मैला उठाने की प्रथा के खिलाफ चलाना होगा सामाजिक आंदोलन

Friday, December 5, 2014 - 18:31

एस.पी.सिंह

स्वच्छता ईश्वरीयता के समकक्ष है- महात्मा गांधी। अच्छे इरादों वाले वक्तव्य या विचार तब तक सार्थक नहीं होते, जब तक इतिहास, मुल्यों, संदर्भ, आर्थिक विकास के स्तर, शिक्षा और सामाजिक पूर्वग्रहों को ध्यान में नहीं रखा जाए। जो सदी-दर-सदी इकट्ठे होते रहे हैं। हमारे संविधान में अस्पृश्यता, दहेज, बाल विवाह, जाति व्यवस्था और अन्य अनेक सामाजिक बुराइयों को खत्म कर दिया गया है, परंतु ये सभी हमारे समाज में अभी भी विद्यमान है। उसी तरह हाथ से मानव मल की सफाई की प्रथा को खत्म करने के लिए भी कानून बना है, लेकिन व्यवहार में वह तब तक प्रभावी नहीं होगा, जब तक कि हम सामाजिक आंदोलन नहीं चलाते, जनता को शौचालय इस्तेमाल करने की आदत डालने के लिए शिक्षित नहीं करते और तकनीक संबंधी विकल्प प्रस्तुत नहीं करते।

‘स्वच्छता हमारा धर्म है’

जब सुलभ के संस्थापक डॉ बिंदेश्वर पाठक ने अपने भाषण में कहा कि ‘स्वच्छता हमारा धर्म है’ तो लोगों ने इसे बहुत साधारण ढंग से लिया। हमें आश्चर्य हुआ की किस तरह स्वच्छता और धर्म को मिलाया जा सकता है। धर्म एक विश्वास है जबकि स्वच्छता विज्ञान, लेकिन जब भारत के अलग-अलग विचारधाराओं वाले दो बड़ी राजनीतिक दलों के दो मशहूर नेताओं श्री नरेंद्र मोदी और श्री जयराम रमेश ने एक ही सांस में शौचालय और मंदिर की बात कही (हालांकि अलग-अलग तरह से) तो हमें पता चला कि स्वच्छता एक दैविक चीज है, जैसा कि गांधीजी ने भी कहा था कि स्वच्छता ईश्वरीयता के समकक्ष है।

राजनीतिक विवाद से अलग देखें तो दो नेता एक ही बात कह रहै हैं, क्योंकि दोनों ने मंदिर बनवाने से पहले शौचालय निर्माण की बात कही- पहले शौचालय फिर देवालय या शौचालय देवालय से अधिक स्वच्छ है दोनों ही दल स्वच्छता को बेहतर बनाने के मुद्दे पर एकमत हैं, यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने जीवन भर कार्य किया है। हिरोडोटस का कहना है कि जो लोग इतिहास को नजरअंदाज करते हैं उन्हें उसे फिर से जीना होगा। चूंकि हम अपने इतिहास को भूल चुके हैं, इसलिए स्वच्छता की समस्या ने इतना बड़ा आकार ले लिया है जो लोगों के जीवन, विकास और शताब्दी के एक महान देश के हमारे सपने के लिए खतरा बन गई है।

विश्व बैंक के अनुसार, देश में लगभग 54 बिलियन डॉलर (32400) करोड़ रुपए हर वर्ष असमय मृत्यु, बीमारों के इलाज, समय और उत्पादकता की बर्बादी और पर्यटन से होने वाले लाभ को खो देता है।

भारतीय बच्चों के विकास में अवरोध का जितना बड़ा कारण गंदगी है, उतना कुपोषण नहीं। कारण यह है कि अपर्याप्त सफाई बच्चों में पोषक अन्न को पचाने की ताकत कम कर देती है। -डीन स्फीयर्स, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री।

हर वर्ष 5 लाख से अधिक बच्चे असमय मृत्यु के शिकार होते हैं, गंदगी से बीमारियां बढ़ती है। अर्थशास्त्री डीन स्पीयर्स का कहना है कि भारतीय बच्चों के विकास में अवरोध का जितना बड़ा कारण गंदगी है, उतना कुपोषण नहीं। कारण यह है कि अपर्याप्त सफाई बच्चों में पोषक अन्न को पचाने की ताकत कम कर देती है।    

 मानव मल का महत्व

 

पर्यावरणविद् सुश्री सुनीता नारायण ने अपनी पुस्तक ‘व्हाई एक्सक्रीटा मैटर्स’ में कहा है कि अनेक शहर अपने ही मल में डूब रहे हैं। बहुत से नाले (दिल्ली में नजफगढ़ और लुधियाना में बुड्ढा नाला) पहले नदी थे। मुंबई में मीठी नदी थी अब वह गायब हो गई है, क्योंकि शहर ने इसे कचरे से भर दिया है और लोगों ने जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया है। उनका कहना है कि यमुना, कावेरी और दामोदर नदियां मीठी नदी की ही तरह एक दिन गायब हो जाएंगी। यह सब कुछ शुरू हुआ शौचालय के मल-मूत्र और औद्योगिक बहिस्राव के नदियों में बहाए जाने से। शहरी कचरा एक दिन आधुनिक सभ्यता को मिटा देंगा और उसे इतिहास की वस्तु बना देगा। तथ्य यह है कि ढेर सारे आंकड़े उपलब्ध हैं यह साबित करने के लिए कि स्वच्छता का महत्व है।

टू पीट फोर फ्लश

डॉ. पाठक ने लगभग अपना सारा जीवन स्वच्छता के क्षेत्र में और हाथ से स्कैवेंजिंग की समस्या को खत्म करने की कोशिश में लगाया है। उन्होंने इसी विषय पर अपनी पीएचडी की और अन्य शिक्षा संबंधी कार्य उस वक्त शुरू किए, जब उन्होंने 1970 में सुलभ शौचालय संस्थान की स्थापना की जो बाद में सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाईजेशन बन गया। वह देश के भीतर और बाहर के अनेक देशों में काम कर रहा है। उनका कहना है, ढइझ ‘खुले में शौच की प्रथा को खत्म करने का पहला सर्वाधिक प्रभावकारी तरीका है सुलभ शौचालय का निर्माण जिसका आधार है दो गड्ढों वाला (टू पीट फोर फ्लश) शौचालय, जिसमें मौके पर ही बिना हाथ लगाए सफाई हो जाती है। यह किफायती है, सांस्कृतिक दृष्टि से स्वीकार्य और विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और जलवायु संबंधित स्थितियों के लिए उपयुक्त है। मैले की मौके पर सफाई एक नई अवधारणा है जिसे यदि वैश्विक स्तर पर स्वीकार कर लिया जाए तो वह बहुत बड़े पैमाने पर हमारी नदियों को प्रदूषण मुक्त और शहरों को साफ-सुथरा रखेगी। अभी तक तो हमारे पास सीवेज अपजल निस्तारण विधि रही है, जो कि मंहगी है, प्रदूषण पैदा करती है और जिसके लिए स्कैवेंजर की जरुरत होती है। सुलभ की दो गड्ढे वाली शौचालय प्रणाली इन सभी समस्याओं का ध्यान रखेगी।’ सुलभ की इस तकनीक को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली हुई है। उसे निजी घरों और सार्वजनिक शौचालय परिसरों में लगाया गया है।

ऐसे शौचालय जिसमें जल की जरूरत न पड़े

बहरहाल, उस तकनीक को लेकर अभी तक अंतिम शब्द नहीं कहा गया है, जिसने आधुनिक विश्व का निर्माण किया है। ‘द बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन’ नए विचारों को आमंत्रित कर रहा है। उद्देश्य है एक ऐसे शौचालय का निर्माण, जिसमें जल की जरूरत ना पड़े और वह इतना साफ-सुथरा हो कि उसके लिए सीवर या बिजली से जुड़ने की जरूरत ना हो और जिसकी लागत प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पांच सेंट से अधिक न हो। यह एक महान विचार है, जो शुरू-शुरू में होली ग्रेल के लिए एक खोज की तरह लग सकता है। लेकिन अक्सर बड़ी चीजों की शुरुआत छोटे ढंग से होती है। (सुलभ की स्थल पर ही मल के निबटान की व्यवस्था ऐसी ही है।) तकनीक से अकाल रुका है और दुनिया के लिए पर्याप्त अन्न उत्पादन की व्यवस्था हुई है। तकनीक आज नया देवता है, बिना दैवी आभा के, सभ्यता का विकास और नाश दोनों इसी से होंगे, क्योंकि इसके द्वारा वैसे अस्त्र भी पैदा हुए हैं, जो एक बटन दबा देने पर महाद्वीपों को नष्ट कर देने के लिए काफी हैं। वास्तविकता यह है कि हम एक बहुत ही खतरनाक दुनिया में जी रहे हैं, जिसे तकनालाजी की अपेक्षा विवेक ही बचा सकता है।
 

हाथ से स्कैवेंजिंग

हाथ से स्कैवेंजिंग की तरह हमारे यहां अनेक सामाजिक बुराइयां हैं, जैसे - छुआछूत और सामाजिक भेदभाव, जो शौचालय से जुड़े हुए हैं।

विश्व बैंक के अनुसार, देश में लगभग 54 बिलियन डॉलर (32400) करोड़ रुपए हर वर्ष असमय मृत्यु, बीमारों के इलाज, समय और उत्पादकता की बर्बादी और पर्यटन से होने वाले लाभ को खो देता है। हर वर्ष 5 लाख से अधिक बच्चे असमय मृत्यु के शिकार होते हैं, गंदगी से बीमारियां बढ़ती है।

उन पर भी देर-सबेर ध्यान दिया जाना चाहिए। अकेले कानून हाथों से की जाने वाली स्कैवेंजिंग को खत्म नहीं कर सकता। राज्य-सरकारों तथा केंद्र-सरकार ने कानून बनाए हैं- स्कैवेंजरों के पुनर्वास के लिए निधि की व्यवस्था भी की है, लेकिन यह उस स्तर तक कारगर साबित नहीं हुआ है, जितना कि होना चाहिए। सरकार ने हाथ से सफाई करने वाले स्कैवेंजरों के लिए १०० करोड़ रुपए की व्यवस्था की थी, लेकिन किसी भी राज्य से धन नहीं लिया क्योंकि यह जानते ही नहीं थे कि हाथों से सफाई करने वाले स्कैवेंजरों को किस तरह पुनर्वासित किया जाए।
 

 

सामाजिक मूल्य

डॉ पाठक का कहना है कि समाधान है- आदतों में परिवर्तन लाना, शिक्षा द्वारा सामाजिक मूल्य प्रस्तुत करना, प्रशिक्षण और सामाजिक उत्प्रेरणा, जो लंबे समय तक होनी चाहिए। सुलभ ने इस तरह के पुनर्वास-केंद्र राजस्थान के टोंक और अलवर जिले में स्थापित किए हैं। उसने दिखाया है कि कैसे सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है, कानून या दंड के जरिए नहीं, बल्कि शिक्षण और समाधान बनाकर, राजी करके। हमने हाथ की सफाई को अपनी संस्कृति का हिस्सा मान लिया है और छुआछूत को एक धार्मिक विश्वास। एक अछूत को छूना अपवित्र माना जाता है। डॉ पाठक ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि किस तरह उन्हें बचपन में एक तथाकथित (डोम स्त्री) अस्पृश्य को छूने के बाद अपने को पवित्र करने के लिए गोमूत्र और गोबर निगलना पड़ा था। ऐसा अनुभव हममें से बहुतों का रहा है। सामाजिक अस्पृश्यता एक आदत बन गई है, जिसे हम एक धार्मिक आचार की तरह नियमित रुप से बरत रहे हैं। हमें इसको बदलना है। शौचालय के इस्तेमाल को लेकर भी ऐसी ही बात है। भारत-सरकार द्वारा चलाए गए संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत सरकार ने ८.७ करोड़ घरेलू शौचालय बनवाए है। लेकिन अभी भी बहुत से लोग शौचालयों का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि उनका इस्तेमाल वे अनाज या अन्य चीजें रखने के लिए करते हैं। यहां तक कि साढ़े तीन करोड़ शौचालय, जो निर्मित किए गए थे, उनका नामोनिशान नहीं बचा है, वे गायब हैं।

अतः जब हम शौचालय की बात करते हैं, तब हम समूची सभ्यता की बात करते हैं- अर्थव्यवस्था सामाजिक मूल्य, विचारधारा, धार्मिक विश्वास, राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाएं। सामाजिक परिवर्तन घटित होने में समय लगता है, क्योंकि वह सामाजिक विकास, आर्थिक विकास, शिक्षा और सामाजिक मूल्य से जुड़ा होता है। अब हमें वह प्रक्रिया शुरू करनी है। वह हमने कर ली है। हमने सामाजिक परिवर्तन की राह में लंबी दूरी तय की है, उसके लिए एक संपूर्ण स्वच्छता व्यवस्था गठित करके।

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