‘उपग्रह ही नहीं, शौचालय भी चाहिए’

Friday, December 5, 2014 - 18:31

‘उपग्रह ही नहीं, शौचालय भी चाहिए।’ यह कथन है- भारत सरकार के पूर्व माननीय ग्रामीण विकास, पेय जल एवं स्वच्छता-मंत्री श्री जयराम रमेश का। श्री रमेश ने 7 मार्च, 2012 को अपने सुलभ-भ्रमण के अवसर पर उपस्थित सभा को संबोधित करते हुए ये बातें कहीं थी। श्री रमेश उक्त तारीख को प्रातः 9 बजे सुलभ-परिसर में पधारे। उनसे पूर्व उनके विभाग की माननीया सचिव सुश्री विलासिनी रामचंद्रन एवं माननीय संयुक्त सचिव (स्वच्छता) श्री जेएस माथुर पधार चुके थे। इनलोगों के आगमन पर सुलभ-स्वच्छता एवं सामाजिक सुधार-आंदोलन के संस्थापक डॉ. बिन्देश्वर पाठक एवं सुलभ के अन्य वरिष्ठ सदस्यों ने माला एवं पुष्पगुच्छ प्रदान कर स्वागत किया। तत्पश्चात् ये सुलभ की तकनीक देखने के लिए आगे बढ़ गए। कैंपस के लॉन में राजस्थान के अलवर एवं टोंक की करीब सौ महिलाएं उपस्थित थीं। ये वहीं महिला थीं, जो सन् 2008 से पूर्व डॉ. पाठक से सिर पर मानव-मल ढोने की कुप्रथा को दूर करने के उद्देश्य से जुड़ी थीं और इसी वर्ष इन्हें सुलभ द्वारा पुनर्वासित कराया गया था। माननीय मंत्री महोदय को अपने बीच पाकर इन महिलाओं ने इन्हें माल्यार्पण किया, पुष्पगुच्छ प्रदान किया, तिलक लगाया एवं उनके स्वागत में गीत गाया।

इसके बाद माननीय मंत्री जी ने सुलभ की सेट टेक्नोलॉजी, सुलभ एफ्लुएंट-ट्रीटमेंट-प्लांट और सार्वजनिक शौचालय से संयुक्त बायोगैस-प्लांट से ऊर्जा-उत्पादन एवं उसका प्रयोग देखा।

माननीय मंत्री जी ने बायोगैस-आधारित मेंटल-लैंप को स्वयं जलाकर देखा एवं सुलभ के प्रशिक्षित कार्यकर्ता ने उन्हें जेनरेटर चलाकर उसकी विद्युत-आपूर्ति और मीटर-रीडिंग दिखाई। इसके बाद इन्हें रसोईघर ले जाया गया, जहां इन्होंने मानव-मल-आधारित बायोगैस से जलते चूल्हे पर भोजन पकते हुए देखा। इसके बाद इन्होंने सुलभ पब्लिक स्कूल और सुलभ इंटरनेशनल म्युजियम ऑफ टॉयलेट्स देखा। फिर सभी लोग प्रार्थना-सभागार में पहुंचे। वहां सुलभ-प्रार्थना के पश्चात् सुलभ की परंपरा में शॉल-माला से माननीय मंत्री जी एवं उनके विभाग के अधिकारियों का स्वागत सुलभ के संस्थापक डॉ. बिन्देश्वर पाठक एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती अमोला पाठक द्वारा किया गया। इस अवसर पर आदरणीय मंत्री जी के सम्मान में प्रशस्ति-पत्र का वाचन हुआ। वाचिका थीं सुलभ इंटरनेशनल की वरीय उपाध्यक्ष श्रीमती आभा बहादुर। प्रशस्ति में उनके व्यक्तित्व और कार्यों का उल्लेख था। इसके बाद डॉक्टर पाठक ने उनका स्वागत करते हुए कहा, माननीय मंत्री जी, मैं एक बात की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं कि सुलभ एक सफल एवं प्रभावपूर्ण आंदोलन बन गया है। इसे अपने मुकाम तक पहुंचने का श्रेय आप सभी नेताओं, राजनीतिक दलों, केंद्र एवं राज्य की सरकारों के साथ-साथ सभी सुलभ-कार्यकर्ताओं को है। एक बात और कि आपने जबसे ग्रामीण विकास, पेय जल एवं स्वच्छता-विभाग का मंत्रालय संभाला है, निश्चय ही स्वच्छता एवं शौचालय-निर्माण का क्षेत्र विकसित और विस्तृत हुआ है। आपके दिशा-निर्देश के आधार पर यदि ग्राम-पंचायत के मुखिया-सरपंच चलेंगे तो निश्चय ही हमारा देश निर्मल देश के साथ एक स्वच्छ भारतवर्ष होगा।

वांछित शुचिता की कमी के कारण पर्यटन की दृष्टि से हमारी उपलब्धि जितनी होनी चाहिए वह नहीं है। इस संदर्भ में मुझे एक कहानी याद आती है। बात उस समय की है, जब हमारे यहां के लोग डब्ल्यूसी का अर्थ भी नहीं जातने थे। एक अंग्रेज महिला भारत आना चाहती थी और उसने यहां आने की योजना बनाई। एक साधारण-से अतिथिगृह में रहने के लिए उसने एक स्थानीय स्कूल-शिक्षक को लिखा। महिला को यह चिंता थी कि उस घर में पश्चिमी शैली का जलप्रवाही शौचालय यानी डब्ल्यूसी है या नहीं। उसने खत लिखकर यह जानकारी मांगी कि वैसा शौचालय (डब्ल्यूसी) घर में है या नहीं। शिक्षक अंग्रेजी में पारंगत नहीं थे। उन्होंने स्थानीय पादरी से पूछा कि क्या वह डब्ल्यूसी का अर्थ जानते हैं। दोनों उसका अर्थ जानने के लिए कुछ देर तक माथापच्ची करते रहे और आखिर में इस नतीजे पर पहुंचे कि शायद महिला यह जानना चाहती है कि घर के करीब में ‘वेसाइड चौपल’ (गिरजाघर) है या नहीं। उनके दिमाग में यह बात नहीं आई कि उस शब्द का अर्थ शौचगृह भी हो सकता है। अतः उसने उस अंग्रेज महिला को पत्र लिखा-
‘मुझे आपको यह सूचना देते हुए प्रसन्नता हो रही है कि डब्ल्यूसी घर से 9 मील की दूरी पर स्थित है। वह चीड़ के वृक्षों के मध्य स्थित है। उसके चारों ओर मनोभावन दृश्य हैं। उसमें 229 लोग बैठ सकते हैं और वह रविवार एवं वृहस्पतिवार को खुला रहता है। गर्मी के महीनों में बहुत-से लोगों के आने की संभावना है, अतः मेरा सुझाव है कि आप कुछ जल्द ही आ जाएं। बहरहाल, खड़ा होने के लिए वहां काफी जगह है। लेकिन यदि आप वहां नियमित रूप से जाने वाले लोगों में हैं तो थोड़ा कष्ट हो सकता है। यह बात आपके लिए दिलचस्पी की हो सकती है कि मेरी बेटी का विवाह डब्ल्यूसी में ही हुआ था, वह वहीं अपने पति से मिली थी। वह एक शानदार घटना थी। हर सीट के पास 10 लोग थे। उनके चेहरे पर उभरे भावों को देखना अद्भूत लगता था। कुछ दिनों से मेरी पत्नी बीमार रह रही है और वह हाल में वहां नहीं जा सकी है। आखिरी बार वह सालभर पहले वहां गई थी, इससे उसे काफी तकलीफ है। यह जानकर आपको खुशी होगी कि वहां बहुत-से लोग अपना दिन का भोजन लेकर आते हैं और उसका आनंद उठाते हैं। कुछ दूसरे लोग हैं, जो आखिरी मिनट तक प्रतीक्षा करते हैं, लेकिन ठीक समय पर पहुंच जाते हैं। चूंकि वहां साज भी रहता है, चारों ओर मधुर ध्वनियां सुनाई देती हैं। अतः आप वहां बृहस्पतिवार को जाने की योजना बनाएं। हाल में वहां पर एक घंटी लगाई गई है, जो किसी के वहां प्रवेश होने के साथ ही बजने लगती है। हम वहां एक बाजार लगाने की सोच रहे हैं, ताकि सभी के लिए वहां पर अच्छी सीटों की व्यवस्था हो सके, जिसकी सख्त जरूरत है। मैं उस क्षण की प्रतीक्षा कर हरा हूं, जब मैं खुद आपको लेकर वहां जाऊंगा, जहां से आप सभी लोगों को दिखाई दे सकें।’ जाहिर है, यह पत्रोत्तर पाकर अंग्रेज महिला ने अपनी यात्रा स्थगित कर ली।

सुलभ की गतिविधयों को देखकर और यहां जो उन्होंने देखा, उससे माननीय मंत्री महोदय काफी प्रभावित हुए। उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि डॉक्टर पाठक से मेरा परिचय 25 साल पुराना है। सामने नीली साडि़यों में सुसज्जित अलवर एवं टोंक की पुनर्वासित महिलाओं को देखकर उन्होंने कहा कि देश में तकनीक का विकास तो हुआ, लेकिन खुले में शौच करने का कलंक अभी भी पूरी तरह नहीं मिटा है। गांवों में शौचालयों की व्यवस्था नहीं है।

देश में जितनी जरूरत सुरक्षा की है, उतनी ही स्वच्छता की भी है। उपग्रह ही नहीं शौचालय भी चाहिए। देश में 70 करोड़ मोबाईल फोन उपभोक्ता हैं, जबकि शौचालय इस्तेमाल नहीं करनेवालों की कुल जनसंख्या का 60 प्रतिशत भारतीय हैं। इनमें अधिकतर महिलाएं हैं। यह महिलाओं की सुरक्षा व अस्मिता का मामला भी है। - जयराम रमेश, पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री।

मैला ढोनेवाले परिवारों का सुलभ द्वारा पुनर्वासन हुआ है।

 

स्वच्छता की वर्तमान स्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि देश में जितनी जरूरत सुरक्षा की है, उतनी ही स्वच्छता की भी है। उपग्रह ही नहीं शौचालय भी चाहिए। देश में 70 करोड़ मोबाईल फोन उपभोक्ता हैं, जबकि शौचालय इस्तेमाल नहीं करनेवालों की कुल जनसंख्या का 60 प्रतिशत भारतीय हैं। इनमें अधिकतर महिलाएं हैं। यह महिलाओं की सुरक्षा व अस्मिता का मामला भी है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश के बैतूल जिले की श्रीमती अनीता बाई नर्रे ने शौचालय नहीं होने पर ससुराल जाने से इनकार कर उदाहरण प्रस्तुत किया है। आगामी 21 मार्च को विज्ञान-भवन में महामहिम राष्ट्रपति उन्हें सम्मानित करेंगी। राष्ट्रपति के हाथों अनीता बाई को उस साहस के लिए सम्मानित किया जाएगा, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। अनीता वहां उपस्थित जन-समूह को संबोधित भी करेगी।

सुलभ-संस्थान के संस्थापक की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि अस्वच्छता मिटाने के लिए इन्होंने आंदोलन शुरू किया है। करीब एक करोड़ लोग प्रतिदिन सुलभ शौचालय का इस्तेमाल कर रहे हैं, पर ग्रामीण इलाकों में ज्यादा काम नहीं हुआ। आगामी बजट में स्वच्छता के मद में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। ‘निर्मल भारत अभियान’ के तहत गांवों में शौचालय-व्यवस्था के लिए पंचायतों को जिम्मेदारी दी जाएगी। उन्हें प्रति शौचालय सात से आठ हजार रुपए देने की व्यवस्था होगी। सुलभ के संस्थापक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, पाठक जी, आपने शहरों में तो बहुत कार्य किया है। 7,500 पब्लिक टॉयलेट और 12,00,000 घरेलू शौचालय बनाना कोई साधारण कार्य नहीं है, किंतु अब देहातों में भी काम होना चाहिए। स्वच्छता-अभियान के तहत शौचालय-निर्माण के मामले में ग्राम-पंचायत को अधिक-से-अधिक अधिकार उपलब्ध कराए जाएंगे।

माननीय मंत्री महोदय ने कहा कि मैंने सुलभ पब्लिक स्कूल के अंदर स्कूल सैनिटेशन क्लब देखा है। यह बहुत ही अच्छा कार्य है। बचपन से ही स्वच्छता के प्रति सचेष्ट करने का साधन है। स्कूलों में इको क्लब शुरू होने से पर्यावरण के प्रति जागरूकता आई है। ऐसे निर्मल क्लब देश के प्रत्येक विद्यालय में खोले जाएं एवं उसके खर्च का वहन पेय जल एवं स्वच्छता-मंत्रालय करे।

उन्होंने कहा, ‘मैंने सुलभ का इंटरनेशनल टॉयलेट्स ऑफ म्युजियम देखा है। सुलभ इंटरनेशनल के शौचालय संग्रहालय पर किताब बनाएं, ताकि बच्चों और लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जा सके। यहां तीन हजार साल पुरानी हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सहित कई सभ्यताओं के सफाई-प्रबंधन तथा शौचालय-व्यवस्था प्रदर्शित की गई है। मुझे आज आश्चर्य होता है कि उस वक्त की शौचालय-व्यवस्था ज्यादा बेहतर थी। संग्रहालय में भारतीय सभ्यता से लेकर विदेशी संस्कृति के शौचालय प्रदर्शित किये गये हैं, जिसमें दो मंजिला (1920 का) अमेरिकी शौचालय भी है। इसमें ऊपर प्रबंधक एवं नीचे कर्मचारी के लिए व्यवस्था होती थी।’ आगे उन्होंने कहा कि इस पर अच्छी किताब लिखी जा सकती है।

कार्यक्रम के अंत में माननीय मंत्री महोदय के सम्मान में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जिसमें अलवर एवं टोंक की पुनर्वासित स्कैवेंजर महिलाएं, युवतियां तथा सुलभ पब्लिक स्कूल एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण-केंद्र की छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।

साभार : सुलभ इंडिया, अप्रैल 2012

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