11 करोड़ थी। उसमें से सिर्फ 30 लाख लोग किसी न किसी प्रकार के शौचालय की सुविधा पाते थे। स्वच्छ शौचालय की सुविधा से वंचित 80.48 लाख लोग दिशा-मैदान के लिए प्रकृति की कृपा पर निर्भर हैं। सन् 2001 तक बिहार की शहरी आबादी अनुमानतः 1.25 करोड़ होगी और उसमें से एक करोड़ लोग हर दिन शौच के समय शहर में होने की सजा भुगतेंगे। उन्हें शौच की उचित जगह खोजने के लिए दौड़ना होगा।
 
स्लम के लोग शौचालयों का उपयोग नहीं करते हैं 
 
और तो और बिहार में फिलहाल 20 लाख से अधिक लोग शहरी झोपड़पट्टियों (स्लम) में रहते हैं। स्लम सुधारा् के बजाय स्लम विकास योजनाओं का निष्कर्ष यह है कि उनकी संख्या सन् 2000 तक दुगुनी हो जाएगी। उनके लिए सामुदायिक सुलभ शौचालय ही विकल्प है। उनकी निर्माण की गति का आलम यह है कि 5 प्रतिशत स्लमवासी भी आज उन सामुदायिक सुलभ शौचालयों का मुश्किल से इस्तेमाल कर पाते हैं।
 
1971 की गणना के अनुसारए बिहार में 202 अधिसूचित शहर थे। 1997 का चैंकाने वाला आंकड़ा यह है कि करीब 360 शहर बन रहे हैं। यानी गांव तेजी से शहर बनने की तैयारी में लगे हैं। उनमें से 36 शहरों में भी नगर निगम, नगर पालिका या स्थानीय निकाय जैसी कोई साबूत इकाई नहीं है जो शहर की सफाई के लिए प्रतिबद्ध हो। संडास के अभाव में ये तमाम शहर हर सुबह अनिवार्यतः पसरने वाले मैला से जूझने को अभिशप्त हैं। अधिकांश शहर या तो सूअरों की कृपा से मैला से मुक्ति पाते हैं या फिर। बिहार में पटना सहित जमशेदपुर, रांची, बोकारो जैसे चंद औद्योगिक शहरों में मल निकासी सीवरेज सिस्टम प्रणली चालू है। अनुमानतः 7.2 प्रतिशत शहरी आबादी उस प्रणाली की सुविधा पाती है। उस प्रणाली का आलम यह है कि चालीस के दशक में चालू पटना की सीवरेज प्रणाली इसकी आबादी के दसवें भाग को भी समुचित सुविधा मुहैया नहीं कर पाती। बिहार में प्रथम श्रेणी के 14 शहरों में से सिर्फ 5 में आधी-अधूरी। बोकारो स्टील सिटी को छोड़कर सीवरेज प्रणाली है। दूसरी श्रेणी के 25 शहरों में से किसी में मलनिकासी की स्थाई प्रणाली नहीं है।
 
फिर भी राज्य सरकार मानती है कि बिहार में सिर पर मैला ढोने अथवा बम्मा कमाने वालों की संख्या घट नहीं रही हैए तो बढ़ भी नहीं रही है।
 
आजादी के साथ जूते व दस्ताने भी चले गए
 
यहां इस तथ्य को न पेश करना पक्षपात माना जाएगा कि बिहार के विभिन्न अधिसूचित क्षेत्रों में 2 लाख से अधिक सफाई कर्मचारी हैंए उनमें 50 प्रतिशत से अधिक भंगी हैं जो सफाई कर्मचारी बनकर सिर पर मैला ढोने से मुक्ति पा चुके है। पहले नगर पालिकाए नगर निगम अथवा स्थानीय निकायों के जरिए यही कर्मचारी बम्मा कमाते थे। यानी इस प्रथा पर अंकुश लगा है। वैसे उन सफाई कर्मचारियों की दुर्दशा के लिए इतना कहना पर्याप्त होगा कि उन्हें अपने वेतन के लिए तीन-चार महीने इंतजार करना पड़ता है। तीन साल का बोनस बाकी है। पहले उनको मैला ढोने का बम्मा मिला था। आजादी के बाद उनको जूते-दस्ताने देने का रिवाज बंद हो गया। अब उनको सिर्फ झाड़ू दिया जाता है। ऐसे ही एक सफाई कर्मचारी के शब्दों में पहले हम बम्मा जिंदगी जीते थे, अब झाड़ू जिंदगी जीते हैं। दुनिया भर की गंदगी साफ करने वाला झाड़ू खुद कितना गंदा है, यह देखने की फुर्सत किसे है?
 
(28 सितंबर, 1997)
नोटः यह रिपोर्ट 1997 में  लिखी गई। उसी साल छपी भी। उसके बाद गंगा में बहुत पानी बहा। इंसान का मैला साफ करते-करते राजनीति की गंगा मैली हो गई। सो 2000 में बिहार बंट गया। बोकारो, जमशेदपुर आदि कई शहर-जिनका इस आलेख में जिक्र है- झारखंड में चले गए। इसलिए पाठक यह याद रखें कि ‘बम्मा जिंदगी से झाड़ू जिंदगी’ तक की यह यात्रा उस वक्त की है, जब बिहार अविभाजित था। 

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