अस्वच्छता जनित बीमारियाँ एवं उनसे बचाव

Thursday, June 25, 2015 - 16:49

अस्वच्छता जनित बीमारियाँ

बचाव उपचार से बेहतर है। यदि हम ठीक से भोजन करें और अपनी, अपने घर की, अपने मोहल्ले की और अपने गाँव की सफाई का उचित ध्यान रखें तो बहुत से रोगों से बचा जा सकता है। इनमें से मुख्य रूप से अतिसार, मोतीझरा गैस्ट्रोइन्ट्राइटिस (आंत्र शोध), पेचिश, पीलिया, हैजा, पेट में कीड़े जैसे पेट सम्बन्धी रोग या चमड़ी व आँख के विभिन्न संक्रमण हैं।

 

मल जनित रोग कैसे फैलते हैं

संक्रमण फैलाने वाले कीटाणु मल से मुँह तक कैसे पहुँचते हैंः संक्रमित व्यक्ति के मल में हजारों की संख्या में कीटाणु एवं कीड़ों के अण्डे पाये जाते हैं। गन्दे हाथों, अंगुलियों या प्रदूषित भोजन एवं पानी द्वारा यह मुँह तक पहुँचते हैं।

 

दस्त उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं को मल से मुँह तक पहुँचने के कई रास्ते हैं

1. शौच के बाद यदि हाथ साबुन और पानी से न धोए जाएँ और अंगुलियों को मुँह में डाल दिया जाए तो शरीर में कीटाणु पहुँच जाते हैं। बच्चों को यह खतरा विशेष रूप से है।

मल-अंगुलियाँ-मुँह

2. यदि शौच के बाद बगैर हाथ धोएँ खाना बनाया जाए या खाया जाए या परोसा जाए तो भी कीटाणु शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

मल-अंगुलियाँ-भोजन-मुँह

3. अक्सर भोजन मक्खियों द्वारा प्रदूषित हो जाता है। मक्खियाँ जब मल में बैठने के उपरान्त भोजन में बैठती हैं तो वे अपने साथ लाए मल में उपस्थित कीटाणुओं से उसे दूषित कर देती हैं। ऐसे भोजन के सेवन से कीटाणु शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

मल-मक्खियाँ-भोजन-मुँह

4. यदि खाने वाले बर्तनों में मक्खियाँ बैठे या गन्दे हाथ लगाए जाएँ तो वे भी गन्दे हो जाते हैं। ऐसे बर्तनों में खाने से कीटाणु शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

मल-अंगुलियाँ/ मक्खियाँ-बर्तन-मुँह

5. पानी के स्रोत के निकट मल त्यागने से पानी प्रदूषित हो जाता है। ऐसे पानी को पीने से कीटाणु शरीर में प्रवेश करते हैं।

मल-मिट्टी-पानी-मुँह

6. यदि शौचालय पानी के स्रोत से 20 मीटर के दायरे के अन्दर है तो मल से दूषित पानी रिसकर भूमिगत पानी को दूषित कर देता है। जब यह भूमिगत पानी कुएँ या हैन्ड-पम्प से निकाल कर पिया जाता है तो कीटाणु शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

मल-मिट्टी-पानी-मुँंह

7. लोग खेतों में मल त्याग करते हैं कभी-कभी ताजे मल को खेत में खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। यदि ऐसे खेत से सब्जी लायी जाए और यदि ठीक ढंग से धोए बिना खा लिए जाए तो कीटाणु शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

मल-मिट्टी-भोजन-मुँह

8. खेल के दौरान बच्चे अपने हाथों एवं खिसौनों को प्रदूषित मिट्टी से गन्दा कर लेते हैं। जब वह अपने हाथ व खिलौने को मुँह में डालते हैं, तो कीटाणु शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

मल-मिट्टी-अंगुलियाँ/खिलौने-मुँह

 

अतः मनुष्य के शरीर में अतिसार आंत्रशोध (गैस्ट्रो), मोतीझरा, पीलिया, हैजा इत्यादि के कीटाणुओं के प्रवेश के कई रास्ते हैं।

 

ग्रामीण क्षेत्र में मौसम के अनुरूप दस्त का प्रकोप बढ़ता घटता रहता है। कुछ क्षेत्रों में सूखे मौसम में जल की कमी हो जाने से लोग अपनी स्वच्छता का उचित ध्यान नहीं रख पाते हैं। परिणामस्वरूप दस्त की समस्या बढ़ जाती है। अतः पानी की गुणवत्ता के साथ पानी की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता भी आवश्यक है।

 

कुछ क्षेत्रों में बरसात के मौसम के आरम्भ में दस्त का प्रकोप कुछ अधिक रहता है। इसका मुख्य कारण है कि बरसात के पानी के साथ मल बहकर पानी के स्रोत में मिल जाता है। ऐसे दूषित पानी पीने से दस्त हो जाते हैं।

 

कभी-कभी फसल कटने के समय में भी दस्त की शिकायत ज्यादा होती है। दिन भर मल से दूषित खेतों से काम करने से दस्त से पीड़ित होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

 

मल जनित रोगों से बचाव

मल जनित रोगों से बचाव हेतु आवश्यक है कि मल के कीटाणुओं को मुँह तक पहुँचने से रोका जाए।

1. पीने के लिए स्वच्छ जल प्रयोग करें।

2. शौच के उपरान्त हाथों को साबुन पानी से अवश्य धोएँ। यदि साबुन उपलब्ध न हो तो ताजी राख या साफ रेत का प्रयोग करें।

3. बर्तनों को हमेशा साफ पानी से धोएँ।

4. बर्तनों को धोने के लिए हमेशा साबुन, ताजी राख या साफ रेत का प्रयोग करें।

5. कभी भी मिट्टी से बर्तन व हाथ न धोएँ।

6. हमेशा खाना बनाने व खाने से पहले हाथों को साबुन से धोएँ।

7. कच्ची सब्जी व फलों को अच्छी तरह से स्वच्छ पानी से धोएँ।

8. खाना बनाने व पीने के पानी को हमेशा ढककर रखें।

9. खाने को मक्खियों से बचाएँ।

10. बाजार की खुली चीजें खरीद कर न खाएँ।

11. हमेशा शौचालय का प्रयोग करें।

12. यदि शौचालय नहीं है तो मल त्यागने के बाद उसे मिट्टी से ढक दें।

13. शौचालय को पानी के स्रोत से कम से कम 20 मीटर की दूरी पर बनाएँ।

 

दस्त क्या है

दिन में तीन या चार से अधिक बार पानी जैसी पतली टट्टी होना अतिसार या दस्त है।

 

(क) दस्त एक गम्भीर समस्या

मल, मूत्र एवं पसीने से जो पानी निकलता है वह आमतौर पर भोजन व पानी से पूरा हो जाता है। कभी-कभी दस्त के कारण शरीर से अधिक पानी निकल जाता है। ऐसे में निर्जलीकरण की समस्या हो सकती है। वैसे तो हर उम्र के व्यक्ति को दस्त से निर्जलीकरण हो सकता है लेकिन कम उम्र के लगभग 15 लाख बच्चे दस्त से उत्पन्न होने वाले निर्जलीकरण से मरते हैं।

 

(ख) निर्जलीकरण के लक्षणः

प्रारम्भिक लक्षणः

1. पतले दस्त

2. बुखार भी हो सकता है

3. उल्टी भी हो सकती है

4. पेट में मरोड़ भी हो सकता है

 

बाद के लक्षणः

1. अत्यधिक प्यास

2. मुँह, होंठ व जीभ, सूख जाते हैं

3. कमजोरी

 

तीव्र निर्जलीकरण के लक्षणः

1. अत्यधिक कमजोरी

2. आँख धँसना

3. तेज या कमजोर नब्ज चलना

4. चमड़े का लचीलापन कम हो जाना

5. मूत्र न होना

6. रोने पर बच्चे को आँसू नहीं आना

7. गोदी वाले शिशु (बच्चे) का तालू धँस जाना

 

(ग) उपचार

दस्त के लक्षण देखते ही शरीर में पानी की मात्रा बनाए रखने के लिए उपचार आरम्भ कर देना चाहिए।

1. दस्त के दौरान थोड़ी-थोड़ी देर में ओ.आर.एस का घोल मरीज को पिलाते रहना चाहिए। ओ.आर.एस का पैकिट प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं दवा की दुकान पर उपलब्ध होता है।

2. सुरक्षित पेयजल का प्रयोग करें,

3. बच्चे को स्तनपान कराते रहना चाहिए।

 

खाने-पीने के लिए निम्नलिखित खाद्य पदार्थ दे सकते हैंः

1. चावल का माँड़

2. पतली दाल

3. पतली लस्सी/ छाछ

4. फलों का रस

5. नींबू का पानी

6. हरे नारियल का पानी

 

(घ) अस्पताल में भर्ती कराना

दस्त से शरीर में पानी की कमी हो जाती है। अतः दस्त के दौरान तरल पदार्थ तथा ओ.आर.एस पिलाना जारी रखें। यदि घर पर किए गए उपायों से दस्त नियंत्रण में नहीं आता है और मरीज में उल्टी, बुखार औऱ निर्जलीकरण के लक्षण बरकरार है तो उसे उपचार हेतु अस्पताल ले जाए।

 

पीलिया या छुतहा यकृत शोध (इंफेक्टिव हेपेटाइटिस)

पीलिया एक विषाणु का संक्रमण है जो यकृत (जिगर) को नुकसान पहुँचता है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को भूख लगनी बन्द हो जाती है। खाना देखने या उसकी महक से ही उल्टी हो सकती है। थोड़ा बुखार हो सकता है और कुछ दिनों बाद आँखे पीली पड़ जाती है। पेशाब गहरी भूरी या पीली हो जाती है। यह रोग कभी-कभी बहुत गम्भीर भी हो सकता है। यह रोग एक व्यक्ति से दूसरे में मल से होकर मुँह द्वारा शरीर में प्रवेश करता है। यह अक्सर महामारी के रूप में उभरता है। अतः ध्यान रहेंः

1. बीमार व्यक्ति के मल का सुरक्षित रूप से निस्तारण हों

2. बीमार व्यक्ति की देखभाल करने वाले व्यक्ति को हाथ साबुन से धोने चाहिए

3. शौच के बाद साबुन और साफ पानी से हाथ धोना चाहिए

4. पानी को कम से कम 20 मिनट उबाल कर प्रयुक्त करना चाहिए

5. बाजार का खुला खाद्य पदार्थ खरीद कर न खाएँ।

 

मोतीझरा (टायफाइड)

यह रोग जो व्यापक रूप में फैलता है, दूषित पानी एवं भोजन के कारण होता है। इसके कीटाणु भी टायफाइड के रोगी के मल में पाए जाते हैं। यह कीटाणु स्वस्थ व्यक्ति के मुँह से प्रवेश करके उसे भी बीमार कर देते हैं।

 

यह रोग सर्दी-जुखाम या फ्लू की तरह प्रारम्भ होता है। बुखार रोज थोड़ा-थोड़ा बढ़ता जाता है और नब्ज धीमी गति से चलती है। कई बार उल्टियाँ लग जाती हैं। दस्त लग जाते हैं या कब्ज हो जाता है। मरीज को बहुत कमजोरी आ जाती है और वह कंपकंपी महसूस करता है।

 

अक्सर परेशानियाँ बीमारी के तीसरे या चौथे हफ्ते प्रकट होती हैं जब मरीज ठीक होता सा दिखता है। आँतों में घाव के कारण रक्तस्राव भी हो सकता है और कभी-कभी आँत में कटाव भी हो जाते हैं। अतः ध्यान रहेः

 

1. मोतीझरा से बचाव के लिए भोजन एवं पानी को मल से दूषित होने से बचाएँ।

2. मेला और बाजार में खुले बिकने वाले खाद्य पदार्थ न खाएँ।

3. पीने वाले पानी की स्वच्छता पर विशेष ध्यान दें।

4. व्यक्तिगत स्वच्छता पर ध्यान दें।

5. सुरक्षित रूप से मल निपटान सुनिश्चित करें।

 

आँत के कीड़े (कृमि)

ज्यादातर लोगों के आँतों में एक या अन्य प्रकार के कीड़े रहते हैं। ये कीड़े या उनके अण्डे मल से निकलते हैं। लोगों में कीड़ों का प्रवेश कीड़ों या उनके अण्डों द्वारा होती है। आमतौर पर दूषित पानी या भोजन द्वारा कीड़े के अण्डे शरीर में प्रवेश करते हैं। ये कीड़े आँतों में रहते हैं जहाँ भोजन और पोषक तत्वों के लिए संघर्ष करते हैं। इसके कारण पोषण में कमी हो जाती है। परिणाम स्वरूप कीड़े अन्य रोगों के प्रति शरीर की रक्षात्मक शक्ति को कम कर देते हैं।

 

कीड़ों (कृमि) की कई किस्में होती हैे जैसे- अंकुश कृमि (हुक वर्म), गोल कृमि (राउंड वर्म), सूत्र कृमि (थ्रैड वर्म) और फीता कृमि (टेप वर्म) हैं। सब कीड़े शरीर में अलग प्रकार से प्रवेश करते हैं। इनसे बचने के लिए निम्न कदम उठाने चाहिएः

1. व्यक्तिगत स्वच्छता पर ध्यान दें।

2. शौचालय का प्रयोग करें।

3. शौचालय साफ रखें।

4. शौच के बाद हाथ साबुन से धोएँ।

5. कच्ची सब्जी व फल को ठीक से स्वच्छ पानी से धोएँ।

6. खुले में मल न त्यागें या ताजे मल को खाद के रूप में खेतों में न प्रयोग करें।

7. मल को छः से बारह महीने तक कम्पोस्ट करने के बाद ही प्रयोग करें।

8. खेत में हमेशा जूता या चप्पल पहनकर जाएँ।

9. माँस मछली हमेशा ठीक से पकाकर खाएँ।

10. दस्त एवं कीड़ों से बहुत हद तक बच सकते हैं यदि पीने, दाँत साफ करने, मुँह धोने, सब्जी और फल धोने एवं खाने के बर्तन को धोने के लिए स्वच्छ पानी का प्रयोग किया जाए।

11. समय-समय पर स्वास्थ्य कार्यकर्ता की सलाह लेकर कीड़े समाप्त करने की दवा का प्रयोग करें।

 

चमड़ी (त्वचा) रोग

कुछ बीमारियाँ संक्रमित व्यक्ति को छूने या उसके कपड़े, बिछौने तथा तौलिया प्रयोग करने से फलते हैं जैसे- खुजली (स्केबिज) या रिंग वर्म। अतः ध्यान रहेः

1. रोज स्वच्छ पानी से नहाएँ। गन्दे व प्रदूषित तालाब के पानी से नहाने से चमड़ी का संक्रमण हो सकता है

2. रोज स्वच्छ पानी से नहाएँ। गन्दे व प्रदूषित तालाब के पानी से नहाने से चमड़ी का संक्रमण हो सकता है

3. शौच के लिए स्वच्छ जल का प्रयोग करें। लोग अक्सर गड्ढे के गन्दे पानी का प्रयोग करते हैं, जिससे संक्रमण की सम्भावना बढ़ जाती है।

4. दूसरों का तौलिया, कपड़ा या बिस्तर न प्रयोग करें

5. कपड़े साफ पानी से धोकर धूप में सुखाएँ

 

आँख के संक्रमण

रोहें या ट्रकोमा- रोहें या ट्रकोमा भारत में एक व्यापक रूप से पाया जाने वाला आँख का संक्रमण है। यदि इसका इलाज न कराया जाए तो अंधापन तक हो सकता है। यह संक्रमित व्यक्ति के रुमाल या तौलिया के प्रयोग से फैलता है। मक्खियाँ भी संक्रमित व्यक्ति तक यह रोग फैलाती है।

 

कन्जक्टिवाईटिस (आँखे आना)- इसमें आँख लाल हो जाती है और आँखों से पानी बहता है। यह ट्रकोमा की तरह फैलता है। अतः ध्यान रहेः

1. दूसरे का तौलिया या रुमाल इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

2. मक्खियों को पनपने से रोकने के लिए पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाएँ।

3. चेहरे पर मक्खियाँ न बैठने दें।

4. रोज स्नान करते समय अपना चेहरा और आँख भी स्वच्छ पानी से धोएँ।

 

मच्छर द्वारा फैलने वाले रोगः

मलेरिया, फाइलेरिया और डेंगू जैसे रोग मच्छर से फैलते हैं। अतः आवश्यक है कि इन बीमारियों से बचने के लिए घर, मोहल्ले एवं गाँव में भी पानी का जमाव होने से रोका जाए, क्योंकि यहीं पर मच्छर पनपते हैं। ध्यान रहेः

1. टूटी बोतलों, डब्बों तथा टायर आदि में बरसात के पानी का जमाव न होने दें।

2. यदि घर के आस-पास के घास में पानी जमा हो सकता है तो उसे कटवा दें।

3. पानी के बर्तनों टैंकों, घड़ों आदि जिसमें पानी जमा करते हैं उसे ढककर रखें।

4. हर चार दिन के उपरान्त खुले पानी के बर्तनों को खाली कर दें। यह मच्छर के अण्डे को पानी विकसित होने से रोकेगा।

 

साभार : स्वच्छता कार्यकर्ता सहायक पुस्तक

TAGS