स्कैवेंजर स्त्रियों का पुनर्वास और उनके लिए वैकल्पिक रोजगार : सुलभ के पहल की सफलता की कहानी

Friday, December 5, 2014 - 11:17

स्टार संवाददाता

 

सुलभ स्वच्छता आन्दोलन के संस्थापक डॉ. बिन्देश्वर पाठक अथक संत की तरह कार्यरत व्यक्ति हैं। वे भारत के उन नगरों और कस्बों में प्राय: घूमते रहते हैं, जहाँ आज भी सर पर मैला ढोने का कार्य रोज की घटना है। जहाँ कहीं इस अमानवीय पेशे में फँसे लोगों को देखते हैं, वह उद्विग्न हो जाते हैं।

 

कुछ वर्षों पहले अलवर (राजस्थान) में ऐसा ही हुआ था। उन्होंने महिलाओं के एक समूह को सर पर मैले की कड़ाही रखे देखा, जिसे वे फेंकने जा रही थीं। उन्होंने अपनी कार रोकी, गाड़ी से नीचे उतरे और उन स्त्रियों के नजदीक पहुँचे। उन्हें अपने पास देखकर स्त्रियाँ स्तब्ध हो गई थीं।

 

आमतौर पर साफ सुथरे और अच्छे कपड़े पहने उस व्यक्ति से वे क्या बात करतीं, जो उनकी ही तरफ आ रहे थे। वे सफाई करने वाली महिलाएँ थीं। उनके सर पर मैले की कड़ाहियाँ थीं और उनसे बदबू आ रही थी। उन स्त्रियों को घोर आश्चर्य तब हुआ, जब उन्होंने उनसे पूछा कि ‘क्या वे मैला सफाई का कार्य छोड़ना चाहेंगी’! अभी तक तो ऐसा प्रश्न उनसे किसी ने नहीं किया था।

 

स्कैवेंजिंग कमाऊ या शुष्क शौचालयों से मानव मल को हाथ से उठाने और फेंकने का कार्य है। स्कैवेंजर रेंगते हुए कमाऊ शौचालयों में जाते हैं। और अपने नंगे हाथों से मानव मल को उठाते हैं, उसे बाल्टी या कनस्तर में भरते हैं और फिर उसे सर पर उठाकर दूर फेंकने जाते हैं।

 

यह पेशा पुश्तैनी है: एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक एक विरासत की तरह। वर्षों पुराना एक धंधा, जो टेक्नोलॉजी सम्बन्धी विकास से अभी भी अछूता रहा। न केवल वह कार्य पुरातन है, बल्कि उससे भी बुरा यह है कि इस समुदाय में पैदा हुए लोगों को जन्माधारित सामाजिक विरासत की पृष्ठभूमि में अपवित्र माना जाता है।

 

भारतीय समाज में वे सर्वाधिक घृणित, दबे कुचले और शोषित लोग हैं, जिन्हें अन्य सभी जातियों और वर्गों द्वारा बहिष्कृत और निंदित किया गया है। वे जिस प्रकार की कठिनाइयों, अपमान और शोषण का सामना करते हैं मानव इतिहास में उसकी कोई तुलना नहीं है। पौराणिक काल में यह व्यवहार आरम्भ हुआ था और फिर चलता आया, बौद्ध, मौर्य, मुगल और ब्रिटिश काल से होता हुआ आज तक।

 

क्या वह व्यक्ति एक आदर्श नागरिक या किसी पवित्र आत्मा का प्रतीक था, जिसने उस वर्ग को इस अमानवीय कार्य से मुक्त कराना चाहा? वे सब आश्चर्य में डूबे हुए थे। लेकिन जितनी सहजता और स्वभाविकता से उस व्यक्ति ने प्रश्न किया था, उसे देखते हुए, उन्होंने अनुरोध किया कि वे उनकी बस्ती में आएँ। चूँकि डॉ. पाठक देखने में एक सम्भ्रान्त व्यक्ति लगते थे और उनकी किस्मत को बदलना चाहते थे, अत: उन्होंने अपने परिवार के लोगों और पड़ोसियों से अपनी अद्भुत मुलाकात की बात बताई।

 

वह दृश्य देखने योग्य था। डॉ. पाठक वहाँ अपराह्न में पहुँचे थे और वहाँ 500 से अधिक महिलाएँ उन्हें सुनने के लिए एकत्र थीं। वे सभी यह जानना चाहती थीं कि उनकी जिन्दगी किस तरह जीने लायक बनाई जा सकती है। और जब डॉ. पाठक ने उनके पुनर्वास कार्यक्रम के बारे में बताया तो वे सभी एक स्वर में राजी हो गईं।

 

बहरहाल, उनमें से कुछ, बल्कि कहिए कि अधिकतर ने यह प्रश्न किया, ‘सर, हम हाथ से बनाए झाड़ू को छूना या उसका इस्तेमाल कमाऊ शौचालयों की सफाई के लिए नहीं करना चाहेंगे।’

 

‘नहीं बिल्कुल नहीं। अब आप लोग इज्जत के साथ रहेंगी’, डॉ. पाठक ने कहा। उन्होंने प्रश्न किया कि क्या वे दिल्ली आएँगी? सभी ने एक स्वर में अपनी रजामन्दी जाहिर की। जब उनमें से अधिकतर औरतें दिल्ली पहुँचीं तो उन्हें बताया गया कि उन्हें उस प्रशिक्षण केन्द्र में जाना होगा, जिसका नाम ‘नई दिशा’ है।

 

‘नई दिशा’ राजस्थान प्रान्त के अलवर शहर में एक व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्र है। जो सुलभ के संस्थापक डॉ. बिन्देश्वर पाठक की पहल पर अप्रैल 2003 में शुरू किया गया था। वह एक भिन्न प्रकार का केन्द्र है और उसका एक निश्चित उद्देश्य है, यानी उन लोगों के जीवन में एक परिवर्तन लाना, जो जन्म के कारण ही शर्म और अपमान से गुजरने वाली स्कैवेंजर की जिन्दगी जीते हैं।

 

मुक्त और पुनर्वासित की गई महिलाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण के जरिए एक नई दिशा देने और कार्यक्रम को अर्थपूर्ण बनाने के लिए सुलभ ने इस केन्द्र की स्थापना की है, उसे एक व्यावहारिक रूप दिया है, जो उस तरह के कार्य में लगे लोगों के लिए एक मॉडल के रूप में कार्य करता है। केन्द्र की स्थापना सामाजिक दृष्टि से प्रबुद्ध एवं आस-पास की स्कैवेंजर महिलाओं के सहयोग और समर्थन से की गई है।

 

सुलभ स्वच्छता आन्दोलन अलवर में एक व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्र खोलने के सद्विचार का उद्देश्य था मैला सफाई के गन्दे पेशे से निकालकर महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाना। ‘नई दिशा’ नाम देने का कारण यही था। ‘नई दिशा’ की परिकल्पना का मात्र उद्देश्य इस सामाजिक अन्याय और अस्पृश्यता की जंजीर को तोड़ना था।

 

मुल्क राज आनन्द के उपन्यास ‘अन्टचेबल’ में चित्रित इस समुदाय के मन मस्तिष्क और जीवन में जो विक्षोभ है, वह दिखलाता है कि किस प्रकार उनका जन्म सम्बन्धी यथार्थ उनके जीवन में पीड़ा तथा निराशा लाता है। इस संगठन ने जो कदम उठाया, वह सचमुच एक मिशनरी कदम है। यह सत्य है कि एक स्वस्थ शरीर में ही मनुष्य का सम्पूर्ण कल्याण निहित होता  है।

 

इस तरह वहाँ, नियमित ढंग से चिकित्सा सम्बन्धी परीक्षण कराया जाता है। लेकिन किसी वैकल्पिक रोजगार के अभाव में प्रशिक्षण एक व्यावहारिक विचार नहीं हो सकता था। आर्थिक पक्ष की चिंता को मस्तिष्क में रखते हुए ‘नई दिशा’ अपनी प्रशिक्षुओं को मासिक स्टाइपेंड भी देती है।

 

पाठ्यक्रम के चुनाव का कार्य स्कैवेंजर महिलाएं स्वयं करती हैं। अब तक सैकड़ों महिलाओं को खाद्य प्रसंस्करण, ब्यूटीकेयर, साज-श्रृंगार, कढ़ाई बुनाई और कटाई-सिलाई में प्रशिक्षित किया गया है। उन्हें 1800 मासिक का स्टाइपेंड इसलिए दिया जाता है, ताकि वे स्कैवेंजिंग के अपने पुराने पेशे में लौटने को मजबूर न हो जाएँ। पहले दो वर्षों में इन महिलाओं ने न केवल बैंक अधिकारियों से स्वयं बातचीत करने और अपनी चेक बुक पर हस्ताक्षर करने का कार्य किया है, बल्कि लाभ के आधार पर अपने उत्पादों को बेचने का काम भी सीख लिया है।

 

अंग्रेजी से अनूदित

 

साभार : स्टार मैगजीन तंजानिया 6 नवम्बर 2011

सुलभ इण्डिया फरवरी 2012

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