स्वच्छता का अधिकार अभियान

Sunday, November 29, 2015 - 09:23

संकलन- डॉ. तपन भट्टाचार्य

 

सुरक्षित स्वच्छता सुविधाओं के अभाव में रहने वाली बड़ी आबादी के कारण विश्व स्तर पर भारत को सबसे बड़ी स्वच्छता चुनौती के रूप में माना गया है। अनुमान है कि भारत में खुले में शौच की दर विश्व की 60 प्रतिशत है। इस चुनौती का सामना करने के लिये सरकार द्वारा शौचालयों के निर्माण के लिये गरीबों को सब्सिडी प्रदान करने जैसे कुछ केन्द्रित प्रयास किये गए हैं। हालांकि, इसमें से बहुत कुछ कार्य ग्रामीण क्षेत्रों में हुआ है। शहरी ग़रीबों खासकर छोटे शहरों में स्वच्छता पर काफी कम ध्यान दिया गया है। इसलिये यहाँ ग्रामीण स्वच्छता की तुलना में कम राशि आवंटित हुई। शहरी स्वच्छता की चुनौतियाँ कई तरह की हैं और इसकी उपेक्षा करना स्वच्छता के मोर्चे पर भारत का प्रदर्शन पीछे करने जैसे होगा। शहरी स्वच्छता की महत्त्वपूर्ण चुनौतियों में से कुछ इस प्रकार है :

 

संख्या की अदृश्यता : शहरी स्वच्छता की प्रमुख चुनौती आँकड़ों के मामले में व्यावहारिक रूप से अदृश्यता है। अगर शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता का कवरेज देखा जाये तो (2011 की जनगणना के अनुसार) यह कहा जाता है कि करीब 18 प्रतिशत परिवारों में स्वच्छता की पहुँच नहीं है लेकिन अगर इन आँकड़ों को गहराई से देखें तो यह पाएँगे कि मलिन बस्तियों में (अधिसूचित और गैर अधिसूचित) रहने वाले गरीबों को स्वच्छता की उपलब्धता बहुत कम है। चूँकि, शहरों में मलिन और अवैध बस्तियों की संख्या का कोई सही अनुमान नहीं है। अतः यह संख्या विवादास्पद हो सकती है लेकिन शहरी विकास मंत्रालय का अनुमान है कि गैर अधिसूचित मलिन बस्तियों में 51 प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं है। तेजी से हो रहा शहरीकरण एक वास्तविकता है और शहरी स्वच्छता की रणनीति वहाँ विकसित हो रही नई और अवैध बस्तियों से तालमेल रखने में सक्षम नहीं है।

 

कम और विषम निवेश: शहरों में अन्य ढाँचागत निवेश की तुलना में स्वच्छता पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। इसके अतिरिक्त बड़े शहरों में स्वच्छता पर जो भी निवेश किया जा रहा है वह ज्यादातर आबादी के बेहतर वर्गों पर केन्द्रित है। अधिकांश निवेश सीवर नेटवर्क के विकास, मल-जल उपचार संयंत्र आदि पर किया जा रहा है। हालांकि इनमें से ज्यादातर कार्य शहरों के उस हिस्से में हो रहा है जहाँ उन्नत वर्ग रहता है।

 

बड़े शहरों की तुलना में कस्बों में समग्र निवेश भी बहुत कम होता है। छोटे शहर अल्प मानव संसाधन, कम निवेश और कमजोर शासन तंत्र से त्रस्त हैं। जहाँ तक स्वच्छता सेवाओं का सम्बन्ध है, कस्बों में केवल ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन का कार्य हो रहा है। इन शहरों में मल कीचड़ प्रबन्धन और तरल अपशिष्ट प्रबन्धन खाली पड़ी खंती में होता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार भारत के 8,000 कस्बों में से केवल 160 कस्बों में सीवेज सिस्टम और सीवेज उपचार संयंत्र है। इसके अतिरिक्त, सीपीसीबी का अध्ययन दावा करता है कि यहाँ केवल 13 प्रतिशत सीवेज का उपचार किया जाता है। यह भी कहा गया है कि उपचार की सुविधा असमान रूप से 40 प्रतिशत क्षमता के साथ केवल दो बड़े शहरों में दिल्ली और मुम्बई में ही उपलब्ध है।

 

सामुदायिक शौचालय की स्थिरता: शहरों में नगर निकायों द्वारा किये गए प्रयासों और कुछ जगहों पर पीपीपी मॉडल के माध्यम से झुग्गी बस्ती निवासियों के लिये बस्ती में ही स्वच्छता के समाधान के रूप में सामुदायिक शौचालयों का निर्माण किया गया है। हालांकि, जेएमपी अनुसार साझा शौचालय बेहतर विकल्प नहीं माना जाता है फिर भी ऐसी बस्तियों में जहाँ घरों में शौचालयों के निर्माण के लिये जगह की कमी है वहाँ इन्हें एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में देखे जाने की जरूरत है। हालांकि, ये उपयोग के कुछ साल बाद ही अनुपयोगी हो जाते हैं। ऐसा होने के कई कारण हैं। अगर शौचालय का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या अपेक्षाकृत कम है (सुलभ आदि द्वारा प्रोत्साहित मॉडल की तुलना में) तो अक्सर ही उपयोगकर्ता द्वारा दिया जाने वाला शुल्क सामुदायिक शौचालय के रख-रखाव के लिये पर्याप्त नहीं होता है। कई मामलों में देखा गया है समुदाय द्वारा भवन में कोई निवेश नहीं होने पर सामुदायिक शौचालय बेकार हो जाते हैं। ऐसे मामलों में मूल निवेश के साथ शौचालयों के संचालन और रख-रखाव के खर्च पर जोर देने वाली योजनाओं को विकसित करने की आवश्यकता है।

 

गरीबों के लिये स्वच्छता का अपर्याप्त सरकारी योजनाएँ: शहरी ग़रीबों के लिये शौचालय निर्माण के लिये कोई महत्त्वपूर्ण सरकारी योजना (ग्रामीण क्षेत्र की एनबीए की तरह) नहीं है। ऐसी अकेली योजना है एकीकृत न्यूनतम लागत स्वच्छता लागत (आईएलसीएस), लेकिन यह गरीब लोगों के लिये शुष्क शौचालयों को फ्लश शौचालयों में परिवर्तित करने तक केन्द्रित है। इस योजना में नए शौचालयों के निर्माण का भी प्रावधान है लेकिन केवल यह निर्माण कुल परिवर्तित शौचालयों की 25 प्रतिशत की सीमा तक ही हो सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि कस्बे में अगर 10 शुष्क शौचालय हैं तो वहाँ 2.5 नए शौचालयों के निर्माण के लिये राशि प्राप्त कर सकते हैं। दुर्भाग्य से शहरी गरीबों के लिये ऐसी योजनाओं की जगह कुछ और आवश्यक है जैसे:

 

1. अब शुष्क शौचालयों की संख्या बहुत कम है। उदाहरण के लिये मध्य प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में केवल 2717 शुष्क शौचालय (2011 जनगणना के अनुसार) हैं।

 

2. शहरी क्षेत्रों में वास्तविक ग़रीबों के पास कितनी भी तरह का शौचालय (अकेले शुष्क शौचालयों को छोड़ दे) नहीं है। इसलिये शहरी क्षेत्रों में बहुत बड़ी संख्या में गरीब किसी भी तरह स्वच्छता सेवाओं से वंचित हैं।

 

शहरी ग़रीबों के लिये आवास उपलब्ध कराने और कस्बों को ‘स्लम फ्री’ बनाने पर ध्यान केन्द्रित कर रही जेएनएनयूआरएम और रे जैसी योजनाएँ अपने क्रियान्वयन में कई बाधाओं का सामना कर रही हैं। इसके अलावा, यह मौजूदा मलिन बस्तियों के लिये की गई केवल एक तदर्थ व्यवस्था होगी। आने वाले वर्षों में अस्तित्व में आने वाली नई मलिन बस्तियों के लिये रणनीति इन योजनाओं में से किसी में भी स्पष्ट नहीं है।

 

भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और इसके विकास के प्रतिफल के बारे में बड़े शोर के बावजूद देश में अभी भी अपने सभी नागरिकों के लिये पूर्ण स्वच्छता हासिल करने में समर्थ नहीं हुआ है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में 65-80 प्रतिशत लोगों को खुले में शौच करने जाना पड़ता है। सार्वजनिक शौचालय का उचित रख-रखाव नहीं है। 26 लाख से अधिक शुष्क शौचालय हैं जहाँ इंसानों को अपने हाथों से दूसरे मानव का मल-मूत्र साफ करना पड़ता है। ऊँचे-ऊँचे दावों और बड़े-बड़े वादे के बाद भी हम इस अमानवीय प्रथा और परम्परा को खत्म नहीं कर पाये हैं। जनगणना 2011 के आँकड़े बताते हैं कि ग्रामीण भारत में केवल 31.9 प्रतिशत घरों में स्वच्छता सुविधाएँ उपलब्ध हैं। पर्याप्त स्वच्छता साधनों के उपयोग की कमी लोगों के जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करती है। कई अध्ययन हैं इस कमी के स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और देश की बेहतर स्थिति से आन्तरिक सम्बन्ध को बताते हैं। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कई उदाहरण है जहाँ शौचालयों की कमी के कारण लड़कियों ने स्कूलों में आना बन्द कर दिया। स्वच्छता साधनों की कमी के कारण बड़ी संख्या मे बच्चों की डायरिया से मौत होती है। समस्याएँ कई हैं और उनके कुप्रभाव भी बहुत बड़े हैं। और, इस आपातकाल जैसे संकट के समय में यह खतरनाक है कि भारत में बने हुए शौचालय बड़ी संख्या में ‘लापता’ होते जा रहे हैं।

 

मलीय गन्दगी प्रबन्धन: एनएफएचएस 3, 2005-06 के अनुसार भारत में 17 प्रतिशत शहरी परिवारों के घर में किसी भी प्रकार का शौचालय नहीं है, 24 प्रतिशत परिवार शौचालय साझा कर रहे थे और 19 प्रतिशत घरों के शौचालय नाली से जुड़े थे। जिन घरों में शौचालय थे उनमें से 27.6 प्रतिशत में सेप्टिक टैंक और 6.1 प्रतिशत में गड्ढे का इस्तेमाल किया गया था। 5 प्रतिशत शौचालय ऐसे थे जहाँ ‘फ्लश/नाला सेप्टिक टैंक/ गड्ढा’ नहीं था जिसका अर्थ है कि यहाँ से निकलने वाला मानव मल बिना उपचार भूमि पर और जलस्रोतों में बहाया जा रहा था।

 

2011 की जनगणना भी बताती है कि केवल 32.7 प्रतिशत शहरी परिवार पाइप वाली सीवर प्रणाली से जुड़े हैं जबकि 38.2 प्रतिशत परिवार अपने मल का निपटारा सेप्टिक टैंक और 7 प्रतिशत गड्ढा शौचालयों में करते हैं। यह बताता है कि ऐसे परिवारों की संख्या बहुत ज्यादा है जो वहीं निपटारा करते हैं। लगभग 50 लाख गड्ढा शौचालय अस्वास्थ्यप्रद हैं (कोई स्लैब नहीं है या खुले गड्ढे हैं), और 13 लाख सेवा शौचालय हैं- 9 लाख शौचालय का अपशिष्ट सीधे नालियों में मिलता है, 2 लाख शौचालयों का मानव मल इंसानों द्वारा उठाया जाता है (अवैध रूप से) और 1.8 लाख पशुओं द्वारा सेवित है।

 

शहरी आबादी तेजी से बढ़ रही है (2030 तक 50 प्रतिशत लोगों का शहरी केन्द्रों में होना कहा जाता है)। शहरों की ओर पलायन करने वाले ज्यादातर गरीब वे लोग होते हैं जो ग्रामीण क्षेत्र में घर नहीं बना सकते और वे शहर की बस्तियों या फुटपाथ पर बस जाते हैं और इन्हें आमतौर पर कोई सुविधा या मान्यता नहीं मिलती है। अधिकांश समय तक ये मलिन बस्तियों उन खुली नालियों के समीप स्थित रहती हैं जिनमें कॉलोनियों के निवासियों द्वारा उनका जल अपशिष्ट (कुछ मामलों में सेप्टिक टैंक से भी सीवर का पानी) का निपटान किया जाता है। कई बार शौचालय भी सीधे इन खुली नालियों से जुड़े होते हैं। शहरी क्षेत्रों में बड़ा निवेश मुख्य रूप से सीवेज नेटवर्क या सीवर उपचार संयंत्रों जैसे बुनियादी ढाँचे के निर्माण पर किया जा रहा है। हालांकि, ये संसाधन केवल केवल अमीर और नव अमीर क्षेत्रों में होते हैं। यह समझा जाता है कि औसतन केवल 10 प्रतिशत अपशिष्ट जल (ग्रे और काला पानी) का उपचार किया जाता है। इसलिये जो भी अतिरिक्त निवेश किया जाता है वह केवल बेहतर क्षेत्रों के लिये होता है, कोई गरीब समुदाय इनमें से किसी भी नेटवर्क से नहीं जुड़ पाता है।

 

भूमि कार्यकाल: गरीब और वंचित समुदाय मलिन बस्तियों और शहरों के बाहरी बस्तियों में बसते हैं। इन मलिन बस्तियों में से अधिकांश सरकारी ज़मीन या अन्य ज़मीन पर होती हैं और इन्हें ‘अवैध’ मानकर ‘बाहरी’ होने के कारण बोझ समझा जाता है जबकि वे वास्तव में किसी भी शहर की जीवन रेखाएँ हैं। इन परिवारों में से अधिकांश के पास उस भूमि का कोई अधिकार नहीं होता है जिस पर उनकी बस्ती बसी है।

 

ज़मीन का मालिकाना अधिकार न होने का मुद्दा इन मलिन बस्तियों के घरों के लिये सीवर नेटवर्क जैसी बुनियादी व्यवस्था उपलब्ध नहीं करवाने का कारण बन जाता है। सुविधाओं का न मिलना खुले में शौच का कारण बन जाता है। उन स्थानों पर जहाँ समुदाय शौचालय के महत्त्व को समझते हैं वे शौचालय निर्माण करने में सक्षम हैं, लेकिन इन स्थानों पर अपशिष्ट का निपटारा एक बड़ी चुनौती बन जाता है और यह अपशिष्ट खुली नालियों और अन्य जल निकायों में बहता है।

 

यह शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता की गम्भीर स्थिति बतलाता है जो हमेशा ही उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं और संसाधनों पर काफी दबाव डालता है। इस आपातकाल जैसी स्थिति के लिये एक स्थायी समाधान की आवश्यकता है और समाधान खोजने की इस यात्रा में विभिन्न समुदायों और हितधारकों से चर्चा कर उनकी राय जानना महत्त्वपूर्ण है। आइए, इस संकटपूर्ण स्थिति में लोगों को एकजुट करें।

 

भारत में स्वच्छता और स्वास्थ्य पर फैक्ट शीट नवम्बर 2013

 

विश्व अर्थव्यवस्था में तेजी से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा भारत दुनिया की शीर्ष 10 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। हालांकि, यह मानव विकास सूचकांक पर 134वें स्थान पर फिसल गया है।

 

भारत: खुले में शौच की वैश्विक राजधानी

 

1. भारत एक दिवसीय क्रिकेट में विश्व चैंपियन है लेकिन खुले में शौच करने वाली 62 करोड़ 20 लाख की आबादी (राष्ट्रीय औसत 53.1 प्रतिशत) के साथ खुले में शौच की वैश्विक राजधानी भी है। भारत की यह संख्या अगले 18 देशों की खुले में शौच करने वाली संयुक्त आबादी से दोगुने से ज्यादा है, दक्षिण एशियाई देशों की खुले में शौच करने वाली 69 करोड़ 20 लाख की आबादी का 90 प्रतिशत है और यह खुले में शौच करने वाले दुनिया में 1.1 अरब लोगों का 59 प्रतिशत है।

 

2. 2011 की जनगणना के अनुसार राष्ट्रीय स्वच्छता कवरेज 46.9 प्रतिशत है जबकि ग्रामीण स्वच्छता कवरेज सिर्फ 30.7 प्रतिशत है। ग्रामीण दलितों में यह 23 प्रतिशत और आदिवासियों में यह 16 प्रतिशत से भी कम है।

 

3. भारत में शौचालय से अधिक मोबाइल फोन (2011 की जनगणना) हैं। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के अनुसार, देश में वर्तमान में 92 करोड़ 90 लाख से अधिक मोबाइल फोन उपभोक्ता हैं। दूसरे शब्दों में, 300 मिलियन भारतीय मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं लेकिन शौचालय का नहीं।

 

4. विकसित स्वच्छता सुविधाओं का उपयोग करने वाले लोगों के प्रतिशत के मामले में पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान जैसे देश भारत से आगे हैं।

 

5. जब ग्रामीण और शहरी प्रतिशत आबादी में विकसित शौचालय सुविधा के उपयोग की बात आती है तो भारत पूरे दक्षिण एशिया में आखिरी स्थान पर आता है।

 

लापता शौचालय

 

1. भारत के 1.2 अरब लोगों की आबादी में से लगभग आधे घरों में कोई शौचालय नहीं है। अनुसूचित जाति के लगभग 77 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति के 84 प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं है।

 

2. भारत के विभिन्न राज्यों में शौचालय विहिन घरों की सूची में झारखण्ड शीर्ष पर है यहाँ 77 प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं है जबकि 76.6 प्रतिशत के साथ उड़ीसा और 75.8 प्रतिशत के साथ बिहार अगले नम्बर पर आते हैं। ये तीनों राज्य देश के सबसे गरीब राज्यों में शुमार होते हैं जहाँ की आबादी 50 रुपए से भी कम में गुजर-बसर करते हैं। (स्रोत: जनगणना 2011)

 

3. देश में 0.6 लाख गाँवों में से केवल 25 हजार गाँव खुले में शौच की प्रथा से मुक्त हैं।

 

4. भारत की जनगणना 2011 के अनुसार, मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय के उपयोग की दर 13.6 प्रतिशत, राजस्थान में 20 प्रतिशत, बिहार में 18.6 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 22 प्रतिशत है।

 

अर्थशास्त्र

 

पर्याप्त स्वच्छता के अभाव में भारत में एक बड़ी समस्या है। भारत को इस वजह से ज्यादा स्वास्थ्य लागत, उत्पादन घाटा और कम पर्यटन आय के रूप में 53.8 बिलियन डॉलर (भारत के सकल घरेलू उत्पाद 2006 का 6.4 प्रतिशत से अधिक है) का नुकसान होता है। (विश्व बैंक का जल एवं स्वच्छता कार्यक्रम, फरवरी 2011)

 

शुष्क शौचालय और मैला ढोना

 

भारत की जनगणना 2011 बताती है कि भारत में मैला ढोने की अमानवीय प्रथा अभी भी जारी है। जनगणना के आँकड़ों के अनुसार अभी भी देश मे 7 लाख 94 हजार 390 शुष्क शौचालय हैं जहाँ मानव जल मनुष्यों द्वारा साफ किया जाता है। इनमें से 73 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में और 27 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में है। इसके अलावा 13 लाख 14 हजार 652 शौचालय हैं जहाँ मानव मल नालियों में बहता है। इस तरह, देश में कुल 26 लाख से अधिक शुष्क शौचालय हैं जहाँ मैला ढोने की प्रथा अभी भी जारी है।

 

बच्चे

 

1. ठीक से सफाई न होना डायरिया से होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण है।

2. 14 साल की उम्र तक के सभी बच्चों में 20 फीसदी से अधिक बच्चे असुरक्षित पानी, अपर्याप्त स्वच्छता या अपर्याप्त सफाई के कारण या तो बीमार रहते हैं या मर जाते हैं।

3. शौचालय निर्माण में उत्साहजनक वृद्धि (जनगणना के अनुसार 2011 में 84 फीसदी स्कूलों में शौचालय की सुविधा थी) के बावजूद पहुँच, संचालन और सुविधाओं के रख-रखाव की भारी समस्याएँ हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूली बच्चों के खुले में शौच का प्रमुख कारण है।

 

महिला

 

1. अस्वच्छता के कारण महिलाएँ प्रजनन मार्ग के संक्रमण से ग्रस्त हैं (जीवन के लिये तथ्य)

 

2. शौचालयों की कमी के कारण महिलाओं को अधिक गम्भीर रूप से सांस्कृतिक वर्जना झेलनी पड़ती है। वे दिन में खुले में शौच के लिये नहीं जा सकती हैं। शौचालय के अभाव में लाखों महिलाएँ सुबह और शाम के बीच शौच न जाने से मजबूर होती हैं।

 

3. शौच के लिये पुरुषों की नज़रों से दूर जाने की कोशिश में महिलाएँ सुनसान स्थानों पर जाती हैं और अक्सर ही मारपीट या बलात्कार की शिकार हो रही हैं।

 

4. यौवन के उपरान्त लड़कियों और महिलाएँ अपने पूरे जीवन काल में 3 हजार दिन या जीवन के लगभग 10 साल के समय तक रजस्वला रहती हैं। हाल के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में मासिक आधार पर 355 मिलियन महिलाएँ और लड़कियाँ रजस्वला होती हैं। “रजोनिवृत्ति तक एक महिला को माहवारी के दिनों का प्रबन्धन करने के लिये औसतन 7,000 सेनेटरी पैड की आवश्यकता होती है।”

 

5. केवल 12 प्रतिशत युवा लड़कियों और महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध हैं और वे इसका उपयोग करती हैं। हालांकि, जो सेनेटरी नैपकिन का उपयोग करती हैं उन्हें स्कूलों, कॉलेजों, सामुदायिक शौचालयों आदि में इनके सुरक्षित निपटान की सुविधा नहीं मिलती।

 

6. 200 मिलियन महिलाओं को मासिक धर्म स्वच्छता और उससे जुड़ी स्वास्थ्य देखभाल की पर्याप्त जानकारी नहीं है।

 

7. भारत की 23 प्रतिशत लड़कियाँ यौवन तक पहुँचने के बाद स्कूल जाना छोड़ देती हैं।

 

विकलांग (पीडब्ल्यूडी) और बुजुर्ग

 

1. देश में कुल आबादी का लगभग 2.1 प्रतिशत यानी 2 करोड़ 10 लाख व्यक्ति विकलांगता के साथ जी रहे हैं। इसमें अस्थायी रूप से विकलांग और बुजुर्ग भी शामिल हैं। 2020 में विकलांगता के साथ जी रहे लोगों की कुल जनसंख्या 7 करोड़ होने का अनुमान है जिनमें 17 करोड़ 70 लाख बुजुर्ग होने का अनुमान है जिनमें से अधिकांश बहु विकलांगता की स्थिति में होंगे।

 

2. विकलांगता के साथ जीने वालों के लिये उनकी शारीरिक बाधाओं के कारण सामान्य बुनियादी ढाँचे का उपयोग करना या शौच के लिये बाहर जाना मुश्किल होता है।

 

3. ग्रामीण और शहरी इलाकों में विकलांगता के साथ जीने वालों के लिये सार्वजनिक शौचालय कम हैं और दूर हैं। यहाँ तक कि स्कूलों में भी आश्चर्यजनक ढंग से उनके लिये कोई प्रावधान नहीं है। विकलांगों के लिये सुलभ शौचालय मानकों का प्रावधान किसी राज्य/राष्ट्रीय/अन्तरराष्ट्रीय नीतियों में निर्दिष्ट नहीं है।

 

स्वास्थ्य-विज्ञान

 

1. जन स्वास्थ्य एसोसिएशन के अनुसार, केवल 53 प्रतिशत भारतीय शौच जाने के बाद साबुन से हाथ धोते हैं, केवल 38 फीसदी खाने से पहले साबुन से हाथ धोते हैं और केवल 30 फीसदी लोग खाना पकाने के पहले साबुन से हाथ धोते हैं। (यूनिसेफ)

 

2. केवल 11 प्रतिशत भारतीय ग्रामीण परिवारों में बच्चे के मल का निपटान सुरक्षित रूप से होता है। 80 प्रतिशत बच्चों के मल को खुले में छोड़ दिया जाता है या कचरे में फेंक दिया जाता है। (यूनिसेफ)

 

3. साबुन से हाथ धोना, विशेष रूप से मल-मूत्र के सम्पर्क के बाद, डायरिया के मामलों को 40 प्रतिशत और श्वसन संक्रमण को 30 प्रतिशत तक कम कर सकता है।

 

शौचालय मर चुके हैं, उन्हें दफनाने का समय

 

भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और इसके विकास के प्रतिफल के बारे में बड़े शोर के बावजूद देश में अभी भी अपने सभी नागरिकों के लिये पूर्ण स्वच्छता हासिल करने में समर्थ नहीं हुआ है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में 65-80 प्रतिशत लोगों को खुले में शौच करने जाना पड़ता है। सार्वजनिक शौचालय का उचित रख-रखाव नहीं है। 26 लाख से अधिक शुष्क शौचालय हैं जहाँ इंसानों को अपने हाथों से दूसरे मानव का मल-मूत्र साफ करना पड़ता है। ऊँचे-ऊँचे दावों और बड़े-बड़े वादे के बाद भी हम इस अमानवीय प्रथा और परम्परा को खत्म नहीं कर पाये हैं। जनगणना 2011 के आँकड़े बताते हैं कि ग्रामीण भारत में केवल 31.9 प्रतिशत घरों में स्वच्छता सुविधाएँ उपलब्ध हैं। पर्याप्त स्वच्छता साधनों के उपयोग की कमी लोगों के जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करती है। कई अध्ययन हैं इस कमी के स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और देश की बेहतर स्थिति से आन्तरिक सम्बन्ध को बताते हैं। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कई उदाहरण है जहाँ शौचालयों की कमी के कारण लड़कियों ने स्कूलों में आना बन्द कर दिया। स्वच्छता साधनों की कमी के कारण बड़ी संख्या मे बच्चों की डायरिया से मौत होती है। समस्याएँ कई हैं और उनके कुप्रभाव भी बहुत बड़े हैं। और, इस आपातकाल जैसे संकट के समय में यह खतरनाक है कि भारत में बने हुए शौचालय बड़ी संख्या में ‘लापता’ होते जा रहे हैं।

 

पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय (एमडीडब्ल्यूएस) ने घोषणा की है कि निर्मल भारत अभियान (एनबीए) के माध्यम से 2022 तक पूरे देश को खुले में शौच से मुक्त बनाया जाएगा। क्या भारत मार्च 2022 तक 100 फीसदी स्वच्छता प्राप्त करने का खुद को ही दिया गया यह चुनौतिपूर्ण लक्ष्य पूरा करने में सक्षम हो पाएगा? करोड़ो ‘लापता’ शौचालयों के कारण यह लक्ष्य दूर की सम्भावना है- अन्यथा हम इन्हें ‘मृत शौचालय’ कह सकते हैं।

 

जनगणना 2011 की रिपोर्ट का यह रहस्योद्घाटन शर्मसार करने वाला है कि भारत कुल परिवारों में से 49.8 प्रतिशत परिवार खुले में शौच करने जाते हैं। खुले में निस्तार करने वाली ग्रामीण जनसंख्या का प्रतिशत 67.3 फीसदी है जो सर्वाधिक है। केवल 30.7 प्रतिशत परिवारों के पास अपने घरों में शौचालय है और 1.9 प्रतिशत परिवार सार्वजनिक शौचालय का उपयोग कर रहे हैं।

 

भारत में ग्रामीण स्वच्छता में पहल करते हुए ‘केन्द्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम’ (सीआईएसपी) प्रारम्भ करने के साथ ही 1986 से हर साल शौचालय का निर्माण किया जा रहा है। इस पहल को 1999 में देश के 26 राज्यों में 67 जिलों में ‘क्षेत्र सुधार परियोजना’ के पायलट प्रोजेक्ट के माध्यम से तेज किया गया। इसके अलावा, 2002 में ‘सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान’ (टीएससी) के माध्यम से इसका विस्तार पूरे भारत में किया गया जिसके तहत देश को खुले में शौच से मुक्त करने के लिये एक दशक में बड़ी संख्या में शौचालयों का निर्माण किया गया।

 

पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय (एमडीडब्ल्यूएस) का दावा है कि दिसम्बर 2010 तक शौचालय अभियान से 53.09 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों तक पहुँचाया गया और जनगणना के आँकड़ों के संग्रह प्रक्रिया के पूरा होने का समय सितम्बर 2010 माना है। इस तरह अगर हम दिसम्बर 2010 को तय समय मान ले तो एमडीडब्ल्यूएस द्वारा दिया गया आँकड़ा जनगणना के आँकड़ों की तुलना में 22.30 प्रतिशत अधिक है। अब सवाल यह है कि भारत के ग्रामीण परिवारों से 22.39 प्रतिशत (3,75,76,324) शौचालय कहाँ गायब हो गए हैं?

 

अध्ययन और रिपोर्ट बताते हैं कि प्रस्तुत किये गए आँकड़ों और जमीनी हकीक़त में बड़ा अन्तर है। मंत्रालय ने परस्पर विरोधी और खतरनाक आँकड़े को उचित साबित करने के लिये पिछले कुछ वर्षों में जनसंख्या वृद्धि का सहारा लिया है।

 

हकीक़त में उपलब्ध शौचालयों और प्रस्तुत आँकड़ों में अन्तर यानि लापता शौचालयों के पीछे कुछ महत्त्वपूर्ण कारक हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

1. कई मामले हैं जहाँ शौचालयों का निर्माण हुआ ही नहीं लेकिन आँकड़ों में शौचालय बना होना बताया गया।

 

2. ‘क्षेत्र सुधार परियोजना’ के तहत क्रम प्रोत्साहन राशि से और टीएससी के प्रारम्भिक वर्षों में बनाए गए शौचालय वास्तव में अब मौजूद ही नहीं है।

 

3. एक शौचालय की सुधार/नवीकरण को गिनती में दो या तीन बार से ज्यादा शौचालय बनाना मान लिया गया।

 

4. एसआरपी/टीएसपी के तहत आवंटित राशि का उपयोग कर एक ही घर के शौचालय का फिर से निर्माण किया जा रहा है।

 

ये स्थितियाँ क्षेत्र में समान रूप से दिखाई देती है और ये ‘मृत शौचालय’ की संख्या बढ़ा देते हैं। वास्तव में, पहले दो बिन्दुओं का कारण ग्राम पंचायतों को दिये जाने वाले ‘निर्मल ग्राम पुरस्कार’ (एनजीपी) है। अब, हालांकि मंत्रालय ने भी माना है कि ‘निर्मल ग्राम पुरस्कार’ पाने वाली पंचायतों में भारी अन्तर है और उनकी स्थिति भी इतनी ‘निर्मल’ नहीं है।

 

इस सन्धिकाल में, भारत यह देखने के लिये तैयार है कि जनसंख्या में वृद्धि हुई है या वास्तव में घरों में से शौचालय गायब हुए हैं। यह लापता सभी शौचालयों और और जनता के धन को लूटने वालों को जवाबदेह बताती है।

 

लगता है कि इस भारी अन्तर और इसमें निहित कमियों का अहसास होने लगा है। इसे लक्ष्य करने और वास्तविक लक्ष्य की स्थापना सुनिश्चित करने के प्रयास में एमडीडब्ल्यूएस ने 2012 की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिये देश भर में घरेलू स्तर का आधारभूत सर्वेक्षण शुरू किया और अब तक 2 आधारभूत सर्वेक्षण में एमडीडब्ल्यूएस द्वारा लगभग 80 प्रतिशत ग्राम पंचायतों की प्रविष्टियाँ दर्ज की जा चुकी है (2011 की जनगणना के आधार पर)। ये आँकड़े साबित करते हैं कि शौचालय गायब हैं और यह अन्तर इस प्रकार दिखता है-

 

1. एमडीडब्ल्यूएस (2011 की जनगणना अनुमान एचएच कवरेज) और वास्तविक जनगणना 2011 शौचालय कवरेज के बीच ग्रामीण परिवारों में शौचालय की उपलब्धता में लगभग 25 प्रतिशत का अन्तर है।

 

2. यह अन्तर नया नहीं है और इस पर मई 2012 से विभिन्न मंत्री स्तरीय सम्मेलनों में विस्तार से अध्ययन किया गया है (ऐसा ही एक सन्दर्भ इस लिंक में है- http://mdws.gov.in/sites/uploadfiles/ddws/files/pdf/Agenda-SC%20final%2024-25May12%2018.05.12.pdf

 

इस बात से कोई इनकार नहीं है कि वर्षों के अन्तराल में जनसंख्या में वृद्धि हुई है तथा परिवारों की संख्या बढ़ गई है और इसके परिणामस्वरूप शौचालय उपलब्धता ता अन्तर जारी रहेगा। हालांकि, परिवारों की वृद्धि (एमडीडब्ल्यूएस और जनगणना 2011 के अनुमान की तुलना में 2011 की जनगणना के वास्तविक आँकड़ों के आधार पर) को ध्यान में रखकर आँकड़ों का अध्ययन किया जाये तो भी 25 प्रतिशत के करीब का अन्तर आता है।

 

दावा किया गया है कि आधारभूत सर्वेक्षण ‘लापता शौचालय’ की पहेली का समाधान कर देगा और राज्यों के वार्षिक क्रियान्वयन की योजना से आलोचकों और योजनाकारों को सन्तुष्ट कर देगी। हालांकि, अगर अभी हम केरल जैसे राज्य का उदाहरण लें जहाँ आधारभूत सर्वेक्षण पूरा हो गया है, तो पाएँगे कि वहाँ जनगणना (93.23 प्रतिशत) और एमडीडब्ल्यूएस (99.68 प्रतिशत) के आँकड़ों के बीच बड़ा अन्तर है। यह वह राज्य है जहाँ ‘लापता’ शौचालयों की संख्या बीमारू राज्यों की तुलना में कम हैं। बीमारू राज्यों में तो यह लापता शौचालयों का प्रतिशत काफी ज्यादा है।

 

हालांकि, देश में यह बड़ा सवाल है कि जो शौचालय मौजूद हैं उनका भी इस्तेमाल किया जा रहा है या नहीं और इसके सन्दर्भ के रूप में देश में ऐसा कोई व्यापक आँकड़े नहीं है। जनगणना केवल उपलब्धता से सम्बन्धित डेटा प्रदान करती है, उपयोग का नहीं और एमडीडब्ल्यूएस भी कवरेज से सम्बन्धित आँकड़े उपलब्ध कराता है। हालांकि, मौजूदा आधारभूत सर्वेक्षण कार्यात्मक और बन्द शौचालयों से सम्बन्धित डेटा प्रदान करता है लेकिन यह भी उपयोग से सम्बन्धित जानकारी नहीं देता है।

 

चाहे हम एमडीडब्ल्यूसी और जनगणना द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़ों का उपयोग करें या नीतिगत स्तर पर परिवर्तन हो रहे इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि शौचालय खत्म हो चुके हैं। वर्ष 1986 में केन्द्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम (सीआरएसपी) से लेकर निर्मल भारत अभियान (एनबीए) तक किये गए तमाम प्रयासों के बाद भी वांछित परिणाम नहीं मिले हैं। दशकों में ऐसे मृत शौचालयों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है और बेहतर होगा कि ‘विश्व शौचालय दिवस’ पर उन्हें दफन कर दें ताकि स्वच्छता से जुड़े संकट को नए सिरे से लक्षित किया जा सके।

 

‘लापता शौचालय’ या ‘मृत शौचालय’ पर आँकड़े एक तरह से सभी के लिये एक चेतावनी संकेत है और इसका तत्काल समाधान किया जाना चाहिए।

 

तो, इस समस्या से कैसे निपटा जाये? क्या सिर्फ इसे स्वीकार करने और सामान्य रूप से काम करते रहना काफी होगा? इससे पहले कि यह किसी बड़े घोटाले में बदल जाये, यह आवश्यक है कि सरकार जागे और इसे स्वीकार करे तथा जनता के धन के इस गम्भीर दुरुपयोग के लिये दंडात्मक कार्रवाई करे और इस ऐतिहासिक अन्याय के दुरुस्त करे।

 

स्वच्छता के अधिकार की समस्याएँ और समाधान पर राज्य स्तरीय विचार-विमर्श की रिपोर्ट

 

मानव मल, अवशिष्ट तरल तथा अवशिष्ट ठोस पदार्थों के सुरक्षित निपटान के लिये बेहतर प्रबन्धन व्यक्तिगत व सामुदायिक स्वच्छता को बढ़ावा देता है जिससे ही स्वच्छ वातावरण और स्वस्थ समाज का निर्माण सम्भव है। स्वच्छता के मामले में मध्य प्रदेश की स्थिति बहुत ही खराब है। मध्य प्रदेश में 69.99 फीसदी परिवार खुले में शौच करते हैं जिसमें 86.42 फीसदी ग्रामीण परिवार शामिल हैं। वंचित समुदाय के बीच में स्थिति तो और भी चिन्ताजनक है। कुल अनुसूचित जनजाति के 90.8 फीसदी और कुल अनुसूचित जाति के 77.94 फीसदी परिवार खुले में शौच करते हैं। स्वच्छता के सन्दर्भ में सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य को प्राप्त करने में यह प्रगति बहुत ही धीमी है। वर्ष 2001 में ग्रामीण क्षेत्र में खुले में शौच की स्थिति 91 फीसदी से वर्ष 2001 में 88 फीसदी तथा शहरी क्षेत्र में वर्ष 2001 में 32 फीसदी से वर्ष 2011 में 27 फीसदी तक हुई है। यह दर्शाता है कि पिछले 10 वर्षों में मामूली सुधार हुआ है। प्रदेश की अधिकांश लगभग 7.2 करोड़ आबादी खुले में शौच करती है।

 

खुले में शौच के कारण मानव मल से पानी का प्रदूषण और प्रदूषित पानी से मानव जीवन पर खतरे की बड़ी सम्भावना होती है। मानव जीवन को प्रभावित करने वाली 80 फीसदी बीमारियाँ जलजनित होती हैं जिसका प्रमुख कारण जल का प्रदूषण है। प्रदेश में निम्न स्वास्थ्य स्तर तथा बच्चों के कुपोषण के प्रमुख कारणों में डायरिया की बीमारी जल प्रदूषण से ही होती है। स्वास्थ्य से स्वच्छता का जुड़ाव होने के कारण स्वास्थ्य के अधिकार को प्राप्त करने के लिये स्वच्छता के अधिकार का होना बहुत ही जरूरी है। महिलाओं की मर्यादा, मान-सम्मान और अधिकार में भी स्वच्छता का मुद्दा शामिल है। खुले में शौच के कारण महिलाओं को विभिन्न असुरक्षाओं के साथ-साथ असम्मानजनक स्थितियों से गुजरना पड़ता है और इसी समय उनके प्रति अपराध और हिंसा भी होते हैं। प्रदेश के स्कूलों में बनाए गए 91 फीसदी शौचालय और मूत्रालय संरचना में टूट-फूट, पानी की अनुपलब्धता, रख-रखाव के अभाव के कारण बेकार पड़े हुए हैं। पढ़ने वाली बालिकाओं का पढ़ाई छोड़ने का एक कारण स्कूलों में शौचालय की सुविधाओं का अभाव भी होता है, जिससे शिक्षा का अधिकार प्रभावित है। स्वच्छता का मुद्दा स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला, बच्चों और विभिन्न वर्गों से जुड़े होने के कारण उनके मानवाधिकारों को प्रभावित करता है।

 

स्वच्छता को प्राप्त करने के लिये राज्य व केन्द्र सरकार के द्वारा प्रयास किये जा रहे हैं। राज्य के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की मर्यादा को केन्द्रित कर सुरक्षित स्वच्छता को प्रोत्साहित करने के लिये मर्यादा अभियान संचालित किया गया जो राष्ट्रीय स्तर के जल, स्वच्छता व सफाई कार्यक्रम जैसे राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम और निर्मल भारत अभियान पूर्व में सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान का सम्पूरक है। इन योजनाओं के माध्यम से समुदाय जल, स्वच्छता और सफाई की सुविधाओं को प्राप्त कर सकते हैं। पूर्व में सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान जो अभी निर्मल भारत अभियान का स्वरूप लिये हुए है केन्द्र सरकार के द्वारा संचालित किया जा रहा है तो मध्य प्रदेश सरकार के द्वारा मर्यादा अभियान संचालित है। सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता के लिये भारत सरकार के दिशा-निर्देशों में स्थानीय स्तर पर जल और स्वच्छता के संचालन, रख-रखाव व प्रबन्धन स्थानीय सरकार अर्थात पंचायतों को सौंपने पर बल देता है और इसके लिये पंचायत स्तर पर ग्राम जल व स्वच्छता समिति और तदर्थ समितियों का गठन किया गया। व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर स्वच्छता को प्रोत्साहित करने के लिये सरकार के द्वारा धन खर्च किया जा रहा है।

 

हालांकि पंचायतों की कमजोर स्थिति, संस्थागत क्षमता का अभाव और जल व स्वच्छता की सुविधाओं को प्राप्त करने के लिये जागरुकता के अभाव, खराब योजना, योजना के क्रियान्वयन के देख-रेख के अभाव के कारण ज़मीनी स्तर पर इन योजनाओं को लागू करने में बहुत सारी खामियाँ देखने को मिलती हैं। एक अध्ययन के मुताबिक स्वच्छता के कवरेज को लेकर सरकार के आधिकारिक वेबसाइट पर दिये गए आँकड़ों और वास्तविकता में बनाए गए शौचालयों की संख्या में भयानक अन्तर लगभग 60 फीसदी का पाया गया है। सरकार की रिपोर्ट में जिन ढेर सारे परिवारों में शौचालय का निर्माण बताया गया है।  वास्तविकता में उन घरों में शौचालय ही नहीं है। जिन घरों में वास्तव में निर्माण किया गया वहाँ पर मानक के विपरीत कार्य करने के कारण उनकी उपयोगिता न्यून है। स्वच्छता को लेकर ओवर रिपोर्टिंग का मामला विकास के लिये आये धन के दुरुपयोग और कर्तव्यस्थ पदाधिकारियों की लापरवाही को दर्शाता है। पंचायत स्तर पर सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान के कार्यान्वयन के लिये जवाबदेह स्थानीय समिति, ग्राम जल व स्वच्छता समिति तथा तदर्थ समितियों मे 80 फीसदी निष्क्रिय हैं। स्वस्थ जीवन की मुख्य चाबी सम्पूर्ण स्वच्छता को प्राप्त करने और मानव मल के सुरक्षित निपटान के लाभ के सन्दर्भ में स्पष्टता के अभाव के कारण समुदाय काफी हद तक उदासीन और प्रभावित है। सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान का मुख्य उद्देश्य स्वच्छता के लिये ग्रामीणों में अच्छी आदतों को विकसित करना था किन्तु यह बहुत ही मुश्किल है क्योंकि इसको व्यापक जनजागरण की बजाय शौचालय निर्माण तक ही इसको सीमित कर दिया गया।

 

ऐसी विषम परिस्थितियों में स्वैच्छिक हस्तक्षेप बहुत ही लाज़िमी हो जाता है जिससे कि व्यापक जागरुकता के माध्यम से स्थानीय सरकार को जवाबदेह बनाकर लोगों की पहुँच स्वच्छता की सुविधाओं तक सुनिश्चित कर स्वच्छता के अधिकार को प्राप्त किया जा सके और स्वच्छ वातावरण के माध्यम से स्वस्थ समाज का निर्माण किया जा सके। इन्हीं सन्दर्भों को लेकर इस राज्य स्तरीय विचार-विमर्श का आयोजन किया गया है। घर-घर के लिये सुरक्षित पेयजल और स्वच्छ शौचालय के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये समाज के विभिन्न मुद्दों पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकार साथियों के साथ सलाह मशविरा कर स्वच्छता के अधिकार को प्राप्त करने के लिये रणनीति बनाकर जनपहल और जनपैरवी किया जा सके।

 

साभार : लोक विकास एवं अनुसन्धान ट्रस्ट, मार्च 2015

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