ससुराल में बढ़ गया मेरा मान

Sunday, October 25, 2015 - 09:40

राजु कुमार

 

‘‘मेरी शादी को 7 साल हो गए, पर ससुराल से कोई भी मेरे मायके नहीं आना चाहता था। मेरे मायके में शौचालय नहीं था। ससुराल में लोग शौचालय का उपयोग करते हैं और मेरी देवरानियों के घर भी शौचालय है। मैं खुद भी ससुराल वालों को मायके बुलाने में हिचकती थी। बच्चे भी नाना-नानी के घर नहीं जाना चाहते थे। दूसरे रिश्तेदारों के घर सभी लोग बार-बार जाना पसन्द करते थे। मुझे ससुराल में शर्मिन्दगी झेलनी पड़ती थी। पर अब ऐसा नहीं है। पिछले साल मेरे मायके में भी शौचालय बन गया। इस बार मेरे बच्चे भी साथ आए हैं। अब ससुराल में मेरा मान बढ़ गया है। अब मैं किसी को भी अपने मायके शान से बुला सकती हूँ। यहाँ अब उन्हें शौच के लिए परेशानी नहीं होगी।’’ यह कहते हुए मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के चिचोली विकासखण्ड के चूनागोसाई गाँव की सुश्री शारदा भारती के चेहरे पर खुशी की झलक दिखाई पड़ती है। उनका ससुराल बैतूल में है और अब वे नियमित अंतराल पर मायके जाती रहती हैं। चूनागोसाई के गोपालपुरी गोस्वामी की बेटी हैं शारदा भारती।

 

चूनागोसाई बैतूल जिले का पहला गाँव है, जिसे खुले में शौच से मुक्त घोषित किया गया है। चूनागोसाई पंचायत में चार गाँव - चूनागोसाई, गवाझड़प, बाल्हईमाल, बाल्हई रैयर आते हैं। चूनागोसाई को सबसे पहले खुले में शौच से मुक्त कराने पर प्रशासन ने ध्यान केन्द्रित किया। 137 परिवार वाले इस गाँव की कुल जनसंख्या 698 है। यहाँ के मेट, सरपंच, सचिव और प्रेरकों ने उज्जैन और भोपाल में समुदाय आधारित समग्र स्वच्छता का प्रशिक्षण लिया और गाँव में आकर उस पर गम्भीरता से अमल किया। इसका परिणाम यह हुआ कि शौचालय विहीन गाँव में महज छह महीने के प्रयास से सौ फीसदी सफलता हासिल कर ली है। सरपंच श्रीमती सुखवती उइके बताती हैं, ‘‘पिछले साल 19 नवम्बर को विश्व शौचालय दिवस पर गाँव को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया गया था। यह गाँव जिले का पहला खुले में शौच से मुक्त गाँव है। उस दिन गाँव में रैली निकाली गई थी। जिले के अधिकारी भी आए थे।’’

 

प्रेरक अभय मालवी बताते हैं, ‘‘जब अभियान चलाया, तब शुरू में काफी मुश्किलें आईं। बुजुर्ग लोग सबसे ज्यादा आना-कानी कर रहे थे। बच्चे एवं महिलाएँ सबसे पहले इसके लिए राजी हुए। पर हमने काम को रोका नहीं। शौचालय निर्माण सम्बन्धी सामग्री की उपलब्धता गाँव में ही सुनिश्चित कराई। लोग जैसे-जैसे तैयार होते गए, शौचालय का निर्माण बढ़ता गया।’’ स्वच्छता दूत राजकुमार मालवी कहते हैं, ‘‘हमने शुरू में 5 बैठकें की थी। उसके बाद मोहल्ला के अनुसार निगरानी समिति बनाई। बाहर शौच जाने से रोकने, उन्हें समझाने और शर्मिन्दा करने का काम भी समूह ने किया। समूह के सामने परेशानियाँ भी आईं क्योंकि उनमें से कई के घरों में शौचालय नहीं थे। सबसे पहले समूह के लोगों ने शौचालय का निर्माण किया, जिससे दूसरे लोग प्रेरित हुए।’’

 

निगरानी समूह की सदस्य और वर्तमान में पंच निर्वाचित श्रीमती सुनीता बताती हैं, ‘‘हमने महिलाओं की बैठकें आयोजित की। उसमें महिलाओं से मर्यादा और सुरक्षा को लेकर बातचीत की गई। बहू और बेटियों की इज्जत पर बात हुई। फिर सब शौचालय के लिए तैयार हो गए।’’ गाँव के 70 साल के एक बुजुर्ग मनु शौचालय बनाने के लिए तैयार ही नहीं थे। समझाने वाले ग्रामीणों के साथ वे उलझ पड़ते थे। आखिरकार जब पूरे गाँव में शौचालय बन गया, तो वे जनदबाव में राजी हो गए। अब मनु कहते हैं, ‘‘मुझे शुरू में लगता था कि शौचालय की क्या जरूरत है। पर जब देखा कि सभी ने बनवा लिए और गाँव भी साफ दिखने लगा, तो मैं भी मान गया। पंचायत के पूर्व सचिव वियज मालवी ने कई बार मुझसे बोला था, पर मैं साफ इनकार कर देता था। उसने गाँव में शौचालय के लिए बहुत मेहनत की।’’

 

चूनागोसाई को जिले का पहला खुले में शौच से मुक्त गाँव बनने का गौरव तो मिल गया है, पर गाँव में पानी की समस्या बनी हुई है। ग्रामीण चाहते हैं कि नल-जल योजना से उनके गाँव में घरों तक पानी की सप्लाई हो, जिससे कि उनकी परेशानी दूर हो जाए। हैंडपम्प के सहारे पानी की व्यवस्था करना उनके लिए मुश्किल होता है। सुश्री शारदा भारती भी कहती हैं कि घर में रिश्तेदारों के आने पर भले ही शौच के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता है, पर पानी की व्यवस्था में पूरे दिन लगा रहना पड़ता है।

 

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