‘खुले में शौच करने की प्रथा को ओडिशा खत्म कर सकता है ’

Friday, December 5, 2014 - 18:31

डाॅ. रूपक राय चैधरी

देश में स्वच्छता अभियान की उन्नति के लिए भारत-सरकार-द्वारा कई कदम उठाए गए हैं। एक ओर जहां सिर पर मैला ढोने की प्रथा को प्रतिबंधित लगाया गया है, तो वहीं दूसरी ओर निर्मल-ग्राम-योजना के द्वारा ग्रामीण स्तर पर घरों में शौचालय बनवाया जा रहा है। इसके लिए निर्मल-ग्राम-पुरस्कार भी दिए जा रहे हैं। शौचालय-निर्माण और निर्मल भारत योजना के परिप्रेक्ष्य में अधिकतर राज्यों में पंचायती राज संस्थानों के कार्य-कलाप बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। अनेक राज्यों में वर्तमान पंचायतीराज ढांचे को उसी स्तर पर नामित दूसरी संस्थाओं को रखकर कमजोर करने की कोशिशें की गई हैं। स्थानीय निकायों के चुनाव अनियमित ढंग से हुए हैं, कई बार या तो उनमें विलंब हुआ है या उन्हें स्थगित कर दिया गया है।

पंचायतों को ताकतवर बनाना होगा

वर्तमान पंचायतीराज संस्थानों और शहरी स्थानीय निकायों की एक कमजोरी यह भी है कि उन्हें कोष की कमी रहती है। उनके पास अपने संसाधन बहुत कम होते हैं और आवंटन के लिए वे आमतौर पर राज्य-सरकारों पर आश्रित रहे हैं। वित्तीय सहायता राजनीतिक कार्यकारियों के आदेश पर मिलती है, वह भी तदर्थ रूप में। जब तक पंचायतों को पर्याप्त वित्तीय ताकत नहीं मिलती तब-तक उनके आकार-प्रकार का विकसित होना संभव नहीं होगा।

ओडिशा-सरकार ने चैथे वित्तीय आयोग का गठन किया और आयोग का अध्यक्ष सेवा-निवृत्त-अधिकारी श्री चिन्मय बसु को बनाया है। इसके पीछे उद्देश्य यह है कि पंचायतीराज संस्थानों और शहरी स्थानीय निकायों के लिए निधि की व्यवस्था। अधिकतर राज्यों के पास अपने स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति के बारे में विश्वसनीय सूचना नहीं होती। ओडिशा के साथ भी यही स्थिति है। स्थानीय निकायों को डाटा-बेस के निर्माण और हिसाब-किताब के रख-रखाव के लिए प्रावधान-संबंधी समर्थन की जरूरत पड़ती रहेगी। राज्य-सरकारें प्रत्येक स्थानीय निकाय की आवश्यकता का मूल्यांकन इस मामले में कर सकती हैं, और उसी के अनुसार निधि की व्यवस्था कर सकती हैं। इसका आवश्यक समग्र आवंटन वित्त-आयोग की सिफारिश पर होगा।

परामर्शदात्री बैठक

एक उपयुक्त मानदंड विकसित करने और शहरी स्थानीय निकायों के वित्तीय आधार को मजबूत करने के लिए वर्तमान अध्यक्ष श्री चिन्मय बसु ने सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डाॅ. विन्देश्वर पाठक को परामर्श के लिए ओडिशा आने का आमंत्रण दिया था। वह परामर्शी बैठक 22 फरवरी, 2014 को स्थानीय फंड आॅफिस के निदेशालय में हुई थी। इस अवसर पर डाॅक्टर पाठक ने अपनी प्रस्तुति में अत्यंत दृढ़तापूर्वक इस मुद्दे को सामने रखा कि वर्तमान सरकार ओडिशा को खुले में शौच-प्रथा को रोकने में सफल होने की घोषणा कर सकती है और वह ऐसा बिना लाभ वाले संगठन से हाथ-से-हाथ मिलाकर संभव बना सकती है। उन्होंने आयोग से आग्रह किया कि वह अपना फोकस सेप्टिक टैंक-आधारित शौचालयों की जगह सुलभ के दो गड्ढों वाले शौचालय पर रखे। इसी तकनीक के द्वारा संभव सीवर बनाने की बजाय मौके पर ही बहिःस्राव (एफ्लुएंट) का शोधन भी है।

श्री चिन्मय बसु ने यह जानना चाहा कि क्या सुलभ ओडिशा में मलिन बस्तियों में शौचालय बना सकता है, जहां जगह की कमी हमेशा रहती है। डाॅक्टर पाठक ने उन्हें सुलभ के अनुभव के बारे में बताया कि उपलब्ध छोटी-से-छोटी जगह में कैसे शौचालय बनाया जा सकता है?

‘‘देश के अनेक हिस्सों, यथा आदिवासी-क्षेत्रों में घरेलू शौचालय सर्वोत्तम विकल्प नहीं हैं। भविष्य में सेवा के उचित स्तर तथा उसे विकसित करने के लिए वित्तीय सामथ्र्य तथा सामाजिक और पर्यावरण-संबंधी स्थितियों पर बल देना आवश्यक होगा। इसीलिए जरूरत है तकनीक-संबंधी विकल्पों के चुनाव की व्यवस्था की, जिसमें पानी की कमी की स्थिति का भी ध्यान रहे। सुलभ शौचालय इस मामले में एक मिसाल है।’’- डॉ. बिन्देश्वर पाठक, चेयरमैन, सुलभ इंडिया इंटरनेशनल

राज्य वित्तीय आयोग के सदस्य-सचिव श्री प्रदीप कुमार ने ओडिशा के ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक शौचालयों की सफलता के बारे में पूछा। उत्तर देते हुए डाॅक्टर पाठक ने कहा कि देश के अनेक हिस्सों, यथा आदिवासी-क्षेत्रों में घरेलू शौचालय सर्वोत्तम विकल्प नहीं हैं। भविष्य में सेवा के उचित स्तर तथा उसे विकसित करने के लिए वित्तीय सामथ्र्य तथा सामाजिक और पर्यावरण-संबंधी स्थितियों पर बल देना आवश्यक होगा। इसीलिए जरूरत है तकनीक-संबंधी विकल्पों के चुनाव की व्यवस्था की, जिसमें पानी की कमी की स्थिति का भी ध्यान रहे। सुलभ शौचालय इस मामले में एक मिसाल है।

 

डाॅ. टीबीके श्राॅफ, मुख्य अभियंता  (पीएचईडी, शहरी) ने कहा कि शहरी क्षेत्रों में भी जहां घरेलू और सार्वजनिक शौचालय बने हैं, लोग सेप्टिक शौचालयों का ही इस्तेमाल ज्यादा करते हैं या वे दूसरे तरीके इस्तेमाल करते हैं, जिनमें अपजल को खुली नालियों में या जमीन पर ही बहा देते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसी समस्याओं के समाधान में सुलभ इंटरनेशनल की सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है।

वहां उपस्थित सरकारी अधिकारियों को याद दिलाते हुए डाॅक्टर पाठक ने कहा कि ओडिशा को जल तथा पर्यावरण-संबंधी शुचिता और स्वच्छता-संबंधी व्यवहार को सर्वांगीण तरीके से देखना होगा, ताकि जिलों में अधिक-से-अधिक प्रभाव पड़ सके। उनके प्रभाव को बेहतर बनाने और उनके लंबे समय तक चलते रह सकने के लिए जल और पर्यावरण-संबंधी-स्वच्छता कार्यक्रम को स्वास्थ्य-शिक्षा के साथ जोड़ कर देखना चाहिए। उन्होंने श्री चिन्मय बसु से आग्रह किया कि महिला स्वयं-सहायता समूह के सदस्यों और विभिन्न जिलों के मिस्त्रियों को इस उद्देश्य से प्रशिक्षित किया जाए। उन्होंने श्री बसु को आश्वासन दिया कि सुलभ इंटरनेशनल ऐसे प्रशिक्षण की व्यवस्था कर सकता है, यदि ओडिशा-सरकार ऐसा आग्रह करे। बैठक में अनेक शहरी स्थानीय संस्थानों और पंचायतीराज संस्थाओं, नगर निगम और आवास तथा शहरी विकास-विभाग के प्रतिनिधिगण उपस्थित थे।

साभार : सुलभ इंडिया, फरवरी 2014

TAGS